Sunday, 5 August 2018

Khajuraho

यात्रा वृत्तांत

                        रति का अध्यात्म: खजुराहो

                                              -हरिशंकर राढ़ी

कंदरिया महादेव मंदिर       छाया : हरिशंकर राढ़ी  


यदि किसी को धरती पर कामक्रीडा का सौंदर्य
] वैचारिक खुलापन, शारीरिक सुंदरता के प्रतिमान तथा कलात्मक जीवंतता एक साथ देखनी हो तो उसे खजुराहो की धरती पर एक बार जरूर आना चाहिए। ऐसे मंदिर शायद ही कहीं और हों जहां गर्भगृह में ईश्वरीय सत्ता के दूत] हिंदू मान्यता के कल्याणकारी देव विराजमान हों और दीवारों पर सृश्टि की सुंदरतम रचना नारी के लावण्यमयी अंगों का पुरुष संसर्ग में अनावृत्त चित्रण हो। आज से लगभग एक हजार साल पहले प्रेम, सौंदर्य और संभोग की पूजा करने वाला समाज हमारे इस तथाकथित विकसित समाज से कितना आगे और वैज्ञानिक सोच वाला था] इसका अंदाज खजुराहो की धरती पर फैली विशाल मंदिर शृंखला को देखकर सहज ही हो जाता है। चरित्र, वासना और गोपनीयता के नाम पर मनुष्य अपनी नैसर्गिकता और तार्किक सोच से कितना दूर हो गया है, इसका अनुमान यहीं लगाया जा सकता है। ऐसा भी नहीं है कि आज भी खजुराहो जाने वाला हर भारतीय पर्यटक इन कामक्रीडारत मूर्तियों को देखकर बहुत सहज महसूस करता है या इसे एक विकसित सोच का नमूना मानता है। कुछ लोग अभी भी पूरा भ्रमण किए ही वापस आ जाते हैं। हाँ, विभिन्न रिश्तों से बंधे परिवार का एक साथ यहां जाना असहज कर सकता है, इसलिए बेहतर होगा है कि अपनी वय और स्वीकार्य संबधियों के साथ यहां जाया जाए।


दीवार पर मैथुनरत छवि          छाया : हरिशंकर राढ़ी 
अपने दो मित्रों के साथ मेरा यहाँ सन् 2015 में दो दिन के लिए आना हुआ था। आना तो कुल पांच मित्रों को था किंतु एक मित्र किसी कार्यवश आखिरी वक्त यात्रा निरस्त कर बैठे और एक मित्र ट्रैफिक जाम में फंसने की वजह से दस मिनट देर हो गए और ट्रेन चल पड़ी। उस दिन का जाम हमें  आज भी याद है और हम स्वयं पर्याप्त समय लेकर चलने के बावजूद बीस मिनट पहले स्टेशन पहुंच पाए थे। मित्र के छूट जाने के प्रकरण से कुछ हद तक निराश हम खजुराहो लिंक एक्सप्रेस में चलते गए। उत्तरप्रदेश संपर्क क्रांति एक्सप्रेस में कुछ डिब्बे खजुराहो के लिए जोड़ दिए जाते हैं जो महोबा जंक्शन पर काटकर अलग इंजन से खजुराहो भेज दिए जाते हैं। महोबा दिल्ली जबलपुर रेलमार्ग पर स्थित एक महत्त्वपूर्ण जंक्शन है। यह वही महोबा है जो आल्हा-ऊदल की वीरता और शारीरिक बल के लिए जाना जाता है और जिसके आधार पर आल्हखंड का लोकगीत आल्हा मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश के अधिकांश भागों में गाया जाता है।

