Thursday, 20 March 2014

To Ghrishneshwar

                                                    घृष्णेश्वर  की ओर:

                                                                   -हरिशंकर राढ़ी 


हमारा अगला गंतव्य घृष्णेश्वर  ज्योतिर्लिंग और अजंता एलोरा की गुफाएँ थीं। घृष्णेश्वर  ज्योतिर्लिंग और एलोरा की गुफाएं महाराष्ट्र  के औरंगाबाद जिले में हैं और दोनों ही एक दूसरे के बहुत पास पास हैं। हमारे कार्यक्रम में पहले घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग का  दर्शन  था और उसके बाद एलोरा। शिरडी  से वहां जाने के लिए औरंगाबाद की बस पकड़नी थी। यद्यपि हम लोग एक जीप भर की सवारी थे किंतु अनजान सी जगह पर जाते समय प्रायः मैं सरकारी बसों को तरजीह देता हूं। शिरडी  से औरंगाबाद लगभग डेढ़ सौ किमी है और यात्रा में पांच घंटे लग जाते हैं।लेकिन , शिरडी  से औरंगाबाद के लिए बसों की कमी नहीं है।
 घृष्णेश्वरमंदिर का शिखर :     छाया : हरिशंकर राढ़ी  


औरंगाबाद हम लोग लगभग एक बजे अपराह्न में पहुंचे  थे। शिरडी  की तुलना में यहां भाषा  में कुछ दिक्कतें आती हैं, पर ज्यादा नहीं। औरंगाबाद से घृष्णेश्वर  अधिक दूर नहीं है। लगभग 30 किमी होगा, परंतु यहां के लिए बसें उपलब्ध नहीं थीं। कुछ बसें उधर से होकर जाती हैं किंतु लंबी दूरी के ड्राइवर - कंडक्टर नजदीक की सवारी बिठाने को राजी नहीं थे। यदि वे राजी हो भी जाते तो उनमें घुसना युद्ध जीतने से कम नहीं था। और रह गए टैक्सीवाले तो उनकी तो बात मत पूछिए। इतनी सी दूरी के लिए  वे छह सौ रूपये से कम पर हिलने को तैयार नहीं। अंततः एक टैक्सीवाला बीच और पीछे की पूरी सीटें ढाई सौ में देने को तैयार हो गया और हम लोग औरंगाबाद के ऐतिहासिक शहर  से बाहर निकलते हुए लगभग आधे घंटे में घृष्णेश्वर  ज्योतिर्लिंग पहुंच चुके थे।

घृष्णेश्वरमंदिर के सामने प्रसाद विक्रेता  :     छाया : हरिशंकर राढ़ी 
घृष्णेश्वर  का स्थान द्वादश  ज्योतिर्लिंग स्त्रोत में अंतिम माना गया है- घृष्णेशं  शिवालये। यह एक अति प्राचीन ज्योतिर्लिंग है। मंदिर भी कोई बहुत विशाल या भव्य नहीं है। दुर्गम तो नहीं कहा जा सकता किंतु अंदरूनी हिस्से में होने के कारण लोगों की पहुंच बहुत कम है। या तो वहां किसी अन्य कार्य से पहुंचे हुए लोग दर्शन  के लिए जाते हैं या वे जो द्वादश ज्योतिर्लिंग की यात्रा पर हैं। हां, स्थानीय लोग अच्छी संख्या में पहुंचते रहते हैं।

घृष्णेश्वरमंदिर के सामने  परिसर  :     छाया : हरिशंकर राढ़ी 
जैसा कि पहले ही बताया कि यह अभी तक बसावट और व्यापार की दृष्टि  से बहुत सघन और मौद्रिक मानसिकता का नहीं हो पाया है, सो आप केवल धार्मिक अनुभूति ही बटोर सकते हैं। सबसे अच्छी बात यह है कि वहां पहुंचने पर आपको कैच करने की मुद्रा में पंडे - पुजारियों का हमला नहीं होता। न तो होटल वालों की मारामारी और न दूकानदारों की। हाँ, मंदिर प्रवेश  के मुख्य द्वार पर पहुँचने  के बाद फूल माला  और प्रसाद  बेचने वालों का इतना तो हक बनता है कि वे आपको अपनी दूकार पर बुलाकर दस बीस रुपए की कमाई कर लें।

