Monday, 18 June 2018

जाग मछेंदर गोरख आया-1

ऐसा तो नहीं कि मैं गोरख को जानता न था. क्योंकि गोरखपुर में जन्मा. वहीं पला-बढ़ा. ढंग का जो कुछ सीखा, वहीं सीखा. अपनी मिट्टी छोड़ने के बाद तो इंसान जो कुछ सीखता है या दुनिया उसे जो कुछ सिखाती है, वह बिना सीखे निबह जाए तो बेहतर.
तो गोरख को मैं जानता तो था बचपन से. लेकिन यह जानना बाबा गोरखनाथ के रूप में था. संत भी नहीं, कुछ-कुछ भगवान जैसा. शिवावतार कहे जाते हैं हमारे यहाँ बाबा गोरखनाथ. किंवदंतियां बहुत, स्पष्ट जानकारी कुछ नहीं.
यह शायद भारतीय लोकमानस की खामी है. वह जिसे बड़ा मानता है, उसे बड़ा बना देता है कि भगवान से नीचे कुछ उसे स्वीकार ही नहीं होता. फिर गोरख तो गोरख ठहरे. यह केवल गोरख ही नहीं, कबीर के भी साथ हुआ. रैदास, दादू, मलूक, नानक, सूर, तुलसी, मीरा.... सबके साथ हुआ. 'जाग मछेंदर गोरख आया....' अपने गुरु तक को माया के पाश से मुक्त करने की औकात रखने वाले गोरख के साथ यह न होता, ये कैसे संभव था. तो गोरख के साथ भी हुआ.