कंदरिया महादेव मंदिर का  प्रवेश       छाया : हरिशंकर राढ़ी 
खजुराहो रेलवे स्टेशन से खजुराहो मुख्य शहर और पश्चिमी समूह के मंदिर लगभग छह किलोमीटर की दूरी पर हैं। यहां से आॅटोरिक्शा करके हम खजुराहो शहर में पहुंच गए। अगस्त का महीना था और चारो ओर हरियाली बिखरी हुई थी। हल्की-फुल्की बूंदे पड़ रही थीं। रास्ते में खजुराहो विमानतल देखकर खुशी हुई कि दूर से आने वाले सैलानियों को इसका लाभ तो मिलेगा ही, विश्व विरासत खजुराहो को भी इससे पर्यटकों की बढ़ती संख्या मिलेगी। खजुराहो कोई बड़ा शहर नहीं है। यदि मंदिरों को निकाल दिया जाए तो यह एक मध्यम आकार का बाजार है। हाँ, विश्व विरासत होने के कारण यहां होटलों की भरमार है और हवाई अड्डे के आस-पास पांच सितारा होटल भी हैं। हमने आॅटो स्टैंड के पास ही मोल-भाव करक एक मध्य बजट का होटल लिया और तरोताजा होने की तैयारियों में लग गए।

पश्चिमी समूह के मंदिर: नहा-धो लेने और जलपान के बाद हमारा पहला लक्ष्य पश्चिमी समूह के मंदिरों को देखना था क्योंकि वे हमारे होटल से लगभग सटे हुए थे। इस समूह के मंदिर पैदल ही पैदल घूमे जा सकते हैं और यहां के प्रमुख आकर्षण हैं। परिसर में प्रवेश करते ही विस्तृत हरीतिमा के दर्शन होते हैं। एक ही परिसर में दूर-दूर तक फैले अनेक मंदिरों का विहंगम दृश्य मन को मुुग्ध कर लेता है। पश्चिमी समूह में लक्ष्मण मंदिर, कंदरिया महादेव, चित्रगुप्त और विश्वनाथ मंदिर आते हैं जिनमें लक्ष्मण मंदिर तथा कंदरिया महादेव का शिल्प और मैथुनरत युगल या समूह की मूर्तियाँ अद्वितीय हैं।

कंदरिया महादेव मंदिर का एक कलात्मक दृश्य       
लक्ष्मण मंदिर: भगवान विष्णु को समर्पित यह मंदिर जितना विशाल है, उतना ही उत्कृष्ट भी। इस मंदिर का निर्माण चंदेल राजा यशोवर्मन ने 930& 9500 के मध्य करवाया था। ऊँचे चबूतरे पर बने इस विशाल मंदिर का गर्भगृह और शिखर कारीगरी के बेहतर नमूने हैं। चबूतरे की दीवारों पर कामक्रीडारत पुरुषों और स्त्रियों की ऐसी मूर्तियां हैं कि किसी को भी विचलित कर सकती हैं। वात्स्यायन के कामशास्त्र पर आधारित संभोग के विभिन्न आसनों में कहीं प्रेमी युगल तो कहीं समूह में संभोगरत स्त्री-पुरुष शिल्प के अतिरिक्त कुछ पशुओं की मूर्तियां भी बनी हुई हैं। निःसंदेह खजुराहो के मंदिर ऐसे हैं जिनके गर्भगृह में स्थापित देवताओं के विग्रह कामक्रीडा और शारीरिक भूगोल के समक्ष गौड़ हो जाते हैं।

कंदरिया महादेव मंदिर: लक्ष्मण मंदिर से कुछ ही दूरी पर स्थित यह मंदिर अपनी वास्तुकला और चित्रात्मकता के लिए जाना जाता है। यह मंदिर आकार में सबसे बड़ा और सुंदर माना जाता है। ऊँचे चबूतरे पर स्थित होने के कारण इसकी सुंदरता और भी बढ़ जाती है। इस मंदिर का निर्माण 1025&10500 के मध्य हुआ था। इसकी दीवारों पर नृत्यमुद्रा में निमग्न सुंदरियों] विभिन्न प्रकार के पशुओं और और काम मुद्राओं का चित्रण मंत्रमुग्ध कर लेता है। जिस प्रकार की सुंदरता और शारीरिक बनावट इन मूर्तियों में छेनी-हथौड़ी से उभारी गई है, वैसी तो कागज के पन्नों पर तूलिका और रंग से भी नहीं उभारी जा सकती। इस मंदिर के देवता भगवान शिव हैं। कंदरिया महादेव मंदिर का शिल्प देखकर जल्दी लौट आना बहुत ही कठिन कार्य होता है।

