Wednesday, 30 September 2015

Chitrakoot Part-3

              चित्रकूट में शेष दिन 

                                 -हरिशंकर राढ़ी 

स्फटिक शिला:

चित्रकूट शहर से कुछ ही दूरी पर मंदाकिनी के तट पर यह शिला है जो स्फटिक पत्थर की ही। नदी के उस पर सुंदर घना जंगल है और कुल मिलाकर नेत्रों को बड़ी शांति मिलती है। इस शिला पर भगवान राम सीता के साथ बैठा करते थे और समय को देखते रहते थे। यहीं इंद्रपुत्र जयंत कौवे के भेश में सीता के चरणों में चोंच मारकर भागा था और श्रीराम ने सींक का तीर चलाकर दंडित किया था। यह कथा बहुत प्रसिद्ध है। लेकिन, मुझे जो चीज सबसे रोचक लगी, वह यह कि राम कितने प्रकृति प्रेमी रहे होंगे और कितना चिंतन करते रहे होंगे। उनका सीता जी के साथ प्रेम का एक सुुंदर प्रसंग रामचरित मानस में मिलता है:
स्फटिक शिला             छाया : हरिशंकर राढ़ी 


एक बार चुनि कुसुम सुहाए।
निजकर भूषण राम बनाए।।
सीतहिं पहिराए प्रभु सादर।
बैठे फटिक शिला पर सुंदर।।
                            (अरण्य कांड, )
इस शिला पर राम के पैरों के चिह्न बने हुए दिखाई देते हैं। यहीं पर जयंत ने अपनी एक आंख देकर अपने प्राणों की रक्षा की थी। जयंत की वह आंख भी यहां पत्थर पर अंकित है।

जानकी कुंड: 

स्फटिक शिला से रामघाट की ओर बढ़ने पर जानकी कुण्ड  मिलता है। दरअसल यह मंदाकिनी का एक घाट है जहाँ चित्रकूट प्रवास के दौरान सीता जी स्नान किया करती थीं। यहाँ एक बहुत छोटा सा मंदिर बना हुआ है। सड़क से काफी निचाई पर यह घाट स्थित है और सीढि़याँ उतरकर घाट तक आना पड़ता है। सीढि़यों पर भिखारियों और कुत्तों का साम्राज्य है। जानकी कुंड पर कुछ फोटो-सोटो खींचकर हम वापस रामघाट अपने होटल आ गए।

हनुमान धारा: 

भोजन और अल्प विश्राम के बाद हमारा कार्यक्रम हनुमान धारा जाने का था। हनुमान धारा रामघाट से ढाई-तीन किमी की दूरी पर एक पहाड़ी चोटी पर स्थित है। रामघाट से हनुमान धारा तक का रास्ता भी अत्यंत ऊभड़-खाबड़ रास्तों में एक है। समझ में नहीं आया कि जो स्थल भगवान राम का अधिवास रहा हो, जहाँ इतने तीर्थयात्री आते हैं और जिनसे इस पूरे क्षेत्र की जीविका को इतना बड़ा आधार मिला हो, वहाँ की सरकार और प्रशासन  सड़कों तथा अन्य सुविधाओं के साथ इतनी उदासीनता क्यों बरत रहा है ? ऐसे रास्तों पर दस-बीस मील सफर हो करना हो तो शायद शरीर की हड्डियाँ अपना समायोजन फिर से करने लगें। खैर, छोटी सी कष्टप्रद  दूरी तय करके हम हनुमान धारा चोटी के पद पर पहुँच गए।
हनुमान धारा पर्वत              छाया : हरिशंकर राढ़ी 
हनुमान धारा काफी ऊँचाई पर स्थित है और वहां तक सीढि़यां जाती हैं। सीढि़यां बहुत अच्छी नहीं तो बहुत खराब भी नहीं हैं। हनुमान धारा तक की सीढि़यों तक वही धर्मालयी बुराइयाँ। दोनों तरफ भिखारियों का झुंड जो कृत्रिम रूप से दयनीय शक्ल बनाकर, बिगड़ी आवाज और घिसे-पिटे अभिनय करके ‘भक्तों’ का दिल पिघलाते हैं और अपना कटोरा भरते हैं। हो सकता है कि कुछ असमर्थ होते हों, कुछ किसी बड़ी भीख कंपनी के शिकार होते हों, परंतु वे मुझ जैसे तार्किक ‘भक्त’ को ज्यादा चिढ़ाते हैं जो स्वस्थ्य और जवान होते हुए भी लोगों की दयालुता का भयंकर दुरुपयोग करते हैं। दूसरा उनका आतंक जो किसी पत्थर के पास हनुमान जी की सिंदूर पुती मूर्ति रखकर या पत्थर पर ही सिंदूर पोतकर लोगों की धार्मिक भावना का दोहन करते हैं। अब तो श्रद्धा के ध्यान रखते हुए काली माँ, साईं बाबा या दुर्गा जी को यत्र-तत्र इन महात्माओं द्वारा रख दिया जाता है। हनुमान धारा तक जाने वाली लगभग पांच सौ सीढि़यों पर न जाने कितने ‘भगवान’ और कितने भिखारी बैठे मिल जाते हैं जो अपने ‘आर्द्र’ स्वर से आपकी यात्रा को खाते रहते हैं, बशर्ते  आप वाकई ‘बड़े भक्त’ न हों।
हनुमान धारा मंदिर              छाया : हरिशंकर राढ़ी 
हनुमान धारा एक छोटा सा मंदिर है। हालाँकि इसमें भी भ्रम की स्थिति है। यहाँ पर हनुमान धारा के दो मंदिर हैं और दोनों ही अपने को असली हनुमान धारा होने का दावा करते हैं। कहा जाता है कि राम-रावण युद्ध के बाद भी हनुमान जी लंकादहन की गर्मी से त्रस्त थे। रामायण और रामचरित मानस के अनुसार हनुमान जी ने लंकादहन के तुरंत बाद समुद्र में कूदकर अपनी पूँछ की आग बुझा ली थी। किंतु, यहाँ पर जनश्रुति के अनुसार ज्ञात हुआ कि हनुमान जी की लंकादहन से उत्पन्न जलन शांत नहीं हुई थी। उन्होंने भगवान राम को अपनी समस्या बताई और दाह को शांत  करने की प्रार्थना की तो उन्होंने धनुष  पर बाण चढ़ाकर संधान किया जिससे चित्रकूट के इस पर्वत पर एक जलधारा प्रकट हुई। इस धारा में हनुमान जी ने स्नान किया तो उनका दाह चला गया। तबसे यह धारा अविरल बह रही है। यह तो सत्य है कि एक पतली जलधारा पर्वत को भेदकर लगातार बहती रहती है, लेकिन इस कथा में कितनी सच्चाई है, इसे प्रमाणित नहीं किया जा सकता है। प्रश्न आस्था का है। हाँ, दोनों मंदिरों में धार्मिक लेन-देन खूब चलता है। यह आप पर निर्भर करता है कि आप कितने धर्मपारायण हैं और कितना पुण्य खरीदना चाहते हैं।
दोनों मंदिरों में दर्शन  करने के उपरांत अधिकांश यात्री वापस लौट आते हैं। कुछ सैलानी जैसे ही लोग और ऊपर जाना पसंद करते हैं। हनुमान धारा से ऊपर की तरफ सीढि़याँ जाती हैं जो पर्वत की चोटी तक पहुँचती हैं, ऊँचाई कुछ कम नहीं है। वहाँ सीता की रसोई है जिसे देखने और मौजूद समय का सदुपयोग करने की इच्छा हम रोक नहीं सके। यहाँ तक पहुँचना आनंददायक था किंतु आगे धर्म कराने और पुण्य बेचने वालों के अगणित स्टाल लगे हुए थे जो हमें कब्जे में करने को आतुर थे। कुछ-कुछ आतंक जैसा माहौल माना जा सकता है। छोटे-छोटे घेरे और कपड़े या टिन की छत बनाकर उसमें कई देवी-देवताओं की फोटो और मूर्तियाँ जमाई गई थीं और उन पर मालाएं तथा मुद्राएँ चढ़ी हुई थीं। इन पुण्यस्थलों पर कहीं ‘टोलटैक्स या एंट्री फीस’ भरते हुए, कहीं घूरते या उपेक्षित करते हुए हम सीता रसोई तक पहुँच ही गए।

सीता रसोई: 

सीता रसोई            छाया : हरिशंकर राढ़ी 
पर्वत की चोटी पर एक छोटा सा मंदिर बना था जिसे सीता रसोई नाम दिया गया था। पूछने पर पता चला था कि चित्रकूट निवास की अवधि में एक बार सीता जी ने अत्रि सहित तीन ऋषियों को अपने हाथों से बनाकर भोजन कराया था। यह वही स्थल है और सीता रसोई के नाम से प्रसिद्ध है। ऐसा संभव लगता है। हाँ, यदि यह कथा होती कि सीता जी प्रतिदिन यहाँ रसोई बनाया करतीं तो बात कुछ अतार्किक होती। मैं इस बात को महसूस करता रहा कि क्या आदर्श होते थे उस समय लोगों के मन में। विद्वानों की क्या प्रतिष्ठा होती थी और राजवंश में पले-बढ़े लोग कितने सभ्य, विनम्र, सांस्कारिक और उदार होते थे। कितनी मानवता भरी होती थी। सीता जी जैसी राजकुमारी जो जनकराज की पुत्री और दशरथ की पुत्रवधू और राम की पत्नी थीं, अपने हाथों से भोजन बनाकर अतिथि सत्कार करती थीं। एक और युग आया है जब यह सुनकर हैरानी होती है कि अमुक (उच्च शिक्षिता) महिला भोजन बनाना भी जानती है।
खैर, वहां से बाहर निकले तो धर्मचक्र वालों की वसूली फिर शुरू और अपने यहाँ जमाई दुकान पर मत्था टेकने का लगभग बलपूर्वक आग्रह। यहाँ तक आते-आते मेरा धैर्य जवाब दे गया और न चाहते हुए भी खरी-खोटी सुनाना पड़ ही गया। विवाद तो क्या होता, हाँ मूड जरूर खराब हुआ और पाखंड को कोसते हुए हम अवतरण की ओर चल पड़े। नीचे जलपान और धार्मिक स्थलों पर मिलने वाली दुकानों का क्रम था। कुछ सामान देखा गया और जलपान करने के उपरांत फिर वही रामघाट।

