Monday, 3 August 2020

हिंदी का प्रथम पशु चरित्र केंद्रित उपन्यास 'रीफ'


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भारती पाठक 


[ इस कालम के अंतर्गत मैं एक पाठक की हैसियत से किताब को आपके साथ पढ़ने और पढ़े हुए को शेयर करने का प्रयास करती हूं । हम सभी जानते हैं कि आज हिंदी जगत में इतनी खेमेबंदी हो चुकी है कि किताब का पठन-पाठन छूट गया है, बस उन पर अपने वैचारिक फ्रेम से फतवेबाजी अधिक की जाती है । इससे पाठक दिग्भ्रमित हो जाते हैं और स्वतंत्र रूप से पुस्तक में लिखे का न तो अध्ययन कर पाते हैं, न आनंद ले पाते हैं । इसलिए मेरी तो कोशिश है कि पुस्तक में क्या है, यही सार संक्षेप में आपके सामने रखूं, अच्छा-बुरा तो आप जानें।]

कुछ दिन पहले ही मिले इस छोटे से उपन्यास को पढना शुरू किया तो ख़त्म किये बिना रोक नहीं पाई खुद को और उसके बाद पूरी रात स्मृतियों को टटोलते अजीब सी बेचैनी में कटी । सच है कभी-कभी जीव-जंतु भी परिवार के सदस्यों की भाँति हृदय में अपने प्रेम और स्नेह की जड़ें इतनी गहरी जमा लेते हैं कि जीवन उनके ही इर्द-गिर्द मंडराता रहता है और अपने जाने पर वे ऐसा खालीपन दे जाते हैं जिसे भरने की कोई युक्ति नहीं सूझती क्योंकि उनका स्थान कोई नहीं ले सकता।


यह कहना जरूरी है कि हमारा समय कुल मिलाकर मनुष्य और मानव-समाज केंद्रित समय है जिसमें हमने मानव से इतर प्राणियों, प्रकृति और परिवेश को केवल मनुष्य की उपयोगिता और स्वार्थ की दृष्टि से देखा है। इसमें जहां एक ओर प्रकृति का विनाश हुआ है वहीं मनुष्येतर प्राणी जगत के प्रति संवेदनहीनता बढ़ी है। इस तरह के अतिचारों के चलते ब्रह्मांड में बहुत सा असंतुलन पैदा हो गया है । आज जिस तरह मनुष्य सभ्यता महामारी की चपेट में है तो यह उचित समय है इन मानवीय विचलनों पर गंभीरता से विचार करने का और यदि संभव हो तो उसमें कुछ बदलाव लाने का। यह बिना व्यापक मानवीय संवेदनशीलता के संभव नहीं है।

इसी विस्तारित मानवीय संवेदनशीलता को व्यावहारिक रूप में प्रतिफलित करते हुए डॉ. गणेश पांडेय जी ने “रीफ” नाम का यह उपन्यास लिखा है जिसका वास्तविक नायक मनुष्य नहीं पशु चरित्र है । आज उसी की चर्चा हमें करनी है।

गणेश पाण्डेय जी हिंदी के उन लेखकों में हैं जो लेखक के जीवन और लेखन की शुचिता को न केवल स्वयं के लिए महत्वपूर्ण मानते हैं बल्कि इसके लिए संघर्षरत भी हैं। उनका मूल मंत्र है कि एक लेखक को नाम-इनाम-प्रचार-विज्ञापन से अधिक अपने ईमानदार व्यक्तित्व और लेखन के बल पर रहना है। नए-पुराने लेखक उनके इस संघर्ष से बल पाते हैं।

गणेश जी का जन्म १३ जुलाई १९५५ को सिद्धार्थनगर जनपद ( तत्कालीन बस्ती जनपद ) के तेतरी बाज़ार में हुआ । साहित्य में गहरी रूचि थी तो गोरखपुर विश्वविद्यालय से हिंदी में एम. ए. फिर डाक्टरेट किया । कुछ वक्त पत्रकारिता से जुड़े रहे । प्रोफैसर के रूप में गोरखपुर विश्वविद्यालय से रिटायर हुए। एक कवि, कथाकार और आलोचक के रूप में ख्यातिप्राप्त पाण्डेय जी साहित्यिक पत्रिका ‘यात्रा’ का सम्पादन और अपने स्वयं के ब्लॉग का संचालन भी करते हैं । इनकी कविताओं के कई संग्रह, जैसे ‘अटा पड़ा था दुःख का हाट’, ‘जापानी बुखार’ और ‘परिणीता’ के अलावा कहानी संग्रह ‘पीली पत्तियां’, उपन्यास ‘अथ ऊदल कथा’, ‘रीफ’ और कई आलोचना की पुस्तकें भी प्रकाशित हो चुकी हैं।

आज हम उनके उपन्यास रीफ को पढ़ेंगे।

गणेश पाण्डेय जी द्वारा लिखा गया यह छोटा सा उपन्यास “रीफ” पढ़ने के बाद मन कुछ ऐसी ही वेदना से भर गया कि मुझे लगता है कुछ लिखा नहीं उसके लिए तो रीफ को भी बुरा लगेगा । सबसे पहले तो ये नाम ही इतना खींचता है, अनोखा लगता है कि इसका अर्थ जानने की उत्कंठा होती है । तो रीफ का मतलब है “शिलाखंड या समुद्री चट्टान”।

उपन्यास शुरू होता है घर में रीफ को लाये जाने से । लेखक कुत्तों से बेहद डरता है और इसके बिल्कुल पक्ष में नहीं कि कोई कुत्ता पाला जाए क्योंकि रिश्तेदार के घर में कुत्तों के साथ उसका अनुभव कुछ खास अच्छा नहीं रहा है । पत्नी और बच्चों की इच्छा जानकर किन्हीं भावनात्मक क्षणों में वह मान जाते हैं और इस तरह रीफ का घर में आगमन होता है । रीफ का घर में आना किसी कुत्ते का आना नहीं बल्कि परिवार में एक नए बच्चे के आगमन जैसा है । जिसे लेखक की पत्नी कुशी जी माँ के रूप में मिलती हैं और तीनों बच्चे उसे छोटे भाई के रूप में स्वीकारते हैं ।

लेखक से रीफ का पहला साक्षात्कार – “बरामदे में उनका पहला डग...कभी फर्श पर कभी आसपास...थोडा इधर उधर....मेरे पैरों को दूर से देख कर पलभर के लिए ठिठकना....फिर चिकचिक की ओर देखना....जैसे चिकचिक से पूछ रहा हो यही हैं खडूस डैडी...छू लूँ इनके पैर...नहीं बाबू अभी नहीं । रीफ साहब अपनी दीदी की गोद में आकर कभी इधर कभी उधर देख लेते हैं । रीफ की छोटी-छोटी आँखों में पहली बार मुझे ऐसा कुछ दिखा कि मेरा डर जाता रहा ।”

