Thursday, 30 October 2014

आक्थू !!!

इष्ट देव सांकृत्यायन 

कहीं पान खाकर, तो कहीं गुटखा, कहीं तंबाकू खाकर और कहीं बिन कुछ खाए, ऐसे ही ... बेवजह... आक्थू! कहीं कूड़ा देखकर, तो कहीं गंदगी और कहीं बिन कुछ देखे ही, ऐसे ही मन कर गया..... लिहाज़ा .... आक्थू! चाहे रास्ता हो, या कूड़ेदान, स्कूल हो या तबेला, रेलवे या बस स्टेशन हो या फिर हवाई अड्डा, यहाँ तक कि चाहे बेडरूम हो या फिर तीर्थ ... जहां देखिए वहीं आक्थू! हमारे लिए थूकदान कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे कहीं से ढोकर लाना या फिर किसी प्रकार का श्रम करना ज़रूरी हो। हम थूकने की क्रिया में असीम श्रद्धा और विश्वास के कारण जहां चाहते हैं वहीं और जिस चीज़ को चाहते हैं उसे ही अपनी सुविधानुसार थूकदान बना लेते हैं।

शायद यही वजह है कि जिस तरह दूसरे देशों में हर मेज़ पर ऐश ट्रे यानी राखदान पाई जाती है, वैसे ही हमारे यहाँ कुछ सफ़ाईपसंद घरों में पीकदान या थूकदान पाया जाता है। यह अलग बात है कि वहाँ भी थूकदान का इस्तेमाल थूकदान की तरह कम ही होता है। यहाँ तक कि ख़ुद वे लोग भी, जो घर में सफ़ाई के मद्देनज़र थूकदान रखते हैं, बाहर निकलने पर सफ़ाई का ध्यान रखना ग़ैर ज़रूरी ही नहीं, लगभग बेवकूफ़ी जैसा कुछ समझते हैं। ख़ास तौर से ऐसी जगहों पर, जहाँ ‘यहाँ थूकना मना है’ या ‘कृपया यहाँ न थूकें’ जैसी चिप्पियाँ लगी होती हैं, न थूकना तो हम अपनी शान के ख़िलाफ़ समझते हैं। 

समझदार लोग श्रुति परंपरा को मानने वाले अपने देश में लिखे हुए की अहमियत को जानते हैं। इसीलिए वे अपनी संपत्ति में ऐसा कुछ लिखवाने के बजाय, जहाँ कहीं भी थूके जाने की आशंका होती है, वहाँ कुछ प्रतिमाएं या चित्र आदि रख देते हैं। हालाँकि आख़िरकार उनकी यह तरकीब भी काम नहीं आती, क्योंकि जैसे कुछ जंतु किसी साफ़-सुथरे स्थान पर शंका समाधान किए बग़ैर नहीं रह सकते, वैसे ही हम भारतीय थूके बग़ैर नहीं जी सकते। भले कचहरी का बाबू रिश्वत लिए बिना जी ले, बिजली परिषद का बाबू बिल में हेराफेरी किए बिना रह ले, स्कूल मैनेजमेंट जबरिया वसूली किए बिना चल ले, मीडिया वाले ख़बर मैनिपुलेट किए बिना जी लें और हम ख़ुद दो-चार दिन ऑक्सीजन लिए बिना जी लें; लेकिन भाई, ना, ये थूके बिना जीना हमारे लिए संभव नहीं है।

