Monday, 15 December 2014

जामाता दशमो ग्रह:

इष्ट देव सांकृत्यायन

सतयुग की बात है. एक महान देश में महालोकतंत्र था. उस महालोकतंत्र में एक महान लोकतांत्रिक संगठन था और ऐसा नहीं था कि संगठन का मुखिया हमेशा एक ही कुल के लोग रहे हों. कई बार रद्दोबदल भी हुई. थोड़े-थोड़े दिनों के लिए अन्य कुलों से भी मुखिया उधारित किए गए. यह अलग बात है कि वे बहुत दिन चल नहीं पाए, क्योंकि पार्टी के योग्य और सक्षम आस्थावानों ने कई प्रकार के गुप्तयोगदान कर मौका पाते ही उन्हें निकासद्वार दिखा दिया तथा महान लोकतांत्रिक परपंरा निभाते हुए पुन: मूलकुल से ही मुखिया चुन लिया. वैसे संगठन में उदात्त मूल्यों के निर्वहन का जीवंत प्रमाण यह भी है कि मुखिया अन्यकुल का होते हुए भी हाईकमान की हैसियत में हमेशा मूलकुल ही रहा.

संगठन में एकता और मूल्यों के प्रति समर्पण के भाव का अनुमान आप इस बात से कर सकते हैं कि इसके सभी सदस्य अपने उदात्त मूल्यों का निर्वाह अपने पादांगुष्ठ से लेकर मेरुदंड और ब्रह्मरंध्र तक के मूल्य पर किया करते थे. कुछ भी हो जाए, वे मूलकुल और उसके उदात्त मूल्यों की रक्षा में सदैव तत्पर रहते थे. महाराज दशरथ ने जिस एक वचन की रक्षा के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा दी थी,  इसके सदस्य अपने मूलकुल की प्रसन्नता के लिए वैसे कई वचनों की बाजी लगाने को कोई महत्व ही नहीं देते थे. जैसा कि गोस्वामी जी ने कहा है... जहाँ सुमति तहँ संपति नाना, ऐसे संगठन के प्रभाव और उसकी समृद्धि के तो कहने ही क्या! यह संगठन के भीतर उदात्त मूल्यों के निर्वाह का ही परिणाम था कि एक-दो बार देश की बागडोर उसके हाथ से अवश्य गई, पर जिन हाथों में गई वे भी कभी मूलकुल के चरणों से ऊपर नहीं बढ़े.

इसी क्रम में सिंहासन पर बड़ा परिवर्तन हुआ और फिर जिन हाथों में बागडोर गई, वे चरणों से थोड़ा आगे, यानी टखनों की ओर बढऩे लगे. ख़ैर, वे बढ़े ही थे कि स्वयं उनका अपना ही घुटना बदल गया और संगठन फिर सिंहासन का स्वामी हो गया. यद्यपि इस बार तप-त्याग का परिचय देते हुए वह सिंहासन पर स्वयं आरूढ़ न हुआ. उसने वहां अपना अत्यंत विश्वस्त प्रतिनिधि बैठाया और स्वयं केवल हाईकमान बनकर संतुष्ट रहा. जैसे ही उसने बागडोर संभाली चारों तरफ़ सुख-शांति की बाढ़ आ गई. खाद्य पदार्थों सहित सभी वस्तुएं इतनी सस्ती हो गईं कि लोगों ने ख़रीदनी ही छोड़ दीं. सरकारी कार्यालयों में सभी काम इतने शिष्टाचारपूर्वक होने लगे कि लोग ख़ुशी से पागल होने लगे. मंत्रियों से लेकर अफ़सरों और बाबुओं तक को इतनी बड़ी-बड़ी राशियां चढ़ाने लगे कि देश के बैंक छोटे पडऩे लगे.
मूलकुल के नेतृत्व में संगठन के बढ़ते प्रताप को देख स्वर्ग के सम्राट का सिंहासन भी असंतुलित होने लगा. लेकिन, आलस्य के शिकार स्वर्गसम्राट ने सोचा कि जनता इतनी तो समझदार है नहीं. हो सकता है, अगली बार इसे न चुने. आश्चर्य, ऐसा हुआ नहीं. जनता की समझदारी के साथ-साथ तकनीकी चमत्कारों ने भी कमाल किया और उसका सिक्का फिर से जम गया. तब तो स्वर्गसम्राट की निद्रा ही उड़ायमान हो गई.

