Sunday, 20 July 2014

श्रीशैलम : बांध लेता है यह छंद मुक्त-2

इष्ट देव सांकृत्यायन 


यहां देखें :  इस लेख का पहला भाग

मंदिर से बाहर निकले तो धूप बहुत चटख हो चुकी थी। जनवरी के महीने में भी हाफ शर्ट पहन कर चलना मुश्किल हो रहा था। फुल मस्ती के मूड में बच्चे न जाने किसे शो ऑफ करने में लगे थे। उधर साथ की देवियां ख़रीदारी के मूड में थीं और मंदिर के चारों तरफ़ फैले बाज़ार की एक-एक दुकान पर सामान देखने व मोलभाव का मौक़ा हाथ से निकलने नहीं देना चाहती थीं। भला हो बच्चों का, जिन्हें एक तो डैम देखने की जल्दी थी और दूसरे भूख भी लगी थी। इसलिए बाज़ार हमने एक घंटे में पार कर लिया। बाहर गेस्ट हाउस के पास ही आकर एक होटल में दक्षिण भारतीय भोजन किया।
श्रीशैलम की मनोरम पहाड़ियां 

बच्चे डैम देखने के लिए इतने उतावले थे कि भोजन के लिए अल्पविश्राम की अर्जी भी नामंजूर हो गई और हमें तुरंत टैक्सी करके श्रीशैलम बांध देखने के लिए निकलना पड़ा। श्रीशैलम में एक अच्छी बात यह भी थी कि यहां तिरुपति की तरह भाषा की समस्या नहीं थी। वैसे यहां मुख्य भाषा तेलुगु ही है, लेकिन हिंदीभाषियों के लिए कोई असुविधा जैसी स्थिति नहीं है। हिंदी फिल्मों के गाने यहां ख़ूब चलते हैं। जिस टैक्सी में हम बैठे उसमें 'बजावें हाय पांडे जी सीटी पहले से ही जारी था। मैंने ड्राइवर से पूछा, 'इसका मतलब समझते हो?

'मतलब? हां, मतलब टीक से समझता हाय’ उसने दोनों तरफ़ सिर हिलाते हुए कहा, यहां टूरिस्ट लोग ख़ूब आता रहता है न, तो हम लोग हिंदी अच्चे से जानता है।’  आगे तो उसने पूरा वृत्तांत बताना शुरू कर दिया। यहां कब-कब किस-किस फिल्म की शूटिंग हुई, विशेषकर श्रीशैलम मंदिर के माहात्म्य को ही लेकर कौन-कौन सी फिल्में बनीं। कौन-कौन से मशहूर लोग यहां अकसर मल्लिकार्जुन स्वामी के दर्शन के लिए आते हैं... आदि-आदि। क़स्बे से डैम तक पहुंचने में केवल आधे घंटे का समय लगा, वह भी तब जबकि रास्ते में हमने साक्षी गणपति का भी दर्शन कर लिया। ऐसी मान्यता है कि मल्लिकार्जुन स्वामी के दर्शन-पूजन के लिए जो लोग आते हैं, उनका हिसाब-किताब गणपति ही रखते हैं और यही उनका साक्ष्य देते हैं। इसीलिए इनका नाम साक्षी गणपति है।
जल विद्युत परियोजना

बंद डैम का आनंद
डैम पहुंच कर बच्चे अभिभूत थे। हालांकि इस समय यहां पानी कुछ ख़ास नहीं आ रहा था और पानी के अभाव में न तो कोई टर्बाइन चल रही थी, न कोई और ही गतिविधि जारी थी। लेकिन, चारों तरफ़ पहाड़ों से घिरी नदी की गहरी घाटी, उस पर बनी विशाल बांध परियोजना और दूर-दूर तक ख़तरनाक मोड़ों वाली बलखाती सड़क... बच्चों के लिए यह सौंदर्य ही काफ़ी था। वहां हमारे जैसे और भी कई पर्यटक मौजूद थे और सबके नैसर्गिक मनोरंजन के लिए बंदरों के झुंड भी। व्यू प्वाइंट पर ही कुछ स्थानीय लोग मूंगफली बेच रहे थे और चाय की भी एक दुकान थी। चारों तरफ़ पहाड़, सामने नदी, पेड़ों की छाया और आसपास उछलते-कूदते बंदरों के झुंड, कहीं गिलहरियां और कहीं तरह-तरह के पक्षियों की चहचहाहट, बीच-बीच में आ जाती गाय... कुल मिलाकर यह माहौल अत्यंत मनोहारी हो गया था। बच्चे अपनी प्रकृति के अनुकूल एक साथ बहुत कुछ जान लेना चाहते थे। मसलन यह कि यह पानी बिजली कैसे बना देता है, यह पहाड़ कितनी दूर तक फैला है और यहां कोई बंदर से डरता क्यों नहीं है? अरे, हां वाक़ई। हम तो वहां से आए थे जहां लोग मंगल को बंदर को भोग भी खिलाते हैं और बाक़ी दिन उसे देखकर उनकी जान भी निकल जाती है। यहां लोग अपने हाथों में मूंगफली दिखा रहे थे और बंदर उसे निकाल-निकाल कर खा रहे थे। बच्चों ने ऐसा करना चाहा, पर उनकी हिम्मत नहीं पड़ी। यहां तक कि हमारे ख़ुद करके दिखाने पर भी। यह शायद वन्य जीवों के स्वभाव से उनके अपरिचय का प्रभाव था।
डैम पर खाद्य सामग्री की ताक में लगे बंदर 

