Monday, 30 July 2018

आख़िर कब तक और क्यों ढोएँ हम?


हमारी अपनी ही आबादी 134 करोड़ पार कर चुकी है. यह रुकने का नाम नहीं ले रही है. घटने की तो बात ही बेमानी है.

यह बढ़ती आबादी हमारे लिए एक बड़ी मुसीबत है. वे लोग जो आबादी को ह्यूमन रिसोर्स और इस नाते से लायबिलिटी के बजाय असेट मानने की दृष्टि अपनाने की बात करते हैं, जब इस ह्यूमन रिसोर्स के यूटिलाइज़ेशन की बात आती है तो केवल कुछ सिद्धांत बघारने के अलावा कुछ और कर नहीं पाते. दुनिया जानती है कि ये सिद्धांत कागद की लेखी के अलावा कुछ और हैं नहीं और कागद के लेखी से कुछ होने वाला नहीं है.


ये कागद की लेखी वैसे ही है जैसे किसी भी सरकार के आँकड़े. जिनका ज़मीनी हक़ीक़त से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं होता. आँखिन की देखी के पैमान पर इन्हें कसा जाए तो ये प्रायः झूठ और उलझनों के पुलिंदे साबित होते हैं.

इस बढ़ती आबादी से पैदा होने वाली उलझनों की हक़ीक़त ये है कि देश में बहुत बड़ी आबादी या तो बेरोज़गारी की शिकार है या फिर अपनी काबिलीयत से कमतर मज़दूरी पर कमतर रोज़गार के लिए मजबूर. इस आबादी में हम और आबादी जोड़ते जा रहे हैं. नए-नए शरणार्थियों का आयात कर रहे हैं. दुनिया भर के टुच्चे नियम-क़ानून और बेसिर-पैर का हवाला देते हुए.

ये हवाले देखें तो ऐसा लगता है गोया वसुधैव कुटुंबकम का ठेका हमारे बुद्धिजीवियों और कुछ राजनेताओं ने ही ले रखा है. हक़ीक़त ये है कि इनका वसुधैव कुटंबकम भी वह सूत्र नहीं है जो महोपनिषद में आया है, यह तो इसका वैसे ही इस्तेमाल कर रहे हैं जैसे पंचतंत्र के सियार ने बैल पर किया.

देश और देश की जनता से इनकी कितनी सहानुभूति है, इसका अंदाज़ा इसी बात से लगा सकते हैं कि देश में जाति-धर्म की सारी आग उनकी लगाई हुई है जो ख़ुद सेकुलरिज़्म का सबसे बड़ा ठेकेदार बताते नहीं अघाते. ये सिद्धांत भी इनके लिए अपना वोटबैंक बढ़ाने के अलावा कुछ नहीं है.

जिन लोगों की भावनाएँ भड़काकर ये बंग्लादेशियों और रोहिंग्याओं को यहाँ बसाने के लिए मरे जाते हैं, हक़ीक़त ये है कि ये अवैध प्रवासी उनकी ही रोज़ी-रोटी के लिए ख़तरा बनते हैं. उनके ही लिए रोज़गार का संकट पैदा करते हैं. क्योंकि दूसरे देश से अवैध रूप से आकर बसे आदमी के सामने सबसे पहला संकट अपने लिए रोटी के जुगाड़ का होता है. ऐसे में उसे अपने श्रम का जो भी मूल्य मिलता है, वह उसी पर काम करने के लिए राज़ी हो जाता है.

इसका भरपूर फ़ायदा उठाता है क्रोनी कैपिटलिज़्म और उसके इस फ़ायदे के लिए मानवाधिकारों के चैंपियनशिप की बहानेबाज़ी करते हैं हमारे उदारचेता लोग. इनकी सारी उदारता का कुल लाभ किसे मिलता है, इस पर हम ग़ौर ही नहीं कर पाते.

एक बार इस पर ज़रा ग़ौर से देखिए. ये जो बांग्लादेश और म्यांमार से आए हुए अवैध प्रवासी हैं, जो किसी भी हाल में जीने के लिए राजी हैं, ये यहाँ आकर करते क्या हैं? या तो असंगठित क्षेत्र के वे काम जिनमें हमारे देश की बहुत बड़ी ग़रीब आबादी लगी हुई है. या फिर चोरी-डकैती. दोनों ही स्थितियों में शिकार हमारा ग़रीब और मध्यवर्ग ही होता है. क्योंकि चोरी डकैती भी कोई उनके घर नहीं कर सकता जो सात पहरों में रहते हैं.

ये सेकुलरिज़्म और सामाजिक न्याय के बड़े-बड़े दावे करने वाले बुद्धिजीवी और नेता धर्म और जाति के आधार पर ही इन्हें यहाँ अपना पाहुन बनाने के लिए जनमत तैयार करते हैं. जबकि हक़ीक़त ये है कि ये अपने लिए सिर्फ़ वोटबैंक तैयार करते हैं और उसके मार्फ़त बड़े-बड़े पूँजीपतियों के लिए सस्ते, लगभग मुफ़्त के मज़दूर.

इनसे पूछा जाना चाहिए कि जिनके रोज़गार ये खाते हैं और जिनके पेट पर ये लात मारते हैं, वे कौन हैं. पहले से भारत में रह रहे हिंदू-मुसलमान और ईसाइयों के ग़रीब तबके. आप चाहे पिछड़े कह लें या दलित. जब स्वार्थों के टकराव की बात आती है तो ये हिंदू को मुसलमान से, दलित को सवर्ण से और पिछड़े को दलित से भिड़ाकर चैन की बंशी बजाते हैं.

अपने लिए वोटबैंक साधते हैं और क्रोनी कैपिटलिज़्म के लिए मुफ़्त के मज़दूर तैयार कर देते हैं. बड़े-बड़े मनीषियों के सारे सिद्धांत एक किनारे चले जाते हैं. आप जब इन पर सवाल उठाते हैं तो प्रतिक्रियावादी, सांप्रदायिक, संशोधनवादी और पिछड़ी सोच वाले करार दे दिए जाते हैं. चूँकि आपके ज़मीनी सवालों का इनके पास कोई हल नहीं है, लिहाज़ा इकलौता रास्ता यही है कि आपको भरमाया जाए. बेवजह नीचा दिखाया जाए. उनका अपराध आपके सिर थोपा जाए और अंततः कन्नी काटी जाए.