वैसे सरकारें यहाँ अकसर समझदारी भरे निर्णय लेती रहती हैं, लेकिन जाने क्या बात है कि केवल एक समझदारी वाला निर्णय लेने से वे अकसर चूक जा रही हैं। आज़ादी के बाद जाने ‘राष्ट्रीय’ के नाम पर ‘पशु-पक्षी’ से लेकर ‘पेड़-चिह्न’ तक क्या-क्या चीज़ें घोषित हुईं, पर हमारी राष्ट्रीय क्रिया का कहीं कोई ज़िक्र तक नहीं होता। हैरत है कि आज तक इस बारे में सोचा भी नहीं गया। ऐसा तब है, जबकि सोचने के मामले में दुनिया भर में हमारे देश का कोई सानी ही नहीं है। विश्व ही नहीं, ब्रह्मांड में सबसे महान सोचक-चिंतक-विचारक होने के कई ज्वलंत प्रमाण हम आदिकाल से ही प्रस्तुत करते आए हैं, जो कि आज तक अपने संपूर्ण प्रभाव के साथ अस्तित्वमान हैं। फिर भी अपनी राष्ट्रीय क्रिया के बारे में सोचने से हम चूक गए और इसका परिणाम यह हुआ कि दुनिया भर में हमारी प्रतिष्ठा एक निकम्मे राष्ट्र के रूप में हो गई।

बेहतर होगा कि हम इस विषय पर नए सिरे से विचार करें और थूकने को ही अपनी राष्ट्रीय क्रिया घोषित कर दें। यक़ीन मानें, यह जब मैं कह रहा हूँ तो बहुत सोच-समझ कर कह रहा हूँ और वाक़ई इससे देश को बड़े फ़ायदे होंगे। क्योंकि पहली तो बात यह कि इस क्रिया के लिए हमारे देश में जैसा मुफ़ीद माहौल है, वैसा दुनिया के शायद ही किसी और देश में हो; और दूसरी यह कि हमारे देश में ख़ास इस क्रिया के लिए जैसा मुफ़ीद माहौल है, वैसा शायद ही किसी और क्रिया के लिए हो। घर-परिवार और समाज से लेकर सरकार तक निरंतर इसके लिए अनुकूल वातावरण के निर्माण हेतु प्राणप्रण से जुटे रहते हैं। मैंने तो यहाँ तक सुना है कि विकसित देशों में जहाँ भारी संख्या में भारतीय रहते हैं, वहाँ उन्हें भारत जैसे अपनेपन का फील देने के लिए कुछ ऐसे ख़ास बाज़ार बनाए गए हैं, जहाँ दीवारों के कोनों पर पान की पीक के निशान पेंट किए गए हैं। हालांकि इस बनावटी पीक के बनावटी निशान में वह बात तो भला क्या आएगी, फिर भी अपनी मिट्टी की सोंधी ख़ुशबू जैसी थोड़ी-थोड़ी फील तो आने ही लगती है।
मुझे हैरत है कि अभी तक इस थूक या पीक पर जो भी बात हुई, वह सिर्फ़ इसके नुकसान पर हुई। लोग केवल इतना ही जानते हैं कि इससे गंदगी फैलती है, कीटाणु फैलते हैं और बीमारियाँ फैलती हैं। ठीक भाई, बिलकुल ठीक! लेकिन यह बताइए कि ऐसा कौन सा काम है जिससे गंदगी, या कीटाणु या बीमारियां न फैलती हों? अरे भाई, ये फैलने वाली चीज़ें हैं, फैलेंगी। आपके बस की बात अगर इन्हें रोकना हो तो रोक लीजिए। हमारे यहाँ तो ये तीनों चीज़ें खाने तक से फैलती हैं, तो क्या खाना छोड़ दें? हमारे यहाँ पार्टी होती है। ढेर सारा खाना बनता है और उससे भी ज़्यादा लोग अपने प्लेट में परोस लेते हैं। खा नहीं पाते तो बचे हुए खाने को फेंका जाता है। अब ख़ुद फेंकें वे भले डस्टबिन में, हालांकि इतनी ज़हमत भी कम ही लोग उठाते हैं, और अंत में डस्टबिन का पेट भी ख़ाली सड़क पर ही होता है। खाना बनाकर खुला छोड़ दिया जाता है, और तो और, कभी-कभी तो किचन के स्लैब पर ही रोटी बेल दी जाती है। कभी आपने सोचा है, इससे कितने कीटाणु फैलते हैं? अच्छा जाने दीजिए, डॉक्टर साहब से तो मिले ही होंगे। नमक से ब्लड प्रेशर, चीनी से डायबिटीज, चावल से मोटापा, दाल से प्रोटीन की अधिकता और उससे यूरिक एसिड, आलू से स्टार्च और फिर डायबिटीज़..... अरे यार, कोई ऐसी भी चीज़ है, जिससे कोई बीमारी न होती हो? तो बताओ, क्या बीमारियों के डर से हम खाना ही छोड़ दें? तो श्रीमान! बीमारियों के डर से अगर खाना नहीं छोड़ सकते तो थूकना क्यों छोड़ दें भला?   

