Wednesday, 18 July 2018

भीड़ का न्याय, न्याय का तंत्र


मीलॉर्ड, योर ऑनर, हुजूर, माई-बाप, श्रीमान महोदय

कहाँ आप और कहाँ मैं. मेरी क्या औकात कि मैं आपके सामने कुछ कहूँ. कहना तो छोड़िए, आपसे कुछ पूछना भी मेरे बस की बात नहीं. आपसे तो वो भी नहीं पूछ सकते जो सबसे पूछते हैं. सुनते हैं कि वो जनता के प्रतिनिधि हैं और वो जनता के प्रति जवाबदेह हैं. लेकिन जनता को उन्हें कोई जवाब देते मैंने कभी देखा नहीं. बेचारी जनता, उसके पास सवाल ही उठाने की औकात नहीं है, जवाब वो दें भी तो कहाँ से! वो तो बस उनके वादे सुन लेती है और फिर पाँच साल बाद उनमें से जिन किन्हीं के भी जैसे भी पूरे होने का वो जो भी जवाब अपने-आप ही दे दें वही उसे मान लेना होता है.

अब यह जवाब चाहे उसकी जान-माल के सुरक्षा के वादे का हो, चाहे सम्मान का, या फिर रोज़गार या आर्थिक विकास का, महँगाई या भ्रष्टाचार का.. उस बेचारी के पास सुनने के अलावा कोई चारा नहीं होता. सत्तर साल पहले जब लोकतंत्र का पहले-पहल हल्ला मचा था तब ज़रूर लोगों को यह भ्रम रहा होगा कि वो सरकार बनाएंगे, पर अब वो समझ गए हैं कि वो सरकार नहीं बनाते, सरकार उन्हें बनाती है. चूँकि हर पाँच साल बाद सरकारजी को यह लीला दिखानी होती है कि उन्हें जनता बनाती है, तो वो जनता के बीच जाने की कृपा करने में कोई कोताही नहीं करती हैं. वैसे तो हर नियम का अपवाद होता है. तो यह नियम अपवाद से कैसे बच सकता है. लिहाजा इस नियम का भी एक अपवाद है, पिछली शताब्दी के आठवें दशक में. पर अपवाद तो अपवाद ही है.

तो नियम में जनता कहीं उलटा-पुलटा न कर बैठे, इसके लिए जनता की पर्याप्त व्यवस्था की जाती है. सरकार का नाम भले बदल जाए पर सरकार न बदले इसके लिए नई जनता की व्यवस्था भी की जाती है. अगल-बगल के देशों से जनता आयात करने का रिवाज हमारे यहाँ बहुत पहले से चला आ रहा है. पश्चिम, उत्तर और पूरब से लेकर अब धुर पूरब भी इसमें जुड़ गया है. उम्मीद करते हैं कि जल्द ही धुर पश्चिम भी इसमें जुड़ जाएगा. हो सकता है आने वाले दिनों में दूसरे-दूसरे देशों के बाद तीसरे-तीसरे महाद्वीपों से भी आयात की जाए. वैसे भी इस देश की पुरानी जनता के बिगड़ने की आशंका बहुत बढ़ गई है. अब यह लात खाकर चुप नहीं रहती, कभी-कभी जवाब देने लगी है. तो अब इसे पूरी तरह बदल ही देना चाहिए. जनता इसे अपना प्रतिरोध मानती है. आप और आपके संगी-साथी असहिष्णुता.