रीफ डाबरमैन ब्रीड का कुत्ता है जिसकी पूंछ कटवानी पड़ती है तो अगले ही दिन बच्चे उसे डॉक्टर के पास ले जाकर पूँछ कटवा देते हैं । इन जानकारी से बेखबर लेखक के लिए रीफ का पूँछ काटना अत्यन्त पीड़ादायक है जिसे वो हृदय से महसूसते हैं । उसका हृदय विद्रोह कर रहा है । उसकी इच्छा होती है कि जाकर उस निर्दयी डॉक्टर को उल्टा लटका दे जिसने रीफ की नाजुक पूंछ बिना एनेस्थीसिया दिए काट दी है । फिर वह आश्चर्य चकित है स्वयं पर कि “यह क्या हो गया है मुझे कि एक पिल्ले की कटी पूँछ के लिए इतना विकल हो गया हूँ ।”

यानि शुरू में उससे खिंचे-खिंचे रहते लेखक भी आखिर उसकी बाल सुलभ चंचलताओं के मोहपाश से बच नहीं पाते और उसकी ओर खिंचने लगते हैं । रीफ परिवार ही नहीं पूरे मोहल्ले में सबका दुलारा है और एक अच्छे बच्चे की तरह लेखक को घर का मुखिया ही समझ कर अनुशासन का पूरा ध्यान रखता है । रीफ की हर हरकत को देखते लेखक उसी के नजरिये से सोचते हैं और उसके दर्द और ख़ुशी को भी महसूस करते हैं ।

रीफ में अच्छी आदतें कैसे डाली जायं, रीफ को खाने में क्या पसंद, रीफ की पसंदीदा मिठाई कौन सी, रीफ को आइसक्रीम कौन सी पसंद, रीफ को मुर्गा ज्यादा पसंद तो उसमें भी कटौती नहीं होनी चाहिए यानि जैसे छोटे बच्चे के जन्म लेने पर उसकी छोटी-छोटी जरूरतों और पसंद-नापसंद को लेकर परिवार की दुनिया उसी के इर्द-गिर्द सिमट जाती है ठीक वैसे ही लेखक के परिवार की दुनिया में रीफ सबसे अधिक महत्वपूर्ण स्थान पर काबिज हैं । इन सारी बातों का लेखक ने बड़े ही सरल शब्दों में क्रमवार वर्णन किया है जिसमें प्रेम है, संवेदना है, और है एक मानवेतर प्राणी को अपने से अलग न समझने का गहरा भाव ।

किताब को पढ़ते हुए बार-बार महादेवी वर्मा के संस्मरण संग्रह ‘मेरा परिवार’ का स्मरण हो आता है जिसमें उनके जीव प्रेम और उनसे जुडी यादों का विस्तृत विवरण है और जिसका परिचय मैं इसी कालम में दे चुकी हूं । लेकिन रीफ के इस विवरण में उससे कहीं अधिक बल्कि एक तरह की सजीवता और गहरी आत्मीयता महसूस होती है जिसमें पाठक खुद को बंधा और प्रेम विगलित पाता है ।

लेखक कहते हैं कि कुल मिलाकर ‘रीफ और घरवालों के बीच जो पक रहा है वो अकथ है । उसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है वो भी उसके द्वारा जो उसे कुत्ता न समझ कर खुद से जोड़ ले, जिसे कुत्तों से घिन न आये और जो उन्हें अपनी तरह प्रेम कर सके ।’

बड़े धूमधाम से रीफ का जन्मदिन मनाया जाता है बिलकुल उसी तरह जैसे घर के बच्चे का जन्मदिन मनाते हैं । रीफ भी परिवार में अपनी अहमियत समझते हैं । खाना कुशी जी के हाथ से ही खाते हैं और उनके स्नेह पर भी पहला अधिकार उन्हीं का हो गया है लेकिन किसी में कोई जलन या इर्ष्या का भाव नहीं है । बच्चों के साथ-साथ रीफ बडा होता है । बच्चों के आगे की तैयारियों के लिए दूसरे शहरों में चले जाने पर रीफ लेखक दम्पति के प्रेम और देखभाल का एकछत्र अधिकारी होता है, वहीँ रीफ भी उनके लिए बच्चों से खाली हुए घर की रिक्तता को भरने का साधन है । रीफ ने पूरी तरह बच्चों की जगह ले ली है ।

लेखक इस प्रेम पर आश्चर्य चकित हैं और कहते हैं कि “ प्रेम के पैर क्यों इतने अशक्त है ? वक्त के साथ प्रेम का रूपान्तर क्यों होता रहता है ? क्यों हम अपने-अपने प्रेम को एक देह की कैद से बाहर निकाल कर प्रकृति और शेष प्राणियों में देखने लगते हैं ? क्या यही प्रेम की उद्दात्तता है ? या प्रेम का पुनर्जीवन ।”

सब कुछ ठीक चल रहा होता है कि जैसे खुशियों पर ग्रहण की तरह कुछ दिनों से रीफ सुस्त रहने लगता है और खाना कम कर देता है । शुरू में छोटी मोटी दवाओं से ठीक करने का प्रयास होता है । फिर डॉक्टरों के चक्कर पर चक्कर, सुइयां दवाइयां, सब बेअसर और दिन-ब-दिन रीफ की गिरती जाती सेहत । मानसिक रूप से टूटते दोनों पति-पत्नी की विकलता और इस मनोदशा से जूझते एक दूसरे से नज़रें चुराते और ढाढस भी बंधाने के भावों को लेखक ने बड़ी खूबसूरती से पिरोया है । कहीं कोई दिखावा नहीं, कोई बनावट नहीं । दुःख असली है, आंसू असली हैं और संवेदना भी असली हैं ।

पथराई आँखों से अपने पालकों को देखता रीफ क्या सोच रहा होगा, अपनी पीड़ा को न बताकर कैसे सह पा रहा होगा और हम उसे इस असहनीय पीड़ा में देख कर भी कुछ करने में असमर्थ हैं ये सवाल लेखक के दुःख को और बढ़ाते हैं । इन सबको महसूस करते मुझे याद आती है महादेवी जी की गौरा गाय की जिसे ग्वाला ईर्ष्यावश गुड के साथ सुई खिला देता है और अब गौरा के पास मृत्यु के दिन गिनने के सिवा कोई आस नहीं । वहां लेखिका की संवेदना अपने भावों के साथ अधिक है न कि गौरा के नजरिये से सोचने की जबकि यहाँ कथा का नायक है रीफ और लेखक सहायक की भूमिका में हैं ।