भरतकूप की ओर: 

भरत कूप            छाया : हरिशंकर राढ़ी 
अगले दिन सायंकाल हमारी ट्रेन थी। हमारे पास लगभग तीन बजे तक का समय था और हमने यह निश्चय किया कि यह समय भरतकूप के दर्शन करके निकाला जाए। भरत के प्रति मेरे मन बहुत श्रद्धा है, शायद उतनी राम के प्रति नहीं है। किशोरावस्था से ही रामचरित मानस पढ़कर यह श्रद्धा स्थिर भाव से मन में बैठ गई है। तुलसीदास भरत के विशय में लिखते हैं -
      भरत सरिस को राम सनेही। 
     जग जपे राम, राम जपे जेही।।
     जौ न होत जग जनम भरत को। 
      सकल धरमधुरि धरनि धरत को।।
      भरत महामहिमा जलराशी।
      मुनि मति ठाढ़ तीर अबला सी।।
      गा चह पार जतन हियँ हेरा। 
      पावति नाव न बोहित बेरा।। (अयोध्याकांड में विविध प्रसंगो से)

ऐसे भरत कूप का दर्शन तो अनिवार्य ही था। गाँव में बचपन के दिनों में चारो धाम के यात्रियों से सुन चुका था कि चित्रकूट में भरत कूप स्थित है। 
भरतकूप रामघाट से लगभग 18 किमी की दूरी पर स्थित है और यही एक तीर्थ चित्रकूट में है जो उत्तरप्रदेश में है। यहाँ के लिए हमने बड़ा वाला आॅटो रिक्शा तय किया और फिर एक बार अस्थिभंजक गर्तशंकुल बीहड़ रास्ते से होते हुए किसी प्रकार एक घंटे की यात्रा करके भरतकूप पहुँच  गए।
भरतकूप आज की तारीख में एक कुआँ है जो उपयोग में है। रामकथा के अनुसार राम के राजतिलक हेतु सभी तीर्थों को जल मंगाया गया था किंतु दुर्भाग्यवश राम को वनवास हो गया। यह जल उपयोग में नहीं आ पाया। जब भरत ने चित्रकूट जाकर राम को मनाने और वापस लाने का निर्णय किया तो वे आत्मविश्वास से भरे थे और निश्चय किया कि राम का राजतिलक वहीं कर दिया जाएगा। शायद इसी मानसिकता से वे पूरी सेना, गुरु वशिष्ठ सहित अनेक ऋषियों -मुनियों सहित राजर्शि जनक को भी साथ लेकर गए थे। राम समयपूर्व अयोध्या लौटने को तैयार नहीं हुए तो भरत के सामने यह समस्या हुई कि तीर्थों के पवित्र जल का क्या करें। इस पर चित्रकूट का विशद भौगोलिक ज्ञान रखने वाले अति मुनि ने भरत को सलाह दी कि इस पवित्र जल को अमुक कूप में रख दिया जाए क्योंकि वह बहुत ही पवित्र जल वाला कूप है। तीर्थों का जल उसमें रख देने से कूप का भी महत्त्व बढ़ जाएगा और जल का भी सम्मान होगा। इतना ही नहीं, उस दिन से उस कूप का नाम भरतकूप होगा और इसके जल में स्नान करने से समस्त पापों का विनाश होगा। गोस्वामी तुलसीदास को एक बार फिर उद्धृत करें तो: 
भरतकूप कहिहहिं सब लोगा। अति पावन तीरथ जल जोगा।।
प्रेम सनेम निमज्जत प्रानी। होइहंहि बिमल करम मन बानी।। (अयो0/309/8)

भरत कूप पर लेखक पत्नी के साथ 
कूप एक विशाल पीपल के पेड़ के नीचे है और कूप पर टीन की चादरों से छाया की हुई है। दो - तीन चरखियाँ लगी हुई हैं और अनेक भक्त बाल्टियों से पानी भरकर स्नान करते रहते है।
चार भाइयों का मंदिर: कूप परिसर में ही भरत मंदिर और चार भाइयों का मंदिर है। राम मंदिर तो देश में हर गली-मोहल्ले में मिल जाते हैं किंतु भरत मंदिर और चार भाइयों का मंदिर दुर्लभ है। यह स्थल वस्तुतः भाइयों के प्रेम और त्याग का प्रतीक है। एक ओर जहाँ मर्यादा परुषोत्तम राम हैं तो दूसरी ओर उनसे कम त्यागी और धैर्यवान भरत नहीं हैं। लक्ष्मण का त्याग कम करके आँकना भ्रातृस्नेह का घोर अपमान होगा। यह एक ऐसा स्थल है जहाँ पर अयोध्या जैसे स्रामाज्य को लात मारने की होड़ लगी है। कथा तो हम सुन लेते हैं किंतु वास्तविक जीवन में राम-भरत और  के देश में कितना त्याग कर पाते हैं, यह सोचने की बात है। 
कुछ देर रुककर हमने वापसी का मन बनाया । यहाँ जाने के लिए निजी वाहन ही सर्वोत्तम है। सार्वजनिक वाहन पर भरोसा करना कष्टप्रद हो सकता है। एक वृद्ध दंपति साधन के अभाव में बहुत देर से परेशान हो रहे थे। हमारे आॅटो में पीछे की सीट खाली थी और उन्होंने निवेदन किया तो हम सहर्ष उन्हें बिठा लाए। वे पिछले दो घंटे से वाहन की प्रतीक्षा में परेशान थे।

रामशैया :

राम शैया              छाया : हरिशंकर राढ़ी 
 भरतकूप से वापसी में रामशैया नामक एक स्थल पड़ता है। यहाँ एक विशाल शिला है जो दो भागों विभक्त सी दिखती है, या यों कहें कि बीच में मेंड़ सी बनी हुई है। कहा जाता है कि इस  शिला पर राम और सीत शय न करते थे। बीच में मेंड़ थी जिससे वे अलग रहते थे और पूरे वनवास काल में उन्होंने ब्रह्मचर्य का पालन किया था। यह अलग बात है कि पूरी श्रद्धा के बाद भी यह तर्क गले नहीं उतरता कि वे रहते थे कामदगिरि के पास और शयन करने यहां आते थे। इसके सम्मुख एक छोटा सा परिसर है जहाँ कुछ छोटे मंदिर भी हैं और सामने एक विद्यालय है जहाँ उस समय जूनियर तक की परीक्षाएं चल रही थीं।
खैर, उस गड्ढेनुमा सड़क से होते हुए हम एक बार फिर रामघाट आ गए। दोपहर का भोजन किया। रामघाट को प्रणाम किया और ट्रेन पकड़ने चित्रकूटधाम कर्वी स्टेशन चल पड़े -हाँ, मन में यह पंक्ति वापसी के समय भी गूँज रही थी -चलु चित चेति चित्रकूटहिं अब। काश ! चित्रकूट को उसकी प्राचीन और उपयुक्त गरिमा पुनः मिल पाती। 

Wednesday, 2 September 2015

इन्द्राणी के बहाने


हालांकि मीडिया के सोचने-करने के लिए हमेशा बहुत कुछ रहता है, इस वक़्त भी है. न तो किसानों की आत्महत्या रुकी है, न कंपनियों की लूट, न ग़रीबों-मज़दूरों का शोषण, न फीस के नाम पर स्कूलों की लूट. सांस्कृतिक दृष्टि से देखें देश का सबसे बड़ा पर्व महाकुंभ नासिक में और राजनीतिक नज़रिये से चुनाव बिहार में चल ही रहे हैं. मीडिया चाहे तो इनके बहाने उन बुनियादी सवालों से जूझ सकती है जिनसे जूझना देश और जन के लिए ज़रूरी है. लेकिन हमारी मीडिया ऐसा कभी करती नहीं है. इन सवालों से वह हमेशा बचती रही है और आगे भी बचती रही है. इनसे बचने के लिए ही वह कभी कुछ झूठमूठ के मुद्दे गढ़ती है और कभी तलाश लेती है. जिन मुद्दों को वह तलाश लेती है, उनमें कुछ देश को जानना चाहिए या जिन प्रश्नों की ओर देश का ध्यान जाना चाहिए, उनसे वह हमेशा बचती है. ऐसा ही एक मुद्दा इन दिनों इंद्राणी मुखर्जी का है. ख़बरें उन्हें लेकर बहुत चल रही हैं, लेकिन उन तीखे प्रश्नों से हमारी मीडिया बच कर भाग जा रही है, जो उठाए ही जाने चाहिए. वही प्रश्न उठा रहे हैं भारत संस्कृति न्यास के अध्यक्ष संजय शांडिल्य