ख़ैर, इस सब पर कुछ कहना तो छोटा मुँह बड़ी बात होगी. मेरी क़ाबिलीयत क्या कि मैं इन मुद्दों पर बोलूँ या कुछ कहूँ. मैं न विद्वान वकील, न माननीय सांसद-विधायक या ग्राम प्रधान. मैं ठहरा एक अदद मामूली इंसान. इतना मामूली कि मामूली से भी मामूली. वह वाला मामूली जो कुछ साल पहले तक अपने को आम आदमी कहा करता था, पर हमारे महान देश की महान राजनीति से उससे वह हक़ भी छीन लिया. यह अपने को मामूली इंसान कहने का हक़ भी मुझसे कब कैसे छीन लिया जाए, हूजूर मैं वाक़ई नहीं जानता. आप तो दयानिधान हैं. हमने आपकी दयानिधानता अमीरों के सामने ग़रीबों की वक़त वाले कई मामलों में बख़ूबी देखी है. मेरी मामूलीयत का सही-सही अंदाजा आप ही लगा सकते हैं. बस यूँ समझें कि धरम का हिंदू जात का बाभन, जिसके पास रोज़ लात खाते हुए भी विक्टिम कार्ड खेलने तक की सुविधा नहीं है.

आप तो सुनते हैं और सुनते ही क्या देखते भी हैं कि बड़े-बड़ों को फींच देते हैं. जिसे चाहें अपने दरबार में हींच लेते हैं. इधर तो क़ानून बनाने वाले भी रोज़-रोज़ खींचे जा रहे हैं. यहाँ तक कि वो भी खींचे जाते हैं जो आपका रोस्टर बनाते हैं. बस वो नहीं खींचे गए जो आपको बनाते हैं. वह भी भरे बाजार, आम जनता के बीच. हालाँकि बनाने की प्रक्रिया की उनकी फिलिम पहले बाजार ने और बाजार से पूरी जनता ने सींची. पता नहीं, इस बात पर आपका ध्यान कभी क्यों नहीं गया कि जो बात एक दिन की एक बैठकी में तय हो जानी चाहिए, आपके दरबार में उसे तय होने में कई-कई साल क्यों लग जाते हैं!

मैं उतना समझदार तो नहीं हूँ फिर भी आपकी बात समझता हूँ कि सौ गुनहगार भले छूट जाएँ पर एक बेगुनाह को सज़ा नहीं मिलनी चाहिए. हुजूर जनता बड़ी बावली है. वह कानून के सिद्धांत को जाने बगैर व्यवहार को देखती है. और ऐसा कहती है कि ये सौ गुनहगार छूटते हैं, वो छूटते नहीं असल में छोड़े जाते हैं और छोड़े जाकर ये कितने बेगुनाहों को अपने गुनाह का शिकार बनाते हैं, इसका हिसाब रखना उन ढाई करोड़ से ज़्यादा केसों से भी कठिन है जो आपके यहाँ पेंडिग पड़े हैं.

कुछ बकलोल तो यहाँ तक कहते हैं कि न्याय करना भीड़ का शौक़ नहीं मजबूरी है. उन्हें लगता है कि जब जिसे न्याय करना है वो अनंत तक कोई फ़ैसला ही नहीं कर पाता तो ऐसे न्यायतंत्र पर क्या भरोसा किया जाए? कुछ तो अंग्रेजी की एक कहावत कहते हैं कि जस्टिस डिलेड माने जस्टिस डिनाएड. उन्हें लगता है कि न्याय कोई हँसी-खेल टाइप काम है. वो कहते हैं कि इस न्यायतंत्र में अपराधी छूटते रहते हैं. छूट-छूट कर नए अपराधों को अंजाम देते रहते हैं और नए-नए बेगुनाहों को अपना शिकार बनाते रहते हैं. ऐसे में आम जनता यानी भीड़ के पास अपनी सुरक्षा का एक ही तरीक़ा है और वह यह कि वह अपने लिए न्याय ख़ुद कर ले. ये बकलोल लोग नहीं जानते कि इसका अंतिम नतीजा क्या होगा.

आपने बहुत अच्छा किया कि सरकार बहादुर को मॉब लिंचिंग के ख़िलाफ़ क़ानून बनाने का हुकुम दिया. मुझे बहुत अच्छा लगा. इस पर क्या, आपकी किसी भी बात पर मैं कभी सवाल तो उठा ही नहीं सकता. हाँ कुछ जिज्ञासाएँ ज़रूर हैं और प्लीज़ बुरा न मानिएगा, बस वो जिज्ञासाएँ मैं आपके सामने रख देना चाहता हूँ.

