Saturday, 28 May 2016

Bhairo Baba :Azamgarh ke

स्थानीय आस्था के केंद्र : आजमगढ़ के भैरव बाबा

                                                                         -हरिशंकर राढ़ी

आस्था तो  बस आस्था ही होती है, न उसके पीछे कोई तर्क और  न सिद्धांत। भारत जैसे धर्म और आस्था प्रधान देश में आस्था के प्रतीक कदम-दर कदम बिखरे मिल जाते हैं। यह आवश्यक भी है। जब आदमी आदमी और प्रकृति के प्रकोपों से आहत होकर टूट रहा होता है, उसका विश्वास और साहस बिखर रहा होता है तो वह आस्था के इन्हीं केंद्रों से संजीवनी प्राप्त करता है और अपने बिगड़े समय को साध लेता है। भारत की विशाल जनसंख्या को यदि कहीं से संबल मिलता है तो आस्था के इन केंद्रों से ही मिलता है। तर्कशास्त्र कितना भी सही हो, इतने व्यापक स्तर पर वह किसी का सहारा नहीं बन सकता !
भैरव बाबा मंदिर का शिखर : छाया - हरिशंकर राढ़ी

 ऐसे ही आस्था का एक केंद्र उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जनपद में महराजगंज बाजार स्थित भैरव बाबा का विशाल एवं अति प्राचीन मंदिर है। प्रशासनिक स्तर पर महराजगंज ब्लॉक भले ही विख्यात हो, भैरव जी की महत्ता और लोकप्रियता दूर-दूर तक फैली है। श्रद्धा और आस्था की दृष्टि से महराजगंज भैरव बाबा के अस्तित्व के कारण जाना जाता है, न कि महराजगंज के कारण भैरव जी को।

भैरव बाबा का यह मंदिर पचास किलोमीटर की परिधि से श्रद्धालुओं को सामान्य दर्शन के लिए खींचा करता है किंतु विशेष मेलों और मनौतियों की दृष्टि से यह आसपास के कई जिलों तक आकर्षण और श्रद्धा का केंद्र है। मनौतियां पूरी होने पर, मुंडन और जनेऊ संस्कार के लिए गोरखपुर, मऊ, बलिया, गाजीपुर, बनारस, जौनपुर और फैजाबाद तक के लोग आया करते हैं। ज्येष्ठ मास के गंगा दशहरा पर लगने वाले सप्ताह भर के मेले में लाखों श्रद्धालुओं का आगमन होता है।

भैरव बाबा का यह मंदिर निस्संदेह बहुत प्राचीन है। इसकी उत्पत्ति के विषय में किंवदंतियां और जनश्रुतियां पौराणिक काल तक ले जाती हैं। सामान्यतः माना यह जाता है कि दक्षिणमुखी ये काल भैरव भगवान शिव के उन गणों के प्रमुख हैं जिन्होंने राजा दक्ष का यज्ञ विध्वंश किया था। यह कथा लगभग हर हिंदू को मालूम है कि राजा दक्ष ने एक यज्ञ किया था जिसमें उन्होंने अपनी पुत्री पार्वती और दामाद शिव को नहीं आमंत्रित किया था। कारण यह था कि वे शिव के अवधूत स्वभाव से चिढ़े हुए थे। पार्वती अनामंत्रित ही पिता के यज्ञ में गई और पति का अपमान देखकर भस्म हो गईं। तब भगवान शिव ने भयंकर क्रोध किया और काल भैरव को आदेश दिया कि वे राजा दक्ष का यज्ञ विध्वंश कर दें। यज्ञ विध्वंश के बाद काल भैरव दक्षिणाभिमुखी होकर यहीं बैठ गए और तबसे यह स्थान भैरव बाबा के रूप में प्रसिद्ध हुआ।
अतृप्त हवन कुंड  : छाया - हरिशंकर राढ़ी