वास्तव में कहा आ गए है हम। क़ुछ समझ में नहीं आता। हम भारत के लोग है। हमारे पास चिंतन और चर्चा के हजारों विषय है। हमारी विरासत महान है। हम बहुत ही उत्तम संस्कृति के वाहक हैं। हमारे देश का सबसे बड़ा सांस्कृतिक पर्व फ़िलहाल नासिक में चल रहा है। हमारे दश के सबसे बड़े ज्ञानी राज्य बिहार में विधानसभा चुनाव होने जा रहे है। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में पिछले 36 सालो में 60 हज़ार से ज्यादा बच्चे मौत के मुह में इसलिए समा गए क्योकि हमारी सरकारों ने ठीक से काम नहीं किया और इन्सेफेलाइटिस जैसी महामारी फैलती चली गयी। देश की दशा और दिशा किस हालत में है? देश की सीमा पर दुश्मन रोज ललकार रहा है. …… लेकिन देश की मीडिया के लिए पिछले आठ दिनों एक ऐसी कहानी चिंता और चर्चा का विषय बनी है जिसमें कुछ भी ऐसा नहीं है जो भारतीय हो, सब अभारतीय मूल्यहीनता और असामाजिकता का नमूना है। एक ऐसी महिला जिसके जीवन की संपूर्ण यात्रा में केवल संस्कारहीनता की घटनाएं हैं, उन्हें देश के सामने ऐसे परोसा जा रहा है जैसे इस कथानक को सुने बिना भारत की धड़कन रूक जाएगी। हमारे देश की मीडिया को शायद यही लगता है कि इन्द्राणी की कहानी दिखा कर वह देश को बहुत ही रोचक जानकारी दे रहा है। वह यह भूल गया है की इन्द्राणी केवल एक इन्द्राणी मुखर्जी नाम की महिला की कथा नहीं है। यह एक ऐसी प्रवृत्ति की कथा है जिसमे पूरी तौर पर भारतीयता का लोप हो चुका है।

कोई एक दिन में इन्द्राणी मुख़र्जी नहीं बन जाता। उसके लिए देश काल परिस्थितियां भी बहुत हद तक जिम्मेदार होती है। देश और समाज जैसा संस्कार देते है कोई पारी वैसे ही इन्दाणी या इन्द्राणी मुख़र्जी बनती है। सोचिए की एक छोटी सी लड़की अपने सौतेले पिता के साथ रहती है। वह शराबी है। रोज अपनी पत्नी से झगड़ा भी करता है। वह उस सौतेली बेटी पर भी गलत निगाह रखता है। बच्ची थोड़ी बड़ी होती है। बहकते माहौल में वह किसी अधेड़ आदमी की कुंठा का शिकार होती है. फिर वह अपनी कच्ची उम्र में ही घर से भागती है। उसे लगभग उसी की उम्र का एक लड़का मिलता है। दोनों बिना किसी बंधन के एक साथ एक कोठरी में रहना शुरू करते है। स्वाभाविक रूप से इस जोड़ी के माध्यम से दो बच्चे अस्तित्व में आ जाते हैं। दोनों बिना ब्याह के माँ बाप बन कर भी बच्चों को बाकायदा जन्मा देते है। वे चाहते तो वह सब कर सकते थे जैसा आज कल हो रहा..abortion करा सकते थे। लेकिन ऐसा न करके दोनों उन बच्चो के साथ जीने की कोशिश करते है। बिना किसी सामाजिक बंधन के ये दोनों केवल तीन साल एक साथ रहते है। लड़का अलग होकर असली शादी कर अपना घर बसा लेता है। 

लड़की अपने लावारिस बच्चों को अपने उन्हीं माँ बाप के घर छोड़ने के बाद अपना घर बसाने की कोशिश करती है। एक दूसरा आदमी उसको सम्बल देता है। उससे भी एक बेटी जन्म लेती है।लेकिन यह बंधन इतना कच्चा निकलता है कि सब बिखर जाता है. फिर वह महिला जीवन जीने की कोशिश में वह भी करती है जिसे समाज का सबसे गंदा पेशा कहा जाता है। एक दिन वह एक वेश्यालय से पकड़ ली जाती है। अब ऐसी महिला के लिए इस समाज में तो जगह नहीं है। वह जब उस पकड़ से निकलती है तब तक समाज उसे सब कुछ सिखा चुका होता है। वह सीधे देश की सबसे चकाचौध वाली माया नगरी में पहुंच कर अपना नया आशियाना तलाशती है। यह भी खोज का विषय होना चाहिए की इन्द्राणी को आखिर स्टार टीवी के दफ्तर में काम किसने दिलाया और उसके बदले इन्द्राणी को क्या कुर्बानी देनी पड़ी। क्योकि असम या कोलकाता से आने वाली एक सामान्य सी महिला रातोरात स्टार जैसी कंपनी में ह्यूमन रिसोर्स की सलाहकार कैसे बन गयी। यहाँ इस एक पड़ाव को हमारे मीडिया के शोधकर्ता पी जा रहे है। इतने बड़े मीडिया हाउस में अचानक किसी को इतना बड़ा पद नहीं मिल सकता। 

बहरहाल अब इन्द्राणी बोरा के जीवन का सुन्दरकाण्ड शुरू होने वाला है। भारतीय मीडिया के दिग्गज पुरुष के रूप में पीटर मुखर्जी की पहचान है। वह कोई सामान्य आदमी नहीं हैं। छोटे-मोटे पत्रकारों और संपादकों के लिए उन तक पहुंचना भी आसान नहीं था जब वे स्टार के सीईओ रहे होंगे। ऐसे में इन्द्राणी नाम की यह महिला कैसे उनके इतने करीब पहुंच गयी और एक दिन अचानक वह इन्द्राणी बोरा से इन्द्राणी मुख़र्जी बन गयी.... क्या यह कोई बच्चों का खेल है या कि मंच का drama... बहरहाल यह उनकी अपनी जिंदगी है। आज वह पीटर की पत्नी के रूप में ही जानी जा रही है। यह अलग बात है कि .उसके आज के संकट में पीटर उसके साथ नहीं दिख रहे। अब आइये इस यात्रा की थोड़ी विवेचना कर ली जाय। एक ऐसी लड़की जो १४ या १५ साल की है उसी उम्र में उसका सौतेला पिता उसका शोषण करता है। वह भाग कर अपनी उम्र के लड़के के साथ रहती है वह उसे भोग कर बच्चे पैदा कर किनारे लग जाता है। फिर वह दूसरे के साथ जीने की कोशिश करती है। वह भी एक बेटी पैदा कर छोड़ देता है। 

यहाँ एक प्रश्न पैदा होता है की यदि उस लड़की को एक जिम्मेदार माँ बाप मिले होते जो उसको पूरी सुरक्षा देते फिर ठीक से उसका विवाह करते उसका अपना घर बसता। तब यदि वह अपने मन से इधर उधर जाती तो उसका दोष बनता था। यह वही समाज है न जिसने एक लड़की को कदम-कदम पर शोषित होते देखा। किसी ने यह सवाल उस समय सिद्धार्थ दास से क्यों नहीं किया की बिना ब्याह के दो बच्चे पैदा करने के बाद किस भरोसे उसने इन्द्राणी को छोड़ा? खन्ना ने क्यों नहीं निधि को अपने पास रख कर पढाया? शादी यदि टूट भी गई तो इन्द्राणी के खर्च के लिए खन्ना ने क्या दिया? सच तो यह दिख रहा है कि जब इन्द्राणी पैसे वाली बन गयी तब उसने सबका ख्याल किया। अपने उन्ही माँ-बाप के लिए आलिशान कोठी बना कर दी। उन्ही बच्चो को काफी धन दिया। अपने पूर्व पति खन्ना की भी मदद की। यह तो हुआ एक पक्ष। अब इस कहानी का दूसरा पक्ष भी देखिये। इन्द्राणी ने जो कुछ किया वह सब गलत हो सकता है लेकिन सिद्धार्थ दस ने क्या किया। खन्ना ने क्या किया। उस पीटर मुखर्जी ने क्या किया जिन्होंने इन्द्राणी के डैम पर सैकड़ो करोड़ की कंपनी कड़ी कर ली। आखिर उनके पास यह अकूत संपत्ति कहा से आई। 

आज पीटर अपने को पाक साफ बता रहे है। मीडिया के उनके चाटुकार उनके बारे में सवाल तक नहीं उठा रहे। इन्द्राणी ने शीना की हत्या की या नहीं यह तो अब कोर्ट में तय होगा लेकिन विडम्बना तो यह है की इन्द्राणी फिर से एक मर्द के हाथ ठगी गयी। आज पीटर काम से काम इन्द्राणी के असली पति तो है ही और इस लिहाज से उनको इन्द्राणी की मदद करनी चाहिए थी। आज वह यदि कहते भी है की उनका इन घटनाओ से कोई लेना देना नहीं है तब भी कोई उनकी बात पर भरोसा नहीं करेगा। किरण बेदी जी ने भी माना है की पुलिस को चाहिए कि पीटर को भी interogate करे। यह एक बात साफ हो गयी है की इसमे आज की तारीख में कोई किसी की पत्नी नहीं है। कोई माँ नहीं है। कोई बाप नहीं है। कोई भाई नहीं है। कोई बेटा नहीं है। कोई बेटी नहीं है। अर्थात सभी अलग अलग जीने वाले जानवर है। भारत में ऐसे जानवरो को इंसान नहीं कहा जाता। इसीलिए हमारी संस्कृति संस्कारो को महत्व देती है। 