डैम पर हालांकि इस समय उत्पादन बंद था, लेकिन इसकी भव्यता से इसकी महत्ता को समझा जा सकता था। नल्लामलाई (श्रेष्ठ पर्वतशृंखला) पर्वतशृंखला में कृष्णा नदी पर बना यह डैम देश का तीसरा सबसे बड़ा जलविद्युत उत्पादन केंद्र है। समुद्रतल से 300 मीटर ऊंचाई पर बने इस बांध की लंबाई 512 मीटर और ऊंचाई करीब 270 मीटर है। इसमें 12 रेडियल के्रस्ट गेट्स लगे हैं और इसका रिज़र्वायर 800 वर्ग किलोमीटर का है। इसके बाएं किनारे पर मौजूद पावर स्टेशन में 150 मेगावाट के छह रिवर्सिबल फ्रांसिस पंप टर्बाइंस लगे हुए हैं और दाहिने किनारे पर 110 मेगावाट के सात फ्रांसिस टर्बाइन जेनरेटर्स हैं। इसकी उत्पादन क्षमता 1670 मेगावाट बताई जाती है। इसके अलावा यह कुर्नूल और कडप्पा जिले के किसानों को सिंचाई के लिए पानी भी उपलब्ध कराता है। यह तब है जबकि इसमें बाढ़ के दौरान आने वाला बहुत सारा पानी इस्तेमाल किए बग़ैर छोड़ दिया जाता है। वजह यह है कि अगर बाढ़ के समय इसे रोकने की कोशिश करें तो आफत आ जाए। इसके अलावा पहाड़ों का
मेरे अनुज अभीष्ट, राढ़ी जी और मैं 
बेतहाशा खनन और पेड़ों की अंधाधुंध कटाई
, जिसमें से अधिकतम काम अवैध तरीक़े से माफियाओं के संरक्षण में हो रहा है, के चलते इसके रिज़र्वायर में शिल्ट भरती जा रही है। जिसे अभी तो ऑफ सीज़न में साफ़ कर लिया जाता है, लेकिन बाद में यह भी नहीं हो सकेगा और यह बेहद ख़तरनाक स्थिति होगी। अगर यहां उपलब्ध जलस्रोत का पूरा इस्तेमाल किया जा सके तो दक्षिण में पेयजल, सिंचाई और बिजली कोई समस्या ही न रहे। सब जानकर लगा कि अपने देश में कहीं भी चले जाएं, वस्तुस्थिति जानने के बाद दुखी होने के अलावा कोई चारा नहीं बचता। यह सब जानते-देखते शाम के पांच बज गए थे और अब लौटना ज़रूरी था। लिहाज़ा हम वापस श्रीशैलम लौट चले।

जागता है शहर
मल्लिकार्जुन मंदिर का रात्रिकालीन दृश्य 
थोड़ी देर विश्राम के बाद शाम सात बजे फिर निकल पड़े, नगर दर्शन के लिए। थोड़ी देर मंदिर के मुख्यद्वार के सामने बैठे रहे। गोपुरम वहां से साफ़ दिखाई दे रहा था और उसकी रात्रिकालीन सज्जा भी अद्भुत थी। झिलमिलाती लाइटों से सजे गोपुरम की छटा देखते ही बनती थी। पूरे दिन गर्मी झेलने के बाद अब शाम की ठंडी-ठंडी हवा हमें बेहद सुकून दे रही थी। थोड़ी देर बैठने के बाद हम नगर दर्शन के लिए निकल पड़े। छोटे क़स्बे के लिहाज़ से देखें तो बाज़ार बड़ा है, लेकिन अन्य धार्मिक स्थलों की तरह यहां भी पूरा बाज़ार केवल पूजा सामग्रियों से ही अटा पड़ा है। दुकानों पर मोमेंटोज़ ख़ूब मिलते हैं, लेकिन इनका मूल्य काफ़ी अधिक है। ख़रीदने लायक चीज़ों में यहां जंगल का असली शहद और काजू की गजक है। शहद के बारे में एक स्थानीय व्यक्ति ने पहले ही बता दिया था कि इसमें धोखाधड़ी बहुत है। बताया जाता है कि यह जंगल से वनवासियों का निकाला हुआ शुद्ध शहद है, लेकिन होता मिलावटी है। अगर आपको असली शहद लेना हो तो उसे म्यूजि़यम (चेंचू लक्ष्मी ट्राइबल म्यूजि़यम) से ही लें। गजक भी 400 रुपये किलो था। घूमने से इतना तो मालूम चला कि यह देर रात तक जागने वाला शहर है।

राजा का सम्मान
रात का भोजन हमने फिर एक रेस्टोरेंट में लिया और इसके बाद सो गए। अगली सुबह हमारा इरादा नागार्जुनसागर टाइगर रिज़र्व घूमने का था। हम सब आठ बजे तैयार हो गए। टाइगर प्रोजेक्ट जाने का उपाय पता किया तो मालूम हुआ कि यहां से सुन्नीपेंटा तक आपको कोई टैक्सी लेनी पड़ेगी। टैक्सी लेकर हम सुन्नीपेंटा पहुंचे। पहुंचने पर मालूम हुआ कि यह तो उसी रास्ते पर है, जिससे हम पिछले दिन डैम देखने आए थे। वहां प्रवेश शुल्क तो केवल 10 रुपये है, लेकिन अपने वाहन से आप जंगल के अंदर नहीं जा सकते। जंगल के भीतर सैर-सपाटे के लिए जीप सफारी लेनी थी, जो हमें उस दिन 10 बजे के बाद ही उपलब्ध होती। इसका शुल्क 800 रुपये है। थोड़ी देर इंतज़ार के बाद हमें सफारी उपलब्ध हो गई और हम चल पड़े। जंगल के भीतर थोड़ी दूर ही अच्छी सड़क है। इसके बाद कच्चा रास्ता और वह भी थोड़े दिन पहले बारिश होने के नाते कई जगह कीचड़ से भरा हुआ था। इस रास्ते पर चलना सधे हुए ड्राइवरों के ही बस की बात है।
जंगल में सेही 

