Wednesday, 21 August 2019

कश्मीर की कोकिला हब्बा खातून



 लल्लेश्वरी और शेख नूरुद्दीन के बाद कश्मीरी साहित्य में नाम आता है हब्बा खातून का। लल्लेश्वरी का जन्म १४वीं शताब्दी के दूसरे दशक में हुआ, नूरुद्दीन का सातवें दशक में और हब्बा खातून का जन्म हुआ १६वीं शताब्दी के छठे दशक में, एक मामूली किसान के घर।

हब्बा खातून का मूल नाम है जून। ज़ून शब्द का अर्थ कश्मीरी भाषा में है चांद। यह नाम उन्हें मिला उनके अप्रतिम सौंदर्य के कारण। कश्मीरी लडकियां वैसे भी बेहद खूबसूरत होती हैं। हब्बा को सौंदर्य के अलावा दो और गुण मिले थे; एक तो मोहक सुरीला कंठ और दूसरा कवि हृदय। गांव के मौलवी से उन्होंने पढ़ना-लिखना भी सीख लिया था।

श्रीनगर के निकटवर्ती सोंबुरा जिले के किसी गांव में जन्मी थीं वे। प्रकृति ने सौंदर्य तो इस पूरे क्षेत्र को दोनों हाथ खोलकर लुटाया है। यह पूरा इलाका है ही इतना सुंदर कि गणितज्ञ और तर्कशास्त्री भी यहां आकर कवि हो जाएं। भला जून इससे कैसे बच सकती थीं!

वह अपने खेतों-बागों में आते-जाते काम करते गाती रहती। सौंदर्य में रची-बसी कविताएं और उस पर सुरीला कंठ कौन न रीझ जाए इस पर। यहीं खेतों में रमते-खटते जून ने एक नई विधा को परवान चढ़ाया। यह विधा है लोल। कश्मीरी में लोल कहते हैं गीत को। 

लेकिन जून का यह गायन निर्बाध न चल पाया। ज़माना किसे उसकी अपनी दुनिया में रमे रहने देता है। अपेक्षाकृत कम उम्र में ही जून की शादी हो गई और जैसा कि आम तौर पर हो ही जाता था, बल्कि अब भी होता है, ये शादी हुई बेमेल। ससुराल में जून पर टूटने लगा दुखों का पहाड़।

जून गाती रहतीं और उनका गाना उनकी सास-ननद से बर्दाश्त न होता। वे जून से गुलाम की तरह काम लेना चाहती थीं और वह भी इस शर्त पर कि उनके अनमोल गुण वे बस अपने तक रखें। दुनिया को उससे रूबरू कराकर उनकी हेठी न कराएं। वही सास-बहू एपिसोड जो कमोबेश भारत के हर घर की कहानी है। यह पीड़ा उनके कुछ गीतों में भी छलकी है।

जून न मानतीं तो पति पीटता। आखिरकार हद हो गई। रिश्ता निभा नहीं, टूट गया। जून वापस अपने पिता के घर आ गईं। वहां आकर फिर वही राग। उन्हीं खेतों बागों पगडंडियों में वही गीत, वही सुर छिड़ गए। रिश्ते के साथ मन के भी टूटने से टूटी-बिखरी जून का कंठ दर्द के साथ और भी निखर गया। गीतों में केवल प्रकृति का सौंदर्य और अपना दर्द ही नहीं रहा, एक दार्शनिकता को भी जगह मिल गई।

ऐसे तो जून हब्बा कैसे बन गईं, इसका कोई स्पष्ट उल्लेख कहीं नहीं है।  लोकश्रुति यह है कि इस अलगाव के बाद किसी मौलवी ने उन्हें सुझाया कि तू अपने बिछड़े पति का नाम अपना ले। तेरी किस्मत बदल जाएगी। यह किंवदंती ही है। इसमें सच कितना है, कैसे कहा जा सकता है!

पर एक बात सच है। रिश्ते का टूटना जून का अनंत तक टूटना नहीं बना रहा। थोड़े दिनों बाद जून की किस्मत वाकई बदल गई। बदल ही नहीं गई, बल्कि कहें, पलट गई। 

हुआ यह कि किसी दिन जून अपने खेतों में काम करती वैसे ही गा रही थीं, जैसे अकसर गाती रहती थीं। संयोग, उसी वक़्त कश्मीर के उस समय के बादशाह यूसुफ शाह चाक, जो शिकार पर निकले थे, उनके कानों में जून की सुरीली आवाज पड़ी। 

यूसुफ शाह खुद को रोक न पाए। उन्होंने आवाज़ की दिशा पकड़ी तो एक चिनार के पेड़ के नीचे उन्हें गाती हुई जून मिलीं। यूसुफ ने उन्हें अपने साथ ले लिया।

एक मत यह भी है कि अपने पहले पति से जून का तलाक हुआ नहीं, बल्कि यूसुफ शाह ने कराया। ऐसा इसलिए क्योंकि यूसुफ उनकी सुंदरता और उनके कंठ पर मुग्ध हो गए थे। ऐसा कहने वालों का तर्क यह है कि इसीलिए तो जून ने अपने पति का नाम अपना लिया, अपना मूल नाम छोड़ कर। यह उनका अपने पहले पति की याद बनाए रखने का तरीका था। जून से हब्बा बन गईं। कश्मीरी में हब्बा का अर्थ है अनाज।


जनश्रुतियां यूसुफ के यहां जून यानी हब्बा के असर पर तो एकमत हैं, लेकिन हैसियत पर नहीं। एक धारा यह कहती है कि यूसुफ ने उन्हें अपनी बेगम बना लिया, मगर दूसरी धारा का मत यह है कि उन्होंने अपने हरम की तमाम औरतों में एक हब्बा को भी शामिल कर लिया।