आख़िर कब तक? और क्यों ढोएँ हम?

Saturday, 28 July 2018

कश्मीर की आवाज़


जिस कश्मीर को आप केवल आतंकवादियों की सहायता में पत्थरबाजी के लिए जानते हैं, वहाँ ऐसे लोग भी हैं जो आतंकवादियों के छक्के छुड़ाने का हौसला रखते हैं. बल्कि ऐसे लोगों की तादाद ज़्यादा है. और ये वही लोग हैं जो ख़ुद भारतीय मानते हैं और जमू-कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग.


हुआ बस यह था कि इनकी आवाज़ दबा दी गई थी. यह दबाने का काम किसी और ने नहीं, शेख़ अब्दुल्ला के शासन ने किया था. ख़ुद नेहरूजी ने महसूस किया अब्दुल्ला का साथ देकर उन्होंने ग़लती कर दी. लेकिन जब उन्होंने महसूस किया तब तक पानी सिर से गुज़र चुका था.

अगस्त 1953 में जब उसकी पहली गिरफ़्तारी की गई तब तक वह अपने गुर्गे पूरे कश्मीर में फैला चुका था और उन्हें अपना शासन रहते बहुत मजबूत कर चुका था.

इसके पहले वह विलय के पक्ष में आंदोलन करने वाले तमाम हिंदुओं और मुसलमानों पर बेइंतहां जुल्म ढा चुका था. जेल में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जान ले चुका था. कई और लोगों की जान जेल से बाहर ले चुका था. लिहाजा उसका और उसके गुर्गों का ख़ौफ़ लोगों पर क़ायम रहा.

पाकिस्तान से भेजे गए गुर्गों को भी वह जगह-जगह स्थापित कर चुका था. इनसे मिलकर उसके गुर्गे अपना काम कर रहे थे. आमजन को डरा-धमका रहे थे और उसे पाकिस्तानपरस्त बना रहे थे. उसी पाकिस्तान के पक्ष में जो अब्दुल्ला को स्वायत्तता के मुद्दे पर कुत्ते की तरह दुरदुरा चुका था और वह अपना सा मुँह लेकर लौट आया था.

लेकिन कश्मीर पर क़ब्ज़ा तो उसे चाहिए था और इसके लिए उसने अब्दुल्ला को हरसंभव सहायता जारी रखी. जो वास्तव में अब्दुल्ला को उसकी सहायता नहीं, बल्कि पाकिस्तान द्वारा अपने हित में अब्दुल्ला का इस्तेमाल था. अब्दुल्ला इसमें इस कदर मशगूल हुआ कि उसने सारे कश्मीरियों की आवाज़ सिर्फ़ दबा नहीं दी, बल्कि बदल दी. उन्हें अपनी बात बोलने के लिए मजबूर किया.

मजबूरी में उन्होंने सिर्फ़ बोला ही नहीं, वह सब किया भी जो अब्दुल्ला और उसके परवर्तियों ने चाहा. चूँकि भारत सरकार ने इस पर कभी कोई प्रभावी लगाम नहीं लगाया तो उसका और उसके जैसे दूसरे अलगाववादियों का मन बढ़ता ही गया. इसी क्रम में कश्मीरी पंडितों की सबसे बीभत्स मॉब लिंचिंग हुई. जिसे तब के अखबारों-चैनलों में से किसी ने मॉब लिंचिंग नहीं कहा.

तब शायद उनके पास यह शब्द था नहीं. असल में उन्हें किसी नए पवित्र शब्द की जरूरत तभी पड़ती है जब किसी वास्तविक अपराधी के ख़िलाफ़ निर्दोष आमजन कोई क़दम उठाता है. इसका अंदाजा आप आसानी से लगा सकते हैं इन दिनों देश के कुछ अंग्रेजी अखबारों की हेडलाइन-फोटो-कार्टून प्रोपगंडा नीति से.

आपको यह ख़बर बहुत कम अख़बारों में दिखी होगी और दिखी भी होगी तो किसी कोने में. ख़बर यह है कि बैंक लूटने आए आतंकवादियों को आमजन ने मार भगाया. हालांकि इस घटना में कुछ लोग घायल भी हो गए, लेकिन उन्होंने जिस साहस का परिचय दिया, यह वे पहले नहीं कर सकते थे.

आज कर पा रहे हैं, यह बड़ी बात है. यह एक बड़ा परिवर्तन है. तैयार रहें, हो सकता है कि आने वाले दिनों में लोग ऐसे ही आतंकवादियों को धरना-दबोचना और उनकी ही भाषा में उनके कृत्यों का जवाब देना शुरू करें. अफजल की मौत पर शर्मिंदा बुद्धिजीवी और अख़बार तब शायद इसे भी मॉब लिंचिंग का नाम देंगे.

शुरुआत हो गई है तो दूर तलक जाएगी. बहरहाल मेरी राय कि खूंखार आतंकियों का सामना करने वाले इन आम नागरिकों और गार्ड को पुरस्कृत किया जाना चाहिए.


आपकी भूख का फुटबॉल

जिन राजनेताओं को लेकर आप बहुत गंभीर होते हैं, अपने दोस्तों-परिजनों से लेकर अजनबियों तक से भिड़ जाते हैं; कभी ग़ौर किया है कि वे आपको लेकर कितने गंभीर हैं?

नहीं किया है तो अबसे करें.

जब आप भूख से मरते हैं तो वे आपके मरने को मुद्दा बनाते हैं. और मुद्दा वे उसी चीज़ को बनाते हैं, जिसे भुना सकें. भुना सकें, यानी जिससे ख़ुद फ़ायदा उठा सकें. फ़ायदा उठा सकें यानी व्यापार कर सकें.
तो वे आपके भूख से मरने का भी व्यापार करते हैं.