बीच-बीच में पहाड़ों और तरह-तरह की झाडिय़ों से भरा यह जंगल कहीं-कहीं इतना घना है कि दोपहर में ही घुप्प अंधेरा जैसा लगता है। ऐसी जगह आने से पहले ही ड्राइवर-सह-गाइड महोदय हमें आश्वस्त कर देते थे, 'डरने का तो कोई बात नहीं। जानवर लोग कोई हमला नहीं करता, बस ये रहे कि आप लोग  चीखना मत। जानवर ऐसे ई घूमता, कुछ नहीं बोलता। हम भी आश्वस्त थे। जानवर अगर बोलेगा तो क्या बोलेगा? बहुत होगा तो एंट्री पास मांगेगा, तो वो दिखा देंगे। बाक़ी भाषा तो न हमारी वह समझेगा और न उसकी हम। खुले में घूमते और अपने-आप में मस्त जानवरों को देख-देख कर बच्चे मन ही मन ख़ुश हो रहे थे। चूंकि उन्हें पहले ही समझा दिया गया था कि यहां हल्ला मचाना जीवन के लिए ख़तरनाक हो सकता है, इसलिए वे अपनी प्रसन्नता स्वाभाविक रूप से प्रकट नहीं कर पा रहे थे। इशारों-इशारों में एक-दूसरे से काफ़ी बातचीत कर ले रहे थे। अगर कभी कोई ज़ोर से बोल देता तो होंठों पर उंगली रख उसे समझाना पड़ता। ऐसी नौबत अकसर तब आती जब कहीं जंगल का राजा दिख जाता। बहरहाल, बच्चे ऐसे समय में सिर्फ़ इशारा कर देने पर जैसी समझदारी दिखाते, उससे इतना तो एहसास हुआ कि कुछ भी हो राजा की इज़्ज़त सभी करते हैं। भले देश में लोकतंत्र आ गया हो।

बादशाह की सवारी
मुश्किल तब हुई, जब चौकड़ी भरता हिरनों का एक समूह हमारे सामने ही सड़क पर भागने लगा। ड्राइवर ने जीप रोकी और तुरंत मुड़कर इशारा किया। उसके चेहरे पर जैसा ख़ौफ़ दिखा, उसने बच्चों की सिट्टी-पिट्टी गुम कर दी। अब कोई बोल नहीं रहा था। आगे बैठे होने के नाते उसने मुझे कोहनी मार कर समझा दिया था कि ये नाटक है। लेकिन धीरे से उसने यह भी बताया, 'अब्बी, एकदम अब्बी कहीं से राजा आएगा। बोलने का नईं, एकदम नईं। बस देखो, चुपचाप देखो।और हम ठहरे रहे। क़रीब बीस मिनट बाद जंगल में बाईं तरफ़ इशारा किया। घने जंगल में वाक़ई महाराजाधिराज सपरिवार चले जा रहे थे और वे बड़े इत्मीनान से जा रहे थे। इसके पहले कि बच्चे कुछ बोलें, उन्हें एक बार फिर चुप रहने का इशारा कर दिया गया। क़रीब दस मिनट तक हम सब उन्हें जाते हुए निहारते रहे और जब वे घने जंगलों में गुम हो गए तो हम भी आगे बढ़ गए। वाक़ई चलता तो शेर ही है।

जंगल की एक-एक गतिविधि पर नज़र गड़ाए कब फरहाबाद व्यू प्वाइंट पहुंच गए, पता ही नहीं चला। काफ़ी ऊंचाई पर मौजूद इस जगह से जंगल की गतिविधियां देखी जा सकती हैं। बेहतर हो कि अपने साथ दूरबीन रखें, जो हमारे पास नहीं थी। सागौन और गूलर के पेड़ तो इस जंगल में ख़ूब हैं और जानवरों की भी हज़ारों प्रजातियां हैं। सौ से ज्य़ादा प्रजातियां तो केवल तितलियों की हैं। पतंगे भी कई तरह के हैं। चिडिय़ों के मामले में यह जंगल काफ़ी धनी है। परिंदों की 200 से अधिक प्रजातियां यहां हैं। इसके अलावा सांभर, भालू, चीते, लकड़बग्घे, सियार, हिरन, चौसिंघा हिरन, ढोल, सेही, नीलगाय सभी यहां पर्याप्त संख्या में हैं। बताया गया कि यहां हनी बैजर भी पाया जाता है, हालांकि हम देख न सके।

जंगल घूम कर हम दो बजे तक वापस एंट्री गेट पर थे। टैक्सी ली और फिर श्रीशैलम पहुंचे। अब हमारे पास और घूमने का वक़्त नहीं था, क्योंकि अगले दिन हैदराबाद से दिल्ली के लिए ट्रेन पकडऩी थी और यह तभी संभव था जब आज ही निकल चलते।

थोड़ा और वक़्त होता तो
हालांकि घूमने के लिए यहां और भी कई जगहें हैं। इनमें पंचमठम का श्रीशैलम के इतिहास और संस्कृति में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उच्च अध्ययन को समर्पित इन मठों में घंट मठम, भीमशंकर मठम, विभूति मठम, रुद्राक्ष मठम और सारंगधारा मठम शामिल हैं। इन मठों का इतिहास सातवीं शताब्दी से शुरू होता है। तब यहां कई मठ थे। अब केवल यही पांच बचे हैं और वह भी जीर्ण हालत में हैं। ये मठ श्रीशैलम मुख्य मंदिर से क़रीब एक किलोमीटर दूर पश्चिम दिशा में स्थित हैं।

श्रीशैलम से 8 किमी दूर स्थित शिखरम समुद्रतल से 2830 फुट की ऊंचाई पर है। शिखरेश्वरम मंदिर में गर्भगृह और अंतरालय के अलावा 16 स्तंभों वाला मुखमंडपम भी है। यहां के इष्ट वीर शंकर स्वामी हैं, जिन्हें शिखरेश्वरम के रूप में पूजा जाता है। स्कंद पुराण के अनुसार इसके शिखर के दर्शनमात्र से मल्लिकार्जुन स्वामी के दर्शन का फल प्राप्त होता है। इसके वर्तमान स्वरूप का निर्माण रेड्डी राजाओं ने सन 1398 में कराया था।