फिर अंत वही जिसकी कल्पना कोई भी पाठक नहीं चाहेगा, मैं भी नहीं । लेकिन नियति पर किसका वश । तमाम कोशिशों के बाद भी रीफ इस दुनिया को छोड़ अनंत यात्रा पर निकल पड़ता है जहाँ शांति ही शांति है और छोड़ जाता है अपनी यादों से कलपते हृदयों को सदा-सदा के लिए ।

किसी मानवेतर प्राणी पर इतने करीब से और संवेदनशील तरीके से लिखा गया संभवतः यह पहला उपन्यास है जिसने मन को भिगो दिया । उपन्यास का नायक है रीफ और उसी को केंद्र में रख कर लेखक ने कुछ-कुछ जगह-जगह बड़ा अच्छी बातों का तांता लगा दिया है कि “रीफ साहब कभी-कभी अपने गले के पट्टे पर सू-सू क्यों कर देते हैं । यह मैं ठीक-ठीक नहीं जानता । क्या पता रीफ को प्लेटो के ग्रन्थ रिपब्लिक के बारे में पता हो कि उसमें साफ-साफ कहा गया है कि गुलामी मृत्यु से भी भयावह है । स्वतंत्रता के मूल्यों के प्रति ऐसी निष्ठा पशुओं में भी देखा जाना स्वागतयोग्य तो है ही एक पाठ भी है कि भोंपू लेकर हमेशा इन्किलाब-इन्किलाब चिल्लाने और आज़ादी-आज़ादी का तराना गाने से स्वतंत्रता के सच्चे अर्थों की प्राप्ति नहीं होती ।”

ये कहानी सिर्फ रीफ की नहीं मानवीय संवेदना के उस अधिकतम स्तर पर पहुंचे मानव मन की है जब प्रेम की इस भाषा को पढ़ने के लिए विशेष दृष्टि चाहिए, उन भावों को आत्मसात करने के लिए विशेष हृदय चाहिए । यहाँ लेखक की कुछ पंक्तियाँ लिखूंगी जो सच है कि “ठहरे हुए अक्षरों को पढ़ना मामूली बात है । एक पद्धति से आदमी सीख जाता है लेकिन रीफ जैसों की जीवित और गतिशील भाषा और मुद्रओं को पढ़ना मनुष्य की उन्नत संवेदना और विकसित भावतंत्र से जुडी कोई विशिष्ट चीज है जो किसी-किसी के पास होती है ।” उपन्यास की भाषा सरल, सहज बोधगम्य और हम जैसे सामान्य पाठकों के समझने योग्य जो कि इसे पठनीय बनाती है ।

भारी भरकम साहित्य के बोझ से इतर एक पठनीय किताब ।

भारती पाठक





Friday, 31 July 2020

वार्षिक अधिवेशन एवं ई-विश्व कवि सम्मेलन


अखिल विश्व हिंदी समिति, टोरोंटो का 11वाँ वार्षिक अधिवेशन व ई- विश्व कवि सम्मलेन’ 25 जुलाई 2020 शनिवार को प्रातः 10 से सायं 2 बजे (भारतीय समय 7:30 सायं से 11:30 रात्रि) तक कोरोना काल में ज़ूम कांफ्रेंस द्वारा पूर्ण भव्यता, सफलता, साहित्यिक तरंग व आध्यात्मिक संवेदन के साथ संपन्न हुआ। समारोह की मुख्य अतिथि थीं टोरोंटो, कनाडा की भारतीय कोंसलाधीश सम्माननीया अपूर्वा श्रीवास्तव जी। कार्यक्रम के प्रमुख अतिथि थे भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के राजभाषा विभाग के निदेशक श्री वेद प्रकाश गौड़ जी। कार्यक्रम की अध्यक्षता की हिंदी एवं संस्कृति शोध संस्थान के महासचिव व अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति, भारत के राष्ट्र सचिव आगरा से डॉ. श्री भगवान शर्मा जी ने। कनाडा से हिंदी प्रचारिणी सभा के अध्यक्ष व हिंदी चेतनाके प्रमुख संपादक श्री श्याम त्रिपाठी जी कार्यक्रम के उपाध्यक्ष रहे। 

विशिष्ट अतिथि थे नागरी लिपि परिषद, नई दिल्ली, के महासचिव डॉ हरिसिंह पाल जी। अन्तर्राष्ट्रीय हिंदी समिति, भारत के अंतर्राष्ट्रीय महासचिव डॉ प्रवीण गुप्ता व उपाध्यक्ष श्री राजेश गर्ग विशेष अतिथि थे। अखिल विश्व हिंदी समिति, न्यूयॉर्क, सं रा अमरीका के कार्यकारी उपाध्यक्ष डॉ प्रदीप टंडन विशिष्ट अतिथि थे। इस सम्मेलन का आयोजन व संचालन अखिल विश्व हिंदी समिति, आध्यात्मिक प्रबंध पीठ व  मधु प्रकाशन, टोरोंटो के अध्यक्ष व हिंदी साहित्य सभा के महासचिव गोपाल बघेल मधुने किया। प्रमुख सहायक संचालक थे फ़्रीडम योगा व संस्कृत योग सभा, कनाडा के अध्यक्ष आचार्य संदीप त्यागी जी। 

पहले सभी उपस्थित साहित्यिकार व श्रोता परस्पर परिचय किए। ज़ूम पर एक साथ 50 व्यक्ति उपस्थित हुए व कुल मिला कर 75 लोग कार्यक्रम में सम्मिलित हुए। उपस्थित साहित्यकारों में भारत, कनाडा, अमरीका, लन्दन, मॉरीशस, इत्यादि देशों से सहभागिता हुई। कार्यक्रम का शुभारम्भ श्री गोपाल बघेल मधुद्वारा उच्चरित ऋग्वेद की दो ऋचाओं, ‘संग्छध्वं सम्बदध्वंॐ मधु वाता ऋतायतेके शब्द मंत्रों से हुआ ।

सम्मेलन को सर्वप्रथम मुख्य अतिथि सम्माननीया भारतीय कोंसलाधीश अपूर्वा श्रीवास्तव जी ने सम्बोधित किया। उन्होंने पूर्व भारतीय विदेश मंत्री स्व. सुषमा स्वराज जी के साथ अपने व्यक्तिगत सचिव के कार्यकाल के विषय की स्मृति साँझा कीं व साहित्य के प्रसार प्रचार के लिए अपनी विशेष प्रतिवद्धता प्रकट की। उन्होंने सभी साहित्यकारों के अनवरत प्रयासों को सराहा व हार्दिक धन्यवाद दिया व भारतीय कोंसलावास की और से हिंदी के विकास व उन्नयन के लिये हर संभव सहायता देने का आश्वासन दिया। 