और इस व्यापार में वे आपकी भूख को फुटबॉल बना लेते हैं. यानी एक आपकी भूख को लात मार कर दूसरे के पाले में फेंकता है. और फिर दूसरा भी उसके साथ यही सलूक करता है. सब यही कहते हैं -- नहीं नहीं, मेरे नहीं, उसके चलते हुई है तेरी मौत. तेरी भूख की वजह मैं नहीं बे, वो है.

पूरी ईमानदारी से सभी यही करते हैं. वो भी जो आप पर रोज़ किरपा की बारिश करते रहते हैं. इतनी बारिश कि जितनी कोई बाबा भी न कर सके. और वो भी जो आपको दुनिया भर के पाठ पढ़ाते हैं.

कोशिश सबकी यही है कि आप कभी इस लायक होने ही न पाएँ कि उनकी किरपा से बाहर निकल जाएँ. उनके होने का तो सारा मज़ा ही बस तभी तक है जब तक कि आप उनकी किरपा के दायरे में बने रहें.

आपकी रोटी ही नहीं, आपका स्वाभिमान, आपकी सभ्यता, आपकी संस्कृति, आपका विचार... कुछ भी, उनके लिए फुटबॉल से ज़्यादा कुछ नहीं है.

इस पूरे उपक्रम में आपके और नेता के बीच बुद्धिजीवी आते हैं. बिलकुल वैसे ही जैसे कौड़े पर आलू भूनते वक़्त आपके और आलू के बीच लकड़ी आती है.

ये लकड़ी किसके इशारे पर और कैसे काम करती है, आप जानते हैं. कैंब्रिज एनलिटिका की लिस्ट आपने हाल ही में देखी है. इसके पहले कई और लिस्टें बिना प्रकाश में आए अपना काम कर चुकी हैं.

जब तक आप नेता और लकड़ी से समझते रहेंगे, आप फुटबॉल बने रहेंगे. इनमें से कोई भी आपको कभी भी वह नहीं समझाएगा जो आपको समझना चाहिए. क्योंकि इसे तो आपकी भूख बेचनी है. आपकी शर्म बेचनी है. आपका स्वाभिमान, आपकी सभ्यता, आपकी संस्कृति बेचनी है.

जब तक आप इनकी समझाइश पर समझते रहेंगे, फुटबॉल ही बने रहेंगे.

यह आपको तय करना होगा कि आप उनके फुटबॉल बने रहना चाहते हैं, या फिर आप बनना चाहते हैं.


Tuesday, 24 July 2018

sms आएगा, आएगा, आएगा....


भारत का आयकर विभाग बार-बार आपको रिमाइंडर पर रिमाइंडर भेजे जा रहा होगा कि जी आप जल्दी से अपना रिटर्न जमा कराएँ. 31 तारीख के पहले-पहले डाल दें. ताकि आपका बाकी जीवन सुखी रहे.


Income Tax Department, Government Of India बार-बार यह भी कहता है कि जी अब तो सब online हो गया है. आप सोचते हैं, चलो कम से कम कई-कई घंटे लाइन में लगने से फ़ुर्सत मिली. लेकिन जब आप Online अपना रिटर्न जमा करने जाते हैं तो......


पहले तो आप इंटरनेट की स्पीड झेलते हैं. जो यूट्यूब और फेसबुक चलाते समय चलती नहीं दौड़ती है, वही सरकारी साइट पर पहुँचते ही नाकों चने चबवानी लगती है. दौड़ना-चलना तो छोड़िए जी, घिसटती भी बड़ी मुश्किल से है. ख़ैर, जैसे-तैसे राम-राम करके आपने बाक़ी डिटेल भर दिए, 'सरल' नामधारी कठिन बवाल झेल लिया, आख़िरकार जमा करवा ही दिया तो फिर एक बवाल आएगा.


इस बवाल को कहते हैं भेरीफाई (verify) करना. इस भेरीफैयाने के लिए बताया यह जाता है कि आयकर विभाग आपको आपके रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर पर एक sms भेजता है. यह ख़ाली बताया ही नहीं जाता, वह वाक़ई भेजता है. और यह वह केवल आपके मोबाइल नंबर ही नहीं, आपके रजिस्टर्ड ईमेल आइडी पर भी भेजता है. ऐसा केवल लोग ही नहीं जी, ख़ुद Income Tax Department, Government Of India भी कहता है. वह यह भी कहता है कि जी हमने भेज दिया.


लेकिन


लेकिन होता है कि ये अपना आयकर विभाग जो sms या mai भेजता है, वो कोई नेटवर्क पर नहीं भेजता. अगर किसी मोबाइल या मेल नेटवर्क से भेजता है तो चाहे भले वो कई साल पहले का लद्धड़ bsnl क्यों न हो, एक-दो दिन में पहुँचा ही देता.


हमारे देश का आयकर विभाग हर काम सरकारी ढंग से करता है. आख़िर सरकार का डिपार्टमेंट है. उसकी ज़िम्मेदारी है कि हर काम सरकारी ढंग से करे. और बस इसीलिए वह भेरिफैयाने वाला sms पोस्टकार्ड या अंतर्देसी से मार्फ़त डाक भिभाग भेजता है. जिसके नाते ऊ आप तक पहुंच नहीं पाता है.


उस sms में चूँकि otp नाम का कोई तत्त होता है और ऊ तत्त डाले बिना आपका रिटर्न भेरिफाया नहीं जा सकता तो लिहाजा आप इंतजारिए, तब तक जब तक कि ऊ मिल न जाए. नहीं मिलता है त का है कि आते-जाते रहिए. मने घर आपका है. आप देस के जिम्मेदार टैक्सपेयर हैं. आप खाएं या न खाएं, दिन-रात मरें, सरकार का ख़ज़ाना भरें. ताकि आपके द्वारा भरे गए ख़ज़ाने से ख़ैरात बाँटी जा सके. संसद जिसको चलाने पर हर मिनट कई करोड़ रुपये का वारा-न्यारा होता है और जिसकी कार्यवाही रोकने पर देश भर के अख़बारों में यशगान गाया जाता है, वो चलाई जा सके.