सुंदर जलप्रपात फलधारा पंचधारा क़स्बे से पांच किलोमीटर और अक्क महादेवी की गुफाएं क़रीब 10 किलोमीटर दूर हैं। समय हो तो आप हटकेश्वरम, कैलासद्वारम, भीमुनि कोलानू, इष्ट कामेश्वरी मंदिर, कदलीवनम, नगालूती, भ्रमरांबा चेरुवु, सर्वेश्वरम और गुप्त मल्लिकार्जुनम को भी अपनी यात्रायोजना में शामिल कर सकते हैं। यहां आकर हमें एहसास हुआ कि इस छोटे से क़स्बे की घुमक्कड़ी का पूरा आनंद लेने के लिए कम से कम एक हफ़्ते का समय चाहिए। हम इकट्ठे तो इतना समय निकाल नहीं सकते थे, लिहाज़ा 4 बजे की बस से भारी मन लिए हैदराबाद के लिए रवाना हो गए। अपने आप से इस वादे के साथ कि फिर मिलेंगे, ज़रूर मिलेंगे। आगे बढ़ने पर तो श्रीशैलम से हैदराबाद के बीच प्रकृति की मनोरम झांकियों ने हमारे मन का भारीपन भी ख़ुद हर लिया।
नदी, पहाड़ और जंगल से गुज़रता रास्ता 


                       जान कर चलें
कैसे पहुंचें
जो रास्ता हमने चुना, वह चुनने की ग़लती आप न करें तो ही ठीक। हैदराबाद तक भारत के हर बड़े शहर से हवाई, रेल और सड़क सभी मार्गों का सीधा संपर्क है। लेकिन इसके बाद आपके पास एक ही रास्ता बचता है और वह है सड़क। आप चाहें तो अपने वाहन से भी जा सकते हैं, वरना साधारण और लग़्ज़री - सभी तरह की बसें नियमित रूप से उपलब्ध होती हैं। हैदराबाद से 215 किलोमीटर की यह दूरी तय करने में आम तौर पर चार से छह घंटे लगते हैं। स्थानीय भ्रमण के लिए आप टैक्सी या ऑटो कुछ भी ले सकते हैं।

कहां ठहरें
शहर में बड़ी संख्या में बजट होटल, गेस्ट हाउस और धर्मशालाएं हैं। कुछ में आप पहले से बुकिंग भी करा सकते हैं। न भी हो सके, तो चिंता न करें। वहां पहुंच कर भी ठहरने की व्यवस्था आसानी से हो जाएगी।

खाना-पीना
दक्षिण भारतीय शाकाहार आपको कहीं भी आसानी से मिल सकता है। रोटीप्रेमी उत्तर भारतीयों को थोड़ी समस्या हो सकती है, लेकिन थोड़े दिन स्वाद बदलने का भी अपना अलग मज़ा है। धार्मिक स्थल होने के नाते मांसाहार और सुरापान यहां वर्जित है।

कब जाएं
जा तो आप कभी भी सकते हैं, लेकिन अक्टूबर से फरवरी तक का समय बेहतर होता है। इसमें भी अक्टूबर-नवंबर में यहां बारिश होती है। बाक़ी समय सर्दी की फ़िक्र करने की यहां कोई ज़रूरत ही नहीं है। यहां का औसत तापमान 27 डिग्री सेल्सियस होता है। हां, गर्मी में यह चढ़कर 44 डिग्री तक चला जाता है।

धरती उत्सवों की
उत्सव यहां पूरे साल चलते रहते हैं, लेकिन फरवरी/मार्च में होने वाला महाशिवरात्रि का उत्सव विशिष्ट होता है। इस अवसर पर यहां बहुत बड़ा मेला लगता है, जो पूरे एक सप्ताह चलता है। मार्च/अप्रैल में मनाया जाने वाला तेलुगु नववर्ष उगाडि (संभवत: युगादि का बदला हुआ रूप) प्रमुख उत्सवों में है। इसके अलावा कुंभोत्सवम, संक्रांति उत्सवम, अरुद्रोत्सवम, कार्तिक महोत्सवम और श्रवण नामोत्सवम भी प्रमुख उत्सवों में हैं।

Friday, 18 July 2014

श्रीशैलम : बांध लेता है यह छंद मुक्त

इष्ट देव सांकृत्यायन

श्रीशैलम के लिए हमारा सफ़र तिरुपति से शुरू होना था। तयशुदा कार्यक्रम के अनुसार एक दिन पूर्व यानी 31 दिसंबर को ही दिन में तिरुपति के सभी दर्शनीय स्थल घूमकर अगले दिन यानी 1  जनवरी को सुबह ही हमें वहां से श्रीशैलम  के लिए निकलना था। 31 दिसंबर को दिन में तो वहां घूमना संभव नहीं हो सकाक्योंकि पूरा समय तिरुमाला पर्वत स्थित भगवान श्री वेंकटेश्वर मंदिर में ही बीत गया। नए साल की पूर्व संध्या पर वहां दर्शनार्थियों की जो क़तार लगी थीउसे देखकर किसी की भी हिम्मत छूट सकती थी। काफ़ी जद्दोजहद के बाद हमने दर्शन किया और रात में बाक़ी जगहें घूम लीं। छोटा क़स्बा होने के नाते बहुत अधिक समय नहीं लगा। तीर्थस्थल होने और दूर-दराज से अकसर श्रद्धालुओं के आते रहने से तिरुपति में किसी भी समय निकलना मुश्किल नहीं है। छोटा सा यह क़स्बा दिन-रात जागने और चलते रहने वाला है। अगले दिन सुबह 9 बजे ट्रेन पकडऩे में हमारे लिए कोई बाधा नहीं थी। तिरुपति में जिस गेस्टहाउस में हम ठहरे थेवह रेलवे स्टेशन के ठीक सामने ही था। वहां से स्टेशन पहुंचना  मुश्किल नहीं था। रात में तय हुआ कि सुबह नाश्ते से पहले ही हम लोग चेक आउट कर जाएंगे। इसके बाद नाश्ता करेंगे और फिर ट्रेन पकड़ेंगे।
 