देखिये न कि केवल एक जगह एक संस्कार टूटा तो कैसी कहानी बन गयी। आप खुद सोचिये कि हम समाज को सिर्फ मनुष्य के रूप में जानवर देना चाहते है या रिश्तो के संस्कारो के साथ स्वस्थ समाज बनाना चाहते है। और तकलीफ तो इस बात की है कि देश का मीडिया आज आठ दिनों से इसी कहानी में पूरे दश को उलझाये हुए है।यह अखबारों के पैन इन खबरों से भरे पड़े है कि बेटे ने बाप को कुल्हाड़ी से काटा, बेटे ने माँ की गर्दन मरोड़ी , भाई ने भाई को मर डाला , बही ने भाभी की हत्या कर दी , बाप ने बेटी को गड़ासे से काटा , दहेज़ केलिए नव विवाहिता जलायी गयी आदि आदि। और तो और देश में अनगिनत इंद्राणिया घूम रही है.... अनगिनत खन्ना और पीटर मौजूद है...यदि वास्तव में चिंता करनी है तो इस बात की होनी चाहिए कि इन प्रवृत्तियों को कैसे रोक जाय। मित्रो यह कहानी यही खतम होने वाली नहीं है। २३०० साल पहले देवी हेलेना ने भी अपने पुत्र जस्टिन का कत्ल भरी सभा में किया था। विगत वर्षो में कई ऐसी हत्याए हुई है जिनमे माँ बाप शामिल रहे है। कई चर्चित हत्याए राजनीतिक महत्वाकांक्षा में भी हुई है। आज भी देश के कई घरानो में ऐसा ही युद्ध चल रहा है। क्या सभी को हमारा मीडिया ऐसे ही दिखा सकेगा/ हमारे पुरखे कह गए है की जब कही से कोई सड़ांध पैदा होने लगे या बदबू आने लगे तो उस जगह से दूर चले जाना चाहिए। संस्कारहीन जानवरो की कथा सुना कर देश के लोगो खासकर बच्चो के दिमाग में गन्दगी नहीं फैलानी चाहिए। इतना इनको मत उछलिये की ये ही समाज के रोलमॉडल बनने लगे। बस कीजिये।

Tuesday, 25 August 2015

Chitrakoot Part - 2

                                   चित्रकूट के रामघाट पर 

                                                                  -हरिशंकर राढ़ी 

रामघाट:

रामघाट पर हमारा पहला मुकाबला बोटिंग वालों से हुआ। घाट की ओर रुख करते ही बोटिंग वाले कुछ इस तरह हम पर टूटे जैसे मधुमक्खियों, ततैया या बर्र का झुण्ड  टूटता है। केवल उनकी खींचतान और शोर -शराबा । मुझे ऐसे मुकाबलों से सख्त नफरत है। एक-दो बार मना करने के बावजूद जब उनकी दुकानदारी बंद नहीं हुई तोे गुस्सा फूट पड़ा। यार चैन से जीने दोगे या नहीं ? कोई यात्री तुम्हें ग्राहक के अलावा भी कुछ नजर आता है कि नहीं ? कौन किस मूड और किस परिस्थिति में आया है, तुम्हें इससे फर्क पड़ता है या नहीं ? और न जाने क्या - क्या ! थोड़ी सी भीड़ जमा हुई और फिर कोई खास मनोरंजन न पाकर धीरे-धीरे छंट गई। अपने देश  का भीड़तंत्र तो है ही ऐसा।
रामघाट की एक नौका        छाया : हरिशंकर राढ़ी 
अकेला पाकर रामघाट की सीढि़यों पर बैठ गया। शांत  होने का प्रयास करने लगा और सोचने भी लगा। आखिर ऐसा हुआ क्यों जा रहा है। लोग तीर्थों पर इसलिए जाते रहे होंगे कि कुछ शांति  मिल सके; थोड़ा सा स्वयं को भी देखने का अवसर मिल सके। भौतिकवाद और मौज-मस्ती से अलग अपनी आत्मा के नजदीक जाने का अवसर मिल सके। लेकिन कहां से कहां पहुंच गई हमारी सभ्यता और मानसिकता ! तीर्थस्थल पिकनिक और मौजमस्ती के स्पाॅट बन गए। क्या वाकई धार्मिक आस्था बढ़ी है या धर्म भी मनोरंजन का माध्यम बन गया है। अभी केदारनाथ की त्रासदी भूली नहीं है और प्रकृति का इतना बड़ा और आसान सा पाठ हमारी समझ में नहीं आया है। धार्मिक स्थल सैर-सपाटे के पर्याय बनते जा रहे हैं। सैर सपाटे में कोई बुराई नहीं है, तीर्थयात्रा के पीछे भी यह सोच रही होगी; लेकिन क्या कहीं भी हम अपनी भौतिक समृद्धि और कामना को छोड़कर कुछ गंभीर चिंतन और यात्रा नहीं कर सकते ? मैं मानता हूँ कि आबादी के साथ रोजगार की समस्या बढ़ी है और पर्यटन स्थल, चाहे वे तीर्थ ही क्यों न हों, जीविका चलाने में सहायक सिद्ध हो रहे हैं। लेकिन उसका भी एक तरीका होना चाहिए। एक व्यवस्था हो जिसमें इच्छुक व्यक्ति खुद ही इन सुविधाओं का लाभ लेने जाए और बिना किसी मोल-भाव को निश्चित  दर पर ईमानदारी से इन सुविधाओं को भोग सके। लेकिन अपने यहां ऐसा नहीं होता । मंदिर के बाहर फूल-माला-प्रसाद वाले भी कुछ ऐसा ही दृश्य  उपस्थित करते हैं और रास्ता तक रोक लेते हैं। मुझे कई बार ऐसे आग्रहों से चिढ़ हुई है और चिढ़ बस मैंने मन होते हुए भी फूल-माला नहीं लिया।
रामघाट वह जगह है जहां राम अपने वनवास के दिनों में मंदाकिनी में नहाया करते और बैठा करते। इसी लिए इस घाट का नाम रामघाट पड़ा। राम से जुड़ी कई नदियों के घाटों का नाम ‘रामघाट’ है। नासिक में भी गोदावरी के किनारे प्रसिद्ध रामघाट है, जहां बारहवें वर्ष  कुंभ का मेला लगता है और आज भी हिंदू पितरों को पिंडदान करते हैं।

पर तब मंदाकिनी और उसका तट बहुत सुन्दर  रहा होगा। आज मंदाकिनी गंदा नाला बन चुकी है। अंधेरा हो चुका था। रामघाट बहुत सुन्दर  लग रहा था। अधिकांश  लोग बोटिंग और दूसरे प्रकार की मस्ती कर रहे थे। मैं राम के वनवास की कल्पना और तत्कालीन परिस्थितियों का अवलोकन कर रहा था। बच्चे अपने में मस्त थे। पत्नी को लगा कि ये कुछ ऐसा ही सोच रहे होंगे (वे मेरे इस दुर्गुण से परिचित हैं)। मैंने उन्हें भी रामायण काल की चर्चा में शामिल किया और उस अतीत को उन्होंने भी महसूस किया। पर उनका मन भी मंदाकिनी में सजी-सजाई नौकाओं में लगा हुआ था। मैं बचपन से किशोरावस्था तक अपने गांव के पास की बरसाती नदी में नौकायन (उसे मजबूरी या नदी पार करने का एकमात्र साधन कह सकते हैं) का खूब आनंद लियाा था। स्कूली बच्चे कभी-कभी नाव को डुबाने की भी कोशिश  करते। एक बार हमारी नाव डूब भी गई थी, लेकिन वहां पर गहराई अधिक नहीं थी। मुझे याद है कि जब मैं दसवीं का छात्र था तो अपनी साइकिल समेत नदी में उलट गया था। कई बार  विशाल  सरयू (घाघरा नदी जो चैड़ाई और वेग में गंगा को भी मात करती है) को नाव से पार किया था। सो, मुझे नौकायन का कोई शौक  नहीं है। हाँ, बच्चे ललचा रहे थे। मित्र ज्ञान जी का परिवार इस आनंद को उठाना चाहता था। अकेला पाकर एक नाविक आया और सभ्यता से बात करने लगा और फिर हम नौकायन के लिए मंदाकिनी में उतर गए।
नौकायन के बाद हम रामघाट पर उस ओर चले जहाँ गोस्वामी तुलसी दास का एक छोटा सा मंदिर है। तुलसीदास ने रामघाट पर लंबा समय बिताया था। जिस जगह राम ने 12 वर्ष  काटे हों, वहां लंबे प्रवास के बिना रामायण पूरी भी कैसे हो सकती थी। छोटे से बुर्जनुमा मंदिर में तुलसीदास की प्रतिमा बड़ी जीवंत लगती है और दीवार पर वह प्रसिद्ध दोहा लिखा है जिससे चित्रकूट की पहचान को अतिरिक्त महत्त्व मिलता है:

चित्रकूट के घाट पर भइ संतन की भीर।
तुलसिदास चंदन घिसंे, तिलक देत रघुबीर।।

गुप्त गोदावरी के लिए:

गुप्त गोदावरी गुफा  :       छाया  हरीशंकर राढ़ी 
अगली सुबह हमारा गंतव्य गुप्त गोदावरी की गुफा थी। रामघाट से इसकी दूरी लगभग बीस किमी है और यह मध्य प्रदेश  में है। वहाँ जाने के लिए बड़े वाले तिपहिया और टैक्सियाँ मिलती हैं जिसकी जानकारी हमने एक दिन पहले ही ले ली थी। इसी रास्ते में सती अनसूया का मंदिर, स्फटिक शिला  और जानकी कुंड है। तिपहिया वाले अक्टूबर 2014 में छह सौ रुपये लेते थे। सुबह हम होटल से निकले तो तिपहिया वालों ने घेरा और हमने एक नई सी गाड़ी देखकर बात तय कर ली। उसने बिठाया और जिधर से (रामघाट गंदे नाले के पुल से जिसके उस पार मध्यप्रदेश  है) जाना था, उसके बजाय उल्टा मोड़ा तो हमें मामला खटका। उसका जवाब यह था कि उसका आॅटो यूपी के नंबर का था और पुल पर जो एमपी के आॅटो खड़े रहते हैं, वे नहीं जाने देंगे। अतः वह दूसरे रास्ते से जाएगा। इस बीच उसे दूसरा आॅटो आता दिख गया जो उसी मालिक का था, सो उसने हमें नए वाले में से उतार कर पुराने वाले में बिठा दिया और लंबा रास्ता लेकर न जाने किस सड़क पर आया। वहाँ उसने ड्राइवर को ताकीद की कि आगे जाकर फलाँ पंचर वाले से टायर ले ले नहीं तो रास्ता खराब है और पंचर हो जाने पर दिक्कत होगी। हमें लगा कि वह सवारियों के सुख-दुख का ध्यान रख रहा है। पंचर वाले ने पंचर लगाया नहीं था, सो उसमें लगभग आधा घंटा खराब हुआ। और जनाब हम शहर से बाहर निकले ही थे कि उस अति खराब, अधिकांषतः गड्ढे वाली संकरी सड़क को उसका टायर झेल नहीं पाया और लीजिए साहब फिस्स। जिसका डर वही हुआ। वहां भी आधा घंटा लगा और इन ड्राइवरों के महालालची स्वभाव से उत्पन्न बाधाओं को सहते हुए हम डरे मन से गुप्त गोदावरी की ओर।
गुप्त गोदावरी गुफा में लेखक 
भगवान न करें कि ऐसी सड़कों पर यात्रा करनी पड़े। महान जीवट के वे टैक्सी आॅटो चालक हैं जो इन सड़कों पर अपने शरीर का भुरता बनवाते हैं। खैर, लगभग बीस किमी की दूरी हम दो घंटे में तय करके गुप्त गोदावरी जा पहुँचे।

यह स्थल दर्शनीय  है। यहाँ कुल दो गुफाएं हैं जिनमें प्रवेश  रोमांचित करता है। गुफा में प्रवेश  हेतु दस रुपये षुल्क था जिसका भुगतान करके हम अंदर गए। गुफा नंबर एक को राम दरबार के नाम से भी जाना जाता है। इसमें श्रीराम प्रमुख ऋषियों  - मुनियों से मिलते और गंभीर चर्चा किया करते थे। इस गुफा में कई शा खाएं हैं और प्राकृतिक नक्काशी  मन को  बांध लेती है। इसी गुफा के एक हिस्से में वह स्थल है जहाँ सीता जी का वस्त्र चुराने वाले राक्षस को लक्ष्मण ने मारकर उल्टा लटका दिया था। वह वस्त्र सती अनुसूया ने सीता जी को भेंट में दिया था। कहा जाता है कि श्रीराम से मिलने दक्षिण की गंगा कही जाने वाली गोदावरी उनसे मिलने हेतु यहां प्रकट हुई थी। गुफा संख्या दो में घुटनों से ऊपर तक बहता हुआ जल भरा रहता था। यह जल गुफा अंदर पत्थरों में से स्वतः उत्स्रुत कूप की भांति निकलता रहता है। जनश्रुति के अनुसार गोदावरी की एक धारा नाशिक  से अंदर ही अंदर प्रवाहित होती हुई यहाँ पत्थरों को तोड़कर बाहर निकलती है और तब से लगातार प्रवाहित हो रही है। नाशिक  में गोदावरी का उद्गम स्थल देखने का मुझे अवसर मिला था। जब मैं दूसरी बार त्रयंबकेष्वर का दर्शन  करने गया था तो गोदावरी के उद्गम स्थल तक की लंबी चढ़ाई चढ़कर हम वहाँ गए थे और गोदावरी को कई जगहों से प्रकट होते हुए देखा था। इस स्थल पर गोदावरी को भगवान राम ने वचन दिया था कि वे उससे मिलन अवश्य आएंगे और सीता हरण से पूर्व वनवास के अंतिम दो वर्ष वे गोदावरी और कपिला नदी के संगम पर ही पर्णकुटी बनाकर रहे थे। नाशिक  शहर में भी रामघाट एक पवित्र स्थल है जहां कुंभ का मेला लगता है और लोग अपने पितरों का तर्पण करते हैं। इस जल से भरी गुफा में चलना काफी अच्छा लग रहा था। गुफा में जब-तब भीड़ अधिक हो जाती है क्योंकि बाहर से कोई ऐसी व्यवस्था नहीं है कि दर्षनार्थियों को क्षमतानुसार रोककर भेजा जाए। एक बार लगा कि इसमें कभी कोई हादसा हो सकता है। लेकिन जब तक हादसा हो न जाए, हम एहतियात बरतते कहाँ हैं ?
चित्रकूट में आकर यह पहली जगह मिली थी जहाँ हमें एक सुंदर प्रकृति के दर्शन हुए थे। यहाँ का वातावरण मनोहारी था और पहली बार पर्यटन का आनंद मिलता हुआ महसूस हुआ था। दोपहर हो आई थी और हमें भूख लगने लगी थी। यहाँ के अधिकांश ढाबों में लकड़ी पर खाना बनता है और यह देखकर हमारी लालच कुछ और बढ़ गई। सो, निश्चित  हुआ कि भोजन कर लिया जाए। सती अनुसूया का आश्रम देखकर चित्रकूट पहुंचते-पहुंचते तीन बज जाएगा और भोजन का समय निकल जाएगा। लेकिन जितना देखने में लग रहा था, भोजन उतना अच्छा नहीं निकला और न ढाबे वाले की सेवा ही सराहनीय रही। कुल मिलाकर भोजन हो गया। हमारा आॅटो वाला बेचैन हो रहा था। हम आॅटो में सवार हुए और सती अनुसूया आश्रम के लिए चल पड़े। उस बिगड़ैल रास्ते पर भी आॅटो वाले रेलम-पेल मचाए हुए थे। एक जगह सामने गलत तरीके से आ रहे आॅटो से टक्कर होते-होते बची और हम सती अनसूया के आश्रम पहुंच गए। बीच का रास्ता घने जंगल से होकर जाता है और प्रकृति का सानिध्य मिल जाता है।

सती अनसूया का आश्रम:

सती अनुसूया का मंदिर :       छाया  हरिशंकर राढ़ी 
 यह आश्रम प्राकृतिक रूप से समृद्ध है। यह आज की स्थिति है। त्रेताकाल में यह स्थान और भी संुदर रहा होगा। हमारे ऋषि -मुनि अपनी ज्ञान साधना में किसी प्रकार की टोका-टाकी नहीं चाहते थे और प्रकृति के साहचर्य में रहकर ऊर्जा प्राप्त करते रहना चाहते थे, सो उन्होंने ऐसे स्थलों को चुना और उसे अपने तप से पावन और रमणीय बनाया। इस स्थल पर बने परमहंस आश्रम की पृश्ठभूमि में ऊँचा पर्वत और सम्मुख मंदाकिनी की मंद और निर्मल धारा के उस पार सघन वन वातावरण को आध्यात्मिक बना रहे थे। परमहंस आश्रम की भव्यता और उसके अंदर की झांकियाँ हमारी पहुँच को सार्थक कर रहे थे। इसमें अनसूया का त्रिदेवों को अबोध बालक बनाना और सीता को सतीत्व का उपदेश  देना प्रमुुख है जिसे लोग बड़ी श्रद्धा से देखते हैं। सती अनसूया अपने पति अत्रि मुनि के साथ यहाँ चिरकाल तक निवास करती रहीं और सीता को उपदेश , आशीष  और उपहार स्वरूप वस्त्राभूषण  दिया था।
सती अनुसूया का आश्रम  :       छाया  हरिशंकर राढ़ी 
रामचरित मानस के अनुसार चित्रकूट में मंदाकिनी का अवतरण सती अनसूया के तप से हुआ था। ऋषियों -मुनियों की सुविधा तथा वन्य पशुओं की प्यार बुझाने हेतु एक जलस्रोत की आवश्यकता थी और उस आवश्यकता को सती अनसूया ने अपनी कठिन साधना से पूरा किया। गोस्वामी तुलसीदास लिखते हैं -






नदी पुनीत पुरान बखानी। अत्रि प्रिया निज तपबल आनी।
सुरसरि धार नाम मंदाकिनि। जो सब पातक पोतक डाकिनि।

वाल्मीकि रामायण के अयोध्या कांड के उनसठवें सर्ग में मंदाकिनी का अप्रतिम वर्णन मिलता है। श्रीराम मंदाकिनी को सरयू के समान पवित्र और पापहारी मानते हैं तथा सीता से आग्रह करते हैं कि वे भी उनके (राम के) साथ मंदाकिनी में स्नान करें -
विधूतकल्मशैः सिद्धैस्तपोदमष्मान्वितैः ।
 नित्यविक्षोभितजलां विगाहस्व मया सह।। (2/59/13)
लेकिन आज यह मंदाकिनी शायद अपने जन्म को रो रही होगी। नदी तो दूर, आश्रम की पवित्रता का ध्यान किए बिना भी लोग मल-मूत्र से लेकर हर प्रकार की गंदगी इसके आँचल में डालते रहते हैं। पता नहीं क्या होगा ऐसी सोच वाले लोंगो का और देश  का। कहने के लिए धर्म हमारा प्राण है। हम सबसे बड़े धार्मिक देश  के निवासी हैं जहाँ ईश्वर  ने एक नहीं, दस अवतार लिए हैं। इसका उद्गम आश्रम से कुछ ही दूर घने जंगल में है और हमें समयाभाव और खतरा मोल न ले पाने की स्थिति के कारण इसका उद्गम देखे बिना ही चलना पड़ा। हाँ, आश्रम के ठीक ऊपर सती अनसूया का प्राचीन मंदिर और कुछ अन्य अवशेष  देखना हम नहीं भूले।
पूरी तरह आश्रम देख और महसूस कर लेने के बाद हम पुनः आॅटो में सवार हुए और चित्रकूट की ओर वापस।

Sunday, 26 July 2015

गढ़ तो चित्तौडग़ढ़...