बाक़ी अब चूँकि नौकरीपेशा टैक्सपेयर हैं तो आपके लिए आपके काम का क्या? ऊ त होता रहेगा. भाई काम त आजकल केवल बैंक और आयकर विभाग कर रहे हैं. यकीन न हो तो sbi की किसी ब्रांच पर जाके देख आइए. फिर भी यक़ीन न पड़े तो किसी बुद्धिजीवी जी से पूछ लीजिए. आपको यक़ीन होइए जाएगा.


और ज़िम्मेदार तो हर बात के लिए मने कि वित्तमंत्री और प्रधानमंत्री हैए है. सबको ये जरूरत महसूस होती है कि चलना सब ठीक चैये, पर करें यही. जिम्मेदारी हमारी यानी किसी भिभाग के अफसरों, बाबुओं और तकीनीकी स्टाफ की थोड़े है. 




Sunday, 22 July 2018

राहुल गांधी के जूते में आपके पैर

राहुल गांधी के मन में नरेंद्र मोदी के प्रति कितना प्यार है, यह किसी से छिपा नहीं है. वैसे तो संसद में अविश्वास प्रस्ताव पर भाषण देते समय राहुलजी की आवाज़ और उनके हाव-भाव से ही सब कुछ जाहिर हो रहा था, लेकिन नई पीढ़ी भी अभी 2002 से लेकर अब तक ख़ुद राहुलजी, उनकी माताजी और उनके भिन्न-भिन्न पार्टीजनों की ओर से नरेंद्र मोदी को दिए गए विशेषण अभी भूली नहीं है.

कांग्रेसजनों की ओर से मोदी को दिया गया प्रत्येक विशेषण यह बताने के लिए काफ़ी है कि राहुलजी या कोई भी कांग्रेसजन नरेंद्र मोदी से कितना प्यार करता है. इस देश की जनता ने इस बात को हँसकर उड़ा दिया. मैं नहीं समझ पा रहा कि इसे बेबुनियाद और अगंभीर बातों को ऐसे ही हँसकर उड़ा देने की उसकी कला माना जाए, या फिर तथ्यों से ठीक उलट बातों के प्रति उसकी सहिष्णुता का बेजोड़ नमूना.

ख़ैर, मैं बात तथ्यों पर नहीं करने जा रहा हूँ. मैं बात तेदेपा की ओर से लाए गए और देश की कई प्रमुख पार्टियों की ओर से समर्थित लेकिन बेतरह धड़ाम हो गए अविश्वास प्रस्ताव और उसके औचित्य पर भी नहीं करने जा रहा. ना, मैं उस घिसी-पिटी स्क्रिप्ट की तो कोई बात ही नहीं कर सकता. क्योंकि उस पर चर्चा भी स्क्रिप्टिंग की तौहीन होगी.

मैं बात उस विषय की करने जा रहा हूँ जिसे लेकर आज राहुल गांधी बहुत लोगों के बीच मज़ाक के पात्र बने हुए हैं. हालाँकि हमेशा की तरह कुछ बुद्धिजीवी इसी बात पर ख़ुद को लहालोट दिखाने की कोशिश भी कर रहे हैं. मुझे उन पर भी कुछ नहीं कहना है.

भारत में देसी पत्रकारिता जिन संस्कारों के साथ पैदा हुई थी, अगर उनका लेशमात्र भी उसमें शेष होता तो शायद यह चर्चा का विषय नहीं होता. चर्चा का विषय आज सांसदों को मिले विशेषाधिकार होते. इन विशेषाधिकारों की आवश्यकता है भी क्या?

आइए अब राहुल गांधी के व्यवहार पर चर्चा करते हैं. राहुल गांधी ने जिस तरह प्रधानमंत्री की सीट के आगे जाकर उन्हें हाथ से उठने का इशारा किया और न उठने पर जिस तरह उन्हें झुककर गले लगाने की कोशिश की और उसके बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया को आँख मारी... यह पूरा प्रकरण मज़ाक उड़ाने, इस या उस दल के आधार पर विरोध या समर्थन करने और केवल समझने की नहीं, बल्कि समानुभूतिपूर्वक समझने की कोशिश माँगता है.

सहानुभूति से यहाँ काम नहीं चलेगा, समानुभूति चाहिए. पूरी समानुभूति राहुल गांधी के प्रति. और वह भी ऐसी नहीं कि आप यह कल्पना कर लें कि अगर आपकी माताजी इंग्लैंड से आई होतीं और आप भारत के एक बड़े खानदान में पैदा हुए होते तो क्या होता. पहले इतनी ही कल्पना करके देखिए कि आप यहाँ से फ्रांस चले जाएँ और वहाँ जाकर आपसे यह अपेक्षा की जाए कि आप वहाँ के सारे तौर-तरीक़े निभाएँ... तो ज़रा सोचिए, आपका क्या हाल होगा.  

आप अपनी स्थितियों में रहते हुए अपनी ओर से पूरी कोशिश करेंगे तो भी आपको वह सब सीखते-सीखते कई साल लग जाएंगे. सब सीखकर भी आप उसे केवल निभा लेंगे. उन तौर-तरीकों के प्रति आपके मन में कभी कोई लगाव नहीं पैदा हो पाएगा. आप उन तौर-तरीक़ों को झेलने की तरह निभाएंगे और मौका पाते ही उन्हें किसी बोझ की तरह अपने सिर से पटक देंगे.

यह सब आप अपनी परिस्थितियों में करेंगे. यानी जिस औकात में हैं, उसी या फिर उससे थोड़ी बेहतर औकात में रहकर. अगर आप राहुल गांधी की औकात में होंगे, यानी किसी भी देश के प्रथम परिवार के सदस्य की हैसियत में, तो यक़ीन मानिए आप वह सब सीखने की ज़रूरत भी नहीं समझेंगे.

ईश्वर की कृपा से अगर कहीं भारत जैसे चमचे उस देश में हुए तो वे आपको सीखने ही नहीं देंगे. वे शुरू से आपको एहसास कराएंगे कि हुजूर आपको यह सब जानने-सीखने की क्या ज़रूरत! काहे इतनी तकलीफ उठाते हैं! हम हैं न, जब जो ज़रूरत पड़ेगी, बता देंगे.

