Wednesday, 2 September 2015

इन्द्राणी के बहाने


हालांकि मीडिया के सोचने-करने के लिए हमेशा बहुत कुछ रहता है, इस वक़्त भी है. न तो किसानों की आत्महत्या रुकी है, न कंपनियों की लूट, न ग़रीबों-मज़दूरों का शोषण, न फीस के नाम पर स्कूलों की लूट. सांस्कृतिक दृष्टि से देखें देश का सबसे बड़ा पर्व महाकुंभ नासिक में और राजनीतिक नज़रिये से चुनाव बिहार में चल ही रहे हैं. मीडिया चाहे तो इनके बहाने उन बुनियादी सवालों से जूझ सकती है जिनसे जूझना देश और जन के लिए ज़रूरी है. लेकिन हमारी मीडिया ऐसा कभी करती नहीं है. इन सवालों से वह हमेशा बचती रही है और आगे भी बचती रही है. इनसे बचने के लिए ही वह कभी कुछ झूठमूठ के मुद्दे गढ़ती है और कभी तलाश लेती है. जिन मुद्दों को वह तलाश लेती है, उनमें कुछ देश को जानना चाहिए या जिन प्रश्नों की ओर देश का ध्यान जाना चाहिए, उनसे वह हमेशा बचती है. ऐसा ही एक मुद्दा इन दिनों इंद्राणी मुखर्जी का है. ख़बरें उन्हें लेकर बहुत चल रही हैं, लेकिन उन तीखे प्रश्नों से हमारी मीडिया बच कर भाग जा रही है, जो उठाए ही जाने चाहिए. वही प्रश्न उठा रहे हैं भारत संस्कृति न्यास के अध्यक्ष संजय शांडिल्य

वास्तव में कहा आ गए है हम। क़ुछ समझ में नहीं आता। हम भारत के लोग है। हमारे पास चिंतन और चर्चा के हजारों विषय है। हमारी विरासत महान है। हम बहुत ही उत्तम संस्कृति के वाहक हैं। हमारे देश का सबसे बड़ा सांस्कृतिक पर्व फ़िलहाल नासिक में चल रहा है। हमारे दश के सबसे बड़े ज्ञानी राज्य बिहार में विधानसभा चुनाव होने जा रहे है। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में पिछले 36 सालो में 60 हज़ार से ज्यादा बच्चे मौत के मुह में इसलिए समा गए क्योकि हमारी सरकारों ने ठीक से काम नहीं किया और इन्सेफेलाइटिस जैसी महामारी फैलती चली गयी। देश की दशा और दिशा किस हालत में है? देश की सीमा पर दुश्मन रोज ललकार रहा है. …… लेकिन देश की मीडिया के लिए पिछले आठ दिनों एक ऐसी कहानी चिंता और चर्चा का विषय बनी है जिसमें कुछ भी ऐसा नहीं है जो भारतीय हो, सब अभारतीय मूल्यहीनता और असामाजिकता का नमूना है। एक ऐसी महिला जिसके जीवन की संपूर्ण यात्रा में केवल संस्कारहीनता की घटनाएं हैं, उन्हें देश के सामने ऐसे परोसा जा रहा है जैसे इस कथानक को सुने बिना भारत की धड़कन रूक जाएगी। हमारे देश की मीडिया को शायद यही लगता है कि इन्द्राणी की कहानी दिखा कर वह देश को बहुत ही रोचक जानकारी दे रहा है। वह यह भूल गया है की इन्द्राणी केवल एक इन्द्राणी मुखर्जी नाम की महिला की कथा नहीं है। यह एक ऐसी प्रवृत्ति की कथा है जिसमे पूरी तौर पर भारतीयता का लोप हो चुका है।

कोई एक दिन में इन्द्राणी मुख़र्जी नहीं बन जाता। उसके लिए देश काल परिस्थितियां भी बहुत हद तक जिम्मेदार होती है। देश और समाज जैसा संस्कार देते है कोई पारी वैसे ही इन्दाणी या इन्द्राणी मुख़र्जी बनती है। सोचिए की एक छोटी सी लड़की अपने सौतेले पिता के साथ रहती है। वह शराबी है। रोज अपनी पत्नी से झगड़ा भी करता है। वह उस सौतेली बेटी पर भी गलत निगाह रखता है। बच्ची थोड़ी बड़ी होती है। बहकते माहौल में वह किसी अधेड़ आदमी की कुंठा का शिकार होती है. फिर वह अपनी कच्ची उम्र में ही घर से भागती है। उसे लगभग उसी की उम्र का एक लड़का मिलता है। दोनों बिना किसी बंधन के एक साथ एक कोठरी में रहना शुरू करते है। स्वाभाविक रूप से इस जोड़ी के माध्यम से दो बच्चे अस्तित्व में आ जाते हैं। दोनों बिना ब्याह के माँ बाप बन कर भी बच्चों को बाकायदा जन्मा देते है। वे चाहते तो वह सब कर सकते थे जैसा आज कल हो रहा..abortion करा सकते थे। लेकिन ऐसा न करके दोनों उन बच्चो के साथ जीने की कोशिश करते है। बिना किसी सामाजिक बंधन के ये दोनों केवल तीन साल एक साथ रहते है। लड़का अलग होकर असली शादी कर अपना घर बसा लेता है। 