सही पूछिए तो थूकना हमें छोड़ना चाहिए भी नहीं। यह अलग बात है कि आपको कभी बताए नहीं गए, लेकिन इसके फ़ायदे बहुत हैं। थूकने से गंदगी फैलती है, यह सिक्के का एक पहलू है। दूसरा पहलू यह है कि इससे गंदगी को फैलने से रोका भी जाता है। मुझे याद है, दो दशक पहले तक मेरे गाँव में लोग चोरी करने वालों पर थूकते थे। रिश्वत लेने, लड़की छेड़ने, दलाली करने, झूठ बोलने और यहाँ तक कि कोई वादा करके मुकर जाने वालों पर भी लोग थूकते थे। हालाँकि यह थूकना असल में नहीं, केवल सांकेतिक होता था। मने लोग बोल देते थे थू-थू और मान लिया जाता था कि थूक दिया गया। कोई भौतिक रूप से थूकता नहीं था। इतने के ही डर से बहुत सारे लोग ऐसे गंदे काम करने से बचते थे और बुराइयाँ फैलने से रुक जाती थीं। जैसे-जैसे लोगों ने इन पर थूकना कम किया इनके कीटाणु बहुत तेज़ी से फैलने लगे। और अब तो आप देख ही रहे हैं।

और तो और, हमारे देश की सेहत व्यवस्था को बनाए रखने में भी इस क्रिया का बड़ा महत्वपूर्ण योगदान है। ज़रा सोचिए, एक अनार सौ बीमार की कहावत ऐसे ही तो नहीं आई होगी! ज़ाहिर है, हमारे यहाँ अस्पताल व्यवस्था का आदिकाल से ही वही हाल है, जो आज दिखता है। इसीलिए बीमार पड़ने पर स्वस्थ होने के बजाय हम स्वर्ग के लिए सीढ़ी बना लेना बेहतर समझते थे। यह शायद अस्पतालों की कमी का ही नतीजा है कि पहले असाध्य बीमारियों से ग्रस्त सदस्य को लोग अपने घरों से निकाल देते थे। अब समय बहुत तरक़्क़ी कर गया है। योग्य बच्चे बुढ़ापे की ओर बढ़ते ही अपने माता-पिता को ओल्ड एज होम का रास्ता दिखा देते हैं। जहाँ शारीरिक रोगों का ही यह हाल हो, वहाँ मानसिक बीमारियों के लिए इलाज़ की सुविधा का अंदाज़ा आप आसानी से लगा सकते हैं। अब ज़रा सोचिए, जहाँ चिकित्सा की आधुनिक तकनीक का उपयोग जन्म लेने से पहले ही बेटियों को मार देने के लिए किया जाता हो, दहेज के लिए हाथों की मेंहदी छूटने से पहले ही बहू की चिता सजा दी जाती हो, प्रेम करने के अपराध में युवाओं को पेड़ पर लटका दिया जाता हो, भ्रष्ट अफ़सर को विधिनिर्माता बनाने का रास्ता दिया जाता हो और ईमानदार अफ़सर को एक बार हुए तबादले की जगह ज्वाइन करने से पहले ही दूसरी जगह और दूसरी जगह निकलने से पहले ही तीसरी जगह तबादले का ऑर्डर थमा दिया जाता हो, कुल पड़े वोटों का पंद्रह फ़ीसद पाकर सौ फ़ीसद जनता के प्रतिनिधित्व का दावा किया जाता हो और इस नाम पर कुछ भी अनाप-शनाप क़ानून बनाने की छूट ली जाती हो, बलात्कार करने वाले को नाबालिग मान लिया जाए, आतंकवादियों को देश का बेटा-बेटी बताया जाए, आतंकवादियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई में शहीद हुए अफ़सर की शहादत पर सवाल उठाए जाएं, अपनी जान पर खेलकर भी जो ईमानदार अफ़सर बच जाएं उन पर रिटायरमेंट के बाद अपराधियों की तरह मुकदमा चलाया जाए और सिपाही बने ग़रीब बेटों की धोखे से जान लेने को क्रांति माना जाए और अच्छे उद्देश्यों के साथ शुरू हुई किसी भी क्रांति को मैनिपुलेट करके हास्यास्पद बना दिया जाता हो ... ज़रा कल्पना करें, अगर वहाँ मानसिक चिकित्सालय भी सही हालात में न हों, तो आदमी मानसिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए करे क्या? ज़ाहिर है, उसके पास एक ही रास्ता बचता है। और वह है – आक्थू!!!



