Sunday, 24 June 2018

जाग मछेंदर गोरख आया-3


कल लिखने बैठा तो मन थोड़ा भन्नाया हुआ था. सोच ही नहीं पा रहा था कि शुरू कहाँ से करूँ. वजह कुछ ख़ास नहीं, बस एक दुविधा थी.

दुविधा यह कि आगे की कड़ी बढ़ाएँ कहाँ से. मन यह बन रहा था कि पहले जन्म से जुड़े सारे मिथकों की सारी चर्चा कर ली जाए. क्योंकि पिछली पोस्ट में जिस मिथक ज़िक्र किया वह कई मिथकों में से एक ही है. वह जो लगभग उत्तर भारत में प्रचलित है. लगभग माने बिहार, उत्तर प्रदेश, पंजाब और हिमाचल तक. राजस्थान के कुछ भागों में यही मिथक है और कुछ में दूसरा. इसी से मिलता-जुलता.

इसी से मिलती-जुलती कई लोकगाथाएँ कई दूसरे क्षेत्रों में भी हैं. लेकिन पूर्वोत्तर भारत में भिन्न. गुजरात में कुछ और भिन्न. नेपाल और तिब्बत में और भिन्न. एक और बात है. मिथक या कहें लोकगाथाएँ या लोकवार्ताएँ मुझे आकर्षित बहुत करती हैं. जानते हुए भी कि इनमें तथ्य कम, भाव ज़्याद है और तथ्य अगर है भी तो वह बहुत गूढ़ अर्थ या कह लें लक्षणा में मौजूद है, जिसे निकालना बहुत जटिल काम है; मैं अपने को उनको उन्हें जानने और उनकी चर्चा करने से रोक नहीं पाता.

लेकिन जरूरी मुझे यह लग रहा था कि पहले काल की चर्चा कर ली जाए. हालांकि इस कार्य में भी विद्वानों ने लोक में प्रचलित रूपकों का सहारा बहुत लिया है. चाहे राहुल जी हों, या बड़थ्वाल, या फिर ब्रिग्स या ग्रियर्सन; जिसने भी गोरख का काल निर्धारित करने की कोशिश की, वह लोक में प्रचलित आख्यानों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सका.

लेकिन मुश्किल यह है कि ये बहुत हैं और ऐसे भी लोक में प्रचलित गाथाओं-आख्यानों को छानकर तथ्य निकालना बालू के ढूह से छननिया के पाव भर चीनी निकालने जैसा काम है. हालाँकि है ये बड़ा मज़ेदार काम, लेकिन फिर यह रास्ते से भटका देता.

इस असमंजस में फिर गोरख ही आगे आए.

छाँड़ै आसा रहै निरास, कहैं ब्रह्मा हौं ताका दास
तजै अल्यंगन काटै माया
, ताका बिषनु पषालै पाया
मरौ वे जोगी मरौ मरौ मरण है मीठा
तिस मरणी मरि दीठौ जिस मरणी मरि गोरष दीठा 

फिर छोडीं आसा
, तजी अलगनी और काटी माया... और हाँ, आजकल तो चादर तानने की भी ज़रूरत नहीं, सो बिस्तर पर पड़े और मर गए. सुबह जिए तो दिमाग़ साफ़ था. पहला उद्देश्य क्या है मेरा? गोरख का मानवीकरण ही न! तो फिर जन्म और स्थान को लेकर गाथाएं और आख्यान बाद में. अभी पहले काल पर चर्चा हो ले.