उन्होंने तुरंत देवगुरु से संपर्क किया. देवगुरु ने एक श्लोक सुनाया -
सदा वक्र: सदा क्रूर: सदा पूजामपेक्षते.
कन्याराशिस्थितो नित्यं जामाता दशमो ग्रह:..

अर्थात्, हे वत्स प्रभु स्वयं तो सीधे कुछ करते नहीं हैं. उन्हें जो कुछ भी करना होता है, उसके लिए वे हमेशा ग्रहों को ही माध्यम बनाते हैं और उन्हीं के स्थानों में कुछ फ़ेरबदल कर अपना इच्छित कार्य करवाते हैं. मुश्किल यह है कि पहले से मान्य नौ ग्रह तो अब इस कुल के समक्ष आत्मसमर्पण कर चुके हैं. अतः तुम्हारा त्राण तो अब केवल दसवाँ ग्रह ही कर सकता है. वही क्रूर ग्रह, जो हमेशा वक्री रहता है और पूजा की अपेक्षा करता है. सदैव कन्या राशि में ही स्थित रहने वाले उस दसवें ग्रह को जामाता अर्थात् दामाद कहते हैं.


नोट : लेखक टाइममशीन पर यहीं तक देख पाया था. इसके बाद बिजली चली गई. थोड़ी प्रतीक्षा करें, पता चलने पर हाल बताया जाएगा.

Wednesday, 10 December 2014

ग़ायब होने का महत्व

इष्ट देव सांकृत्यायन

परिवेदना के पंजीकरण और निवारण की तमाम व्यवस्थाएं बन जाने के बाद भी भारतीय रेल ने अपने परंपरागत गौरव को बरकरार रखा है। देर की सही तो क्या, कैसी भी सूचना देना वह आज तक मुनासिब नहीं समझती। जानती है कि हमसे चलने वाले ज़्यादातर लोग नौकरीपेशा हैं और वह भी तीसरे दर्जे के। इनके पास उपभोक्ता फोरम जाने तो क्या, चिट्ठी लिखने की भी फ़ुर्सत नहीं होती। ऊपर से शिकायत निवारण के हमारे विभिन्न तंत्रों ने इनकी पिछली पीढ़ियों को इतने अनुभव दिए हैं कि समझदार आदमी तो अगर फ़ुर्सत हो, तो भी यथास्थिति झेलते हुए मर जाना पसंद करे, पर शिकायत के लिए कोई दरवाज़ा न खटखटाए। ख़ासकर रेल के संबंध में। वैसे भी, हमारे पास दुनिया देखने का जो इकलौता मुनासिब साधन है वह रेल है, इसलिए अनुभव भी जितने हैं, सब रेल के ही दिए हुए हैं। तो जीवन का यह जो अनुभव मैं आपसे साझा करने जा रहा हूं, यह भी रेल का ही दिया हुआ है और पूरे होशो-हवास में बता रहा हूं कि मेरा अपना और मौलिक है।

हुआ यह कि हम सफ़र में थे। सफ़र से एक और सफ़र पर निकलना था, लिहाज़ा ठहरने के लिए जो ठीया चुना वह रेलवे स्टेशन के निकट का था। पहली बार जब स्टेशन पहुंचे तो मालूम हुआ कि हमारी अगली ट्रेन 2 घंटे लेट है। तय किया कि अभी इसी कमरे में पड़े रहते हैं, क्योंकि हमारा चेक आउट टाइम तीन घंटे बाद का है। पर जब अगली बार निकले तो नए दिन का किराया शुरू हो जाने की पूरी संभावना थी, लिहाज़ा सब साजो-सामान लेकर निकले। स्टेशन पहुंचने पर मालूम हुआ कि अब ट्रेन तीन घंटे और लेट हो गई है। लेकिन, अब निकलते तो जाते कहाँ? लिहाज़ा वहीं वेटिंग रूम में डेरा डाल दिया। इस तीन घंटे बाद फिर मालूम हुआ कि अब ट्रेन छह घंटे और लेट हो गई है। अब तक तो जैसे-तैसे बच्चों को चिप्स-कुरकुरे-कोल्ड ड्रिंक के दम पर रोक रखा था, पर अब बच्चे मानने वाले नहीं थे। जैसा कि भारत में आम तौर पर होता है, बड़े अपने बड़प्पन के खोल में दुबके पड़े रहें तो पड़े रहें, पर बच्चों को दूसरे बच्चे मिलते ही सारी दीवारें कूद-फांदकर अपने बचपन के मैदान में निकलते देर नहीं लगती। वहाँ उन्हें ट्रेन के इंतज़ार में बोर होते दूसरे बच्चे मिले और वे चल पड़े हाइड एंड सीक खेलने।