Thursday, 2 October 2014

अजंता: जहां पत्थरों में अध्यात्म है

-हरिशंकर राढ़ी

बस में अजंता की ओर  :  छाया - हरिशंकर राढ़ी 
एलोरा तो देख आए किंतु अजंता का आकर्षण  एलोरा से भी बड़ा था। कारण जो भी रहा हो, चाहे वह अजंता - एलोरा के युग्म में पहले आता है, इसलिए या फिर अब तक की पढ़ाई लिखाई और इंटरनेट से एकत्र की गई जानकारी के कारण। जलगांव में रात अच्छी गुजरी थी और नींद तो खूब आई ही थी। सुबह की चाय के बाद नाश्ता  और दो बार चाय लेने के बाद मन में उत्साह थोड़ा और बढ़ गया। लगभग दस बजे हम जलगांव से अजंता की गुफाओं के लिए कूच कर गए। बैग - सैग गाड़ी में ही जमा लिया क्योंकि वापसी हमें भुसावल से करनी थी। जलगांव से अजंता गुफाओं की दूरी 62 किलोमीटर है और भारतीय राजमार्ग की परंपरा के अनुसार तेज चलने पर भी लगभग डेढ़ घंटा लग ही जाता है। हम लोग तो वैसे भी तसल्ली से चलने रास्ते का आनंद लेने वाले पथिक हैं, सो डेढ़ घंटे से कुछ                                                                                             ज्यादा ही समय खर्च कर अजंता गुफाओं तक पहुंच                                                                                         गए।

विश्व धरोहर अजंता 

गुफा परिसर में प्रवेश के बाद  : छाया - हरिशंकर राढ़ी
अजंता को यूनेस्को द्वारा विश्व  विरासत घोषित किया है, सो इसका प्रभाव वहां के वातावरण पर पड़ना ही है। मजबूरी में ही सही, नियमों का पालन करना है, साफ-सफाई दिखानी ही है, सो यह सब अंतर साफ दिखा। अपनी अर्वाचीन भारतीय संस्कृति का जो जादू - रेहड़ी, खोमचा, भुट्टा वगैरह का अतिक्रमणीय दृष्य अपने पर्यटन स्थलों पर देखने को अनिवार्य रूप से देखने को मिल जाता है, वह यहां नहीं था। उसका परिणाम यह होता है कि एक आम भारतीय दर्शक को लगता है कि किसी महत्त्वहीन जगह पर आ गया है। परंतु हम कर भी क्या सकते हैं, भारतीय नियमों को मानें या न मानें, अंतर्राष्ट्रीय  नियमों को तो मानना ही पड़ेगा। और फिर जिसे यूनेस्को ने गोद ले रखा हो, उसे हम आंखें तरेर भी कैसे सकते हैं ?
दीवारों पर गज़ब के  मिथुन :  छाया - हरिशंकर राढ़ी