गोरख के काल पर सबसे पहला मौलिक प्रकाशित शोधकार्य ग्रियर्सन का है. इसकी जानकारी मुझे हुई ब्रिग्स को पढ़ते हुए. अपनी कृति Gorakhnāth and The Kānphaṭā Yogīs में जॉर्ज वेस्टन ब्रिग्स कहते हैं कि कच्छ के धिनोधर में स्थित प्रसिद्ध मठ धरमनाथ से जुड़ा है. प्रसिद्ध संत धरमनाथ गोरखनाथी थे और वह कच्छ 1382 में आए थे. बस इसी एक संदर्भ के आधार पर ग्रियर्सन गोरखनाथ का होना अस्थायी रूप से 14वीं शताब्दी में मानते हैं. इसके आगे वह तर्क देते हैं कि जोगियों की परंपरा के अनुसार देखें तो धरमनाथ और उनके प्रसिद्ध गुरु गोरखनाथ के बीच कम से कम एक और शिष्य होना ही चाहिए. ये दोनों यानी गोरख और धरमनाथ समकालीन तो हो ही नहीं सकते. 

इसमें उन्होंने ग्रियर्सन का जो संदर्भ दिया है, वह स्पष्ट नहीं है. कहीं और मैंने पढ़ा कि ग्रियर्सन का यह जो निष्कर्ष है वह ब्रिग्स के ही खोजे हुए एक अभिलेख के आधार पर है, जो उन्होंने गुजरात से तलाशा था. हालांकि ब्रिग्स ने कहीं ऐसा कोई ज़िक्र नहीं किया है. फिर ऐसे ही किसी किताब में मैंने पढ़ा कि गोरख का काल निर्धारण ग्रियर्सन ने लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया के पाँचवें खंड में किया है. इसका कोई वाजिब कारण तो मेरी समझ में नहीं आया, फिर भी सोचा कि देख ही लिया जाए. उसके पाँचवें खंड का दूसरा भाग सरसरे तौर पर पूरा देख गया. भोजपुरी वाले हिस्से को ख़ासतौर पर पढ़ा. उसमें वह भोजपुरी की लिपि और व्याकरण दोनों विधिवत देते हैं. यह अलग बात है कि आजकल भोजपुरी के बड़े-बड़े स्वघोषित विद्वान सरकारी बैठकों में भोजपुरी की लिपि न होने की बात आसानी से मान कर आराम से मुँह लटकाए चले आते हैं. ख़ैर, इस पर फिर कभी. इसमें बहुत नई जानकारियां मिलीं, पर गोरख कहीं नहीं मिले.

इस दिशा में नवीनतम मौलिक खोज राहुल जी की है. इसकी चर्चा पहले इसलिए कर लेनी चाहिए क्योंकि कालक्रम में राहुल जी ही गोरख को सबसे पहले रखते हैं. बाक़ी सभी उनसे बाद का मानते हैं. राहुल जी ने गोरख को विक्रम संवत के अनुसार 10वीं शताब्दी का माना है. हिंदी साहित्य का इतिहास में आचार्य रामचंद्र शुक्ल लिखते हैं:
“गोरखनाथ के समय का ठीक पता नहीं. राहुल सांकृत्यायन जी ने वज्रयानी सिद्धों की परंपरा के बीच उनका जो स्थान रखा है, उसके अनुसार उनका समय विक्रम की दसवीं शताब्दी आता है. उनका आधार वज्रयानी सिद्धों की एक पुस्तक रत्नाकर जोपम कथाहै, जिसके अनुसार मीननाथ के पुत्र मत्स्येंद्रनाथ कामरूप के चरवाहे थे और चर्पटीपा के शिष्य होकर सिद्ध हुए थे. पर सिद्धों की अपनी सूची में सांकृत्यायन जी ने मत्स्येन्द्र को जलंधर का शिष्य लिखा है, जो परंपरा से प्रसिद्ध चला आता है. गोरखनाथ के गुरु मत्स्येंद्रनाथ (मछंदरनाथ) थे, यह तो प्रसिद्ध ही है. सांकृत्यायन जी ने मीननाथ या मीनपा को पालवंशी राजा देवपाल के समय में अर्थात संवत 900 के आसपास माना है. यह समय उन्होंने किस आधार पर स्थिर किया, पता नहीं. यदि सिद्धों की उक्त पुस्तक में मीनपा के राजा देवपाल के समय में होने का उल्लेख होता तो वे उसकी ओर विशेष रूप से आकर्षित करते. चौरासी सिद्धों के नामों में हेरफेर होना बहुत संभव है. हो सकता है कि गोरक्षपा और चौरंगीपा के नाम पीछे से जुड़ गए हों और मीनपा का मत्स्येंद्र से नाम साम्य के अतिरिक्त कोई संबंध न हो. ब्रह्मानंद ने दोनों को बिलकुल अलग माना भी है (सरस्वती भवन स्टडीज). संदेह यह देखकर और भी होता है कि सिद्धों की नामावली में और सब सिद्धों की जाति और देश का उल्लेख है, पर गोरक्ष और चौरंगी का कोई विवरण नहीं. अतः गोरखनाथ का समय निश्चित रूप से विक्रम की दसवीं शताब्दी मानते नहीं बनता.”

