Monday, 16 July 2018

भीड़ की हत्यारी भेड़चाल


बच्चाचोर समझकर एक इंजीनियर की हत्या कर दी गई. अभी उसे लेकर थोड़ा हल्ला मचा है. हो सकता है विक्टिम कार्ड के विशेषज्ञ उसमें कोई जातीय-सांप्रदायिक दृष्टिकोण भी तलाश लें. वह भी निकल ही आएगा. लेकिन जो मारा गया, वह सबसे पहले एक इंसान है. यह अलग बात है कि भारत में इंसान होने के नाते किसी की कोई क़ीमत नहीं है. उसकी क़ीमत हो, इसके लिए इंसान को किसी जाति, किसी संप्रदाय, किसी वर्ग के खाँचे में ढलना होता है. किसी वोटबैंक का हिस्सा बनना होता है. उसे बाँटने का यह काम वे करते हैं जो ख़ुद को जाति-संप्रदायवाद का घोर विरोधी और सौहार्द इकलौता ठेकेदार बताते हैं. लोकतांत्रिक राजनीति ने बीते साथ दशकों में भारत को जो दिया है, वह यही है.

यह बेशक एक निंदनीय घटना है, लेकिन इसके मूल में निहित ग्रामीणों-आमजनों की पीड़ा और उनकी आशंका भी समझी जानी चाहिए. कौन नहीं जानता कि आज आमजन के सामने अगर सबसे बड़ी समस्या है तो वह यह कि तंत्र में उसकी सुनी नहीं जाती और यह समस्या कोई आज से नहीं है. सुनी उसकी अंग्रेजों के समय में भी नहीं जाती थी. लेकिन अंग्रेजों की दासता से मुक्ति का सारा संघर्ष जो हमारे पूर्वजों ने किया वह क्या इसीलिए था कि नया तंत्र भी न सुने?

नया तंत्र कहने को तो हमारा अपना तंत्र है, लेकिन यह हमारा कितना अपना है, इसका अंदाजा सबको है. ज्यादा नहीं केवल एक बार अपने साथ किसी दुर्घटना की थाने में रिपोर्ट लिखाकर देख लीजिए. अगर आपका कोई जुगाड़ कोई पहुँच नहीं है तो रिपोर्ट लिख ली जाए, यही बहुत बड़ी बात होगी. लिख भी ली गई तो जाँच और किसी नतीजे की बात मत सोचिए. हर घटना जाँच के बाद कोर्ट जानी है और कोर्ट की कोर्टशिप ऐसी है बस पूछिए मत. न्यायाधीश यहाँ रोते हैं लेकिन केस की फाइलें नहीं चलने देते. तारीख़ पर तारीख़ पड़ती है लेकिन कोई नतीजा वर्षों तक नहीं आता.

यह स्थिति अपराधियों को बड़ा अपराधी और पीड़ितों को और बड़ा पीड़ित बनाती है. अपराधियों और भ्रष्टाचारियों के हौसले बढ़ाती है और आमजनों के हौसले पस्त करती है. उन्हें इस बात के लिए मजबूर करती है कि या तो निराश-हताश होकर सुखी-सम्मानजनक जीवन के चाहत ही छोड़ दें या फिर अपना नुइसेंस वैल्यू क्रिएट करें. यह नुइसेंस वैल्यू क्रिएट करने के लिए आजकल बड़े-बड़े विदेशी संगठनों के फंड पर चलने वाले बड़े-बड़े मीडिया हाउस हैं. सवा सौ करोड़ की आबादी में सवा सौ लोगों के बीच अत्यंत लोकप्रिय और भयंकर बुद्दिजीवी माने जाने वाले कुपढ़ पत्रकार हैं. अर्थशास्त्र की डिग्री लेकर इतिहासकार बनने वाले महान बुद्धिजीवी हैं. इनकी नज़र जिनुइन आम आदमी पर कभी नहीं पड़ती.