चलिए, एक सुखद एहसास हुआ कि हम हल्ला-गुल्ला और शोर -शराबे  से बच गए।  जिस पर्वतीय हिस्से में अजंता की गुफाएं स्थित हैं, उसके पद तक ही सामान्य वाहनों को जाने की अनुमति है। गाडि़यों वहीं पार्क करने की सुविधा है। वहां से आगे पुरातत्व विभाग की देख-रेख में प्रदूषण  रहित मिनी बसें  प्रशासन  की ओर से चलाई जाती हैं और हर पर्यटक को उन्हीं बसों में बैठकर गुफा तक जाना होता है। हाँ, ये बसें निश्शुल्क  नहीं हैं परंतु किराया तार्किक है। ऐसी ही एक बस में हम तेरह जने सवार हुए और सर्पाकार मार्ग का आनंद लेते हुए गुफा के प्रवेशद्वार  तक पहुंच लिए। यहां  टिकट लेकर हम भी निर्देशित  दिशा  में गुफा की ओर चल पड़े।

अभी अप्रैल  की शुरुआत ही थी और लगभग ग्यारह बजे होंगे किंतु धूप उस सूखी पहाड़ी में खलनायिका की तरह हमें तंग कर रही थी। वैसे भी यह प्रदेश  कर्क रेखा क्षेत्र में पड़ता है और सूर्य उत्तरायण की स्थिति में कर्क से संक्रांति करने वाला था। (अजंता  की भौगोलिक स्थिति 20°31अक्षांश  उत्तर है जो कर्क रेखा - 230 उत्तर से बहुत निकट है) इस बात को मैं समझ रहा था किंतु समझने से धूप कम नहीं हो जाती। ऊपर से अंदर किसी भी प्रकार के खान-पान की व्यवस्था नहीं क्योंकि विश्व  धरोहर के क्षतिग्रस्त होने का खतरा। सो, हम अपने साथ ले मौजूद पानी की एक बोतल पर निर्भर थे। गर्मी के कारण आस-पास के पेड़-पौधे और झाडि़यां सूख रही थीं। लेकिन मन में खुशी  थी कि आज हम उस स्थान तक आ ही गए जो विश्व  विरासत घोषित  हो चुका है। आखिर क्या रहा होगा उन लोगों के मन में जिन्होंने इस प्रकार के गैर व्यावसायिक कार्य में इतना पैसा लगाया ? यह प्रश्न  मेरी मानसिकता की उपज नहीं था अपितु उस विचारधारा के विरुद्ध था जिसमें समाज का एक वर्ग केवल आर्थिक प्रगति को ही मानव का विकास मानता है; केवल उसे ही सार्थक कार्य मानता है जिससे उसकी मूल आवश्यकताओं के अतिरिक्त भोग - विलास की सामग्री पैदा हो सके। उसकी नजर में कला, साहित्य और शिल्प  सिवाय चोंचलेबाजी के कुछ नहीं है। इस बात से असहमत नहीं हुआ जा सकता है कि मानवता यह है कि हर मनुष्य  की मूल आवश्यकताओं की पूर्ति होनी ही चाहिए और हमारा प्रथम प्रयास भी इस दिशा  में होना चाहिए। किंतु केवल मूल आवश्यकताओं की पूर्ति में इतना व्यस्त हो जाए कि वह अपनी मानसिक भूख की चिंता ही न करे और अपनी सभ्यता के आयाम ही छोड़ दे, यह भी न्याय नहीं होगा। मुझे याद आया कि औद्योगीकरण के युग में योरोप में एक समय ऐसा आया था जब कविता और साहित्य की प्रासंगिकता पर आक्षेप लगने शुरू  हो गए थे। तब साहित्य की प्रतिरक्षा में फिलिप सिडनी ने ‘एन अपोलोजी फाॅर पोएजी’ लिखकर निहायत भौतिकवादियों को जवाब दिया था। आज फिलिप सिडनी का वह लेख मील के पत्थर के रूप में याद किया जाता है।
विहंगम दृश्य :  छाया - हरिशंकर राढ़ी