आयोजक गोपाल बघेल मधुने उनकी, कोंसल देवेन्द्र पाल सिंह जी व समस्त भारतीय कोंसलावास के अधिकारियों के सहयोग की भूरि-भूरि प्रशंसा की। अनेक वर्षों से टोरोंटो कोंसलावास प्रतिवर्ष हिंदी दिवसआदि पर कार्यक्रम आयोजित करता है जिसका संचालन करने का सौभाग्य गोपाल बघेल मधुव अन्य साहित्यिकारों को मिलता रहा है। इसके बाद मुख्य अतिथि गण आदरणीय श्री वेद प्रकाश गौड़, डॉ श्रीभगवान शर्मा, श्री राजेश जैन, डॉ प्रवीण गुप्ता, डॉ हरिसिंह पाल, श्री श्याम त्रिपाठी व डॉ प्रदीप टंडन एक-एक कर सम्मेलन को संबोधित किए! तत्पश्चात् प्रमुख बीज वक्ताओं प्रोफ़ेसर व डॉ अमर सिंह -छिंदवाड़ा, डॉ अरविंद नवले- नाँदेड़, डॉ. जगन्नाथ प्रसाद बघेल- मुम्बई, श्री पंकज वशिष्ठ प्रियम- अध्यक्ष-साहित्योदय- बाबा धाम, इत्यादि ने सम्मेलन को सम्बोधित किया व अपनी रचनाएँ भी सुनाईं। 

कार्यक्रम में इसके उपरांत 33 से अधिक उपस्थित कवियों ने अपनी मार्मिक व मंत्रमुग्ध करने वाली रचनाएँ सुनाकर श्रोताओं का हृदय तरंगित किया। काव्य पाठ करने वाले कनाडा के प्रमुख कवि गण थे सर्वश्री श्याम त्रिपाठी, विजय सूरी, धर्म जैन, भगवत शरण श्रीवास्तव, गोपाल बघेल मधु’, आचार्य संदीप त्यागी, राज माहेश्वरी जी, इत्यादि। कनाडा की कवयत्रियों में प्रमुख थीं  सर्व श्रीमती मीना चोपड़ा, श्यामा सिंह, सविता अग्रवाल व ऋचा बघेल व डॉ साधना जोशी जी, इत्यादि। 

भारत से काव्य पाठ करने वाले प्रमुख कवि गण थे सर्वश्री डॉ श्रीभगवान शर्मा-आगरा, डॉ अमर सिंह बघेल- छिंदवाड़ा, डॉ अरविंद नवले- नाँदेड़, डॉ जगन्नाथ प्रसाद बघेल- मुम्बई, पंकज वशिष्ठ प्रियम- बाबा धाम झारखण्ड, सुनील गुप्ता श्वेत- मोहाली (अयोध्या), डॉ सुनील जाधव- नाँदेड़, राजपाल पाल- मथुरा, आदि। 

भारत से काव्य पाठ करने वाली प्रमुख कवयत्रियाँ थीं कुमारी वैशाली पाल- शिवपुरी म.प्र., सर्व श्रीमती सुदेष्णा सामंत- हैदराबाद, डॉ कुमुद बाला मुखर्जी- हैदराबाद, डॉ संगीता पाल- कच्छ, डॉ रजनी शर्मा चंदा, डॉ सुशीला पाल, मधु चन्दा- जोधपुर, रेणु बाला- राँची, रेखा पाण्डेय- भुज, निवेदिता चक्रवर्ती- गुरुग्राम, डॉ हीरा मीणा- दिल्ली (जयपुर), इत्यादि। 

ज़ूम अधिवेशन में पधारे अन्य प्रमुख साहित्यकार थे डॉ राजेन्द्र मिलन- आगरा, कनाडा के सुप्रसिद्ध वयोवृद्ध कवि डॉ कैलाश भटनागर व श्रीमती सरोज भटनागर, डॉ रवि पाल - नई दिल्ली, वरिष्ट कवि राजेश जैन राही- छत्तीसगढ़, डॉ.अरविंद पाल भोगन- मैनपुरी, संजय करुणेश -गिरिडीह, विनय अंतवाल- देहरादून, कवि वर श्री अजय गुप्ता- कनाडा, कवयत्री सरोजिनी जौहर- कनाडा, आदि। उनके या हमारे समयाभाव वश या तकनीकी कारणों के कारण इस वार हम उपय़ुक्त समय पा उनकी रचनाएँ नहीं सुन पाए। डॉ साकेत सहाय, श्री राणा हरपिंदर पाल सिंह, सैंधम आस्था पाल जी, श्री रवि शंकर विद्यार्थी, कुँ. अरण्य बघेल स्वारेज- कनाडा, आदि भी उपस्थित रहे।

साहित्यिकारों व वक्ताओं ने अध्यात्म व अन्य विषयों पर अपनी ओजस्वी, सार गर्भित, चेतना संस्फुरित, मधुर कण्ठों से गायी रचनाएँ व आत्म संप्रेषण से तरंगित प्रस्तुतियाँ व वक्तव्य दे सबको आनन्दित किया व मन मोह लिया। इस वार विगत दश वर्षों से सदैव सम्मिलित होने वाले हमारे परम-आदरणीय, अन्तर्राष्ट्रीय हिंदी समिति, भारत के अन्तर्राष्ट्रीय अध्यक्ष सुप्रसिद्ध डॉ. दाऊजी गुप्ता जी, हिंदी साहित्य सभा कनाडा के अध्यक्ष श्री अनिल पुरोहित, विश्व हिंदी संस्थान कनाडा के अध्यक्ष प्रोफ़ेसर सरन घई जी, इत्यादि उत्कट इच्छा होते हुए भी व्यक्तिगत व तकनीकी कारणों वश कार्यक्रम से जुड़ नहीं पाए; पर आत्मीय भाव से वे व अन्य बहुत से साहित्यकार हम लोगों के साथ रहे! 

भारतीय कौंसलावास टोरोंटो के वरिष्ठ कोंसल श्री देविंदर पाल सिंह जी का इस आयोजन में विशेष आशीर्वाद रहा। आयोजन में परोक्ष अपरोक्ष से विशेष योगदान देने वालों में श्री चन्द्र कुमार सिंह, आ. संदीप त्यागी, डॉ प्रवीण गुप्ता, श्री अजय गुप्ता, श्री भगवत शरण श्रीवास्तव, डॉ कैलाश भटनागर, श्री सरन घई, श्री सेवक सिंह, इत्यादि प्रमुख रहे। 

श्री चन्द्र कुमार सिंह, आचार्य संदीप त्यागी, डॉ हरिसिंह पाल व श्री वेद प्रकाश गौड़, संचालक, इत्यादि कार्यक्रम के समापन तक सुस्मित वातावरण बनाए रखने व समीक्षा करने में तत्पर रहे।