चित्रगुप्त मंदिर के सामने लेखक    
चित्रगुप्त मंदिर: पश्चिमी समूह के मंदिरों में चित्रगुप्त महत्त्वपूर्ण है। यह एक तरह से प्रांगण के कोने में है और सामने बड़े वृक्ष और हरी घास का मैदान बहुत सुंदर है। यह मंदिर पास में स्थित जगदंबी मंदिर की अनुकृति लगता है। ऊँचे चबूतरे पर स्थित यह मंदिर सूर्यदेव को समर्पित इकलौता मंदिर है। सात घोड़ों के रथ का दृश्य उभारता यह मंदिर हिंदू पौराणिक मान्यताओं को प्रतिबिंबित करता है। इस मंदिर का निर्माण कार्य संभवतः 1020&10250 में हुआ था। दीवारों पर कामुक जोड़ों की आकर्षक मूर्तियाँ मन को बांध लेती हैं। मंदिर का बाहरी हिस्सा और मूर्तियां समय और आक्रमण की मार से कहीं-कहीं क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं किंतु दीवारों पर सुरा- सुंदरी का मोहक रूप अवर्णनीय है। योनिदर्शना अप्सरा अपनी कामुक किंतु संकोची मुद्रा से पर्यटकों को बांध लेती है।

विश्वनाथ मंदिर: चित्रगुप्त मंदिर से कुछ ही दूरी पर स्थित विश्वनाथ मंदिर भी बहुत महत्त्वपूर्ण है। यह मंदिर स्पश्टतः भगवान शिव को समर्पित है और खजुराहो के मंदिर समूहों में सबसे पुराना माना जाता है। इस मंदिर का निर्माण संभवतः 10020 में राजा धंग ने कराया था और इसे शिव मर्कटेश्वर मंदिर के नाम से जाना जाता था। पंचायतन शैली में निर्मित] परिक्रमा पथ सहित निर्मित सुंदर मंदिर में अब दो ही मंदिर शेष हैं।

जैन मंदिर की भित्ति पर देह सौंदर्य        छाया : हरिशंकर राढ़ी 
जैन मंदिर समूह: खजुराहो के पूर्वी मंदिर समूह में जैन मंदिर समूह बहुत ही आकर्षक और परिमार्जित शैली के हैं। इन मंदिरों की दीवारों पर कामरत युगलों की मूर्तियां बहुत ही सजीव और कामोद्दीपक लगती हैं। आदिनाथ, पार्श्वनाथ और शांतिनाथ मंदिर वास्तुकला और मानवीय रचनात्मकता के जीवंत उदाहरण हैं। पार्श्वनाथ मंदिर दसवीं शताब्दी के मध्य में बना हुआ माना जाता है। आदिनाथ मंदिर ग्यारहवीं सदी में बनाया गया और पश्चिमी समूह के मंदिरों की सुंदरता से मेल खाता है। हाँ, जैन मंदिरों की दीवारों पर बनी नग्न नर्तकियों की शारीरिक भाषा और भी अधिक मोहक है तथा उनकी तन्वंगी काया बेजोड़ है। इन मंदिरों की एक विशेषता यह भी मानी जा सकती है कि यहां मूर्तियां विध्वंसकों के कहर से बची हुई हैं। शिखर तक की गई महीन नक्काशी दर्शकों को बांधने और सोचने पर मजबूर कर देती है।

अन्य मंदिर: सच तो यह है कि खजुराहो में एक बार घूमना शुरू कर दिया जाए तो लगता है कि मंदिरों का अंत ही नहीं होगा। तीनों समूहों में इतने मंदिर हैं कि इनकी संख्या अनंत सी लगती है। वामन मंदिर,चतुर्भुज मंदिर, दूल्हादेव मंदिर और जावेरी मंदिर कहीं से भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं हैं। पुराने खजुराहो गांव में स्थित जावेरी मंदिर और वामन मंदिर प्राचीन स्थापत्य कला और मानवीय संवेदनशीलता की कहानी कहते हैं।