श्रीशैलम की पहाड़ियां 
नाश्ते के बाद सभी लोग स्टेशन पहुंचे। वहां ट्रेन के बारे में कोई सूचना ही नहीं थी। इन्क्वायरी काउंटर पहुंचने पर पता चला कि ट्रेन तो छह घंटे देर है। जो ट्रेन 9 बजे खुलने वाली थीवह 3 बजे जाएगी। अब हमारे पास इसके अलावा कोई चारा नहीं था कि हम दुबारा गेस्ट हाउस लौट आते और वहीं बैठकर इंतज़ार करते। बीते दिन बहुत देर तक बिना खाए-पिए क़तार में खड़े रहने से हमारे साथी श्री हरिशंकर राढ़ी का स्वास्थ्य भी थोड़ा ख़राब हो गया था। ऐसी स्थिति में स्टेशन के वेटिंग रूम में समय गुज़ारना मुश्किल था। मजबूरन गेस्ट हाउस वापस आए। केवल छह घंटे के लिए अब दुबारा कमरा तो बुक कराया नहीं जा सकता था और कोई दूसरी वैकल्पिक व्यवस्था वहां थी नहीं। आख़िरकार हमने वहां वेटिंग हॉल में ही समय गुज़ारना तय किया। गेस्ट हाउस के वेटिंग हॉल में पर्याप्त जगह थी। कुछ लोग किताबों में व्यस्त हो गएकुछ ख़रीदी गई वस्तुओं या आइपॉड में और बच्चे फ़ोन पर गेम में। हालांकि बच्चे फ़ोन पर बहुत देर तक व्यस्त नहीं रह सके। लंबा-चौड़ा हॉल देखकर वे हाइड एंड सीक खेलने में जुट गए। 

देखते ही देखते अब तक अपरिचित रहे दूसरे पर्यटक बच्चों से भी उनकी दोस्ती हो गई। धमाचौकड़ी का माहौल कुछ ज्य़ादा ही गहरा होते देख हमने लंच के बहाने उन्हें बाहर निकाला और बाज़ार की ओर चल दिए। काफ़ी देर इधर-उधर भटकने के बाद एक रेस्टोरेंट में दक्षिण भारतीय भोजन किया और वापस गेस्ट हाउस आ गए। अभी भी केवल 12 बजे थे और तीन घंटे बाक़ी थे। बच्चों को तीन घंटे बांधकर रखना आसान नहीं थाइसलिए मेरे अनुज अभीष्ट उन्हें लेकर म्यूजि़यम दिखाने चले गए। वहीं से पद्मावती देवीमंदिर भी चले गए। क़रीब दो बजे वापस लौटे। हमने सोचा, दुबारा सबको लेकर स्टेशन जाने से बेहतर होगा कि केवल दो लोग जाकर पहले ट्रेन का पता कर लें। इसके बाद जाया जाए। स्टेशन की इनक्वायरी से मालूम हुआ कि ट्रेन 3 बजे ही जाएगी। यह अलग बात है कि अभी प्लैटफॉर्म तय नहीं है। तय हुआ कि अब सब स्टेशन चलेंलेकिन स्टेशन पहुंचने पर मालूम हुआ कि अब ट्रेन रात 8 बजे जाएगी।

श्रीशैलम बस अड्डा 
आख़िर धैर्य कब तक साथ देता। तय हुआ कि अब यहां बैठकर इंतज़ार करने से बेहतर होगा रेल का रिज़र्वेशन कैंसिल करा श्रीशैलम के लिए बस पकड़ी जाए। ख़ैर, वहीं वेटिंग रूम में बैठकर रिज़र्वेशन कैंसिल कराया। उम्मीद थी कि पहले तरह जब ट्रेन 8 घंटे से ज़्यादा लेट हो चुकी है तो आसानी से हमारा पूरा पैसा वापस मिल जाएगा। पर अफ़सोस, आइआरसीटीसी ने उसका पैसा लौटाने के बजाय हमें बताया कि चार्ट बन चुका है। अतः अब आपको टीडीआर भरना होगा। इसके पहले तक मैं टीडीआर शब्द से भी परिचित नहीं था। मुझे पूरा भरोसा था कि आइआरसीटीसी बेईमानी नहीं करेगी और हमारा पूरा पैसा लौट आएगा। बारहां अफ़सोस, हमने साल भर इंतज़ार किया, कई बार कार्पोरेशन को फोन भी लगाया और अंत में मुझे मेल आया कि उनके रिकॉर्ड के मुताबिक गाड़ी समय पर चली और हमने सफर किया। वैसे वे ग़लत नहीं थे। क्योंकि हमने सफ़र तो किया ही, ये अलग बात है कि सफ़र हमने उर्दू-हिंदी में नहीं, अंग्रेज़ी में किया। इससे मुझे यह समझ में आ गया कि रेल में कितना गड़बड़झाला होता है और यह भी कि अगर कभी ऐसी नौबत आए तो वे दूसरे टिकट संभाल कर रखे जाएं जिनसे हम सफ़र करें, ताकि ज़रूरत पड़ने पर उपभोक्ता फोरम के काम आएं।