लड़की अपने लावारिस बच्चों को अपने उन्हीं माँ बाप के घर छोड़ने के बाद अपना घर बसाने की कोशिश करती है। एक दूसरा आदमी उसको सम्बल देता है। उससे भी एक बेटी जन्म लेती है।लेकिन यह बंधन इतना कच्चा निकलता है कि सब बिखर जाता है. फिर वह महिला जीवन जीने की कोशिश में वह भी करती है जिसे समाज का सबसे गंदा पेशा कहा जाता है। एक दिन वह एक वेश्यालय से पकड़ ली जाती है। अब ऐसी महिला के लिए इस समाज में तो जगह नहीं है। वह जब उस पकड़ से निकलती है तब तक समाज उसे सब कुछ सिखा चुका होता है। वह सीधे देश की सबसे चकाचौध वाली माया नगरी में पहुंच कर अपना नया आशियाना तलाशती है। यह भी खोज का विषय होना चाहिए की इन्द्राणी को आखिर स्टार टीवी के दफ्तर में काम किसने दिलाया और उसके बदले इन्द्राणी को क्या कुर्बानी देनी पड़ी। क्योकि असम या कोलकाता से आने वाली एक सामान्य सी महिला रातोरात स्टार जैसी कंपनी में ह्यूमन रिसोर्स की सलाहकार कैसे बन गयी। यहाँ इस एक पड़ाव को हमारे मीडिया के शोधकर्ता पी जा रहे है। इतने बड़े मीडिया हाउस में अचानक किसी को इतना बड़ा पद नहीं मिल सकता। 

बहरहाल अब इन्द्राणी बोरा के जीवन का सुन्दरकाण्ड शुरू होने वाला है। भारतीय मीडिया के दिग्गज पुरुष के रूप में पीटर मुखर्जी की पहचान है। वह कोई सामान्य आदमी नहीं हैं। छोटे-मोटे पत्रकारों और संपादकों के लिए उन तक पहुंचना भी आसान नहीं था जब वे स्टार के सीईओ रहे होंगे। ऐसे में इन्द्राणी नाम की यह महिला कैसे उनके इतने करीब पहुंच गयी और एक दिन अचानक वह इन्द्राणी बोरा से इन्द्राणी मुख़र्जी बन गयी.... क्या यह कोई बच्चों का खेल है या कि मंच का drama... बहरहाल यह उनकी अपनी जिंदगी है। आज वह पीटर की पत्नी के रूप में ही जानी जा रही है। यह अलग बात है कि .उसके आज के संकट में पीटर उसके साथ नहीं दिख रहे। अब आइये इस यात्रा की थोड़ी विवेचना कर ली जाय। एक ऐसी लड़की जो १४ या १५ साल की है उसी उम्र में उसका सौतेला पिता उसका शोषण करता है। वह भाग कर अपनी उम्र के लड़के के साथ रहती है वह उसे भोग कर बच्चे पैदा कर किनारे लग जाता है। फिर वह दूसरे के साथ जीने की कोशिश करती है। वह भी एक बेटी पैदा कर छोड़ देता है। 

यहाँ एक प्रश्न पैदा होता है की यदि उस लड़की को एक जिम्मेदार माँ बाप मिले होते जो उसको पूरी सुरक्षा देते फिर ठीक से उसका विवाह करते उसका अपना घर बसता। तब यदि वह अपने मन से इधर उधर जाती तो उसका दोष बनता था। यह वही समाज है न जिसने एक लड़की को कदम-कदम पर शोषित होते देखा। किसी ने यह सवाल उस समय सिद्धार्थ दास से क्यों नहीं किया की बिना ब्याह के दो बच्चे पैदा करने के बाद किस भरोसे उसने इन्द्राणी को छोड़ा? खन्ना ने क्यों नहीं निधि को अपने पास रख कर पढाया? शादी यदि टूट भी गई तो इन्द्राणी के खर्च के लिए खन्ना ने क्या दिया? सच तो यह दिख रहा है कि जब इन्द्राणी पैसे वाली बन गयी तब उसने सबका ख्याल किया। अपने उन्ही माँ-बाप के लिए आलिशान कोठी बना कर दी। उन्ही बच्चो को काफी धन दिया। अपने पूर्व पति खन्ना की भी मदद की। यह तो हुआ एक पक्ष। अब इस कहानी का दूसरा पक्ष भी देखिये। इन्द्राणी ने जो कुछ किया वह सब गलत हो सकता है लेकिन सिद्धार्थ दस ने क्या किया। खन्ना ने क्या किया। उस पीटर मुखर्जी ने क्या किया जिन्होंने इन्द्राणी के डैम पर सैकड़ो करोड़ की कंपनी कड़ी कर ली। आखिर उनके पास यह अकूत संपत्ति कहा से आई। 