ग़ौर किया तो पता चला, यह वही खेल है जिसे हम अपने बचपन में आइस-पाइस कहा करते थे। एक बच्चे ने अपनी आँखें बंद कीं और बाक़ी ग़ायब। अब बेचारा वो ढूंढे बाकी को। एक वह है जिसकी तलाश किसी को नहीं है, और उसे सबकी तलाश है। उस बच्चे की स्थिति वैसी ही हो जाती है, जैसी हमारे देश के ज्ञात इतिहास में ईमानदारी की चली आ रही है। यहाँ वही महत्वपूर्ण होते हैं जो ग़ायब हो जाते हैं। जो सामने रहते हुए क़तई महत्वपूर्ण नहीं होते, ग़ायब होते ही बेहद महत्वपूर्ण हो जाते हैं। इसीलिए कई लोग, जो महत्वपूर्ण होने के लिए पहले ग़ायब नहीं हो पाते, महत्वपूर्ण होने के बाद ग़ायब होना सीख लेते हैं। इस तरह के महत्वपूर्णों की पहली कटेगरी में संत-महात्मा आते हैं। वे महत्वपूर्ण ही इसलिए माने जाते हैं क्योंकि उन्हें सबके बीच से बैठे-बैठे ग़ायब हो जाना आता है। इसे वे अंतर्धान हो जाना बोलते हैं। महत्वपूर्णों की एक दूसरी कटेगरी भी है, जिसमें जनप्रतिनिधि, सरकारी अफसर और बाबू लोग आते हैं। ये पहले महत्वपूर्ण बनते हैं, फिर ग़ायब हो जाते हैं। बाद में ग़ायब होने का यह आशय बिलकुल न लगाएं कि इनकी महत्वपूर्णता का इनकी ग़ायबता से कोई संबंध नहीं है। संबंध है।

संबंध ऐसे है कि जब ये ग़ायब हो जाते हैं तो इनका महत्व और ज़्यादा बढ़ जाता है। हालांकि बढ़ता हुआ यह महत्व एक दिन चूक जाता है और तब इन्हें फिर से प्रकट होना पड़ता है। जब ये प्रकट होते हैं तो अपने साथ कई और महत्वपूर्ण रहस्य भी ले आते हैं प्रकट करने के लिए। हर बार इन रहस्यों की वृत्ति-प्रकृति सब अलग-अलग होती है और हर बार नए-नए रहस्यों का साक्षात्कार कर जनता दंग रह जाती है। इसके बाद वह फिर अपने विवेकानुसार कुछ को महत्वपूर्ण बनाती है और कुछ को नहीं बना पाती। जिन्हें वह दुबारा महत्वपूर्ण बना देती है, वे अपना महत्व और-और बढ़ाने के लिए फिर ग़ायब हो जाते हैं; जिन्हें नहीं बना पाती, वे ग़ायब भी नहीं होते। वे फिर अगले अवसर तक के लिए प्रकट रहते हैं। तब तक जब तक कि वे फिर से महत्वपूर्ण न बन जाएं। और महत्वपूर्ण बनते ही, आप तो जानते हैं, फिर से ग़ायब होना उनकी मजबूरी हो जाती है।