मने मैं जानना ये चाहता हूँ कि देश में बलात्कार के ख़िलाफ पहले से क़ानून है. हत्या के खिलाफ़ पहले से क़ानून है. चोरी, डकैती, भ्रष्टाचार, आतंकवाद.. आदि-आदि न मालूम कितनी चीज़ों के ख़िलाफ पहले से क़ानून है. यहाँ तक कि स्कूलों, कॉलेजों, अस्पतालों आदि की संस्थागत लूट के ख़िलाफ़ भी क़ानून है. वैसे भी हमारा क़ानून तो शुरू से ही इन तमाम ख़राब चीज़ों के ख़िलाफ़ ही है. फिर भी हम देखते हैं कि ये सब चीज़ें हो ही रही हैं. बल्कि हुए ही चली जा रही हैं. बढ़े ही चली जा रही हैं. आख़िर ऐसा हो क्यों रहा है?

सच पूछिए तो हमको तो क़ानून एक अंधेरे जंगल जैसा लगता है. नहीं-नहीं इसका यह मतलब बिलकुल नहीं है कि मैं जंगल राज जैसा कुछ कह रहा हूँ. मेरा मतलब ये है कि क़ानून को न मुझे पढ़ना आता है और न समझना. असल में क़ानून में लिखा कुछ होता है, डिक्शनरी उसका मतलब कुछ बताती है और व्यवहार में होता कुछ और है. तो ये जो फ़र्क़ है, उसे देखकर कभी-कभी तो ऐसा लगने लगता है कि क़ानून बड़ा प्रेमी है. जैसे प्रेम में कहा कुछ जाता है और मतलब कुछ और होता है, कुछ-कुछ वैसा ही कानून के साथ भी है. एक दिन टीवी पर एक बड़े वकील साहब बता रहे थे कि हर क़ानून का उलटा क़ानून भी है. यह सुनकर मेरा तो दिमाग़ ही चकरा गया.

तो हुजूर मने मेरे मन में आशंका यह है कि जब भीड़ वाली लिंचिंग के ख़िलाफ़ क़ानून बन जाएगा तब फिर तो ऐसा नहीं होगा न? मल्लब उसके बाद तो भीड़ किसी को नहीं मारेगी न? मल्लब तनी सोच के देखिए, वैसे तो भीड़ में सब छोटे-छोटे आदमी होते हैं. बड़ा आदमी तो कभी भीड़ का हिस्सा होता ही नहीं. छोटे-छोटे आदमियों के ख़िलाफ़ फ़ैसला करना कोई बड़ा काम तो होता नहीं. फिर भी कभी-कभी इसमें भी बड़ा टाइम लग जाता है. और कभी मान लीजिए, अगर कोई बड़ा आदमी भी इस भीड़ का हिस्सा बन गया तो? तब तो फिर यह फ़ैसला करने में कई-कई साल लग जाएंगे. या कि नहीं लगेंगे?

मने तब तो सोचना पड़ेगा न कि ये सब क्यो हो रहा है! वैसे आप कहें तो मैं मान लेता हूँ कि नहीं होगा. लेकिन अगर फिर भी हुआ, क़ानून बन जाने पर भी भीड़ न्याय करती रही, तो तब तो सोचना पड़ेगा न कि भीड़ ऐसा क्यों कर रही है! मल्लब मेरा करबद्ध निवेदन है कि थोड़ा-सा, मने कि ज़रा-सा यह भी सोच के देखा जाए कि भीड़ ऐसा कर क्यों रही है. हुजूर, माई-बाप अगर इस विषय पर थोड़ा सोच लिया जाए तो कैसा रहेगा?
   
इष्ट देव सांकृत्यायन  

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