मुख्य अतिथियों ने साहित्यकारों को हिंदी साहित्य की सेवा करने के लिये सराहा, प्रोत्साहित किया और सहयोग प्रदान करने के लिए आश्वस्त किया। पूर्ण मनोयोग से आ. श्री वेद प्रकाश गौड़ जी की उपस्थिति पूरे समय रही और उनके विचार व वक्तव्य विशेष रूप से प्रेरणास्पद रहे। उन्होंने भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के राजभाषा विभाग से हिंदी साहित्य के संवर्धन व प्रचार प्रसार के लिए हर सम्भव सहयोग देने का आशीर्वचन दिया। 

डॉ. श्रीभगवान शर्मा जी का संवोधन हर वर्ष की तरह हृदयों को आल्ह्वादित व आनन्दित करने वाला था। उन्होंने व अन्य प्रमुख अतिथियों ने आयोजन की गरिमापूर्ण प्रस्तुति के लिए आयोजक व संचालक श्री गोपाल बघेल मधुको धन्यवाद दिया व उनकी आध्यात्मिक व हिंदी साहित्य की सेवाओं की मुक्तकंठ से प्रशंसा की। इस बार कोरोना के कारण उपस्थित परिस्थितियों में हमारा वार्षिक अधिवेशन ज़ूम पर आयोजित किया गया। पिछले 10 वर्षों की भाँति हम इस वर्ष अभी तक विश्व कवि सम्मेलनआयोजित नहीं करा पाए। फिर भी कार्यक्रम में भारत, कनाडा व विश्व भर से भरपूर सहभागिता रही। कई रूप से यह कार्यक्रम भौतिक अधिवेशन से भी अधिक अच्छा रहा और यह अद्भुत आध्यात्मिक तरंग छोड़ने में सफल रहा। 

कार्यक्रम में अन्तर्राष्ट्रीय हिंदी समिति - भारत, अखिल विश्व हिंदी समिति, सं रा अमरीका, कनाडा की हिंदी साहित्य सभा, आध्यात्मिक प्रबंध पीठ, फ़्रीडम योगा, हिंदी प्रचारिणी सभा, विश्व हिंदी संस्थान, इत्यादि संस्थाओं का भरपूर सहयोग मिला। कई व्हाट्सऐप समूहों जैसे साहित्योदय, अमर लेख, अखिल विश्व हिंदी समिति, आदि का पूरा सहयोग व सहभागिता मिली। 

सभी कवि व श्रोता गणों एवं अतिथियों के तन- मन- धन व हृदय से किये परोक्ष-अपरोक्ष सहयोग के लिये संस्था की ओर से हार्दिक आभार व साधुवाद दिया गया। अन्त में साहित्य की सेवा के लिये सभी कवियों, कवयित्रियों, श्रोताओं व सहयोगियों को आयोजकों की ओर से साधुवाद दिया गया। सभी सहभागिता करने वाले साहित्यिकारों व साहित्य अनुरागियों को यथाशीघ्र ई-प्रमाण पत्र भेजा जाएगा। 

सम्मेलन का चलचित्र नीचे दिया है जो 7 दिन रहेगा। आप इसे तुरंत संग्रहित कर लें। चल- चित्र देख कर इस ई-विश्व कवि सम्मेलनका पूरा आनन्द आप ले सकते हैं।

[आयोजक एवं अखिल विश्व हिंदी समिति टोरंटो के अध्यक्ष गोपाल बघेल मधु से प्राप्त विज्ञप्ति के अनुसार]


Thursday, 30 July 2020

पत्रकारिता का रंग इतना ज़र्द!!

इष्ट देव सांकृत्यायन 

योगी आदित्यनाथ पर मुक़दमा दर्ज कराने वाले परवेज़ परवाज़ को दुष्कर्म मामले में उम्र क़ैद

इस शीर्षक से आपको क्या सीख मिलती है?

यही कि मीडिया का कोई भी घराना हो, उस पर धेला भर भी यकीन करने की जरूरत नहीं है. 

पहली बात.. उम्र क़ैद की सज़ा उसे किसने दी? आदित्यनाथ ने या कोर्ट ने?

दूसरी बात.. भारत में कोर्ट इतनी जल्दी या तेज़ गति से तो काम करता नहीं कि इधर आदित्य नाथ पर उसने मुकदमा दर्ज कराया और उधर कोर्ट ने उसे सज़ा दे दी. जाहिर है, यह मामला पुराना रहा होगा. पहले पीड़ित ने पुलिस को सूचना दी होगी. पुलिस ने अपनी रीति-रिवाज़ के मुताबिक हीला-हवाली की होगी. उसके बाद उस पर स्थानीय लोगों का दबाव पड़ा होगा, तब जाकर मुकदमा दर्ज हुआ होगा. फिर जाँच हुई होगी. रपट आई होगी. पहली जाँच रपट निश्चित रूप से अंतर्विरोधों से भरी रही होगी. क्योंकि यूपी पुलिस के जो संस्कार उसके अनुसार ठीक-ठीक रपट वह अपनी माँ-बहन के मामले में भी दे दे तो बड़ी बात है. हाँ एनकाउंटर अलग मसला है. फिर उसे दो-चार बार अदालत में लताड़ पड़ी होगी. तब जाकर उसने कहीं सही रपट दी होगी.

कोर्ट की कार्यपद्धति #मजीठिया_वेजबोर्ड के मामले में रहे मुकदमों की गति से मैं प्रैक्टिकली जानता हूँ.

इसके बाद वर्षों बहस चली होगी. न जाने कितनी बहसों के बाद फ़ैसला हुआ होगा. अब इस पूरे फ़ैसले में आदित्य नाथ यह केस दर्ज कराने वाले थे, या भुक्तभोगी थे या फिर गवाह?

इस मामले में आदित्य नाथ का नाम क्यों घसीटा गया?

केवल इसलिए कि इस बलात्कारी ने [हमारे कुछ बुद्धिजीवियों को अभी भी यानी कोर्ट में साबित हो जाने और कोर्ट से परवेज परवाज और महमूद उर्फ जुम्मन बाबा के सज़ायाफ्ता हो जाने के बाद भी दोनों को बलात्कारी कहने पर एतराज होगा. भले वे मुकदमा दर्ज होने के पहले कोर्ट से बाइज्जत बरी कर दिए जाने के बाद भी मोदी को मौत का सौदागर कहते रहें] आदित्य नाथ के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया था?


यह कौन सा आधार होता है?

आप खुद सोचिए, क्या परवेज परवाज और महमूद उर्फ जुम्मन बाबा को कोर्ट से सज़ा मिलने के बाद इसका शीर्षक ढंग से यह नहीं होना चाहिए था -

आदित्य नाथ पर मुकदमा दर्ज कराने वाला निकला बलात्कारी!!

क्या आपको यह नहीं लगता कि यह शीर्षक केवल उत्तर प्रदेश में आम जन के बहमत से चुने गए मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ ही नहीं, विधि द्वारा स्थापित न्यायालय की भी अवमानना है?