बच्चे की पहली पाठशाला उसकी माँ होती है. सोनिया गांधी ने साड़ी पहननी सीख ली, जनता का मन रखने के लिए गंगा में डुबकी लगा आईं, इतना क्या कम है?

सोनिया जी जब राजीव गांधी के साथ भारत आई थीं तो इंदिरा जी ने उन्हें पहले कुछ दिन बच्चनजी (डॉ. हरिवंश राय बच्चन) के घर रखा था. उन दिनों बच्चनजी दिल्ली में ही रहते थे. ऐसा उन्होंने इसीलिए किया था ताकि वह सोनिया भारत की संस्कृति और तौर-तरीक़े सीख सकें.

मैं बिलकुल सोनिया गांधी की इटैलियन या ब्रिटिश पृष्ठभूमि की बात नहीं करूंगा, लेकिन उस पृष्ठभूमि से आई और उस उम्र की कोई भी युवती किसी दूसरे देश में जाकर वहाँ की संस्कृति-सभ्यता जानने के प्रति कितनी रुचिशील हो सकती है, इसका अनुमान आप आसानी से लगा सकते हैं. एक और बात, प्रधानमंत्री के परिवार की बहू आपके घर पर मेहमान हो, तो भले प्रधानमंत्री की ओर से आपको यह निर्देश हो कि इन्हें देसी तौर-तरीक़े सिखाए जाएँ, पर उन्हें आप कितना सिखा पाएंगे?

आपका ध्यान केवल उनकी मेहमाननवाज़ी पर लगा रहेगा. ईमानदारी से सोचें तो पाएंगे कि ऐसी स्थिति में आप उन्हें कुछ सिखाने के बजाय उन्हें प्रसन्न रखने में ही व्यस्त रहेंगे. बच्चन परिवार देश के सबसे समझदार परिवारों में से एक है. ज़ाहिर है, उनके साथ भी यही हुआ.

अब राहुल गांधी 49 साल के बताए जाते हैं. राजीव गांधी का निधन 1991 में हो गया था. बेहद दुखद परिस्थितियों में. यानी राहुल गांधी तब केवल 22 साल के थे. इससे केवल पाँच साल पहले इंदिराजी भी ऐसी ही त्रासद परिस्थितियों में दुनिया छोड़ गई थीं. ये दोनों ही घटनाएँ केवल नेहरू परिवार नहीं, पूरे देश के लिए त्रासद थीं. इन पर केवल कांग्रेसी या नेहरू परिवार नहीं, पूरा भारत रोया था. हालांकि उसी समय पाश ने एक कविता भी लिखी थी.

क़ायदे से राहुल गांधी की जो उस समय जो उम्र थी, वह राजनीति सीखने की भी नहीं थी. कुछ सीखने की किसी की उम्र परिस्थिति सापेक्ष होती है. इंदिराजी अगर 20 उम्र में राजनीति में रुचि लेती थीं और उसे बहुत अच्छी तरह जानती थीं तो इसलिए नहीं कि वह प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की बेटी थीं, इसलिए कि वह स्वतत्रता संघर्ष में शामिल नेहरू की बेटी थीं. किसी संघर्ष में शामिल एक नेता और एक प्रधानमंत्री की संतान होने में बड़ा फ़र्क़ होता है.

संघर्षरत नेता की संतान जनता की नब्ज़ जानती है. संघर्ष के तौर-तरीक़े, देश की सभ्यता-संस्कृति, कमियाँ-ख़ूबियाँ, ज़रूरतें और संसाधन जानती है. वह यह भी जानती है कि कहाँ किसे फटकारना है और कहाँ किसे पुचकारना है. लेकिन प्रधानमंत्री की संतान सिर्फ़ शासन के तरीक़े जानती है. उसकी भाषा से लेकर उसके बॉडी लैंग्वेज तक में शासन आ जाता है.

कल्पना करिए कि आपका परिवार देश का प्रथम परिवार मान लिया गया हो. भारत जैसे लोकतंत्र का प्रधानमंत्री होने की आदत-सी पड़ गई हो आपके परिवार को, और इस बीच में एक ऐसा प्रधानमंत्री भी आपके सामने रह चुका हो जो सिर्फ़ आपके नाते और आपके प्रसादपर्यंत प्रधानमंत्री हो, तो आपके तौर-तरीक़े क्या होंगे? मोदीजी की सीट के पास जाकर राहुलजी ने जो इशारे किए, उसे आप इस नज़रिये से देखें तो ठीक-ठीक समझ सकेंगे.

ऐसे व्यक्ति को कोई आदेश या अनुशासन मानने की नहीं, सिर्फ़ देने की लत होती है. इस नज़रिये से देखें तो राहुल गांधी वाक़ई आपको बेहद शालीन नज़र आएंगे.

आप राहुल गांधी से गंभीर होने की उम्मीद करते हैं. वह भी राजनीति में. क्या आपको ख़ुद नहीं लगता कि यह सरासर अन्याय है? कुछ लोग यह भी उम्मीद पाल लेते हैं कि राहुल के बाद प्रियंका सँभालें कांग्रेस. सही पूछिए तो यह दोनों पर अत्याचार है.

यह प्रश्न आपसे लगाकर नहीं करूंगा. वरना बुरा मान जाएंगे. पर सोचना तो आपको ही पड़ेगा और उतनी ही समानुभूतिपूर्वक. ज़रा सोचिए किसी के होश सँभालने से पहले उसके परिवार में बेहद त्रासद परिस्थितियों में दो जानें गई हों... वह भी इसी राजनीति के चलते... क्या उसके मन में राजनीति के प्रति कोई लगाव बचेगा? क्या आपको नहीं लगता कि राहुल गांधी जितनी राजनीति निभा ले रहे हैं, सच पूछिए तो झेल ले रहे हैं, वह बहुत है?