इष्ट देव सांकृत्यायन 

गढ़ तो चित्तौडग़ढ़, बाक़ी सब गढ़ैया... यह कहावत और इसके साथ-साथ मेवाड़ के महाराणाओं की शौर्यगाथाएं बचपन से सुनता आया था। इसलिए चित्तौड़ का गढ़ यानी क़िला देखने की इच्छा कब से मन में पलती आ रही थी, कह नहीं सकता। हां, मौक़ा अब जाकर मिला, अगस्त में। जिस दिन कार्यक्रम सुनिश्चित हो पाया, तब तक रेलवे रिज़र्वेशन की साइट दिल्ली से चित्तौडग़ढ़ के लिए सभी ट्रेनों में सभी बर्थ फुल बता रही थी। जैसे-तैसे देहरादून एक्सप्रेस में आरएसी मिली। उम्मीद थी कि कन्फर्म हो जाएगा, पर हुआ नहीं। आख़िर ऐसे ही जाना पड़ा, एक बर्थ पर दो लोग। चित्तौडग़ढ़ पहुंचे तो साढ़े 11 बज रहे थे। ट्रेन सही समय पर पहुंची थी। स्टेशन के प्लैटफॉर्म से बाहर आते ही ऑटो वालों ने घेर लिया। मेरा मन तो था कि तय ही कर लिया जाए, पर राढ़ी जी ने इनके प्रकोप से बचाया। उनका कहना था कि पहले कहीं ठहरने का इंतज़ाम करते हैं। फ्रेश हो लें और कुछ खा-पी लें, फिर सोचा जाएगा। इनसे बचते हुए सड़क पर पहुंचे तो सामने ही एक जैन धर्मशाला दिखी। यहां बिना किसी झंझट के कम किराये पर अच्छा कमरा मिल गया। रेलवे स्टेशन के पास इतनी अच्छी जगह मिलने की उम्मीद नहीं की जा सकती थी। फ्रेश होने और नाश्ता आदि करने के बाद रीब एक बजे हम लोग निकल पड़े क़िले की ओर।
 
चित्तौड़गढ़ की प्राचीर
दूरी कुछ ख़ास नहीं है, लेकिन ऑटो वाले ने अपने वादे के विपरीत बस स्टैंड से थोड़ा आगे ले जाकर छोड़ दिया। वहां से हमें दूसरा ऑटो पकडऩा पड़ा, जो हमें क़िले की ओर ले चला। थोड़ी दूर आगे चलते ही क़िला शुरू हो गया। पहले पाडल पोल, फिर हनुमान पोल, इसके बाद जोरला और अंत में राम पोल। इससे थोड़ा और आगे ले जाकर उसने हमें छोड़ दिया। थोड़ी दूर पैदल चलने के बाद सामने फतेह प्रकाश महल था। बड़े से क्षेत्र में फैला कभी महल रहा यह भवन अब राजकीय संग्रहालय बन चुका है। इसके परिसर में बड़ी संख्या में ऊंट और घोड़े लिए लोग खड़े थे। साथ में पारंपरिक वस्त्रों की कई दुकानें भी थीं। पहले तो हमें लगा कि ये भी घोड़े और ऊंट से टूर कराने वाले हैं और कपड़े भी शायद बिकने के लिए हों, पर बाद में ग़ौर करने पर मालूम हुआ कि ये फ़ोटो खिंचाने के शौक़ीन लोगों के लिए हैं। घोड़े और पारंपरिक वस्त्राभूषणों से लेकर बंदूकें तक यहां थोड़ी देर के लिए किराये पर उपलब्ध हैं। बहुत लोग यहां महाराणा प्रताप से लेकर सुलताना डाकू तक बनने का अपना शौ पूरा कर रहे थे। चूंकि साथ में गाइड कोई नहीं था और स्थानीय गाइड जो करता है, वह हम बख़ूबी जानते भी हैं, लिहाज़ा स्वयं आसपास का जायजा लेने हम लोग महल के पिछवाड़े चले गए। पीछे दूर-दूर तक फैला मैदान और खंडहर ही दिख रहे थे। कैसे और किधर जाया जाए तो सब कुछ देखा जा सकता है, इसका कुछ अंदाजा नहीं हो पा रहा था। 


इतनी बार बसे-उजड़े
क़िले जैसा वहां कुछ दिख ही नहीं रहा था। एक बार तो हमें ऐसा लगा गोया हम बेवजह ही आ गए इतनी दूरी तय करके। बस नाम ही नाम है। थोड़े दिनों पहले मैंने क़िले की जर्जर हालत उसके संरक्षण के लिए केंद्रीय खनन एवं ईंधन अनुसंधान संस्थान तथा केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों के प्रयासों की ख़बर भी पढ़ी थी। जिसमें कहा गया था कि अलाउद्दीन खिलजी के हमले से क्षतिग्रस्त हुआ यह दुर्ग अब प्रदूषण के आक्रमण से त्रस्त है। हमें लगा, कहीं उत्खनन से उपजा प्रदूषण 7वीं शताब्दी के इस अंतरराष्ट्रीय धरोहर को पूरी तरह खा ही तो नहीं गया। हमारा इरादा सबसे पहले विजय स्तंभ और फिर पद्मिनी महल देखने का था, जिसका कोई रास्ता अपने-आप से पता नहीं चल रहा था। इसी बीच एक दुकानदार से बात हुई तो उसने बताया कि क़िले का असली नज़ारा तो आपको विजय स्तंभ से ही मिलेगा और वह यहां से लगभग तीन किलोमीटर दूर है। रास्ता पूछने पर मालूम हुआ कि सामने बाईं तर जा रही सड़क से सीधे चले जाएं। इसी पर आपको सारी धरोहरें दिख जाएंगी। यह मालूम हो जाने के बाद हमने तय किया कि अब पहले संग्रहालय ही देख लेते हैं। संग्रहालय में प्रवेश के टिकट लिए गए और हम अंदर।

इस दोमंजि़ले महल का निर्माण उदयपुर के महाराणा फतह सिंह ने करवाया था। इस महल का निर्माण 20वीं शताब्दी के शुरुआती दौर में करवाया गया। बाद में 1968 में इसी भवन में राज्य सरकार द्वारा संग्रहालय स्थापित किया गया। इस संग्रहालय में मध्यकाल में राजाओं द्वारा इस्तेमाल की गई विभिन्न वस्तुओं से लेकर पाषाण काल की कई कलाकृतियां तक मौजूद हैं। इसके संग्रह में शामिल सिक्के, कलाकृतियां, मूर्तियां, अस्त्र-शस्त्र और लकड़ी की बनी कई चीज़ें न केवल दुर्ग और मेवाड़ के प्राचीन वैभव, बल्कि इसके संघर्ष का भी साक्षात्कार कराती हैं। चित्तौड़ की नियति बहुत कुछ दिल्ली जैसी रही है, बार-बार बसने, बसकर उजडऩे और फिर बसने की। शौर्य, षड्यंत्रों, युद्ध, नीति-अनीति, सत्ता संघर्ष, राजनीति-कूटनीति और पारिवारिक विखंडन के साथ-साथ युद्धों और जौहर में जाने कितने प्राणों की आहुतियों के जितने दौर इस क़िले ने देखे हैं, उन्हें देख और महसूस कर तो ख़ुद काल का मन भी टूट कर रह जाए। गहलोत वंश के राजाओं द्वारा स्थापित इस क़िले पर पहले सिसौदिया राजाओं का ब्ज़ा हुआ। सिसौदिया लोगों की अलाउद्दीन से लंबी लड़ाई चली और आख़िरकार वह हार गया। फिर अकबर से लंबी लड़ाई चली, जो छल-बल का प्रयोग कर अंतत: जीत गया। यही वह क़िला है, जिसने राणा कुंभा, राणा सांगा और महाराणा प्रताप का शौर्य देखा है, इसी ने पन्ना धाय का बलिदान देखा और इसी ने बनवीर की गद्दारी भी देखी है। संग्रहालय में मौजूद वस्तुओं का बारीक़ी से निरीक्षण करें तो इसे आप महसूस कर सकते हैं। 
 
राजकीय संग्रहालय के आंगन में राढ़ी जी
फतह प्रकाश महल के बीच में एक बड़ा सा आंगन है, जहां कई पर्यटक बैठे आराम करते मिले। इस आंगन में दो पेड़ भी लगे हैं और बीचोबीच एक छतरी भी है। यहां से बाहर निकल कर एक चने बेचने वाले से हमने विजय स्तंभ और रानी पद्मिनी महल जाने का रास्ता पूछा। उसने बताया, 'सामने ही जो सड़क दिख रही है, उस पर बाईं तर मुड़ कर सीधे चले जाएं। इसी रास्ते पर आपको यहां के सभी दर्शनीय मिल जाएंगे। और हम चल पड़े। बमुश्किल एक किलोमीटर आगे चल कर सड़क के बाएं हाथ सतबीस देवरी है। वस्तुत: यह एक भव्य जैन मंदिर है। इसमें एक मुख्य मंदिर भगवान श्री महावीर जी का है, इसके अलावा तीन मंडपों में विभक्त इस मंदिर में कुल 27 मंदिर हैं। एक परकोटे के अंदर ऊंची जगती पर स्थापित इस मंदिर का निर्माण विक्रम संवत 1505 (सन् 1448 ई.) में हुआ था। इस मंदिर में एक कल्पवृक्ष भी है।
 