बहरहाल आपको बता दूं कि यह शीर्षक बीबीसी का है, जिसे पिछले एक दशक से कुछ लोग साफ तौर पर जिहाद का पोषण केंद्र कहने लगे हैं. कहें भी क्यों न, उसे अपनी विश्वसनीयता की कोई फ़िक्र तो दिखती नहीं! 

#BBCinFavourOfRapists


Saturday, 25 July 2020

संवाद-यात्रा


संवाद-यात्रा 

(प्रोफेसर रामदरश मिश्र के साक्षात्कारों का संग्रह )

संपादक - हरिशंकर राढ़ी 

प्रकाशक - अमन प्रकाशन
कानपुर , उत्तरप्रदेश
इस संग्रह मे वरिष्ठ और प्रसिद्ध कवि, कथाकार, उपन्यासकार प्रो 0 रामदरश मिश्र से लिए गए 28 साक्षात्कार समाहित हैं जो समय - समय पर अनेक लेखकों - कवियों एवं पत्रकारों द्वारा लिए गए हैं।

Samvaad -Yaatra

(Collection if Interviews)

Editor - Hari Shanker Rarhi

Publisher - Aman Prakashan
Kanpur , U.P.

Wednesday, 22 July 2020

ज्योति और सचिन: खलनायक नहीं, नायक हैं ये

इष्ट देव सांकृत्यायन

सचिन पायलट का प्रयास एक बार उलटा क्या पड़ा पूरे परिदृश्य पर वे खलनायक नजर आने लगे। गहलोत और दूसरे कांग्रेसियों से लेकर न्यूज चैनलों-अखबारों के छापदार विशेषज्ञों और सोशल मीडिया के छापेमार विशेषज्ञों तक ने उन्हें विभीषण से लेकर रावण और दुर्योधन से लेकर शकुनि तक साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ा। ठीक यही बात उस वक्त भी हुई थी जब पायलट के दहिनवार सिंधिया ने मध्य प्रदेश में तख्ता पलट किया था। सिंधिया अपने प्रयास में सफल हो गए तो अब उनके खिलाफ सारी आवाजें आनी बंद हो गईं। उस वक्त अमावस के नीरव अंधकार में दहाड़ते कांग्रेसी शेरों की हैसियत अब ज्योतिरादित्य के मामले में कीं कीं करते निरीह झींगुरों से अधिक नहीं रह गई है।

अगर कहीं सिंधिया अगले चुनाव में जीत गए और भाजपा में अपने समर्थकों की संख्या बढ़ा सके तो इन झींगुरों में से आधों से ज्यादा का पिल्लों के रूप में पुनर्जन्म तो हम-आप दो साल बाद ही देख लेंगे। इसके लिए महाराज ज्योतिरादित्य सिंधिया को कोई बहुत ज्यादा कुछ करना नहीं है। उन्हें कुल जो करना है, वह बस इतना ही है कि महाराज के अपने साँचे से बाहर निकल आना है। ज्योतिरादित्य के लिए यह बहुत मुश्किल नहीं है। क्योंकि वह केवल महाराज जीवाजी राव के वंशज ही नहीं, हार्वर्ड के अर्थशास्त्र ग्रेजुएट और एमबीए भी हैं। मुझे नहीं लगता कि महाराज जैसे कड़े साँचे की जकड़न से मुक्ति की कामना उनके भीतर नहीं होगी। ऐसा मैं केवल अनुमान से नहीं, दो मुलाकातों के अनुभव से भी कह रहा हूँ। अड़चन इसमें एक ही है और वे हैं शुभेच्छु। राजनीति में प्रतिस्पर्धियों ही नहीं, जानी दुश्मनों तक से ज्यादा खतरनाक शुभेच्छु होते हैं। अब इन शुभेच्छुओं से निपटना महाराज के बस की बात है या नहीं, यह समय तय करेगा।

File photo of BJP leader Jyotiraditya Scindia. (PTI)

ठीक यही बात सचिन पायलट के मामले में भी है। हाईकोर्ट उनके बारे में क्या फैसला करता है, यह मामला ही अलग है। बाकी कालचक्र की कृपा से हम-आप जानते हैं कि लोकतंत्र में किसी जननेता के मामले में किसी कोर्ट के फैसले की कितनी अहमियत होती है। जहाँ कोर्ट द्वारा अवैध घोषित और सही मायने में स्थगित संसद पूरे देश पर दो साल के लिए एक व्यक्ति की तानाशाही थोपकर संविधान के मूल ढाँचे से खिलवाड़ कर सकती है और उस पर सवाल तक नहीं उठता, राजनीतिक पार्टियों के बीच आपराधिक रिकॉर्ड वाले सैकड़ों बाहुबलियों को टिकट देने और लोकसभा या विधानसभा तक लाने की होड़ मची हो और जिस देश में माननीय सर्वोच्च न्यायालय पूँजीपतियों द्वारा अपनी अवमानना के मामले में फैसले के नाम पर बेस्वाद जलेबी छानते हुए अपनी भूल ढूँढ निकालता हो, वहाँ जनता के मन पर किसी भी अदालती फैसले का कितना दबाव होता होगा, यह आसानी से समझा जा सकता है।

यहाँ सचिन के साथ एक सुविधा है। सचिन बेशक मुँह में सोने की चम्मच लेकर धरती पर आए हैं, लेकिन उनकी पृष्ठभूमि सोने-चाँदी वाली नहीं है। महाराज के साँचे में उनके कसे होने का तो कभी सवाल ही नहीं रहा और जीवन का उनका अनुभव बहुत लोगों की तुलना में बहुत व्यापक है। सचिन अपने निर्वाचन क्षेत्र से लेकर लोकसभा तक जिस बात के लिए खास तौर से जाने जाते हैं, वह उनका विनम्र और सहज व्यवहार ही है। जीत-हार और चुनाव में क्षेत्र बदलना एक अलग बात है, लेकिन उनके निर्वाचन क्षेत्रों के आमजन उनके व्यवहार की प्रशंसा करते थकते नहीं हैं। अब गहलोत जैसे जुगाड़ू लोग कुछ भी कह लें, बाकी 2014 के चुनाव में सच यही है कि मोदी की लहर मीडियाई विशेषज्ञों को छोड़कर बाकी सबको साफ तौर पर दिख रही थी। कांग्रेस की अपनी औकात क्या बची थी कि इसका अनुमान सिर्फ़ इस बात से लगाएं कि उनके तत्कालीन अध्यक्ष महोदय को अमेठी छोड़ वायनाड जाना पड़ा। बीच में 2105 किलोमीटर की इस दूरी में उन्हें 45 प्रतिशत मुस्लिम और 13 प्रतिशत ईसाई आबादी वाला कोई और क्षेत्र नहीं मिला। चूँकि कांग्रेस में नेहरू-घैंडी-गांधी परिवार की मूढ़ताओं-धूर्तताओं-विफलताओं-आशंकाओं को याद रखने का रिवाज नहीं है, इसीलिए दासानुदास गहलोत जब सचिन का निर्वाचन क्षेत्र बदले जाने संबंधी टिप्पणी कर रहे थे तब उन्हें अपने माननीय अध्यक्ष जी वाला मामला याद नहीं था।