जिसकी कोई नहीं सुनता, वह क्या करे? नहीं, ऐसा कतई नहीं है कि मैं इस घटना का समर्थन कर रहा हूँ. यह निंदनीय घटना है और निंदनीय ही रहेगी. मेरी बात को इस घटना के जस्टिफिकेशन के तौर पर कतई न लें. लेकिन हर घटना के कई पहलू होते हैं. इसके भी हैं. भीड़ ने अपने पागलपन में जिसकी जान ले ली, वह आज का फौरी पीड़ित है. उसकी जगह मैं भी हो सकता था, आप भी हो सकते थे. लेकिन उस भीड़ की मनोदशा को समझा जाना चाहिए. क्या करे, यह तो बाद की बात है. भीड़ ने ऐसा क्यों किया, यह समझना ज़्यादा ज़रूरी है. क्योंकि यह समझे बिना ऐसी घटनाओं का निदान नहीं निकलेगा. हम केवल झाड़ियाँ पीटेंगे, साँप पकड़ में नहीं आएगा.

इसके मूल में भीड़ की वही, कहीं कुछ सुने न जाने की पीड़ा है. वह देख रही है कि हमारे देश में ऐसे-ऐसे प्रेशर गुट काम कर रहे हैं जो सामूहिक बलात्कार के जघन्य अपराधी को माननीय उच्चतम न्यायालय से बच्चा मनवा लेते हैं. जिसे सज़ा-ए-मौत मिलनी चाहिए उसे पुनर्वास का पुरस्कार दिला देते हैं. वे देख रहे हैं कि वे प्रेशर गुट के भोंपू ख़ुद माननीय उच्चतम न्यायालय की ही अवमानना करते हैं और न्यायालय इस पर साफ़-साफ़ फ़ैसला नहीं दे पाता.

वे देख रहे हैं कि अगर बच्चा चोरी हो जाए तो पहले तो रपट ही नहीं लिखी जाएगी और लिख भी ली गई तो उसे तलाशने की कोई कोशिश नहीं होगी. मंत्री की भैंस या बकरी खो जाए या किसी अफसर का कुत्ता खो जाए तो उसे तलाशने में पूरा थाना ही नहीं पूरे जिले की पुलिस लग जाएगी, लेकिन आम आदमी के कलेजे के टुकड़े को तलाशने कोई नहीं जाएगा. दो-चार साल बाद अगर वह कहीं मिला तो किसी मंदिर या स्टेशन के सामने अपंग के रूप में भीख माँगता मिलेगा.

यह तो गांधी ने भी कहा था कि अगर विधि अवैधानिक हो जाए तो उसे तोड़ना ही एकमात्र रास्ता होता है. और जो विधि सिद्धांत रूप में समान होते हुए भी अमीर और ग़रीब के लिए अलग-अलग तरीक़े से काम करती हो, नुइसेंस वैल्यू रखने और न रखने वाले के लिए अलग-अलग तरीक़े से काम करती हो, वोटबैंक बन सकने और न बन सकने वाले के लिए अलग-अलग तरीक़े से काम करती हो, सिद्धांततः और व्यवहारतः पंथनिरपेक्ष देश में जो विधि घोषित रूप से अलग-अलग जातियों के लिए अलग-अलग मानदंड रखती हो, एक तरफ़ पंथनिरपेक्ष संविधान के सम्मान की सुरक्षा का हल्ला मचाती हो और दूसरी ओर किसी पंथ की बनाई पांथिक विधि के अनुसार अदालतें चलाने की अनुमति देती हो... वह कितनी वैधानिक हो सकती है?

बेशक मेरी बात यह आशय नहीं है कि कोई अराजक हो जाए. वस्तुतः इन विषयों पर ध्यान मैं इसीलिए दिला रहा हूँ कि अराजकता के बुनियादी कारणों को समझा जाए. निदान उन कारणों का करिए. तभी वह स्थायी निदान होगा. लक्षणों का नहीं. यह मॉब लिंचिंग एक लक्षण भर है. इससे ज्यादा कुछ नहीं. असल बात तो यह है कि लोक की अराजकता के मूल में तंत्र की अराजकता है. इस तंत्र में वे सब शामिल हैं जो तंत्र को चला रहे हैं और वे भी जो इसे चलवा रहे हैं यानी अपनी उंगलियों पर नचा रहे हैं. अगर इनकी अराजकता ख़त्म कर दी जाए तो सारी अराजकता ख़त्म हो जाएगी.