दूसरी ओर दूल्हादेव मंदिर कुल ग्यारह हजार एक शिवलिंगों के लिए जाना जाता है। इस मंदिर में मुख्य शिवलिंग पर ग्यारह हजार शिवलिंग बने हुए हैं और मुख्य शिवलिंग को मिलाकर ग्यारह हजार एक शिवलिंग बनते हैं। यह मंदिर आस्था का भी केंद्र है और स्थानीय भक्त यहां पूजा-अर्चना करने आते हैं। प्रदक्षिणा पथ काफी बड़ा है। ऊँचाई पर स्थित इस मंदिर के सामने एक बड़ा उद्यान भी है और मानसून काल में यहां हरियाली का साम्राज्य होता है। संभवतः बारहवीं सदी में बना यह मंदिर भी कामक्रीडारत युगलों और युवतियों के आकर्शक नग्न शरीर का चित्रण बहुत खूबसूरती से करता है। इस समूह के मंदिरों की बात होगी तो वामन मंदिर और वाराह मंदिर का भी जिक्र होगा। सच तो यह है कि खजुराहो के मंदिरों को देखकर जी नहीं भरता और आश्चर्य होता है कि कामकला, रतिक्रीडा और नारी देह के नाम पर आज इक्कीसवीं सदी में भी नाक-भौं सिकोड़ने वाले भारतीय समाज में आज से एक हजार वर्श पूर्व कितना खुलापन रहा होगा कि ऐसे मंदिरों का निर्माण किया गया। निःसंदेह वह काल कुंठाग्रस्त और पाखंडी नैतिकता का युग नहीं था। जो सच था, उसे पूरी सुंदरता के साथ स्वीकारा गया। हाँ] दुख होता है जब मुख्यतः पश्चिमी समूह की सुंदर मूर्तियों को खंडित रूप में देखना पड़ता है और अफसोस होता है उन जाहिल मुगल बादशाहों पर जिन्हें कला का ककहरा भी पता नहीं था और सार्वदेशिक - सार्वकालिक कामक्रीडा जैसे प्राकृतिक कर्म को हेय मानकर मूर्तियों को भंजित करवा दिया। किसी समय कुल बीस वर्ग किलोमीटर में फैले 85 से अधिक मंदिरों में अब केवल छह वर्ग किलोमीटर में लगभग 25 मंदिर ही शेष हैं।

पश्चिमी और दक्षिणी समूह के मंदिरों तक जाने के लिए आटो रिक्शा या कैब की आवश्यकता होती है। ये मंदिर बहुत अधिक दूरी पर तो नहीं हैं किंतु पैदल जा पाने में समय का अपव्यय होना ही है।

रने प्रपात: मंदिरों के अतिरिक्त भी खजुराहो के पास घूमने के लिए बहुत कुछ है। खजुराहो में हमें पूरे दो दिन रुकना था और पहले दिन हम वहां सुबह ही पहुंच गए थे। पहले से जुटाई गई जानकारी और नियोजन के अनुसार उस दिन दोपहर तक हमने पश्चिमी समूह के मंदिरों का भ्रमण, दर्शन और मनन किया। पूर्वी और दक्षिणी समूह के मंदिरों के लिए हमने अगला दिन सुरक्षित रखा और शाम को केन नदी पर स्थित रने प्रपात देखने का निश्चय किया।