उम्र के इस पड़ाव पर अशोक गहलोत जी के लिए यह भूल जाना तो अत्यंत स्वाभाविक है कि उनको चुनाव जिताने और सरकार बनाने में इस नाकारे-निकम्मे आदमी की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण थी। वे भूल गए कि सचिन पायलट को कांग्रेस में केवल इसलिए जगह नहीं मिली हुई है कि वे राजेश पायलट के बेटे हैं और राजेश पायलट राजीव गांधी के मित्र थे। वे यह भी भूल रहे हैं कि राजनीतिक हम्मामी नंगई में भी कोई किसी से कम नहीं है और जब सब एक ही हम्माम के हों तो एक-दूसरे की नंगई की ओर दुनिया को ललकारना कितना खतरनाक है। माधवराव सिंधिया और राजेश पायलट दोनों की ही मृत्यु जिन परिस्थितियों में और जैसे हुई थी, उसमें कांग्रेस आलाकमान के खास कृपापात्रों के अलावा और किसी को भी कुछ भी सामान्य नहीं लगा था।

सचिन और ज्योतिरादित्य में समानता केवल इतनी ही नहीं है। उनमें कई और समानताएं भी हैं और उतने ही अंतर भी। दोनों ही बड़े महत्वपूर्ण हैं। दोनों ही के पिता राजीव जी के समकालीन और मित्र थे। दोनों खुद राहुल गांधी के समकालीन और मित्र हैं। इसके बावजूद ये दोनों ही राहुल गांधी की तरह जोनाथन स्विफ्ट रचित लापुटा द्वीप के वासी नहीं हैं और इसीलिए उनकी अपेक्षा छोटी राजनीतिक हैसियत वाले परिवार से होते हुए भी दोनों की अपनी राजनीतिक जमीन है। चाहे छोटे से इलाके में छोटा सा ही सही, लेकिन वे पूरी तरह जनाधार रहित राजनेता नहीं हैं। दोनों की जो पीड़ा है, उसका कारण वास्तव में यही है। महाराज के साँचे में कसे होने के बावजूद ज्योतिरादित्य केवल अपने परिवार की प्रतिष्ठा या पार्टी के नाम के भरोसे नहीं रहते हैं। जीत हार अलग बात है, लेकिन गुना में उन्होंने मेहनत भी की थी और हमेशा करते रहे हैं। यह बात सचिन के मामले में भी उतनी ही सही है। सोने की चम्मच के बावजूद इन्हें कहीं एडमिशन के लिए तीरंदाज बनने की जरूरत नहीं पड़ी। समय के साथ आने वाले भारतीय राजनीति के घाघपन की बात छोड़ दें और मेरी बात को अशोक जी जैसे वरिष्ठ राजनेता के सम्मान में धृष्टता के रूप में न लिया जाए तो दोनों के पास दुनिया की बेहतर समझ है। बेशक इसे विश्वदृष्टि कहना बहुत जल्दबाजी होगी लेकिन वैश्विक कूटनीति की समझ के साथ-साथ देश-दुनिया का इन दोनों नेताओं का अनुभव बेहतर है। आने वाले समय को इस बेहतर अनुभव की जरूरत ज्यादा होगी।

सचिन की खास बात यह है कि उन्हें भारतीय जमीन यानी आम जनजीवन की भी पर्याप्त समझ है और ज्योतिरादित्य को उन मूल्यों-मर्यादाओं की जिनकी कांग्रेस तो नहीं लेकिन आम भारतीय जनमानस में बड़ी कद्र है। सचिन की खूबी यह है कि उनके लिए सोने की चम्मच केवल एक पीढ़ी की बात है और अपनी जमीन उन्होंने पूरी तरह छोड़ी नहीं है। सचिन के पिता राजेश पायलट दिल्ली जब पहली बार आए थे, तो वह कोई पढ़ने या राजनीति करने नहीं आए थे। बुलंदशहर के एक छोटे से गाँव से राजेश्वर प्रसाद सिंह विधूड़ी यहाँ अपने चाचा की डेयरी पर उनकी मदद करने और शायद दूध का कारोबार समझने आए थे। मामूली किसान के इस बेटे के लिए राजीव गांधी से दोस्ती या पायलट बनना और भारतीय वायुसेना में अपने करतब दिखाते हुए बतौर लड़ाका पायलट पूर्वी स्टार एवं संग्राम मेडल हासिल करना सपने से भी बाहर की चीज़ें थीं।

जाहिर है, सचिन के रिश्तों में अभी ऐसे बहुत लोग होंगे जिनकी दुनिया खेत-मेड़, गाय-भैंस और गाँव-कस्बों तक ही सिमटी हुई है। इसके साथ ही अपने एकल परिवार के स्तर पर रिश्तों के मामले में वह अखिल भारतीय भी हैं। यह भी कि राजनीति में गया हुआ आदमी अपने रिश्तों से संवाद कभी नहीं छोड़ता। यह सचिन की विफलता का दिन है। आप जितनी चाहें गालियां उन्हें दे सकते हैं, लेकिन सितारे कोई एक जगह ठहरने वाली चीज नहीं हैं। समय के चक्र के साथ वे बदलते रहते हैं और उनके साथ ही आदमी की नियति के सोपान भी। मैं राजस्थान और देश-दुनिया की राजनीति को आने वाले उत्तर कोरोना दौर में जिस ओर बढ़ते देख रहा हूँ उससे यह कह सकता हूँ कि कुछ ही दिनों के बाद लोगों को यह समझ आने लगेगा कि रिश्तों को सहेजना सचिन के कितने काम आया और इसने उन्हें किस तरह ज्ञान और अनुभव संपन्न बनाया। जो लोग अभी सचिन और ज्योति को धोखेबाज, कृतघ्न और अति महत्वाकांक्षा का शिकार बता रहे हैं, उन्हें कोशों से दूसरे शब्द निकालने होंगे और बूढ़े घोड़ों पर ही लाल लगाम कसने की कांग्रेसी नीति पर पुनर्विचार की सलाह देनी होगी। ध्यान रहे, राजनीति में शुभाकांक्षियों की भूमिका बड़ी महत्वपूर्ण होती है और अभी के पूरे प्रकरण में सचिन के शुभचिंतकों ने उन्हें जो दुर्दम्य अनुभव दिया है, इसकी तपिश भी उस वक़्त उनके साथ होगी।

© Isht Deo Sankrityaayan

Wednesday, 8 July 2020

विकास दुबे या विनय तिवारी

इष्ट देव सांकृत्यायन

जो दशा विकास दुबे के घर की हुई, वह उससे पहले विनय तिवारी के घर की होनी चाहिए थी। विकास दुबे ने तो केवल ब्राह्मण जाति और मनुष्यता को कलंकित किया है लेकिन विनय तिवारी और उसके साथियों ने तो अस्तित्व मात्र को कलंकित किया। अपने ही साथियों के खिलाफ एक गुंडे के लिए सुरागरसी और उसके यह कहने के बावजूद कि आने दो सालों को... सबको कफन में लपे देंगे... अपने साथियों को कोई हिंट तक देना... उन्हें सचेत तक करना...