लेकिन उनकी अराजकता ख़त्म करेगा कौन? तंत्र के भीतर जो अराजकता व्याप्त है, नुइसेंस वैल्यू क्रिएट करने वाले वे तत्त्व उसका फ़ायदा उठाते हैं. अपनी अराजकता से भयभीत तंत्र उसे महत्त्व देता है और उनके सामने झुक जाता है. तंत्र का यह झुकना अराजक तत्त्वों की छाती और चौड़ी कर देता है. इसके ठीक उलट जनता का साहस और सिकुड़ जाता है. तंत्र पर उसका भरोसा और डूब जाता है. नतीजा वही होता है जो सामने है और जो नहीं होना चाहिए.

इस घटना को ही ले लें. इसके मूल में एक व्हाट्सएप मेसेज है. किसी ने किसी ग्रुप पर कोई संदेश भेजा और वह संदेश चारों ओर फैल गया. फैले हुए संदेश ने लोगों को बेचैनी और आशंका से भर दिया और किसी अजनबी पर ज़रा-सा संदेह होते ही वे आशंका से भर उठे. उसके बाद वे इतना भी धैर्य नहीं दिखा पाए कि यह जान लें कि वे कौन लोग हैं, क्यों आए हैं और बच्चों को चॉकलेट या मिठाइयाँ क्यों बाँट रहे हैं. यह उस भारत में हो रहा है, जहाँ आज भी रोज़ाना हज़ारों लोग लंगर चलाते हैं और अपरिचितों को भी आग्रह कर-करके खिलाते और शर्बत पिलाते हैं. अहेतुक विश्वास की इस धरती ऐसे जानलेवा अविश्वास का माहौल अगर बन गया है तो क्यों?

वे कौन लोग हैं जो इस तरह की अफवाहें फैला रहे हैं, यह भी जाना जाना चाहिए. उनकी मंशा जानी जानी चाहिए और उन पर प्रभावी रोक लगाई जानी चाहिए. जाँच होगी भी व्हाट्सएप ग्रुप के एडमिन तक ही जा पाएगी. उसके पास यह मेसेज कहाँ से आया, किसने भेजा और उसे किसने भेजा... ना, इतनी दूर तक जाने की ज़रूरत हमारे देश की कोई पुलिस नहीं समझती.

घटनाएँ कभी उतनी सपाट नहीं होतीं जितनी दिखती हैं. उनके मूल में कारणों की कई परतें होती हैं. उन परतों को खोला जाना चाहिए. इस घटना के मूल में सतही कारण एक व्हाट्सएप मेसेज है. लेकिन मेसेज के मूल में क्या कारण हैं, इसका उद्गम कहाँ है और इसे फैलाने वालों के लक्ष्य क्या हैं, यह सब जानने की ज़रूरत है. वरना हम बस झाड़ियाँ पीटते रह जाएंगे और आशंकाओं का साँप सरकता और अपनी वंशवृद्धि करता हुआ पूरे देश को अपनी ज़द में लेता चला जाएगा.

मुझे नहीं लगता कि अभी भी इसे लेकर शासन-प्रशासन ज़रा भी गंभीर हुआ है. ऐसी कई घटनाएँ घट चुकीं लेकिन कोई गंभीर जाँच-पड़ताल नहीं दिखी. ट्रेनों को दुर्घटना का शिकार बनाने की साजिशें होती हैं. अगर हो जाती हैं तो सरकारें जाँच-पड़ताल के बाद थोड़े दिन हल्ला मचाकर अपना पल्ला झाड़ने के बाद उन्हें ठंडे बस्ते में डालकर सो जाती हैं. उनकी कायदे से पैरवी तक नहीं की जाती. ट्रेनें बच जाती हैं तो जाँच पड़ताल की भी जरूरत नहीं समझी जाती. क्यों? ऐसा ही इन मामलों में भी होता है. कोई इसकी तह तक पहुँचने की कोशिश नहीं करेगा. आख़िर कहाँ से चला वह जानलेवा मेसेज और क्यों?


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