गुफाओं की खोज

ये गुफा  महल ! : छाया - हरिशंकर राढ़ी
यद्यपि आज यह स्वीकार किया जा चुका है कि गुफाओं का निर्माण 200 ई0पू0 शुरू  हुआ था और अनेक कालों से गुजरता हुआ यह छठी शताव्दी तक पूरा हुआ था, किंतु इसकी खोज 1819 में संयोगवश  हो गई थी। मद्रास प्रेसीडेंसी  का अफसर जाॅन स्मिथ यहां शेर  के शि कार की तलाश  में अचानक ही पहुंच गया था। जब वह गुफा नंबर 10 के सामने पहुंचा तो स्थानीय लोग गुफा का प्रयोग प्रार्थना स्थल के रूप में कर रहे थे और वहां आग जल रही थी। दरअसल ये गुफाएं पर्वत के अंदरूनी हिस्से में बनी हुई हैं। चारो तरफ ऊंची पहाडि़यां, पेड़-पौधे और घनी झाडि़यां थीं जिनके अंदर यह कहीं एक रहस्य की भांति समा गई थी। जाॅन स्मिथ गुफाओं को देखकर हैरान हो गया और उसके लौटने के बाद ब्रिटिश  सरकार ने सुध लेना शुरू   किया और अजंता की गुफाएं आज विश्व धरोहर  में शीर्षस्थ  रूप से स्थापित हो चुकी हैं।



                                                                                    गुफाओं का स्थापत्य और सौंदर्य


देवताओं की मूर्तियां :     छाया - हरिशंकर राढ़ी
एलोरा की गुफाओं की भांति अजंता की गुफाओं को क्रमांकित किया गया है। गुफाओं की कुल संख्या 29 है और जैसे -जैसे आगे बढ़ते हैं, गुफाओं का सौंदर्य बढ़ता सा प्रतीत होता है। इन गुफाओं को संभवतः कालक्रम के अनुसार निर्मित किया गया और उसी के अनुसार इन्हें बांटा भी जाता है। ऐसा माना जाता है कि गुफा क्रमांक  9, 10, 12, 13  एवं 15 ई0पू0 100 से लेकर 100 ई0 सन् के बीच बनाई गई थीं।  इस समय सत्त्वाहन वंश   का राज्य था और वे कला के बड़े  समर्थक थे। इन गुफाओं में क्रमांक 9,10ए19ए26 तथा 29 चैत्यगृह और शेष  विहार हैं। इतिहासकारों द्वारा निर्माणकाल एवं शैली  के आधार पर गुफाओं को मुख्यतः दो भागों में बांटा गया है। कुल छह गुफाओं को उत्खनन बौद्धकाल के हीनयान युग में हुआ। गुफा संख्या 8,10,12, 15 अ, ईसा पूर्व की हैं।

गुफाओं के निर्माण का दूसरा काल ईसा की पांचवीं -छठी शती हैं। इनके उत्कीर्णन का प्रयोजन संभवतः वाकटकों के प्रति सामंतों की निष्ठां  का  प्रदर्शन  था। इसका समर्थन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा अजंता गुफाओं  के परिसर में  लगाया गया शिलालेख भी है। वाकाटक नरेश  हरिषेण  के मंत्री वराहदेव ने गुफा संख्या 16 का निर्माण कराकर बौद्धसंघ को समर्पित किया। चीनी घुमक्कड़ ह्वेनसांग ने भी गुफाओं का जिक्र किया है जबकि वह यहां नहीं आया था। इस गुफा के संबंध में भारतीय पुरातत्व कहता है कि गुफा संख्या 16 महायान संप्रदाय से संबंधित है। यह एक उत्कृष्ट  कृति है जिसमें भगवान बुद्ध के जीवन की घटना का चित्रण है। इसके प्रदक्षिणापथ चंवरधारी बोधिसत्त्व एवं मालाधारी गंधर्व आकृतियों से घिरे सिंहासनस्थ बुद्ध का चित्रण है। मरणासन्न राजकुमारी, असित की भविष्यवाणीं , नंद का मनपरिवर्तन, माया का स्वप्न, श्रावस्ती का चमत्कार एवं सुजाता का खीर प्रदान करना प्रमुख चित्र हैं।
यह भी एक गुफा है !   :छाया - हरिशंकर राढ़ी

भित्तिचित्र:  