सतबीस देवरी 
शौर्य का प्रतीक

यहां से लगभग दो किलोमीटर और आगे चलने पर सड़क से दाएं हाथ विजय स्तंभ है। बहुत बड़े परिसर में मौजूद इस स्तंभ का निर्माण 1448 ई. में ही कराया गया था। मालवा के सुल्तान पर विजय की स्मृति में निर्मित इस स्तंभ को महाराणा कुंभा ने भगवान विष्णु को समर्पित किया था। इस बड़े परिसर के ही एक हिस्से को जौहर स्थल के रूप में चिन्हित किया गया है। इसके पीछे कुछ छोटे-छोटे मंदिरों के अवशेष हैं और एक मंदिर भी है। अंदर पहुंच कर मालूम हुआ कि लोग ऊपरी तल तक जा भी सकते हैं, लेकिन इसके लिए टिकट लेना होगा। मुश्किल यह थी कि टिकट यहां नहीं, प्रवेश द्वार पर मिलता है। पद्मिनी महल में प्रवेश के लिए भी वहीं से टिकट मिलता है, अन्यथा उसे भी बाहर से ही देखकर लौटना पड़ेगा। मजबूरन फिर से वापस लौटना था। मैं तो उसी परिसर में ठहर कर वहां उपलब्ध पुरातत्व संपदा देखने लगा, लेकिन मेरे दो साथी श्री हरिशंकर राढ़ी और श्री बद्री प्रसाद यादव वहां से टिकट घर के लिए लौट गए। रीब तीन किलोमीटर से कुछ अधिक ही दूर तक आने-जाने में समय तो लगना ही था, लिहाज़ा आसपास मौजूद अन्य जगहों का भी जायजा मैंने ले लिया। दूसरी दर्शनीय जगहों पर जाने के रास्ते और नियम-क़ानून भी पता कर लिए। खीज भी आई। इतना गैर प्रोफेशनल अप्रोच सिर्फ़ भारत के ही पर्यटन विभागों का हो सकता है। इसके लिए टिकट क़िले के प्रवेश द्वार के पास मिलता है, लेकिन वहां ऐसा कोई साइनबोर्ड तक नहीं दिखा जिससे यह जाना जा सके। बेहतर होता कि वहां प्रवेश वहां सामने ही साइनबोर्ड लगा दिए जाते और पूरे क़िले में कहीं भी घूमने के लिए सभी टिकट इकट्ठे वहीं दे दिए जाते। इससे पर्यटन विभाग की भी बचत होती और पर्यटक को भी बार-बार टिकट लेने-देने के झंझट से फ़ुर्सत मिल जाती।
 
विजय स्तंभ 
मित्रों के टिकट लेकर आने पर इस स्तंभ के अंदर गए। इसमें भीतर जाने की अनुमति तो है, पर बेहद संकरी और अंधेरी गलीनुमा सीढिय़ों वाले इस रास्ते में प्रकाश की कोई व्यवस्था नहीं है। इससे ऊपर जाना काफ़ी मुश्किल काम है। अगर इसके भीतर प्रकाश की व्यवस्था की जा सके तो इसकी भव्यता भी बढ़ जाएगी और पर्यटकों के लिए सुविधा भी। साथ ही अंदर जाने में जोखिम भी कम हो जाएगी। 37 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले स्तंभ में कुल नौ मंजि़लें हैं। बाहर से तो यह शानदार है ही, भीतर भी जगह-जगह ख़ूबसूरत नक्काशी है। सबसे ऊपरी मंजि़ल से चित्तौडग़ढ़ क़िले के भीतर मौजूद कई दर्शनीय जगहें सा दिखाई देती हैं। हमने वहीं से कुछ तसवीरें भी खींचीं। नीचे उतरने पर मालूम हुआ कि इस परिसर में ही मौजूद मंदिर के पीछे ही गोमुख कुंड है, जो बाहर से देखने पर क़िले का ही एक हिस्सा लगता है।
 
पद्मिनी महल
वह सौंदर्य अनूठा
इसके बाद हम रानी पद्मिनी महल की ओर बढ़े। यह महल एक ताल के भीतर बना है। झील से पहले एक परिसर बना है, जिसे रानी पद्मिनी उद्यान कहा जाता है। हमें उम्मीद थी कि टिकट लेकर महल को अंदर जाकर देखा जा सकता है, लेकिन वास्तव में ऐसा कुछ है नहीं। यह टिकट इसी उद्यान परिसर के लिए होता है, जिसके अंतिम छोर से पानी के बीच बने महल को ठीक से देखा जा सकता है। महल चूंकि एक तालाब के भीतर बना है और सड़क या उद्यान से महल के बीच कोई पुल भी नहीं है, इसलिए अंदर जाकर महल देखना संभव नहीं है। चित्तौडग़ढ़ के इतिहास में इस महल का विशेष महत्व है। तीन मंजि़लों वाले इस जलमहल का निर्माण कब हुआ, इस बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। केवल यह पता चला कि सन् 1881 में राणा सज्जन सिंह ने इसकी दीवारों पर प्लास्टर कराया और कुछ नए निर्माण भी कराए थे।
पद्मिनी उद्यान के व्यूप्वाइंट पर मैं, बद्री जी और राढ़ी जी

बताया जाता है कि महल के भीतर एक कमरे में आदमद शीशे लगे हैं। इन्हीं शीशों के ज़रिये राजा रतन सिंह ने बहुत आग्रह पर दिल्ली के सुलतान अलाउद्दीन खिलजी को तालाब के जल में रानी पद्मिनी का प्रतिबिंब दिखाया था, जिसके बाद वह रानी पद्मिनी को पाने के लिए बेचैन हो उठा और फिर मेवाड़ के राणा व खिलजी के बीच कई युद्ध हुए। लोगों का मानना है कि इस महल का उपयोग रानी पद्मिनी केवल गरमी के दिनों में किया करती थीं। शेष समय वह राणा कुंभा महल में ही रहती थीं। तालाब के दूसरे छोर पर कुछ खंडहर दिखाई देते हैं। बताया जाता है कि ये खातण रानी के महल के खंडहर हैं। यहां से कुछ और आगे चलकर भाक्सी है। जनश्रुतियों के अनुसार महाराणा कुंभा ने मालवा के सुलतान महमूद शाह को पकड़ कर यहीं पांच महीने तक क़ैद रखा था। इसके आगे मृगवन शुरू हो जाता है।
 
कालिका माता मंदिर 
यह सब देखने में शाम के चार बज गए थे। अब वापस लौटना था और अभी कई चीज़ें देखनी भी थीं। लौटते हुए हमने सबसे पहले इसी सड़क पर मौजूद कालिका माता मंदिर के दर्शन किए। चित्तौडग़ढ़ क्षेत्र का यह सबसे पुराना मंदिर है। इसका निर्माण मेवाड़ के गुहिलवंशी राजाओं ने आठवीं शताब्दी में करवाया था। शुरुआत में यह सूर्य मंदिर था, पर बाद में आक्रांताओं द्वारा सूर्य प्रतिमा खंडित कर दिए जाने के कारण सज्जन सिंह ने इसका जीर्णोद्धार करवाया और यहां कालिका माता की प्रतिमा स्थापित करवाई। इसकी दीवारों पर अभी भी सूर्य प्रतिमाएं उकेरी हुई हैं। थोड़ा और आगे चलकर मीरा मंदिर है। यह भी एक बड़े परिसर में मौजूद है। हालांकि अब इसे आम तौर पर मीरा मंदिर के नाम से जाना जाता है, लेकिन मीरा मंदिर यहां मुख्य मंदिर के पार्श्व भाग में एक छोटा सा मंदिर है। इसका मूल नाम कुंभास्वामिन मंदिर है और अब यहां गर्भगृह में श्यामसुंदर की प्रतिमा स्थापित है। मूल रूप से यह भगवान वराह का मंदिर रहा है। इसका निर्माण महाराणा कुंभा ने 1449 ई. में करवाया था। ऊंचे शिखर, विशाल कलात्मक मंडप एवं प्रदक्षिणा वाला यह मंदिर इंडो-आर्यन स्थापत्य कला का सुंदर नमूना है।
कीर्ति स्तंभ 