उन किंवदंतियों की मानें तो गोरख महाभारत काल में भी हुए. क्योंकि हमारे यहाँ गोरखनाथ के मंदिर में एक पोखरा यानी तालाब है. पोखरे के किनारे एक लेटे हुए व्यक्ति की मूर्ति है. माना जाता है कि ये भीम की मूर्ति है. भीम यहाँ बाबा गोरखनाथ को निमंत्रण देने आए थे. राजसूय यज्ञ के लिए. उनके लेटने से यह पोखरा बन गया. ऐसी ही कई और बातें हैं. इन बातों में कितना सत्य है, मैंने कभी जानने की कोशिश नहीं की.
थोड़ा बड़ा हुआ, यानी किशोर वय में आया, तो नास्तिक हो गया, यह सब मानना और सोचना एकदम बंद. राहुल, यशपाल, बर्ट्रांड रसेल, मार्क्स, एंजेल्स और थोड़ा दयानंद सरस्वती भी... आदि को पढ़ते-पढ़ते और अपने-आप से ही तर्क करते-करते इस निष्कर्ष पर पहुँच गया कि ईश्वर-आत्मा सब झूठ है. इस विषय में सोचना ही छोड़ दिया. अपरिपक्व मानस और उसमें घुस गई नास्तिकता का असर यहाँ तक हुआ कि मैंने भक्ति काल के कवियों तक को पढ़ना छोड़ दिया. जब-तब कबीर को पढ़ लेता था और वह भी केवल उनके विद्रोही तेवर के नाते. वही उतना मुझे भाता था. वह भी जहाँ ईश्वर-आत्मा की बात करते, वह मुझे फालतू लगने लगती थी.
ख़ैर, बीए में मैंने हिंदी-अंग्रेजी साहित्य के साथ एक विषय दर्शन-शास्त्र भी लिया. सेंट एंड्रयूज कॉलेज में. वहाँ मुझे दर्शन के गुरु मिले डॉ, ग़ुलाम मुहम्मद यहया खाँ. बहुत तर्क होते थे उनसे. लेकिन धन्य है उनका स्नेह. उन्हें बड़े प्रेम से मुझे झेला ही नहीं, कई बार प्रश्न करने के लिए उकसाया भी. और बहुत बार प्रश्न का उत्तर न होने पर यह भी कहा कि इसका उत्तर तुम्हें समय देगा. वाकई समय ने दिया.
गोरख को मैंने जाना रजनीश से. ओशो रजनीश. हालांकि यह बहुत बाद की बात है. मैं उस वक्त तक नहीं जानता था कि गोरख कवि भी थे. संत भी थे. भगवान होने के नाते तो मैं उन्हें किंवदंती ही मानता था. मुझे लगता था कि जैसे भगवान के नाम पर कई मूर्तियां लगी हैं, वैसे ही यह भी एक मूर्ति हैं. और सबकी तरह इनके साथ भी कुछ झूठी-सच्ची कहानियाँ जोड़ दी गई हैं. हाँ, योग-ध्यान की ओर आकर्षण होने लगा था. चूँकि इसमें शामिल भी होने लगा तो इसका आनंद भी आने लगा था. लेकिन नास्तिकता पर कोई असर नहीं पड़ा था. हालांकि पड़ा, पर वह उसके बहुत बाद की बात है.
ओशो की गोरखवाणी शीर्षक प्रवचन श्रृंखला के संकलन का श्रीगणेश यहीं से होता है. यह तो कहने की बात नहीं कि अपने समय के विचारकों में रजनीश सबसे अधिक बहुपठ थे. अबके बाबाओं को उनके समक्ष रखकर देखना भी मेधामात्र का अपमान होगा.
वह कवि सुमित्रनंदन पंत से एक भेंट का ज़िक्र करते हैं. पंत ने रजनीश से पूछा कि भारत के धर्माकाश में वे कौन बारह लोग हैं जो उनकी दृष्टि में सबसे चमकते हुए सितारे हैं. रजनीश ने जो नाम गिनाए, वे ये हैं - कृष्ण, पतंजलि, बुद्ध, महावीर, नागार्जुन, शंकर, गोरख, कबीर, नानक, मीरा, रामकृष्ण, कृष्णमूर्ति। रजनीश मानते हैं कि यह सूची बनाना आसान नहीं है. पर जोखिम मोल लेते हैं, क्योंकि यह उनकी आदत है, और बड़े सलीके से बनाते हैं. आगे उनके तर्क देखिए,