अजंता गुफाओं में जहाँ  विशाल पहाड़ को काटकर अथक श्रम एवं अजेय धैर्य से सुंदर उत्कीर्णन किया गया है, वहीं भित्तिचित्रों को विशेष  स्थान दिया जाना चाहिए। विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में पिछड़ा युग  कहलाने वाले उस युग में जिस प्रकार चित्रकारी करके उसे संरक्षित किया, वह किसी भी संवेदनशील  मनुष्य  को दाँतों तले उँगली दबाने पर मजबूर कर देगा। इसमें संदेह नहीं कि समय के साथ इनका बहुत क्षरण हुआ है, फिर भी विशेषज्ञों  की सहायता से इन भित्तिचित्रों को संरक्षित करने का सराहनीय प्रयास किया गया है। इनके स्वास्थ्य को देखते हुए भित्तिचित्रों वाली गुफाओं में फोटोग्राफी निषिद्ध  है। हाँ, फ़्लैश  चमकाए बिना फोटोग्राफी करते हुए लोग देखे जा सकते हैं, किंतु नीम उजाले में लिए गए फोटो बेकार से ही नजर आते हैं।
छाया - हरिशंकर राढ़ी

सभी भित्तिचित्र बौद्धकथाओं  को ही आधार बनाकर चित्रित किए गए हैं। स्पष्ट  है कि उस समय बौद्ध धर्म के प्रति लोगों के मन में विशेष  रुझान रहा होगा। तमाम राजाओं ने रुचि एवं उदारतापूर्वक इन गुफाओं के निर्माण में अकूत धन खर्च किया होगा। अजंता गुफाओं के बड़े -बड़े हाॅलों को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि कितनी चोटों से ये आग्नेय शैलें  कटी होंगी और छेनी हथौड़ी की हर चोट पर कितना धन खर्च हुआ होगा। ईश्वर  को इसलिए भी धन्यवाद देना चाहिए कि ये गुफाएँ धर्मांधता की भेंट नहीं चढ़ीं, हालांकि उसके पीछे इनकी दुर्गमता और अज्ञात होना अधिक महत्त्वपूर्ण कारक है।

वाल्टर एम स्पिंक का शोध :  

मिशिगन  विश्वविद्यालय में  एशियाई कला एवं इतिहास (Asian Art and  History ) के प्रोफेसर वाल्टर एम स्पिंक ने अजंता पर गहन एवं आधिकारिक शोध  किया और आज हम उन्हीं के शोध  के बल पर अजंता गुफाओं के बारे में कुछ कह पाते हैं। हार्वर्ड जैसे प्रतिष्ठित  विश्व विद्यालय के इस विद्वान ने भारत सरकार के अनुरोध पर अजंता, एलोरा और एलीफैंटा गुफाओं पर गहन शोध  किया। सन् 2010 तक इनकी पुस्तक अजंता: हिस्ट्री एंड डिवैलपमेंट (Ajanta : History and Development ) के पांच खंड आ चुके हैं। स्पिंक ने उत्कीर्णन एवं कला की शैली  जैसे साक्ष्यों के आधार पर संक्षिप्त विधि से पूरी जानकार दी है और अजंता के निर्माण को तिथिवार विभाजित किया है।
घोड़े की नाल का नज़री नक्शा :   छाया - हरिशंकर राढ़ी  

दूर से देखने पर गुफाएँ घोड़े की नाल के आकार की नजर आती हैं। अंततः हम भी इन्हें देखते - समझते दूसरे सिरे पर जा पहुँचे और थककर बैठ गए। अन्य पर्यटकों को देखने समझने का भी एक अलग मजा होता है। सबके अपने दृष्टिकोण  होते हैं और अपने मूल्यांकन। कुछ देर विश्राम करके हमने वापसी का मन बनाया। 
पहाड़ी को काट कर बना स्तम्भ  :   छाया - हरिशंकर राढ़ी

मोलभाव वाला भोजनालय:

 गुफाओं से बाहर निकले तो भूख का तीव्र एहसास हुआ। प्रवेशद्वार से अंदर पहुंच जाने के बाद तो खाने की कोई सामग्री मिलती नहीं, अतः लौटते-लौटते भूख भयंकर होने लग जाती है। प्रवेशद्वार  के पास ही एक रेस्टोरेंट था, सो हम भी उधर ही खिंचे चले गए। दोपहर हो गई थी, अतः भोजन कर लेने में ही भलाई थी। परंतु, रेस्टोरेंट में प्रवेश करने पर एक विचित्र स्थिति का सामना करना पड़ा, जैसा कभी किया ही नहीं था। वहाँ कोई स्थिर मूल्यसूची हमें देखने को नहीं मिली। पर्यटन का अनुभव हमें यही बताता है कि ऐसी जगहों पर रेट मालूम करके ही खाना पीना चाहिए, क्योंकि खाना कोई ऐसी चीज नहीं है जिसका भाव पसंद न आने पर आप वापस कर सकें । फिर या तो गला दबाकर भुगतान करिए या फिर लड़ाई। यहाँ रेस्टोरेंट का माहौल न जाने क्यों संतोषजनक सा नहीं लग रहा था। सो हमने आॅर्डर देने से पहले रेट मालूम किया। उसने प्रति थाली 150 रुपये बताया। अन्य ग्राहक भी भोजन कर रहे थे और थाली की शक्ल  देखकर वह भोजन आधी से कम कीमत का लग रहा था। सो हमने वहां से निकल जाने में भलाई समझी। कुल मिलाकर हम तेरह जने थे, सो मालिक ने अपने एक कारिंदे को हमारे पीछे लगाया।  फुटपाथी दलाल की तरह उसने अपनी उसी थाली का रेट घटाना शुरू  किया और लगभग सौ मीटर तक पीछा करते-करते 40 रुपये तक आ गया। भोजन के मामले में ऐसी बार्गेनिंग हमने आज तक नहीं देखी थी। इस पर मुझे बहुत चिढ़ आती है और वहां भी आ रही थी। इष्टदेव जी भी गुस्से वाले मोड में आ गए थे। अंततः उसे डांटते हुए यह कहकर वापस भेजा गया कि तुम मुफ्त  में खिलाओ तो भी हम तुम्हारे यहां नहीं खाने वाले!
और भूख को जज़्ब करके हम प्रदूषणरहित बस में बैठे। पार्किंग में अपनी गाड़ी पकड़ी और भोजन रास्ते में करने का निश्चय करके (और हमने रास्ते में ठीक से भोजन किया) भुसावल जंक्शन के लिए रवाना हो गए। वहाँ से अपनी ट्रेन जो थी दिल्ली के लिए !
अंतिम गुफा के पास बैठे बच्चे   :   छाया - हरिशंकर राढ़ी

उपयोगी जानकारियाँ:

अजंता किसी भी ट्रेन  रूट पर सीधे नहीं पड़ता। दिल्ली मुंबई रूट (वाया भुसावल) पर जलगाँव या भुसावल उतरकर रोडवेज बस या टैक्सी से अजंता गुफाओं तक पहुंचा जा सकता है। टैक्सी कर लेना बेहतर होता है। जलगाँव स्टेशन  से अजंता की दूरी 52 किलोमीटर और भुसावल जंक्शन  से 62 किमी है। औरंगाबाद  से यह दूरी 100 किमी है। पूरे महाराष्ट्र  में बस सेवा अच्छी है।

कब जाएँ: 

 अजंता की भौगोलिक स्थिति कर्क रेखा के आस-पास है अतः यहां
गर्मी ज्यादा पड़ती है। सर्वाधिक उपयुक्त मौसम अक्टूबर से मार्च तक का होता है।
दर्शन  समय: साप्ताहिक दिनों में प्रतिदिन प्रातः 9 बजे से सायं 5 बजे तक, सोमवार बंद।
प्रवेश  शुल्क : भारतीय और दक्षिण एषियाई (सार्क देषों के ) नागरिकों के लिए - 10ध्. प्रति व्यक्ति, विदेशी  - 5 अमेरिकी डाॅलर या 250 भारतीय रुपये। 15 वर्ष तक के बच्चे निःशुल्क।
बुद्ध की लेटी  हुई प्रतिमा :    छाया - हरिशंकर राढ़ी