© इष्ट देव 

Wednesday, 18 July 2018

भीड़ का न्याय, न्याय का तंत्र


मीलॉर्ड, योर ऑनर, हुजूर, माई-बाप, श्रीमान महोदय

कहाँ आप और कहाँ मैं. मेरी क्या औकात कि मैं आपके सामने कुछ कहूँ. कहना तो छोड़िए, आपसे कुछ पूछना भी मेरे बस की बात नहीं. आपसे तो वो भी नहीं पूछ सकते जो सबसे पूछते हैं. सुनते हैं कि वो जनता के प्रतिनिधि हैं और वो जनता के प्रति जवाबदेह हैं. लेकिन जनता को उन्हें कोई जवाब देते मैंने कभी देखा नहीं. बेचारी जनता, उसके पास सवाल ही उठाने की औकात नहीं है, जवाब वो दें भी तो कहाँ से! वो तो बस उनके वादे सुन लेती है और फिर पाँच साल बाद उनमें से जिन किन्हीं के भी जैसे भी पूरे होने का वो जो भी जवाब अपने-आप ही दे दें वही उसे मान लेना होता है.

अब यह जवाब चाहे उसकी जान-माल के सुरक्षा के वादे का हो, चाहे सम्मान का, या फिर रोज़गार या आर्थिक विकास का, महँगाई या भ्रष्टाचार का.. उस बेचारी के पास सुनने के अलावा कोई चारा नहीं होता. सत्तर साल पहले जब लोकतंत्र का पहले-पहल हल्ला मचा था तब ज़रूर लोगों को यह भ्रम रहा होगा कि वो सरकार बनाएंगे, पर अब वो समझ गए हैं कि वो सरकार नहीं बनाते, सरकार उन्हें बनाती है. चूँकि हर पाँच साल बाद सरकारजी को यह लीला दिखानी होती है कि उन्हें जनता बनाती है, तो वो जनता के बीच जाने की कृपा करने में कोई कोताही नहीं करती हैं. वैसे तो हर नियम का अपवाद होता है. तो यह नियम अपवाद से कैसे बच सकता है. लिहाजा इस नियम का भी एक अपवाद है, पिछली शताब्दी के आठवें दशक में. पर अपवाद तो अपवाद ही है.

तो नियम में जनता कहीं उलटा-पुलटा न कर बैठे, इसके लिए जनता की पर्याप्त व्यवस्था की जाती है. सरकार का नाम भले बदल जाए पर सरकार न बदले इसके लिए नई जनता की व्यवस्था भी की जाती है. अगल-बगल के देशों से जनता आयात करने का रिवाज हमारे यहाँ बहुत पहले से चला आ रहा है. पश्चिम, उत्तर और पूरब से लेकर अब धुर पूरब भी इसमें जुड़ गया है. उम्मीद करते हैं कि जल्द ही धुर पश्चिम भी इसमें जुड़ जाएगा. हो सकता है आने वाले दिनों में दूसरे-दूसरे देशों के बाद तीसरे-तीसरे महाद्वीपों से भी आयात की जाए. वैसे भी इस देश की पुरानी जनता के बिगड़ने की आशंका बहुत बढ़ गई है. अब यह लात खाकर चुप नहीं रहती, कभी-कभी जवाब देने लगी है. तो अब इसे पूरी तरह बदल ही देना चाहिए. जनता इसे अपना प्रतिरोध मानती है. आप और आपके संगी-साथी असहिष्णुता.

ख़ैर, इस सब पर कुछ कहना तो छोटा मुँह बड़ी बात होगी. मेरी क़ाबिलीयत क्या कि मैं इन मुद्दों पर बोलूँ या कुछ कहूँ. मैं न विद्वान वकील, न माननीय सांसद-विधायक या ग्राम प्रधान. मैं ठहरा एक अदद मामूली इंसान. इतना मामूली कि मामूली से भी मामूली. वह वाला मामूली जो कुछ साल पहले तक अपने को आम आदमी कहा करता था, पर हमारे महान देश की महान राजनीति से उससे वह हक़ भी छीन लिया. यह अपने को मामूली इंसान कहने का हक़ भी मुझसे कब कैसे छीन लिया जाए, हूजूर मैं वाक़ई नहीं जानता. आप तो दयानिधान हैं. हमने आपकी दयानिधानता अमीरों के सामने ग़रीबों की वक़त वाले कई मामलों में बख़ूबी देखी है. मेरी मामूलीयत का सही-सही अंदाजा आप ही लगा सकते हैं. बस यूँ समझें कि धरम का हिंदू जात का बाभन, जिसके पास रोज़ लात खाते हुए भी विक्टिम कार्ड खेलने तक की सुविधा नहीं है.

आप तो सुनते हैं और सुनते ही क्या देखते भी हैं कि बड़े-बड़ों को फींच देते हैं. जिसे चाहें अपने दरबार में हींच लेते हैं. इधर तो क़ानून बनाने वाले भी रोज़-रोज़ खींचे जा रहे हैं. यहाँ तक कि वो भी खींचे जाते हैं जो आपका रोस्टर बनाते हैं. बस वो नहीं खींचे गए जो आपको बनाते हैं. वह भी भरे बाजार, आम जनता के बीच. हालाँकि बनाने की प्रक्रिया की उनकी फिलिम पहले बाजार ने और बाजार से पूरी जनता ने सींची. पता नहीं, इस बात पर आपका ध्यान कभी क्यों नहीं गया कि जो बात एक दिन की एक बैठकी में तय हो जानी चाहिए, आपके दरबार में उसे तय होने में कई-कई साल क्यों लग जाते हैं!

मैं उतना समझदार तो नहीं हूँ फिर भी आपकी बात समझता हूँ कि सौ गुनहगार भले छूट जाएँ पर एक बेगुनाह को सज़ा नहीं मिलनी चाहिए. हुजूर जनता बड़ी बावली है. वह कानून के सिद्धांत को जाने बगैर व्यवहार को देखती है. और ऐसा कहती है कि ये सौ गुनहगार छूटते हैं, वो छूटते नहीं असल में छोड़े जाते हैं और छोड़े जाकर ये कितने बेगुनाहों को अपने गुनाह का शिकार बनाते हैं, इसका हिसाब रखना उन ढाई करोड़ से ज़्यादा केसों से भी कठिन है जो आपके यहाँ पेंडिग पड़े हैं.