यह कड़वा अनुभव तो आपको सिर्फ़ इसलिए बता दिया ताकि आपके लिए यह सनद रहे और वक़्त ज़रूरत पर काम आए। आइए अब आगे बढ़ते हैं। तिरुपति से श्रीशैलम तक बस का सफ़र आसान नहीं था। ख़ासकर ऐसी स्थिति में जबकि साथ का एक व्यक्ति अस्वस्थ हो, पूरे 400 किमी बस से जाना अपने आपमें एक बड़ी सज़ा है। पर घुमक्कड़ी में श्रद्धा-भक्ति निभा पाना उनके बूते की बात भी नहीं है जो थोड़ी-बहुत सज़ा भुगतने के लिए तैयार न हों। फिर भी हिम्मत जुटा कर मैं राढ़ी जी के साथ पास ही मौजूद बस स्टैंड की ओर चल पड़ा। वहाँ मालूम हुआ कि श्रीशैलम के लिए सामान्य बस तो अभी जा रही हैलेकिन डीलक्स 6 बजे और सुपर डीलक्स रात 10 बजे निकलेगी। डीलक्स बस में हमें आसानी से मनचाही दस सीटें मिल गईं। वापस रेलवे स्टेशन आकर हमने सबको साथ लिया। दो टैक्सियां तय की गईं और बस स्टैंड आ गए। बस स्टेशन पहुंचने के थोड़ी देर बाद ही हमारी बस भी आ गई। क़रीब आधे घंटे में सभी व्यवस्थित हो गए और यह भी भरोसा हो गया कि बस से भी यात्रा उतनी कष्टप्रद होगी नहींजितनी सोच कर हम डर रहे थे। बस अपने सही समय से चली।

कुछ ही दिनों पहले क्रिसमस बीता था और नए साल के जश्र का असर अभी पूरे माहौल पर तारी था। इसकी गवाही रास्ते भर पडऩे वाले छोटे-बड़े क़सबों-शहरों से लेकर गांव तक दे रहे थे। जगह-जगह सजे क्रिसमस स्टार और झिलमिलाती रोशनियां एक अलग ही कहानी कहती लग रही थीं।

आतंक से मुक्त

चलते समय एक अनजाना भय आंध्र प्रदेश में बहुचर्चित नक्सलीआतंक का भी था। बस से चलने में संकोच का एक कारण यह भी था। लेकिन, बस जैसे-जैसे आगे बढ़ती गई, भय कम होता गया। हाइवे पर बसों का जैसा तांता लगा था और जिस तरह हमारी बस में जगह-जगह लोग बेखौफ़ चढ़ उतर रहे थे, उससे यह तो समझ में आ गया कि उतना डरने की ज़रूरत नहीं है, जितना हम डर रहे थे। रात क़रीब दस बजे वेल्लूर पहुंच कर मैंने एक सहयात्री से पूछ ही लिया। जो कुछ उन्होंने बताया उसका सारांश यह था कि यह बस जिन-जिन रास्तों से होकर जाएगी उस पूरे रास्ते में कहीं भी नक्सलियों का कोई भय नहीं है। हमें चित्तूर से निकल कर कुर्नूल जिले में जाना था और यह पूरा क्षेत्र नक्सलियों से लगभग अप्रभावित है। कभी कोई छिटपुट घटना हो जाए तो नहीं कहा जा सकता, पर आम तौर पर यह पूरा क्षेत्र सुरक्षित माना जाता है।


रात क़रीब साढ़े बारह बजे हम शिंगरैकोंडा पहुंचे। इस वक़्त भी पूरा क़स्बा रौशनी से जगमगा रहा था और चहल-पहल थी। यह नए साल का असर था। यह प्रकाशम जिले में एक छोटा सा क़स्बा है, जिसकी ख्याति 15वीं सदी में निर्मित भगवान वाराह नरसिंह मंदिर के लिए है। राजा देवराय द्वारा बनवाए गए इस मंदिर को दक्षिण सिंहाचलम नाम से भी जाना जाता है। क़स्बे के बाहर आकर बस एक ढाबे पर रुकी। हमने उतर कर हाथ-पैर सीधे किए, थोड़ा घूमे-टहले और चाय पी। थोड़ी ही देर में बस वहां से फिर चल पड़ी और रात साढ़े तीन बजे मरकपुर पहुंची। यहां से श्रीशैलम की कुल दूरी 84 किलोमीटर यानी दो घंटे की बचती है, लेकिन बस फ़िलहाल इसके आगे नहीं जा सकती थी। इसकी वजह बीच में पडऩे वाली श्रीशैलम वाइल्ड लाइफ सैंक्चुरी है। इस सैंक्चुरी में सुबह 6 बजे तक प्रवेश वर्जित है। ज़ाहिर है, ढाई घंटे का समय हमें यहीं काटना था। चूंकि बस आदतन एक ढाबे पर ही ठहरी थी और वहां कामचलाऊ स्तर की सभी ज़रूरी सुविधाएं थीं, इसलिए समय गुज़ारना बहुत मुश्किल नहीं था। बच्चे, जो अब तक सोए थे, वे भी अब उतर आए। इतनी रात गए खाने का कोई अर्थ तो था नहीं, लिहाज़ा चाय चलती रही।


प्रकृति की कविता
सुबह 6 बजते ही बस चल पड़ी। रास्ता जंगल से होकर गुज़र रहा था। सड़क के दोनों तरफ़ हरे-भरे पेड़ और घने जंगलों में इधर-उधर दौड़ते-भागते, कहीं-कहीं ऊंघते बैठे छोटे-छोटे वन्य जीव बच्चों के लिए आकर्षण का केंद्र बन रहे थे। बच्चे उन्हें उछल-उछल कर देखने की कोशिश करते, कई अपना किताबी या टीवी चैनलों से मिला ज्ञान बघारते और कभी-कभी हमसे सवाल करने लगते। यहां हिरन, भालू, बंदर और सेही तो बहुतायत में हैं। पक्षी भी कई तरह के हैं। शेर-चीते आदि देखने के लिए अलग से निकलना पड़ता है। उन्हें सड़क  के इर्द-गिर्द आने की अनुमति नहीं है और आम तौर पर वे अपने लिए बनाए गए क़ानून का सम्मान करते हैं, भले यह मजबूरी हो। चारों तरफ़ पहाड़ों से घिरा यह क़स्बा अद्भुत ही है। सुबह पौ फटते ही हम श्रीशैलम पहुंच चुके थे। चूंकि बस के स्टेशन पहुंचने का समय सात बजे का था, लिहाज़ा हमें क़स्बे के बाहर ही फिर एक ढाबे पर रुकना पड़ा। यहां आधे घंटे का समय गुज़ार कर ही आगे बढ़ा जा सकता था। सवा सात बजे हम श्रीशैलम बस स्टेशन पहुंच गए थे।