जैसा कि आप जानते ही हैं, आज़ादी के बाद हमारे देश में अगर सबसे ज़्यादा महत्व किसी का बढ़ा है तो वो हैं फाइलें। आदमी हो न हो, उसकी फाइल होनी चाहिए। हृदय परिवर्तन के पक्षधर हमारे लोकतंत्र ने मनुष्य में सुधार की संभावना को कितना ठीक से पहचाना है, इसका अंदाज़ा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि हमारे यहाँ अगर फाइल में कोई ग़लती हो जाए तो उसमें सुधार की कोई गुंजाइश नहीं हो सकती। फाइल के हिसाब से आदमी को सुधरना पड़ता है। क्योंकि फाइल तो कभी ग़लत होती ही नहीं। पिछले कुछ वर्षों में हमारे देश की फाइलों को भी अपनी इस महत्वपूर्णता का भान हो गया है और इसके साथ ही उन्हें ग़ायब होने से महत्व बढ़ने के संबंध का भी पता चल गया। ख़ैर, नतीजा वही हुआ जो होना था। अब अपना महत्व बढ़ाने के लिए फाइलों ने भी ग़ायब होना सीख लिया है। यह कला सीखते ही उन्होंने अपना महत्व बढ़ाना शुरू कर दिया है। पहले कुछ कोयला खदानों की फाइलों ने सोचा कि सचिवालय में हमारा क्या काम! और वे वहाँ से उठकर कोलियरी की ओर कहीं चली गईं। बहुत तलाशा लोगों ने, पर वे मिलीं नहीं। फिर कुछ खेल से संबंधित फाइलों ने महसूस किया कि सचिवालय में बैठे-बैठे उनका दम घुट रहा है। लिहाज़ा वे भी किसी मैदान की ओर कूच कर गईं। खिलाड़ी उन्हें तलाशने की कोशिश में जुटे हुए हैं, पर अभी तक उनका कुछ अता-पता चला नहीं। शायद तलाशने वाले हमारी तरह आइस-पाइस के खिलाड़ी हैं और फाइलें निशानेबाजी और कबड्डी वग़ैरह से संबंधित हैं। वे कबड्डी के मैदान की ओर रुख नहीं करेंगे और ये आइस-पाइस से मिलने वाली नहीं हैं। ख़ैर, हमें क्या? अभी पता चला है, कुछ चार्जशीट वाली फाइलें ग़ायब हो गई हैं। पता नहीं, वो चार्ज होने की हैं, या लेने की, या देने की या फिर करने की। बहरहाल जो भी हो, पर अब ग़ायब हो गई हैं तो महत्वपूर्ण मान ली जानी चाहिए।

मेरे एक मित्र बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों से देशप्रेम की भावना घट रही है। मेरे जैसा कमअक्ल आदमी इसका अर्थ यह लगाता है कि देश का महत्व घट रहा है। हे भगवान, कहीं अगर देश ने अपना महत्व बढ़ाने की ठान ली....?



Friday, 5 December 2014

चिंता से चतुराई घटे

इष्ट देव सांकृत्यायन

भारत हमेशा से एक चिंतनप्रधान देश रहा है। आज भी है। चिंतन की एक उदात्त परंपरा यहाँ सहस्राब्दियों से चली आ रही है। हमारी परंपरा में ऋषि-मुनि सबसे महान माने जाते रहे हैं, इसका सबसे महत्वपूर्ण कारण यही रहा है कि वे घर-बार सब छोड़ कर जंगल चले जाते रहे हैं और वहाँ किसी कोने-अँतरे में बैठकर केवल चिंतन करते रहे हैं। चिंतन से उनके समक्ष न केवल ‘इस’, बल्कि ‘उस’ लोक के भी सभी गूढ़तम रहस्य खुल जाते रहे हैं, जिसे वे समय-समय पर श्रद्धालुओं के समक्ष प्रकट करते रहे हैं। अकसर उनके चिंतन से बड़ी-बड़ी समस्याओं का समाधान भी निकल आता रहा है। कालांतर में चिंतन से एक और चीज़ प्रकट हुई, जिसे चिंता कहा गया। 

हालांकि यह चिंतन से अलग है, यह समझने में थोड़ा समय लगा। बाद में तो यहाँ तक पता चल गया कि यह चिंतन से बिलकुल अलग है, इतना कि चिंतन जितना फ़ायदेमंद है, चिंता उतनी ही नुकसानदेह। मतलब एक पूरब है तो दूसरी पश्चिम। इनमें एक पुल्लिंग और दूसरे के स्त्रीलिंग होने से इस भ्रम में भी न पड़ें कि ये एक-दूसरे के पूरक हैं। वास्तव में ऐसा कुछ भी नहीं है। ये कुछ-कुछ वैसा ही मामला है, जैसे किसी नामी कंपनी का प्रतिष्ठित उत्पाद कोई लोकल टाइप कारखाना मिलते-जुलते नाम से निकाल देता है। बुनियादी फ़र्क़ दोनों के बीच यह है कि एक विशिष्ट जनों द्वारा किया जाता रहा है, जबकि दूसरी सामान्य जन द्वारा। लेकिन, समय के साथ वर्ग-धर्म-जाति भेद मिटने और डुप्लीकेसी बढ़ने का नतीजा यह हुआ कि कई बार सामान्य जन भी चिंतन कर डालता है और विशिष्ट जन भी चिंता के जाल में फंस जाते हैं।