कुछ बकलोल तो यहाँ तक कहते हैं कि न्याय करना भीड़ का शौक़ नहीं मजबूरी है. उन्हें लगता है कि जब जिसे न्याय करना है वो अनंत तक कोई फ़ैसला ही नहीं कर पाता तो ऐसे न्यायतंत्र पर क्या भरोसा किया जाए? कुछ तो अंग्रेजी की एक कहावत कहते हैं कि जस्टिस डिलेड माने जस्टिस डिनाएड. उन्हें लगता है कि न्याय कोई हँसी-खेल टाइप काम है. वो कहते हैं कि इस न्यायतंत्र में अपराधी छूटते रहते हैं. छूट-छूट कर नए अपराधों को अंजाम देते रहते हैं और नए-नए बेगुनाहों को अपना शिकार बनाते रहते हैं. ऐसे में आम जनता यानी भीड़ के पास अपनी सुरक्षा का एक ही तरीक़ा है और वह यह कि वह अपने लिए न्याय ख़ुद कर ले. ये बकलोल लोग नहीं जानते कि इसका अंतिम नतीजा क्या होगा.

आपने बहुत अच्छा किया कि सरकार बहादुर को मॉब लिंचिंग के ख़िलाफ़ क़ानून बनाने का हुकुम दिया. मुझे बहुत अच्छा लगा. इस पर क्या, आपकी किसी भी बात पर मैं कभी सवाल तो उठा ही नहीं सकता. हाँ कुछ जिज्ञासाएँ ज़रूर हैं और प्लीज़ बुरा न मानिएगा, बस वो जिज्ञासाएँ मैं आपके सामने रख देना चाहता हूँ.

मने मैं जानना ये चाहता हूँ कि देश में बलात्कार के ख़िलाफ पहले से क़ानून है. हत्या के खिलाफ़ पहले से क़ानून है. चोरी, डकैती, भ्रष्टाचार, आतंकवाद.. आदि-आदि न मालूम कितनी चीज़ों के ख़िलाफ पहले से क़ानून है. यहाँ तक कि स्कूलों, कॉलेजों, अस्पतालों आदि की संस्थागत लूट के ख़िलाफ़ भी क़ानून है. वैसे भी हमारा क़ानून तो शुरू से ही इन तमाम ख़राब चीज़ों के ख़िलाफ़ ही है. फिर भी हम देखते हैं कि ये सब चीज़ें हो ही रही हैं. बल्कि हुए ही चली जा रही हैं. बढ़े ही चली जा रही हैं. आख़िर ऐसा हो क्यों रहा है?

सच पूछिए तो हमको तो क़ानून एक अंधेरे जंगल जैसा लगता है. नहीं-नहीं इसका यह मतलब बिलकुल नहीं है कि मैं जंगल राज जैसा कुछ कह रहा हूँ. मेरा मतलब ये है कि क़ानून को न मुझे पढ़ना आता है और न समझना. असल में क़ानून में लिखा कुछ होता है, डिक्शनरी उसका मतलब कुछ बताती है और व्यवहार में होता कुछ और है. तो ये जो फ़र्क़ है, उसे देखकर कभी-कभी तो ऐसा लगने लगता है कि क़ानून बड़ा प्रेमी है. जैसे प्रेम में कहा कुछ जाता है और मतलब कुछ और होता है, कुछ-कुछ वैसा ही कानून के साथ भी है. एक दिन टीवी पर एक बड़े वकील साहब बता रहे थे कि हर क़ानून का उलटा क़ानून भी है. यह सुनकर मेरा तो दिमाग़ ही चकरा गया.

तो हुजूर मने मेरे मन में आशंका यह है कि जब भीड़ वाली लिंचिंग के ख़िलाफ़ क़ानून बन जाएगा तब फिर तो ऐसा नहीं होगा न? मल्लब उसके बाद तो भीड़ किसी को नहीं मारेगी न? मल्लब तनी सोच के देखिए, वैसे तो भीड़ में सब छोटे-छोटे आदमी होते हैं. बड़ा आदमी तो कभी भीड़ का हिस्सा होता ही नहीं. छोटे-छोटे आदमियों के ख़िलाफ़ फ़ैसला करना कोई बड़ा काम तो होता नहीं. फिर भी कभी-कभी इसमें भी बड़ा टाइम लग जाता है. और कभी मान लीजिए, अगर कोई बड़ा आदमी भी इस भीड़ का हिस्सा बन गया तो? तब तो फिर यह फ़ैसला करने में कई-कई साल लग जाएंगे. या कि नहीं लगेंगे?

मने तब तो सोचना पड़ेगा न कि ये सब क्यो हो रहा है! वैसे आप कहें तो मैं मान लेता हूँ कि नहीं होगा. लेकिन अगर फिर भी हुआ, क़ानून बन जाने पर भी भीड़ न्याय करती रही, तो तब तो सोचना पड़ेगा न कि भीड़ ऐसा क्यों कर रही है! मल्लब मेरा करबद्ध निवेदन है कि थोड़ा-सा, मने कि ज़रा-सा यह भी सोच के देखा जाए कि भीड़ ऐसा कर क्यों रही है. हुजूर, माई-बाप अगर इस विषय पर थोड़ा सोच लिया जाए तो कैसा रहेगा?
   
इष्ट देव सांकृत्यायन  

Tuesday, 17 July 2018

इन दरिंदों के रहते...


चेन्नै में कुल 18 दरिंदे 11 साल की एक बच्ची का सात माह तक यौन शोषण करते रहे. अभी यह बात आरोप के स्तर पर है. जाँच चल रही है, लेकिन अभी आरंभिक स्तर पर है. बात की किसी तरह पुष्टि नहीं हो पाई है. इसकी ख़बरें प्रायः सभी अख़बारों में हैं, लेकिन मेडिकल परीक्षण की बात कहीं नहीं है. जाहिर है, उसकी रिपोर्ट का अभी इंतज़ार होगा.