बस से उतरने के बाद सबसे पहली आवश्यकता कोई ठिकाना ढूंढने की थी। स्थानीय लोगों से पूछने पर मालूम हुआ कि बमुश्किल आधा किलोमीटर आगे बढऩे पर कई मध्यम दर्जे के गेस्ट हाउस और धर्मशालाएं हैं। हमें कम से कम दो बड़े कमरों की ज़रूरत थी, जो आसपास के गेस्ट हाउसों में एक ही तल पर उपलब्ध नहीं थे। अलग-अलग तलों पर ठहरने पर समन्वय में मुश्किल होती। इसलिए मल्लिकार्जुन मंदिर वाली सड़क पर ही मौजूद एक धर्मशाला में गए। यहां हमें एक साथ दो कमरे मिल गए। वह भी बहुत कम क़ीमत पर, जिसमें एक समय का भोजन भी शामिल था। हमें तुरंत तैयार होकर दर्शन के लिए निकलना था। अत: कोई देर किए बग़ैर हम तैयार हुए और 9 बजे मंदिर के लिए निकल पड़े।


कथाओं में कथाएं
मल्लिकार्जुन मंदिर का शिखर  
इस छोटे से क़स्बे की महत्ता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसे दक्षिण का कैलास कहते हैं। नल्लमलाई पर्वतशृंखला पर मौजूद इस पहाड़ी को सिरिधन, श्रीनगम, श्रीगिरी और श्री पर्वत भी कहते हैं। मान्यता है कि अमावस्या को स्वयं शिव और पूर्णिमा को माता पार्वती इस ज्योतिर्लिंग में वास करती हैं। द्वादश ज्योतिर्लिंगों में होने के नाते भीड़ तो यहां भी थी, लेकिन तिरुपति जैसी नहीं। प्रवेश के लिए यहां भी दो तरह की व्यवस्थाएं हैं। एक तो टिकट वाली और दूसरी बिना टिकट की। हमने 101 रुपये प्रति व्यक्ति वाले टिकट लिए और लाइन में लग गए। हालांकि क़तार तेज़ी से चल रही थी, लेकिन मुख्य मंडप के बाहर ही रोक दी गई। मालूम हुआ, अभी अभिषेक हो रहा है। यह संपन्न हो जाने के बाद ही क़तार आगे बढ़ सकती है। वहां क़रीब एक घंटे तक इंतज़ार करना पड़ा और इस दौरान बेवजह जो धक्का-मुक्की हुई, वह अवर्णनीय है। बहरहाल 11 बजे तक हम मुख्य मंदिर में दर्शन कर चुके थे। हालांकि भीड़ के कारण उस दिन यहां मंदिर के भीतर जाना संभव न हो सका, लेकिन एक बात अच्छी लगी कि दक्षिण के कुछ मंदिरों की तरह श्रीशैलम में जाति-धर्म का कोई भेदभाव नहीं है। किसी भी जाति-धर्म को मानने वाले लोग यहां भीतर जाकर अभिषेक कर सकते हैं और यह प्रथा यहां आरंभ से चली आ रही है।

श्रीशैलम ज्योतिर्लिंग को लेकर कई किंवदंतियां हैं। इनमें से कुछ यहां प्रकारम पीठिका पर खुदी भी हैं। एक तो यह है कि महर्षि शिलाद के पुत्र पर्वत ने भगवान शिव का घोर तप किया। जब भगवान शिव ने दर्शन दिया तो पर्वत ने उनसे अपने शरीर पर ही विराजमान होने का अनुरोध किया। शिव ने उनका अनुरोध स्वीकार कर लिया। इस प्रकार तपस्वी पर्वत उसी स्थान पर पर्वत के रूप में बदल गए और उन्हें श्रीपर्वत कहा गया तथा भगवान शिव ने मल्लिकार्जुन स्वामी के रूप में उनके शिखर पर अपना वास बनाया। इसीलिए श्रीशैलम में भगवान शिव को मल्लिकार्जुन स्वामी के नाम से जाना जाता है।

ज्योतिर्लिंग ही नहीं, शक्तिपीठ भी
मल्लिकार्जुन स्वामी की एक विशिष्टता यह भी है कि यही एक ऐसा ज्योतिर्लिंग है, जो शक्तिपीठ भी है। मल्लिकार्जुन स्वामी के साथ देवी भ्रमरांबा भी इसी परिसर में विराजित हैं। श्री शिव महापुराण के अनुसार देवी सती के ऊपरी होंठ यहीं गिरे थे। कथा यह भी है एक राजकुमारी ने भगवान शिव को पति के रूप में पाना चाहा और इसके लिए उसने कठोर तप किया। एक रात भगवान शिव ने स्वप्न में उसे निर्देश दिया कि तुम इस भ्रमर के पीछे आओ। जहां यह रुक जाए, वहीं ठहर कर मेरी प्रतीक्षा करना। नींद खुली तो उसने पाया कि सचमुच एक भौंरा उसके सामने मंडरा रहा है। राजकुमारी उसके पीछे-पीछे चल पड़ी। काफ़ी दूर तक चलने के बाद भ्रमर श्रीशैलम पर्वत पर स्थित चमेली के एक पौधे पर ठहर गया। राजकुमारी वहीं बैठकर भगवान की प्रतीक्षा करते हुए पुन: तप करने लगी। उसे तपलीन देख स्थानीय वनवासी उसके लिए शहद और फल लाने लगे। अंत में भगवान शिव एक वृद्ध के रूप में प्रकट हुए और राजकुमारी के साथ विवाह किया। इसके कुछ दिनों बाद वनवासियों ने उन्हें भोजन के लिए आमंत्रित किया। वनवासियों ने अपनी परंपरा के अनुसार भोजन में उन्हें मांस और मदिरा परोसी, जिसे वह स्वीकार नहीं कर सके। राजकुमारी ने हठ किया तो शिव वहां से दूर चले गए और कई बार अनुनय-विनय के बाद भी लौट कर नहीं आए। इससे रुष्ट राजकुमारी ने उन्हें पत्थर हो जाने का शाप दिया। वे यहां ज्योतिस्वरूप शिवलिंग में बदल गए और मल्लिका (चमेली) पुष्पों से अर्चित (पूजित) होने के कारण मल्लिकार्जुन कहे गए। जब यह बात देवी पार्वती को पता चली तो उन्होंने राजकुमारी को भ्रमर हो जाने का शाप दिया, क्योंकि वह भ्रमर के पीछे आई थीं। इस प्रकार उनका नाम भ्रमरांबा पड़ा और वही यहां शक्तिस्वरूप में प्रतिष्ठित हैं।