भैरव जी के इस क्षेत्र में इस कथा का प्रतिवाद करने वाला कोई नहीं है। यह सर्वमान्य हो चुका है कि राजा दक्ष का यज्ञ यहीं हुआ था। मेरे पैत्रिक निवास से इस स्थान की दूरी तीन किलोमीटर से कम है और पहले मुझे भी इस कथा का स्थल यही होने में कोई संदेह नहीं था। िंकंतु यज्ञस्थल यही था, ऐसा मान लेना पूरी तरह उचित नहीं होगा। प्रमाणों के आधार पर यह निश्चित सा हो गया है कि राजा दक्ष का वह यज्ञ हरिद्वार में गंगातट पर कनखल में हुआ था और क्योंकि राजा दक्ष हिमालय या हिमाचल के राजा थे, इसलिए हरिद्वार के प्रमाण में तथ्य मजबूत दिखते हैं।
परंतु संदेह इसमें भी नहीं है कि इस भैरव स्थान पर भी एक यज्ञ हुआ था। उसके प्रमाण हैं। यह स्थल भी छोटी सरयू नदी के किनारे है जहां कभी सरयू नदी स्वयं बहा करती थी। लगभग चालीस वर्ष पहले यहां सैकड़ों कुएं थे जिनमें कई का व्यास चार-पांच फीट ही था। पिताजी के अनुसार उनके बचपन में यहां दो सौ से कम कुएं नहीं रहे होंगे। इसके पीछे कारण यह बताया गया था कि राजा दक्ष के यज्ञ में 360 पंडितों ने भाग लिया था और हर पंडित के लिए एक अलग कुआं था। दूसरा प्रमाण यह दिया जाता है कि मंदिर परिसर में एक हवन कुंड है जिसमें विधिपूर्वक कितनी भी आहुति दी जाए, यह कभी भरता नहीं। कारण कि इस हवन कुंड में पार्वती कूद कर भस्म हुई थीं। आज भी इस हवन कुंड में श्रद्धालू हवन कराते रहते हैं। इसकी पूर्णता की सच्चाई पर दावे से कुछ नहीं कहा जा सकता।
पहले का भैरव मंदिर बहुत छोटा सा था - बिलकुल किसी अति प्राचीन सिद्धपीठ की भांति। आज यहां पर अत्यंत ऊंचा मंदिर है जिसका शिखर दस-बारह किलोमीटर की दूरी से भी दिख जाता है। 
कहा जाता है कि पार्वती का श्राप था कि यहां कोई यज्ञ सफल नहीं होगा। सन 1971-72 के दौरान एक युवा ब्रह्मचारी का आगमन हुआ और उन्होंने मंदिर परिसर से हटकर एक बड़ा यज्ञ करवाया। अपने क्षेत्र का यह अपूर्व एवं अप्रतिम आयोजन था। यज्ञ सफल ही नहीं हुआ, इतना जनसमूह आया और इतना चढ़ावा चढ़ा कि िंकंवदंती बन गई। ब्रह्मचारी जी ने उसी चढ़ावे का उपयोग करके नए उच्च मंदिर का निर्माण कराया. म्ंदिर का ढांचा बहुत पहले ही बनकर तैयार हो गया था और बीसों साल तक यथावत पड़ा रहा। भैरो जी का प्राचीन मंदिर इस विशाल मंदिर के अंदर ही था और स्थानीय लोगों को यह बात पीड़ा पहुंचाती रही। काफी दिनों बाद जब महराजगंज बाजार टाउन एरिया के अंतर्गत आया तो टाउन एरिया निवासी व्यापारियां ने मंदिर की प्लास्टर और साज-सज्जा हेतु कमर कसी। जहां तक मुझे याद है, अपने कार्यकाल में टाउन एरिया चेयरमैन श्री लक्ष्मी जायसवाल ने नेतृत्व का बीड़ा उठाया। स्थानीय सहयोग से मंदिर को साज-सज्जा और भव्यता प्रदान की गई। मंदिर के कलश को सुधारा गया और उसे स्वर्णिम रंगत प्रदान की गई। परिक्रमा पथ बनवाया गया और भैरो विग्रह को बड़े मंदिर में स्थापित किया गया। छोटे मंदिर में भीड़ के दिनों में दर्शन दुर्लभ हो जाता था। अब कुछ आसानी जरूर हुई है। हां, दर्शन की लाइन अभी भी नहीं लगती और पूर्णिमा के दिन धक्कामुक्की चलती रहती है। यह सुनसान सा स्थान आज आजमगढ़ के प्रमुख दर्शनीय स्थलों में एक है।
ग्रामीण क्षेत्र में स्थित होने से इसे प्राकृतिक हरीतिमा का वरदान प्राप्त है। मंदिर से सटा एक विशाल तालाब जिसे यहां पोखरा कहा जाता है, इसके सौंदर्य में वृद्धि करता है। पोखरे में आनंद और श्रद्धा के लिए डुबकी लगाते हैं। स्थल से सटी छोटी सरयू नदी भी वातावरण को रसमय करती है।
मंदिर के पास का पोखरा      छाया - हरिशंकर राढ़ी
         