इससे क्या पता चलता है? यही कि विनय तिवारी का भरोसा खुद अपने विभाग यानी पुलिस पर कम और एक गुंडे पर ज्यादा है। जब तक थानों से लेकर चौकियों तक की नीलामी होती रहेगी, आप यह उम्मीद कैसे कर सकते हैं कि कोई पुलिस वाला विनय तिवारी से भिन्न हो सकता है? और जब तक विनय तिवारी जैसे पुलिसिये मौजूद हैं, आप यह सोच भी कैसे सकते हैं कि आम जनता अपनी सुरक्षा के लिए विकास दुबे, मुख्तार अंसारी, हरिशंकर तिवारी, वीरेंद्र शाही, श्रीपत ढाढ़ी, ओमप्रकाश पासी, श्रीप्रकाश शुक्ल, बबलू श्रीवास्तव, कालीचरण, भागड़ यादव या ददुआ जैसों को छोड़कर कहीं की पुलिस पर भरोसा करेगी?

जरा गौर करिए कि वह कौन है जो जनता को इन पर भरोसे के लिए मजबूर करता है। जन्मना अपराधी प्रवृत्ति के लोग कम से कम भारतीय समाज में मुझे नहीं लगता कि .०१ प्रतिशत से अधिक लोग होते होंगे। बल्कि उतने भी नहीं। सामान्यतः आदमी भ्रष्ट भी नहीं होना चाहता। आप किसी बच्चे या किशोर से पूछकर देखिए। आप पाएंगे कि वह एक साधारण शरीफ आदमी की जिंदगी जीना चाहता है। अपनी खेती, व्यापार या नौकरी करके अपना परिवार पालना तथा अपने देश समाज के लिए कुछ बेहतर करना... यही युवावस्था तक लगभग हर शख्स का सपना होता है।

लेकिन यह सपना युवावस्था से आगे बढ़ नहीं पाता। अधिकतर तो युवावस्था तक पहुंचने से पहले ही दम तोड़ देता है। क्यों? क्योंकि शिक्षा से लेकर रोजगार तक हर स्तर पर उसका सामना व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार से होता है। व्यवस्था उसे उसके आदर्शो की हत्या के लिए मजबूर करती है। इसी मज़बूरी से वे पाखंड पैदा होते हैं जिन्हें रॉबिन हुड या बाहुबली कहते हैं।

समाज में जब लोग देखते हैं कि अधिकार संपन्न लोगों का एक बड़ा तबका इन्हीं बाहुबलियों के सामने नतमस्तक है तो उस तबके तक शासन प्रशासन के बारे में संदेश क्या पहुंचता है? जो पुलिस खुद विकास दुबे के प्रति इतनी एहसानमंद है कि अपने ही विभाग के खिलाफ उसके लिए सुरागरसी कर रही है, उससे आप यह उम्मीद कैसे करते हैं कि वह उसके अत्याचारों से आम जनता को बचाएगी? तब आम आदमी अपनी सुरक्षा के लिए कहां जाएगा? तब जालिम के जुल्म से बचने के लिए लोगों के पास कोई और उपाय नहीं होता सिवा इसके कि वे किसी और या फिर उसी जालिम के पास जाएं।

यही अपराध का समाज सापेक्ष मनोविज्ञान है। इसी मनोविज्ञान के तहत कोई गुंडा पहले चौकी, थाने, ब्लॉक प्रमुख, विधायक और सांसद या मंत्री जी का खास आदमी बनता है। फिर एक दिन खुद माननीय बन जाता है। और यह सब बनने की प्रक्रिया के बीच में ही कब वह अपनी जाति, गांव या जवार का हीरो बन चुका होता है, पता ही नहीं चलता।

मैं देख रहा हूं कि पिछले दो दिनों से अपने को बुद्धिजीवी जैसा कुछ समझने वाले लोग बार बार यह सवाल उठाते नहीं थक रहे कि क्या हमारे समाज में वाकई हीरो की इतनी कमी हो गई है... आदि इत्यादि अगड़म बगड़म https://static.xx.fbcdn.net/images/emoji.php/v9/t51/1/16/1f603.png यह पूछने वाले लोग यह भी नहीं सोच पाते कि बीती एक पूरी सदी में हमने कैसा समाज बनाया है और क्या इसके लिए केवल शासन या प्रशासन जिम्मेदार है। क्या समाज की इसमें कोई जिम्मेदारी ही नहीं है?

थाने नीलाम करने वाले माननीय को मंत्री पद से पहले विधायक बनना होता है। उन्हें विधायक किसने बनाया? क्या आपको नहीं लगता कि वह समाज ऐसे ही प्रतिनिधि पाने लायक था और ऐसी ही पुलिस भी! जब तक समाज की मानसिकता नहीं बदलती तो जनप्रतिनिधियों का तौर तरीका बदलेगा और पुलिस का चरित्र।

क्या आपको नहीं लगता #विकास_दुबे का अपराध उस #विनय_तिवारी के अपराध की तुलना में धेला भी नहीं है, जिसने अपने ही विभाग के खिलाफ एक गुंडे को सूचना दी? मेरा मानना है कि विकास दुबे से पहले विनय तिवारी की सारी संपत्तियां बुल्डोज की जानी चाहिए थी। उसके करीबी रिश्तेदारों को पकड़ा जाना चाहिए था।

कायदे से ऐसे पुलिसकर्मियों को बीच चौराहे पर फांसी दी जानी चाहिए, वह भी इलाके के तमाम पुलिस वालों के ही सामने। ताकि पुलिस महकमे में दूसरा विनय तिवारी बनने की बात सोचकर भी पुलिस वालों की रूह कांप जाए। लेकिन यह करेगा कौन? कमोबेश सब विनय तिवारी ही तो हैं। और जनप्रतिनिधि? वहां तो शराफत निहायत फालतू चीज है और वोट तो आपका आपकी बिरादरी के बक्से में ही जाना है!!!


© Isht Deo Sankrityaayan