एक कथा यह भी है कि भगवान शिव श्रीशैलम के जंगलों में एक बार शिकारी के रूप में आए। यहां उन्हें एक चेंचू कन्या से प्रेम हो गया। उसके साथ विवाह कर वह यहीं पर्वत पर बस गए। इसीलिए स्थानीय चेंचू जनजाति के लोग मल्लिकार्जुन स्वामी को अपना रिश्तेदार बताते हैं और चेंचू मल्लैया कहते हैं।

श्री शिव महापुराण में इस ज्योतिर्लिंग के आविर्भाव की कथा बिलकुल भिन्न है। इसके अनुसार भगवान शिव के पुत्र श्री गणेश और कार्तिकेय एक बार विवाह को लेकर आपस में बहस करने लगे। दोनों का हठ यह था कि मेरा विवाह पहले होना चाहिए। बात भगवान शिव और माता पार्वती तक पहुंची तो उन्होंने कहा कि तुम दोनों में से जो पूरी पृथ्वी की परिक्रमा पहले पूरी कर लेगा, उसका ही विवाह पहले होगा। कार्तिकेय तुरंत अपने वाहन मयूर पर बैठकर पृथ्वी की परिक्रमा के लिए चल पड़े। लेकिन, गणेश जी के लिए यह बहुत कठिन था। एक तो स्थूल काया, दूसरे वाहन मूषक। उन्होंने एक सुगम उपाय निकाला। सामने बैठे माता-पिता के पूजनोपरांत उनकी ही परिक्रमा कर ली और इस प्रकार पृथ्वी की परिक्रमा का कार्य पूरा मान लिया। उनका यह कार्य शास्त्रसम्मत था। पूरी पृथ्वी की परिक्रमा कर जब तक कार्तिकेय लौटे तब तक गणेश जी का विवाह हो चुका था और उनके दो पुत्र भी हो चुके थे। अत: कार्तिकेय रुष्ट होकर क्रौंच पर्वत पर चले गए। वात्सल्य से व्याकुल माता पार्वती कार्तिकेय जी को मनाने चल पड़ीं। बाद में भगवान शिव भी यहां पहुंच कर ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए। चूंकि शिवजी की पूजा यहां सबसे पहले मल्लिका पुष्पों से की गई, इसीलिए उनका नाम मल्लिकार्जुन पड़ा और माता पार्वती ने यहां शिवजी की पूजा एक भ्रमर के रूप में की थी, इसीलिए यहां उनके स्थापित रूप का नाम भ्रमरांबा पड़ा। मान्यता यह भी है कि भगवान शिव के वाहन नंदी ने स्वयं यहां तप किया था और शिव-पार्वती ने यहां उन्हें मल्लिकार्जुन और भ्रमरांबा के रूप में दर्शन दिए थे।
मंदिर के पीछे का हिस्सा 

है अतिशय प्राचीन

दूसरी तरफ़, पुराविज्ञानियों का विश्लेषण यह है कि इस परिसर में प्राचीनतम अस्तित्व वृद्ध मल्लिकार्जुन शिवलिंग है, जो संभवत: अर्जुनवृक्ष का जीवाश्म है। उनका अनुमान है कि यह 70-80 हज़ार साल पुराना है। शायद इसीलिए इसे वृद्ध मल्लिकार्जुन कहते हैं। मंदिर में प्रवेश से पूर्व एक मंडप है। इसके बाद चारों तरफ़ ऊंचे मंडप हैं। यह स्थापत्य की विजयनगर शैली है। वस्तुत: वर्तमान रूप में इसका निर्माण विजयनगर के सम्राट हरिहर राय ने कराया था। इनके अलावा कोंडावेडू राजवंश के रेड्डीराजाओं ने भी इसमें महत्वपूर्ण योगदान किया था। इसके उत्तरी गोपुरम का निर्माण छत्रपति शिवाजी ने कराया है। हालांकि यहां इस मंदिर के अस्तित्व के प्रमाण दूसरी शताब्दी ईस्वी से ही उपलब्ध हैं। चारों तरफ़ से छह मीटर ऊंची क़िले जैसी दीवार से घिरे इस परिसर में कई अन्य हिंदू देवी-देवताओं के मंदिर हैं। इनमें सहस्रलिंग और नटराज प्रमुख हैं। भ्रमरांबा शक्तिपीठ के निकट ही लोपामुद्रा की एक प्रतिमा भी है। महर्षि अगस्त्य की धर्मपत्नी लोपामुद्रा प्राचीन भारत की विदुषी दार्शनिकों में गिनी जाती हैं। कहा जाता है कि आदि शंकराचार्य ने श्री मल्लिकार्जुन स्वामी के दर्शनोपरांत ही शिवानंदलहरी की रचना की थी। मंदिर की चहारदीवारी पर जगह-जगह रामायण और महाभारत की कथाएं उत्कीर्ण हैं। कहीं तेलुगु, कहीं संस्कृत और कहीं चित्रों की भाषा में भी। निकासद्वार पीछे से है। नारियल के पेड़ों की छाया में दीवारों पर खुदी इन कथाओं को पढ़ते-देखते निकलना एक अलग ही तरह का सुखद एहसास देता है।