अहिंसा का कीर्ति स्तंभ
अब यहां से हमें कीर्ति स्तंभ की ओर निकलना था। इसके लिए हमें रीब तीन किलोमीटर पैदल सुनसान रास्ते पर चलना था। हम चल पड़े। यह पूरा रास्ता पठार की चट्टानों और सड़क के दोनों तर शरीफे के बाग़ान से भरा पड़ा है। यह फल लगने का समय नहीं था, वरना शायद कुछ लिए भी होते। रास्ते की सारी थकान दूर कर देने के लिए यह जीवंत दृश्य ही काफ़ी था। बीच-बीच में कई जगह चट्टानों से अपने-आप बन पड़ी आकृतियां ऐसा आभास दे रही थीं मानो उन्हें सायास किसी सधे कलाकार ने बनाया हो। क़िले के दूसरे आकर्षणों की तरह वहां भी कई और पर्यटक पहले से मौजूद थे। 12वीं शताब्दी में बनवाया गया यह स्तंभ 22 मीटर ऊंचा है। राणा रावल कुमार सिंह के शासन काल में इसे जैन व्यापारी जीजा भगरवाल ने बनवाया था। यह जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभ देव जी को समर्पित है। इसके निकट ही एक जैन मंदिर भी है। कीर्ति स्तंभ और मंदिर की बाहरी दीवारों पर भी बहुत सुंदर प्रतिमाएं उत्कीर्ण हैं। इसके पीछे नदी और सामने घाटीनुमा मैदान है। यह जगह इतनी शांत और सुंदर है कि अगर समय होता तो शायद हम यहां घंटों बैठना पसंद करते। वहां से वापस लौटते समय रास्ते में भगवान शिव का एक मंदिर था, जहां कोई यज्ञ चल रहा था और उसी समय प्रसाद वितरण हो रहा था। हमने सोचा क्यों न पुण्यलाभ उठाया जाए और प्रसाद ले लिया। इसके बाद दर्शन भी कर लिया। यह भी कोई प्राचीन मंदिर ही था, लेकिन कोई ऐसा अभिलेख यहां उपलब्ध नहीं था, जिससे ठीक-ठीक जानकारी मिल सके। चलते-चलते रीब साढ़े सात बजे हम राणा कुंभा महल पहुंच गए थे। महल तो क्या, अब केवल खंडहर बचे हैं और ये खंडहर ही चित्तौड़ के ऐतिहासिक गौरव के वास्तविक स्मृतिशेष हैं। 
 
मीरा मंदिर
जिस समय हम वहां पहुंचे ठीक उसी समय महल के अंदर से एक गाय निकल रही थी। यहां पुरासंपदा के रख-रखाव का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है। महल के अंदर जाने के लिए मुख्य दरवाज़ा छोटा सा है। लगभग पांच फुट ऊंचा। वहां तक पहुंचने के लिए स्लोप जैसा बना हुआ है। भीतर जाने पर पहले एक कमरा है, फिर गलियारानुमा निर्माण और अब बिना छत के हो गए कई कमरों के खंडहर। आसानी से समझा जा सकता है कि किसी समय इस महल का क्या वैभव रहा होगा। इस महल के पीछे एक और खंडहर है। यह खंडहर भी एक ऐसे प्राचीन भवन का है, जो न केवल मेवाड़, बल्कि मनुष्यता के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ का साक्षी रहा है। बताया जाता है कि यही वह जगह है जहां महाराणा उदय सिंह का जन्म हुआ था। उस समय मेवाड़ का राजकाज संभाल रहा बनवीर राणा विक्रमादित्य की हत्या पहले ही कर चुका था, आगे वह अपना मार्ग निष्कंटक करने के लिए उदय सिंह की ही हत्या करने वाला था। इसकी भनक पन्ना धाय को लग गई और उन्होंने उदय सिंह की जगह स्वयं अपने पुत्र चंदन की बलि दे दी। यह अलग बात है कि आज पन्ना धाय की चर्चा लोगों की ज़ुबानों और कुछ किताबों के सीमित पन्नों तक ही सीमित है, बाक़ी चित्तौड़ में उनके नाम का कोई स्मारक नहीं दिखा।
राणा कुंभा महल 
 
इस महल का निर्माण वास्तव में राणा हमीर ने करवाया था, लेकिन बाद में 15वीं सदी में राणा कुंभा ने इसमें कई परिवर्तन-परिवर्धन करवाए और इसीलिए इसे कुंभा महल कहा जाने लगा। इसके सामने ही बनवीर की दीवार और बड़ी पोल भी है। यहीं से एक रास्ता चित्तौड़ के महाराणा की कुलदेवी तुलजा भवानी के मंदिर की ओर भी जाता है। 

कल्पतरु की छांव 
यह सब देखते हुए रात 9 बजे हम वापस अपने कमरे में थे। थोड़ी देर शहर में घूमने भी निकले और खा-पीकर लौट आए। अगले दिन सुबह ही सांवलिया जी मंदिर निकले। यह चित्तौडग़ढ़ से 40 किलोमीटर दूर उदयपुर वाले हाइवे पर स्थित है। उदयपुर हाइवे पर बागुंड-भादसोड़ा चौराया से बाईं तरएक रास्ता निकलता है। इसी रास्ते पर 6 किलोमीटर आगे जाकर भदसोड़ा गांव में है यह मंदिर। इसी मंदिर के कारण अब यह गांव धीरे-धीरे एक छोटे सबे का रूप ले चुका है।
सांवलिया जी मंदिर

भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित यह मंदिर अभी निर्माणाधीन है, लेकिन भव्य है। जब पूरा बन कर तैयार होगा तो निश्चित रूप से यह स्थापत्य कला का एक अप्रतिम नमूना होगा। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी आसन्न होने के कारण परिसर में इसकी तैयारियां भी शबाब पर थीं। हर तरफ बिजली वाली झालरें सजाई जा रही थीं, झांकियों और अन्य कार्यक्रमों आदि के लिए कई जगह इंतज़ाम बनाए जा रहे थे। इससे भीतर का माहौल काफ़ी अस्त-व्यस्त लग रहा था, लेकिन व्यवस्था चाक-चौबंद थी। किंवदंती है कि सन 1840 में इसी क्षेत्र के भोलाराम गुर्जर को यह सपना आया कि यहां तीन मूर्तियां ज़मीन में दबी हुई हैं। खुदाई की गई तो यह सपना सच निकला। वहां से श्रीकृष्ण की तीन मनमोहक मूर्तियां निकलीं। इनमें एक को मंडपिया गांव में स्थापित किया गया, दूसरे को भादसोड़ा में और तीसरे को प्राकट्य स्थल छापर में ही स्थापित कर दिया गया। बाद में उन्हीं जगहों पर भव्य मंदिर बनवाए गए।

इस मंदिर परिसर में भी एक कल्पवृक्ष है। पुराणों के अनुसार कल्पवृक्ष समुद्रमंथन से निकले 14 रत्नों में से एक है। ऐसा माना जाता है कि इस वृक्ष के नीचे बैठ कर व्यक्ति जो भी इच्छा करता है, वह पूरी हो जाती है। हालांकि पद्मपुराण के अनुसार तो पारिजात (नाइट जैस्मीन) ही कल्पतरु है, लेकिन बहुमत ओलिएसी कुल के ओलिया कस्पीडाटा के पक्ष में है। यह वृक्ष फ्रांस, इटली और दक्षिण अफ्रीका के अलावा ऑस्ट्रेलिया में भी पाया जाता है। भारत में यह झारखंड, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक के अलावा नर्मदा नदी के किनारे कई जगह पाया जाता है। हालांकि यहां इसकी संख्या अत्यंत सीमित है। इस पेड़ का तना मोटा और टहनियां लंबी होती हैं और पत्ते बहुत ही ख़ूबसूरत। इसकी औसत आयु रीब तीन हज़ार साल मानी जाती है। वैसे सबसे पुराने वृक्ष की आयु कार्बन डेटिंग के ज़रिये छह हज़ार साल आंकी जा चुकी है। इसकी ख़ूबी यह है कि यह बहुत ही कम पानी में फलता-फूलता है और इसके पत्तों से लेकर फल-फूल तक सभी हिस्से औषधीय दृष्टि से अत्यंत उपयोगी हैं। शायद यही कारण है कि इसे इच्छाएं पूरी करने वाला मानकर इसकी पूजा की जाती है। बाहर निकलने पर यहां कई जगह राजस्थानी पगडिय़ों के अलावा तलवार-ढाल आदि हथियार भी बिकते दिखे। दोपहर के दो बज चुके थे। अब भोजन अनिवार्य हो गया था। अत: हमने एक ढाबे पर राजस्थान के स्थानीय व्यंजन दाल-बाटी का स्वाद लिया और वापसी के लिए चल पड़े। चित्तौडग़ढ़ लौटकर हमने राणा सांगा  और अन्य बाज़ारों की घुमक्कड़ी भी की। अगर एक दिन का समय और होता तो निश्चित रूप से हम उदयपुर भी जा सकते थे, पर फ़िलहाल उसे अगले सर के लिए मुल्तवी कर स्टेशन की ओर बढ़ लिए। चित्तौड़ के गढ़ की भव्यता का दर्शन हमें वापस रेलवे स्टेशन आकर ही हुआ, जहां फुटओवर ब्रिज से क़िले की प्राचीरें दिखाई दे रही थीं। दूर-दूर तक फैली ये प्राचीरें ही बता रही थीं कि अपने समय में इसका वैभव क्या रहा होगा।


 चित्तौड़गढ़ की प्राचीर का एक विहंगम दृश्य रेलवे स्टेशन से 
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जान कर चलें
कैसे पहुंचें
निकटतम हवाई अड्डा उदयपुर है, जो यहां से 70 किलोमीटर दूर है। कई शहरों से प्रीमियर बस सेवाएं भी यहां के लिए चलती हैं। रेल की बात करें तो दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद, अजमेर, उदयपुर, जयपुर और कोटा से यहां के लिए सीधी टे्रनें हैं। 

कब जाएं
आम तौर पर तापमान यहां 24 से 35 डिग्री सेल्सियस के बीच होता है। मुफ़ीद समय सितंबर से मार्च के बीच होता है। अप्रैल से जून तक यहां तेज़ गर्मी होती है और जुलाई-अगस्त बारिश। इस मौसम में जाएं तो थोड़ा एहतियात बरतें।

कहां ठहरें
ठहरने के लिए यहां सभी तरह के होटलों और गेस्ट हाउस के अलावा सुविधाजनक धर्मशालाएं भी हैं।