जाहिर है, शुक्ल जी को मछेंदर नाथ के मीनपा होने पर संदेह है. और यह संदेह अकारण नहीं है. लेकिन सिद्धों की जो-जो सूची मैंने देखी है, सबमें ये दोनों नाम शामिल हैं. गोरख भी और मीनपा भी. सिद्धों की जो गाथाएँ हैं, इन दोनों के बारे में और इधर नाथों की जो गाथाएँ हैं, इन दोनों में भी बहुत मामूली अंतर हैं. यह अंतर केवल रूपकों का ही है. अपने-अपने परिवेश और अपनी-अपनी पारिस्थितिकी के अनुकूल लोगों ने अपने-अपने रूपक गढ़ लिए. लेकिन रूपकों में अंतर्निहित आख्यानों का मूल तत्त्व एक ही रहा. यह साम्य ऐसे ही नहीं हो सकता. 

यह तथ्य भी हमें ध्यान रखना चाहिए कि राहुल जी शुक्ल जी की तरह इत्मीनान में नहीं थे. वह बहुत बेचैन आत्मा थे. बेचैन इस अर्थ में कि उनके सामने बहुत सारा काम पड़ा था और समय कम था. इसलिए हर काम जल्दी से जल्दी निपटा लेने और साथ-साथ दुनिया भर की घुमक्कड़ी करते हुए अधिक से अधिक खोज और जान लेने की हड़बड़ी उनके पूरे जीवन में दिखाई देती है. चरैवेति चरैवेतिपरंपरा के इस महायोगी के जीवन के क्रम पर मैं जब भी सोचता हूँ, एक शेर मन ही मन अनायास गुनगुनाने लगता हूँ -
आदत ही बना ली है तुमने तो मुनीर अपनी
जिस शहर में भी रहना
, उकताए हुए रहना

इस नज़रिये से सोचें तो हो सकता है राहुल जी से अपनी स्थापना का आधार देना या विवरण देना छूट गया हो. पर ख़ैर, अब तो वह हो चुका है. और हो ही चुका है. इसमें सुधार की गुंजाइश नहीं है. तो आगे शुक्ल जी की बात पर ग़ौर किया जाना चाहिए. वह कहते हैं :
“महाराष्ट्र के संत ज्ञानदेव ने, जो अलाउद्दीन के समय (संवत् 1358) में थे, अपने को गोरखनाथ की शिष्य परंपरा में कहा है. उन्होंने यह परंपरा इस क्रम से बताई है
आदिनाथ
, मत्स्येंद्रनाथ, गोरखनाथ, गैनीनाथ, निवृत्तिनाथ और ज्ञानेश्वर. 