अब जो भी हो, पर एक बात सब मानते हैं। यह कि शाह पर हब्बा का पूरा असर था। यहां तक कि राजकाज के फैसलों में भी हब्बा का पूरा दखल था। यह दखल इस हद तक था कि दूसरे शाहों या रजवाड़ों से उन्हें कैसे रिश्ते रखने हैं, यह भी हब्बा के बिना वे तय नहीं कर सकते थे।

इसी बीच दिल्ली सल्तनत का पैगाम आया, यूसुफ शाह चाक को। सम्राट अकबर का पैगाम यह था कि यूसुफ या तो उनकी अधीनता स्वीकार कर लें या फिर जंग के लिए तैयार हो जाएं। 

जैसा कि अकसर होता ही था, इस विषय पर भी यूसुफ शाह और हब्बा खातून की बात हुई। कवि मन राज्य और जनता की भलाई को चाहे जितनी बारीकी से समझता हो पर सियासत के पेचोखम और सल्तनत की जोर आजमाइश के खेल को तो वह क्या ही समझता। हब्बा को यह बात अपने स्वाभिमान के खिलाफ लगी और उन्होंने अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया।

आखिरकार जंग हुई और अपनी पूरी ताकत झोंक कर यूसुफ शाह अपनी स्वतंत्रता बचाने में सफल भी रहे। लेकिन अकबर बादशाह इतने से मान जाने वाला कहां था! थोड़े ही दिनों बाद उसने दुबारा जंग छेड़ दी। अकबर का ताकतवर साम्राज्य तो आसानी से झेल सकता था, पर यूसुफ जैसे छोटे शाह के लिए इसे झेलना बहुत मुश्किल पड़ा।

जीत तो गए यूसुफ पर बुरी तरह टूट भी गए। अब एक और जंग झेलने की हैसियत उनकी नहीं रह गई थी। उधर बहुत वक़्त न देते हुए अकबर ने उन्हें फिर पैगाम भेजा। इस बार पैगाम बातचीत का था।

लोकश्रुति यह है कि हब्बा ने इस सुलह वार्ता के लिए भी यूसुफ शाह को मना किया। हब्बा ने इस संधि से रोकने की हर संभव कोशिश की लेकिन यूसुफ माने नहीं। वे सुलह के लिए गए। जैसा कि हब्बा ने पहले ही अंदेशा जताया था, वही हुआ। अकबर ने यूसुफ शाह के दिल्ली पहुंचते ही उन्हें बंदी बना लिया।

बंदी बनाकर यूसुफ शाह को पहले बंगाल भेजा गया, फिर वहां से उन्हें बिहार लाया गया। वहीं जेल में ही उनकी मौत हो गई।

हब्बा को लेकर जनश्रुतियां यहां दो तरह की हैं। एक तो यह कि यूसुफ शाह के इस फैसले को हब्बा बर्दाश्त न कर सकीं। जैसे ही उन्होंने दिल्ली के लिए कूच किया, हब्बा महल से निकल गईं। दूसरी यह कि हब्बा ने उनका संदेश आने का इंतजार किया। पर जब आखिर में उन्हें पता यह चला कि हम तो मुगलों के मातहत हो गए, उन्होंने महल छोड़ दिया।

अब छोड़ा जब भी हो, पर ये तो तय है कि घर उन्होंने छोड़ दिया। घर छोड़कर वो जंगलों में चली गई। एक मत यह है कि वे गुरेज घाटी के जंगलों में आ गई। कुछ यह भी कहते हैं कि कहीं और चली गई लेकिन ये तय है कि एक दो साल तक वह किसी को दिखी नहीं और जब दिखीं तो तापस वेश में। उसी गुरेज की घाटी में ही। 

बाकी जीवन अपना उन्होंने वहीं गुजारा। उनका निधन 17वीं शताब्दी के पहले दशक में ही हुआ। श्रीनगर से जम्मू हाइवे पर ही एक जगह है अठवाजन, वहीं। उनकी कब्र वहीं है।

लेकिन कश्मीर में लोकविश्वास यह है कि हब्बा आज भी गुरेज की घाटी में मौजूद हैं। उनकी आत्मा वहां भटकती रहती है। उनके नाम पर वहां एक पहाड़ी का नामकरण भी कर दिया गया है। कहा जाता है कि इसी पहाड़ी के इर्द गिर्द वह भटकती रहती हैं और अपने प्रिय यूसुफ शाह चाक को तलाश करती रहती हैं।

हब्बा के गीतों में एक विरहिन की बेचैनी, प्रिय से मिलन की आस और उसकी आतुरता, शुरू से अंत तक दिखाई देती है। 

कश्मीर की इस कोकिला की रचनाओं का बहुत सुंदर अनुवाद मैंने जम्मू के रचनाकार अग्निशेखर का किया हुआ कहीं पढ़ा है। नेट पर कहीं मिल गया तो कमेंट में लिंक दूंगा।


भरमा ले तुम्हें कौन सौतन मेरी
क्यों बिछड़ गए तुम मुझसे

दूर करो मलाल जो भी हो
मैंने दिल में बसाया है तुझे
क्यों बिछड़ गए तुम मुझसे

आधी रात तक खोल रखे दरवाजे मैंने
किस बात पर तुम रूठे मुझसे
क्यों बिछड़ गए तुम मुझसे

झुलस गया है तन मन विरह की आग में
ये खून के आंसू ये लाल बदामी आंखें
क्यों बिछड़ गए तुम मुझसे।

©इष्ट देव सांकृत्यायन




1 comment:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (23-08-2019) को "संवाद के बिना लघुकथा सम्भव है क्या" (चर्चा अंक- 3436) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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