     रने  प्रपात के दृश्य         छाया : हरिशंकर राढ़ी 
 रने  प्रपात के सम्मुख 
दरअसल हम इस मामले में भाग्यशाली थे कि हमने अपने भ्रमण का समय अगस्त माह में रखा था जो वर्षाकाल का चरम होता है। मध्यप्रदेश की अधिकांश नदियां सदानीरा नहीं हैं। वर्षाऋतु में ही इन पर यौवन आता है और इनके झरने हंसते हंैं। रने प्रपात खजुराहो से बीस किलोमीटर की दूरी पर छतरपुर जनपद में स्थित है। यह घड़ियाल अभयारण्य के निकट केन तथा खुदार नदियों के संगम पर स्थित है। केन तो एक बड़ी और चैड़ी नदी है किंतु मानसून के अतिरिक्त अन्य ऋतुओं में गरीब ही रहती है। यहां लगभग पांच किलोमीटर की लंबाई और तीस मीटर की चैड़ाई में गहरे गर्त का निर्माण करती केन नदी बहुत सुंदर दिखती है। नदी के उस पार दूर-दूर तक हरीतिमा फैली हुई दिखती है और लगता है कि वह हर दर्शक को अपने अज्ञात में बुला रही है। रने फाॅल जाने के लिए हमने एक आॅटोरिक्शा तय कर लिया था जो मध्यप्रदेश की संकरी और उबड़ -खाबड़ सड़क से गुजरता हुआ लगभग एक घंटे मंे पहुंच गया था। प्रवेशद्वार पर औपचारिकता एवं शुल्क भुगतान कर हम घड़ियाल अभयारण्य में प्रवेश कर गए। कुछ ही दूर जाने पर केन की धारा अनेक धाराओं में विभक्त होती हुई अति रोमांचक और सुंदर दृश्य प्रस्तुत करती हुई दिख गई। वास्तव में एक सम्मोहक वातावरण था। संध्या ज्यों -ज्यों निकट आ रही थी, प्रपात का सौंदर्य तथा रोमांच बढ़ता जा रहा था। दर्शकों की भीड़ लगी हुई थी। प्रपात की दहाड़, संगीत और नृत्य एक साथ न जाने कितनी भावनाएं हमारे मन में भर रहा था। दृश्य के लिए क्या कहा जाए - गिरा अनयन नयन बिनु बानी। ऊपर से नीचे गिरने के बाद धारा का प्रवाह भीम रूप धारण कर रहा था। यह सब देखते-देखते वापसी का समय आ गया। आखिर बीस किलोमीटर उसी 'राजपथसे जाना था जिससे हिचकोले खाते आए थे। अभयारण्य मानसून में बंद रहता है। बादल घिर आए थे और फिर बारिश भी इतनी जोर की हुई कि दिखना असंभव सा हो गया।

खजुराहो भ्रमण - कब और कैसे: बढती हुई पर्यटन प्रवृत्ति से खजुराहो जैसे छोटे से कस्बे तक पहुंचना बहुत आसान हो गया है। खजुराहो के मंदिर यूनेस्को द्वारा विश्व विरासत घोषित किए जाने के बाद यहां पर्यटन और तद्जन्य सुविधाओं में विकास हुआ है। खजुराहो तो अभी भी एक छोटा सा बाजार है किंतु यहां पांच सितारा से लेकर मितव्ययी होटलों की संख्या में वृद्धि हुई है। यहां वायु, रेल और सड़क मार्ग से आसानी से पहुंचा  जा सकता है। खजुराहो का अपना हवाई अड्डा है जहां दिल्ली और वाराणसी से विमान सेवा उपलब्ध है। शीघ्र ही अन्य महानगरों से विमान सेवा का विस्तार हो सकता है। खजुराहो में रेलवे स्टेशन भी है जो मुख्य बाजार से लगभग चार - पांच किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां के लिए महोबा जंक्शन से लिंक गाड़ियां चलती हैं और महोबा झांसी - जबलपुर मुख्य रेल मार्ग पर स्थित है। दिल्ली से यहां के लिए उत्तर प्रदेश संपर्क क्रांति के कुछ डिब्बे कटकर जाते हैं।

खजुराहो के लिए सर्वोत्तम समय अक्टूबर से मार्च है जो कि अधिकांश भारतीय पर्यटन स्थलों के लिए उचित माना जाता है। मानसून में भी जा सकते हैं किन्तु तब यहां उमस कुछ अधिक ही रहती है। हाँ, ग्रीष्म ऋतु में न जाएं तो बेहतर है क्योंकि तापमान कुछ असहनीय ही रहता है। ठहरने के लिए छोटे से लेकर अच्छे होटल उपलब्ध हैं और भोजन के लिए अनेक होटल, ढाबे और रेस्तरां हैं। हाँ, यदि एक रात और दो दिन का कार्यक्रम बनाया जाए तो बहुत ही अच्छा रहेगा। वैसे समयाभाव हो तो एक दिन में भी घूमा जा सकता है।




पश्चिमी समूह के मंदिरों में प्रवेश के लिए मुख्य द्वार पर टिकट लेना पड़ता है। सामान्य भारतीय पर्यटक के लिए यह शुल्क दस रुपये है जबकि विदेशियों के लिए अधिक है। फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी के लिए भारतीयों से 25 रु बतौर शुल्क वसूला जाता है जो बहुत पीड़ादायक नहीं लगता। पश्चिमी समूह के अतिरिक्त मंदिर खुले ही रहते हैं और किसी प्रकार का शुल्क देय नहीं होता।

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