हाल में आई कौलीफेर्निया यूनिवर्सिटी की एक स्टडी के अनुसार विशिष्ट जन के चिंता के जाल में फंसने का सबसे पहला विवरण त्रेतायुग में पाया जाता है। भगवान राम के वनगमन के बाद महाराज दशरथ ग़लती से चिंता कर बैठे और उसका नतीजा अब आप जानते ही हैं। वास्तव में चिंता के साइड इफेक्ट का पता यहीं से चलना शुरू हुआ और इसके साथ ही इस पर शोध भी शुरू हुए। शोधों का निष्कर्ष यह निकला कि चिंता बहुत ही ख़तरनाक टाइप चीज़ है। इससे फ़ायदा कुछ नहीं है, जबकि नुकसान हज़ारों। और तो और, इससे कई तरह की बीमारियां भी हो सकती हैं। आयुर्विज्ञान विभाग वाले अनुसंधानकर्ताओं ने इससे हो सकने वाली बीमारियों की जो सूची दी, उसमें ब्लड प्रेशर और डायबिटीज़ से लेकर हार्ट अटैक तक का नाम शामिल था।

आनन-फानन जनकल्याण विशेषज्ञों और साहित्य के आचार्यों को बुलाया गया और इस विषय में जागरूकता फैलाने के लिए कोई प्रभावी उपाय निकालने को कहा गया। काफ़ी सोच-विचार के बाद उन्होंने एक स्लोगन निकाला और उसे हवा में तैरा दिया। वह स्लोगन है – चिंता से चतुराई घटे। वैसे इसे फैलाया तो हर ख़ासो-आम के लिए गया, पर जैसा कि आम तौर पर होता है, आम लोगों में इसे समझ कम ही पाए। अलबत्ता वे और ज़्यादा इसके फेर में फंस गए। जबकि ख़ास लोगों ने इसे ठीक से समझा और इसके फेर में फंसने से बचे। बाद में ग़ौर किया गया कि कुछ ख़ासजन भी इससे बच नहीं पाए। आम तो अकसर और कभी-कभी ख़ास जन भी किसी छोटी-मोटी ग़लती के कारण चिंता में फंसकर अपनी चतुराई घटाते रहे।

इसलिए ज़रूरी समझा गया कि इसके उपचार का कोई उपाय निकाला जाए। काफ़ी शोध-अनुसंधान के बाद मालूम हुआ कि दवा तो इसके मामले में कुछ ख़ास काम आती नहीं, हाँ एक उपाय ज़रूर है। उपाय यह है कि यह जैसे ही हो उसे जता दिया जाए। उस ज़माने में चूंकि कामकाज बहुत तेज़ गति से नहीं चलता था, इसलिए यह इतनी बात पता चलते-चलते बहुत देर लग गई। त्रेता से द्वापर युग आ गया। द्वापर में आपने देखा ही कि किस तरह चिंता ने पितामह भीष्म को आ घेरा। अच्छी बात यह रही कि उन्होंने लगातार आयुर्विज्ञानियों के निर्देशों का पालन किया और उन्हें जब-जब चिंता ने घेरा, वह उसे जता देते रहे।

उसके बाद तो हमारे देश में चिंता के फेर में पड़ते ही उसे जता देने का रिवाज़ सा चल पड़ा। हमारे नए दौर के विशिष्ट जन तो उसके फेर में पड़ने से पहले ही उसे जता देते हैं। आजादी के बाद से लेकर अब तक हम देखते आ रहे हैं कि विशिष्ट जन अकसर बहुत गंभीर मसलों पर सामान्य से लेकर गंभीर और कभी-कभी अति गंभीर टाइप की भी चिंता जताते रहते हैं। मामला चाहे बाढ़ का हो या अकाल का, महंगाई का हो या बेकारी का, दंगे का हो या आतंकवाद का, या फिर पड़ोसी देशों द्वारा हमारे देश में घुसपैठ का ही क्यों न हो... हमारे विशिष्टजन चिंता जताने में कोई कोताही नहीं बरतते। कई बार तो चिंता द्वारा घेरे जाने से पहले ही उसे जता देते हैं। हालांकि जनता टाइप लोगों को चिंता जताना पसंद नहीं आता। कई बार वे किसी विशिष्ट जन द्वारा चिंता जताए जाते ही चिढ़ जाते हैं। कहते हैं, ये तो पहले वाले भी कर रहे थे, फिर आपकी क्या ज़रूरत थी? असल में समझ ही नहीं पाते कि चिंता जताना अपने आपमें बहुत कुछ करना है। मेरी मानें तो आप भी इस पर अमल करें। यानी कोई चिंता आपको घेरे, इससे पहले ही उसे जता दें। क्योंकि चिंता से चतुराई घटे और आप जानते ही हैं, चतुराई घटने का आज के ज़माने में क्या नतीजा हो सकता है।


(यह व्यंग्य दैनिक जागरण में प्रकाशित हो चुका है.)