आक्रोश से भरा मन भी कहता है कि काश यह सच न हो. लेकिन अगर हुआ तो? और ज़्यादा आशंका इसी बात की है कि आरोप सच होगा. कोई क्यों ऐसे आरोप लगाएगा?  
आरोपियों में सब उसी अपार्टमेंट के लिफ्ट ऑपरेटर, सिक्योरिटी गार्ड, वॉटर सप्लायर आदि थे. मान लीजिए अगर ये भीड़ के हत्थे चढ़ जाते तो? किसी हद तक हो सकता है कि आरोप ग़लत ही हो. फिर भी कल्पना करिए अगर ये भीड़ के हत्थे चढ़ जाते तो क्या होता?

कुछ लोग रेप और मॉब लिंचिंग जैसी जघन्य घटनाओं को भी जाति-धर्म के नज़रिये से ही देखते हैं. किसी जाति या संप्रदाय विशेष का व्यक्ति किसी दुर्घटना का शिकार हुआ तो उनकी संवेदना की बाँछें खिल जाती हैं. उन्हें उसमें अपने आकाओं का वोट बैंक जो दिखने लगता है. लेकिन अगर उसके विपरीत हुआ, यानी उसी जाति या संप्रदाय का व्यक्ति शिकारी की भूमिका में नज़र आया तो उनका टोन डाउन हो जाता है. उनकी संवेदना की घिग्घी बँध जाती है.

आपको क्या लगता है? उस जाति या संप्रदाय के हितैषी हैं? कैसे सोच लेते हैं आप ऐसे? कहाँ से लाते हैं इतना भोलापन? जिस जाति या संप्रदाय की भलाई और जिसके हकूक की लड़ाई का बीड़ा उठाए वे दिखते हैं उससे उनको उतना ही प्यार होता है जितना एक शिकारी को शिकार से होता है. और इसीलिए वे कभी मुकम्मल मनुष्यता के साथ नहीं, उसे कई खाँचों में बाँटकर उन खाँचों के साथ खड़े दिखाई देते हैं.

वास्तव में वे किसी सत्ता या ताक़त के ख़िलाफ़ भी नहीं होते. उनकी कुल मुख़ालफ़त केवल उस व्यक्ति या झुंड के प्रति होती है जो संसाधनों पर काबिज होता है. बस संसाधनों पर उन्हें क़ब्ज़ा मिल जाए, सारा विरोध ख़त्म. अगर यह क़ब्ज़ा हाथ मिलाकर मिले तो उन्हें हाथ मिलाते भी देर नहीं लगेगी. बीते सत्तर सालों में आप ऐसे दो हज़ार उदाहरण देख चुके हैं.

कोई भरोसा नहीं है कि जैसे ही घटना की सच्चाई साबित होने लगे, ये आरोपी दरिंदे साबित होने लगें, कुछ लोग दरिंदों के साथ भी खड़े नज़र आने लगें. आपके इतिहास में ऐसा हो चुका है. बेशक निर्भया मामले में आपका भी ग़ुस्सा कोर्ट और क़ानून पर होगा, लेकिन कोर्ट क्या करता? क़ानून का वह केवल निर्वचनकर्ता है, निर्माता नहीं. उसे बने हुए क़ानून के अनुसार ही काम करना होता है.

उम्र 18 साल में एक दिन भी कम हुई तो बलात्कार की पूरी क्षमता रखने वाला मर्द बच्चा बन जाता है. यह कोई बहुत पुराना क़ानून नहीं था. बमुश्किल दस साल पहले का बदलाव था. हमारे माननीयों ने क्या सोच कर बलात्कार में सज़ा के लिए आरोपी की उम्र 14 से बढ़ाकर 18 की थी, इसका आज तक देश को जवाब नहीं मिल पाया. उस देश को जो दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है. बीच में ढाई साल की बात छोड़ दी जाए तो बाक़ी समय यह लोकतंत्र निर्बाध रहा है.

और हमारे पास अभी भी ऐसा क़ानून नहीं है जिसके तहत उन दरिंदों को कोई सज़ा दी जा सके जिहोंने उस दरिंदे को नाबालिग बताकर उसका पुनर्वास कराया. सच यह है कि बलात्कारी को पुरस्कार है और पुरस्कार किसी घटना का जस्टिफिकेशन होता है. सक्रिय और प्रभावी जस्टिफिकेशन. हद ये है कि वही दरिंदे अगर जाति-संप्रदाय की राजनीति करने का मौक़ा मिले तो फिर किसी बलात्कार की घटना के ख़िलाफ़ फर्जी झंडे उठाए दिखेंगे.

ये बहुरूपिये दरिंदे SHAME की तख्ती उठाए भी दिख सकते हैं. और किसी एक व्यक्ति से बात कर भारत को स्त्रियों के लिए दुनिया का सबसे असुरक्षित देश भी घोषित कर सकते हैं. इन्हें अमेरिका, इंग्लैंड, पाकिस्तान, सीरिया या और किसी भी देश के आँकड़े देखने की ज़रूरत महसूस नहीं होगी. दूसरे का हर मजबूत तर्क इनके लिए सरलीकरण और सामान्यीकरण होता है लेकिन ख़ुद मेढक की तरह कुएँ की एक बिल को पूरी दुनिया मान लेंगे. और दुनिया भर की एजंसियों के सारे आँकड़ों को अपने कुविचारों से ढक देंगे. क्योंकि इसी के लिए इन्हें मोटी रकम मिलती है. क्या इनके छुट्टा घूमते दुनिया में कहीं की कोई स्त्री सुरक्षित हो सकती है?

सच पूछिए तो चेन्नै की घटना का सच मेडिकल रिपोर्ट सामने आते ही काफ़ी हद तक पुष्ट हो जाएगा. और आशंका यही है कि पुष्ट ही होगा. लेकिन पुष्टि के बाद जिस गति से अदालती कार्यवाही होनी चाहिए, क्या वह हो पाएगी? क़ानून और उसकी प्रभावी भूमिका की आवश्यकता यहीं होती है. लेकिन क्या अदालतें अपना काम निष्पक्ष ढंग से करने पाएंगी? अगर करने पाएँ तो उन्हें कुल कितना समय लगना चाहिए और लगता कितना है? यह जो गैप है, वह क्यों है? और जहाँ इतना बड़ा गैप होगा, वहाँ मॉब लिंचिंग की कालिख कानून-व्यवस्था के माथे से कैसे मिटा देंगे?