आज पीटर अपने को पाक साफ बता रहे है। मीडिया के उनके चाटुकार उनके बारे में सवाल तक नहीं उठा रहे। इन्द्राणी ने शीना की हत्या की या नहीं यह तो अब कोर्ट में तय होगा लेकिन विडम्बना तो यह है की इन्द्राणी फिर से एक मर्द के हाथ ठगी गयी। आज पीटर काम से काम इन्द्राणी के असली पति तो है ही और इस लिहाज से उनको इन्द्राणी की मदद करनी चाहिए थी। आज वह यदि कहते भी है की उनका इन घटनाओ से कोई लेना देना नहीं है तब भी कोई उनकी बात पर भरोसा नहीं करेगा। किरण बेदी जी ने भी माना है की पुलिस को चाहिए कि पीटर को भी interogate करे। यह एक बात साफ हो गयी है की इसमे आज की तारीख में कोई किसी की पत्नी नहीं है। कोई माँ नहीं है। कोई बाप नहीं है। कोई भाई नहीं है। कोई बेटा नहीं है। कोई बेटी नहीं है। अर्थात सभी अलग अलग जीने वाले जानवर है। भारत में ऐसे जानवरो को इंसान नहीं कहा जाता। इसीलिए हमारी संस्कृति संस्कारो को महत्व देती है। 

देखिये न कि केवल एक जगह एक संस्कार टूटा तो कैसी कहानी बन गयी। आप खुद सोचिये कि हम समाज को सिर्फ मनुष्य के रूप में जानवर देना चाहते है या रिश्तो के संस्कारो के साथ स्वस्थ समाज बनाना चाहते है। और तकलीफ तो इस बात की है कि देश का मीडिया आज आठ दिनों से इसी कहानी में पूरे दश को उलझाये हुए है।यह अखबारों के पैन इन खबरों से भरे पड़े है कि बेटे ने बाप को कुल्हाड़ी से काटा, बेटे ने माँ की गर्दन मरोड़ी , भाई ने भाई को मर डाला , बही ने भाभी की हत्या कर दी , बाप ने बेटी को गड़ासे से काटा , दहेज़ केलिए नव विवाहिता जलायी गयी आदि आदि। और तो और देश में अनगिनत इंद्राणिया घूम रही है.... अनगिनत खन्ना और पीटर मौजूद है...यदि वास्तव में चिंता करनी है तो इस बात की होनी चाहिए कि इन प्रवृत्तियों को कैसे रोक जाय। मित्रो यह कहानी यही खतम होने वाली नहीं है। २३०० साल पहले देवी हेलेना ने भी अपने पुत्र जस्टिन का कत्ल भरी सभा में किया था। विगत वर्षो में कई ऐसी हत्याए हुई है जिनमे माँ बाप शामिल रहे है। कई चर्चित हत्याए राजनीतिक महत्वाकांक्षा में भी हुई है। आज भी देश के कई घरानो में ऐसा ही युद्ध चल रहा है। क्या सभी को हमारा मीडिया ऐसे ही दिखा सकेगा/ हमारे पुरखे कह गए है की जब कही से कोई सड़ांध पैदा होने लगे या बदबू आने लगे तो उस जगह से दूर चले जाना चाहिए। संस्कारहीन जानवरो की कथा सुना कर देश के लोगो खासकर बच्चो के दिमाग में गन्दगी नहीं फैलानी चाहिए। इतना इनको मत उछलिये की ये ही समाज के रोलमॉडल बनने लगे। बस कीजिये।

2 comments:

  1. आपने बहुत अच्छा लिखा है। मुझे भी नहीं लगता कि जो कहानी बताई जा रही है वही पूरा सच है। यकीन करना मुश्किल है कि कोई महिला अपने तीन बच्चों में से दो को मारना चाहेगी। शीना के राहुल से रिश्ते इन्द्राणी की नैतिकता पर कोई आघात नहीं थे। अगर उसे परेशानी थी भी तो निशाना राहुल होना ज्यादा स्वाभाविक था। सम्पत्ति का झगड़ा भी था तो निशाना राहुल या पीटर होते ; शीना या मिखाइल नहीं। इन्द्राणी यदि आपराधिक प्रवृति की है तो उसने अपने अपराधियों को कोई हानि क्यों नहीं पहुँचाई।पूरे मामले में सम्पत्ति वान सिर्फ पीटर मुख़र्जी है तो निशाना शीना - मिखाइल क्यों ? इन्द्राणी ने अपने वर्तमान के लिए अपने बच्चे छिपाए--इसके अलावा कहानी पूरी तरह अविश्नीय प्रतीत होती है।

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  2. Thanks for putting the story in a different perspective.

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