फिर पंत का तर्क-वितर्क भी हुआ. कि राम को क्यों छोड़ा. फिर उन्होंने सात नाम गिनाने को कहे. रजनीश ने सात गिनाए ‌- कृष्ण, पतंजलि, बुद्ध, महावीर, शंकर, गोरख, कबीर। पंत ने फिर पूछा : आपने अब जो पांच छोड़े, किस आधार पर छोड़े हैं? रजनीश ने कहा : नागार्जुन बुद्ध में समाहित हैं. जो बुद्ध में बीज—रूप था, उसी को नागार्जुन ने प्रगट किया है. नागार्जुन छोड़े जा सकते हैं. और जब बचाने की बात हो तो वृक्ष छोड़े जा सकते हैं, बीज नहीं छोड़े जा सकते. क्योंकि बीजों से फिर वृक्ष हो जाएंगे, नए वृक्ष हो जाएंगे. जहां बुद्ध पैदा होंगे वहां सैकड़ों नागार्जुन पैदा हो जाएंगे, लेकिन कोई नागार्जुन बुद्ध को पैदा नहीं कर सकता. ऐसे ही कृष्णमूर्ति भी बुद्ध में समा जाते हैं. कृष्णमूर्ति बुद्ध का नवीनतम संस्करण हैं—नूतनतम; आज की भाषा में. पर भाषा का ही भेद है. बुद्ध का जो परम सूत्र था—अप्प दीपो भव—कृष्‍णमूत्रि बस उसकी ही व्याख्या हैं.
रामकृष्ण, कृष्ण में सरलता से लीन हो जाते हैं. मीरा, नानक, कबीर में लीन हो जाते हैं; जैसे कबीर की ही शाखाएं हैं. जैसे कबीर में जो इकट्ठा था, वह आधा नानक में प्रगट हुआ है और आधा मीरा में. नानक में कबीर का पुरुष—रूप प्रगट हुआ है. इसलिए सिख धर्म अगर क्षत्रिय का धर्म हो गया, योद्धा का, तो आश्चर्य नहीं है. मीरा में कबीर का स्त्रैण रूप प्रगट हुआ है—इसलिए सारा माधुर्य, सारी सुगंध, सारा सुवास, सारा संगीत, मीरा के पैरों में घुंघरू बनकर बजा है. मीरा के इकतारे पर कबीर की नारी गाई है; नानक में कबीर का पुरुष बोला है. दोनों कबीर में समाहित हो जाते हैं.
फिर पंत ने कहा : और अगर पांच की सूची बनानी पड़े? तो रजनीश ने ये नाम गिनाए : कृष्ण, पतंजलि, बुद्ध, महावीर, गोरख। क्योंकि कबीर को गोरख में लीन किया जा सकता है. गोरख मूल हैं। गोरख को नहीं छोड़ा जा सकता. और शंकर तो कृष्ण में सरलता से लीन हो जाते हैं। वह कृष्ण के ही एक अंग का दार्शनिक विवेचन हैं.
फिर पंत जी ने पूछा कि अगर चार ही रखने हों?
तो रजनीश ये नाम गिनाए — कृष्ण, पतंजलि, बुद्ध, गोरख. क्योंकि महावीर बुद्ध से बहुत भिन्न नहीं हैं, थोड़े ही भिन्न हैं. पंत यहीं माने नहीं. आगे उन्होंने तीन नाम गिनाने को कहे और रजनीश ने हाथ खड़े कर दिए. उन्होंने कहा कि अब इनमें से कुछ छोड़ना तो हाथ काटने जैसा होगा. इनमें से एक के बिना भी भारत का आध्यात्मिक नक्षत्र मंडल बनता ही नहीं.
ध्यान रहे, भारत के आध्यात्मिक नक्षत्र मंडल में जो चार भुजाएँ अकाट्य हैं, अभिन्न हैं, उनमें एक गोरख हैं. और रजनीश कुछ भी ऐसे ही नहीं कहते. मैंने जाना रजनीश से कि गोरख ने क्या-क्या कहा. हालांकि गोरख के मामले में रजनीश मेरे लिए केवल प्रस्थानबिंदु भर हैं. लेकिन बहुत महत्त्वपूर्ण. शायद मैं उतनी गहराई से और किसी से न जान पाता गोरख को, जितनी गहराई से रजनीश से जाना. गोरख की रचनाएँ पढ़कर ही आप जान सकते हैं कि गोरख वह नहीं हैं, जो आज आप उन्हें यह जानते हैं.
मैंने रजनीश से जाना कि गोरख कोई काल्पनिक पात्र नहीं और भगवान भी नहीं, सचमुच के एक व्यक्ति हैं. एक योगी, एक संत और एक कवि. एक चेतना संपन्न समाज सुधारक, एक क्रांतिचेता. एक ऐसा व्यक्ति जो चेतना के शिखर पर है. "गगन सिखर महँ बालक बोलै ताका नाँव धरहुँगे कैसा". यह गोरख ही हैं, कोई और नहीं. जो अपने समय में प्रचलित सनातन और बौद्ध दोनों में व्याप्त तमाम कुरीतियों, पाखंडों, कर्मकांडों का मज़ाक उड़ाता है. उस गोरख के जीवन पर, वह भी जीवन के केवल एक हज़ार साल के भीतर ऐसी भ्रांतियां पैदा हो जाएंगी, ना, यह केवल जनमानस की ख़ूबी-ख़ामी का नतीजा नहीं है. इसके पीछे और बहुत सी वजहें हैं. उनका विश्लेषण किया जाएगा और हर ढंग के सवाल का तसल्लीबख्श जवाब भी दिया जाएगा. पर आज इतना ही. बाक़ी किसी और दिन.

#गोरखआया-1 क्र्मशः

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