इस महाराष्ट्र परंपरा के अनुसार गोरखनाथ का समय महाराज पृथ्वीराज के पीछे आता है. नाथ परंपरा में मत्स्येंद्रनाथ के गुरु जलंधरनाथ माने जाते हैं. भोट के ग्रंथों में सिद्ध जलंधर आदिनाथ कहे गए हैं. सब बातों का विचार करने से हमें ऐसा प्रतीत होता है कि जलंधर ने ही सिद्धों से अपनी परंपरा अलग की और पंजाब की ओर चले गए. वहाँ काँगड़े की पहाड़ियों तथा और स्थानों में रमते रहे. पंजाब का जलंधर शहर उन्हीं का स्मारक जान पड़ता है. नाथ संप्रदाय के किसी ग्रंथ में जलंधर को बालनाथ भी कहा गया है. नमक के पहाड़ों के बीच
बालनाथ का टीलाबहुत दिनों तक प्रसिद्ध रहा. मत्स्येंद्र जलंधर के शिष्य थे, नाथपंथियों की यह धारणा ठीक जान पड़ती है. मीनपा के गुरु चर्पटीनाथ हो सकते हैं, पर मत्स्येंद्र के गुरु जलंधर ही थे. सांकृत्यायन जी ने गोरख का जो समय स्थिर किया है, वह मीनपा को राजा देवल का समसामयिक और मत्स्येंद्र का पिता मानकर. मत्स्येंद्र का मीनपा से कोई संबंध न रहने पर उक्त समय मानने का कोई आधार नहीं रह जाता और पृथ्वीराज के आसपास ही विशेषतः कुछ पीछे गोरखनाथ के होने का अनुमान दृढ़ होता है.”

ध्यान रहे, शुक्ल जी के पीछेका आशय पहलेसे है, ‘बादनहीं. इस तरह आचार्य शुक्ल गोरख को पृथ्वीराज का थोड़ा पूर्ववर्ती या समकालीन मानते हैं.

अब यह जानना जरूरी है कि पृथ्वीराज कब हुए. पृथ्वीराज के शासन का समय 1178 से 1192 सीई है. चूँकि शुक्ल जी गोरख को पृथ्वीराज का केवल समकालीन नहीं, उनके पूर्ववर्ती होने की संभावना भी स्वीकार करते हैं, अतः उनका पूरा जीवनकाल देख लेना ठीक रहेगा. पृथ्वीराज विजय के अनुसार उनका जन्म ज्येष्ठ मास की द्वादशी तिथि को हुआ. लेकिन किस संवत् या सन् में, इसका कोई उल्लेख उसमें नहीं है. लेकिन उस समय की ज्योतिषीय गणना और ग्रहदशाओं का विवरण उसमें उपलब्ध है. इन ग्रहदशाओं की गणना के आधार पर दशरथ शर्मा ने पृथ्वीराज के जन्म का जो समय निकाला, वह 1223 विक्रमीय संवत् अर्थात 1166 ईसवी है. इसका पूरा विवरण उनकी कृति Early Chauhān Dynasties में है.

इस तरह आचार्य शुक्ल की इस स्थापना पृथ्वीराज का समकालीन या थोड़ा पूर्ववर्तीका आशय सन् 1100 से पहले का नहीं हो सकता. स्पष्ट है कि शुक्ल जी गोरख का होना 12वीं शताब्दी ई. में मानते हैं. जबकि राहुल जी गोरख को 10वीं शताब्दी ई. का मानते हैं. और उधर ग्रियर्सन शुक्ल जी से भी आगे बढ़ जाते हैं. वह गोरख को चौदहवीं शताब्दी में ले जाकर खड़ा करते हैं. लेकिन अभी दो बहुत महत्त्वपूर्ण लोग बच रहे हैं. एक तो ब्रिग्स की बात पूरी नहीं हो पाई है. विशेषतः गोरखनाथ पर ही पहली शोधपरक कृति मेरी जानकारी में उन्हीं की उपलब्ध है, जिसकी संक्षिप्त चर्चा ऊपर कर चुका हूँ और दूसरे डॉ. पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल. तो यह अगली कड़ी में.  



[पुनश्च, कोई जानकारी अंतिम नहीं होती और न ही अतीत के संबंध में कोई स्थापना. इसलिए विनम्र अनुरोध है कि कमेंट में आप अपना मत, सहमति-असहमति जो भी हो, अवश्य रखें. और हाँ, कोई नई जानकारी, पुस्तक, आख्यान, लोककथा, लोकगाथा या जो भी कुछ हो; साझा करने में कभी संकोच न करें. गोरख हम सबकी साझी विरासत हैं.]

#गोरखआया-3 क्रमशः 

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