 आसपास मंदिरों की एक कतार सी है। हनुमान मंदिर (जिसका हाल में ही जीर्णोद्धार हुआ है), मेवालाल का बनवाया हुआ शिव मंदिर भी श्रद्धालुओं के लिए महत्त्वपूर्ण है।
ज्येष्ठ में गंगा दशहरा से पूर्णिमा तक एक सप्ताह का विशाल मेला लगता है। हमारे बचपन का यह बड़ा आकर्षण हुआ करता था। यहीं हमें कठपुतली की नाच, सर्कस, चिड़ियाघर और न जाने कितने अजूबों का दर्शन और परिचय हुआ करता था। हर स्थानीय परिवार में कुछ रिश्तेदार आया करते थे जिसके बहाने मेला घूमने और मिठाइयां खाने का अवसर मिलता था। दूर-दूर से कड़ाही चढ़ाने भक्त आया करते थे। कड़ाही चढ़ाना पूर्वी उत्तर प्रदेश की एक विशेष श्रद्धा है जिसमें देवस्थान पर पूड़ी और हलवा बनाकर इष्टदेव को अर्पित किया जाता है। हर माह की पूर्णिमा को बड़ा और मंगलवार को छोटा मेला लगता है। यातायात के साधनों की प्रचुरता और

आर्थिक स्तर में उन्नयन के साथ श्रद्धालुओं की                                                                                           संख्या बढ़ती जा रही है।

राजेंद्र हलवाई अपनी दूकान पर                                                           
किशोरावस्था के अंतिम वर्षों में हर मंगलवार को यहां जाने का नियम सा हो गया था। जाना, दर्शन करना और उसके बाद राजेन्द्र हलवाई की दूकान पर बैठकर गप्पें मारना एक सुखद एहसास था। मिठाइयों की दूकानें अब भी सजती हैं किंतु वह रस शायद कहीं बिला गया है। व्यापारीकरण की मार यहां तक पहुंची है। इस साल फरवरी में गया तो जहां सैकड़ों कुएं थे, उनका निशान तक नहीं मिला। कुआें को बंद करके निर्माण कार्य और दूकानें सजा ली गई हैं। आखिर आर्थिक विकास और रोजगार के आगे श्रद्धा, परंपरा, संस्कृति और नैतिकता कहां तक ठहर सकती है।


भैरव स्थान पर  छोटी  सरयू के किनारे लेखक 
गंगा  दशहरा पर लगने वाले मेले   का एक दृश्य 

कैसे पहुंचें 

बाहरी लोगों के लिए यह बता देना ठीक रहेगा कि भैरव बाबा का यह स्थान आजमगढ़ जनपद मुख्यालय, रेलवे स्टेशन या रोडवेज बस स्टेशन से लगभग  पचीस किमी की दूरी पर है। आजमगढ़ फैजाबाद राजमार्ग पर आजमगढ़ से 16 किमी की दूरी पर कप्तानगंज बाजार है और वहां से सात किमी महराजगंज बाजार है। भैरव बाबा महराजगंज से बिलकुल सटा हुआ हे और बाजारीकरण के विकास में महराजगंज और भैरव बाबा के बीच की सीमा समाप्त हो चुकी है। फैजाबाद या अकबरपुर से आने वाले सड़क यात्रियों के लिए कप्तानगंज से ही मुड जाना होगा । गोरखपुर की ओर से आने पर आजमगढ़ से पहले जीयन पुर बाजार से महराजगंज मार्ग पर 25 किमी आना पड़ता है।  

महराजगंज और भैरव बाबा में आज भी कोई होटल/लॉज या ठहरने योग्य धर्मशाला नहीं है। अतः यदि कोई व्यक्तिगत परिचय या रिश्ता न हो तो यहां ठहरने का कार्यक्रम बनाकर नहीं आना चाहिए। 
हां, यह प्रशंसनीय है कि यहां कोई लूट-खसोट या धोखेबाजी नहीं है। हालांकि मंदिर की व्यवस्था पंडों के जिम्मे है लेकिन उनका भी कोई आतंक नहीं है।  दस-पांच रुपये में मान जाते हैं। आवश्यकता के सभी सामान और जलपान गृह उपलब्ध हैं।
आखिर ग्रामीण क्षेत्र की संस्कृति और श्रद्धा समेटे इस स्थान का भ्रमण कर लेने में बुरा ही क्या है ?



1 comment:

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