घृष्णेश्वरमंदिर का प्रवेशद्वार      छाया : हरिशंकर राढ़ी 
घृष्णेश्वर मंदिर बहुत विशाल  या भव्य भले ही न हो, किंतु इसकी महत्ता वहां पहुंचने वाले दर्शनार्थी  को  महसूस हो जाती है। छोटा सा परिसर है जहां आपको एक विचित्र सी प्राचीनता एवं शांति  का आभास होगा। अन्य ज्योतिर्लिंगों की भांति घृष्णेश्वर  ज्योतिर्लिंग के उद्भव की भी एक कथा है। किसी समय यह वरुल या मराठी में वेरुल गांव था जो येलगंगा नदी के किनारे बसा था। यहां का राजा येल था। एक बार वह शिकार  खेलने गया और ऋषियों  - मुनियों के आश्रमों में रह रहे पशुओं  का शिकार कर लिया। यह देख वे ऋषि - मुनि क्रोधित हो गए और उन्होंने राजा येल को श्राप दे दिया कि उसका शरीर कीड़े - मकोड़ों से भर जाए। राजा वहां से भूखा -प्यासा भटकने लगा। अंतत: उसे घोड़े की खुर से बने एक गड्ढे में थोड़ा सा जल मिला। उसे पीने के बाद आश्चर्यजनक  रूप से वह कीड़े-मकोड़ों से मुक्ति पा गया और वहीं तपस्या करने लगा। अंत में उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने दर्शन दिया और तीर्थ स्थल सहित एक सरोवर का निर्माण किया जो बाद में चलकर शिवालय के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

घृष्णेश्वरमंदिर के पास राजमार्ग  :     छाया : हरिशंकर राढ़ी 
किंतु घृष्णेश्वर  के यहां स्थापित होने की यह अंतिम कथा नहीं है। बहुत सी अन्य कथाएं भी हैं। एक अन्य कथा के अनुसार देवपर्वत पर रहने वाला सुधर्मा शिव  का अनन्य भक्त था। उसका विवाह सुदेहा नामक सुंदर एवं धर्मपरायण कन्या के साथ हुआ था। विवाह के बहुत दिनों बाद तक सुदेहा - सुधर्मा के कोई संतान नहीं हुई तो लोग ताने मारने लगे। सुदेहा ने किसी प्रकार अपने पति को समझा-बुझा कर अपनी बहन घुष्मा  से विवाह करा दिया और यह वचन दिया कि वह कभी घुष्मा  से ईर्ष्या  नहीं करेगी। कुछ दिनों बाद घुष्मा  को पुत्र की प्राप्ति हुई तो सुदेहा के मन में जलन ने स्थान बना लिया। एक रात उसने घुष्मा  के पुत्र का वध करके सरोवर में फेंक दिया। घुष्मा ने उस दिन भी शिव  की भक्ति नहीं छोड़ी और नित्य की भांति सरोवर पर जाकर  पूजा अर्चना की। पूजा के बाद उसने पीछे मुड़कर देखा तो उसका पुत्र जीवित था और मुस्करा रहा था। जब क्रोध में आकर शिव  सुदेहा का वध करने चले तो घुष्मा  ने अनुनय - विनय करके उन्हें प्रसन्न कर लिया और सुदेहा का वध करने से रोक लिया तथा विनती की कि वे वहीं शिवलिंग के रूप में विराजें। शिव  ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और ज्योतिर्लिंग के रूप में विराज गए। आज उन्हीं की घृष्णेश्वर  या घुष्म ईश्वर  के रूप में पूजा होती है।

मंदिर का वास्तु: मंदिर की संरचना पर स्थानीय स्थापत्य कला का पूरा प्रभाव देखा जा सकता है। गर्भगृह और मंडप दोनों ही उत्कृष्ट  कारीगरी के नमूने हैं और बसाल्ट पत्थरों को काटकर बनाए गए हैं। शिखर भी सुंदरतापूर्वक बनाया गया है जिसपर ज्यामितीय आकृतियां बनी हैं। मंदिर का पुररुद्धार इंदौर की धर्मपारायाणा रानी अहल्याबाई होल्कर (1765.1795 ) ने कराया है। वे अनेक ज्योतिर्लिंगों के उद्धारक के रूप में प्रसिद्ध हैं।

घृष्णेश्वरमंदिर के लिए यहाँ उतरते हैं     छाया : हरिशंकर राढ़ी 
मंदिर में प्रवेश  हेतु कुछ नियम हैं। पुरुष दर्शनार्थी  केवल अधोवस्त्रों में ही मंदिर में प्रवेश  कर सकते हैं। उन्हें कुर्ता , कमीज, बनियान और बेल्ट उतारना पड़ता है। यह नियम दक्षिण के बहुत से मंदिरों में लागू होता है, त्रिवेंद्रम के स्वामी पद्मनाभ मंदिर में तो पैंट -पाजामा भी स्वीकृत नहीं है। वहां धोती पहनकर ही दर्शन  हेतु आप जा सकते हैं। घृष्णेश्वर  मंदिर में मुख्यतः दो आरतियां प्रातः छह बजे एवं रात्रि के आठ बजे दर्शनीय  होती हैं। सोमवार, प्रदोष  एवं शिवरात्रि पर विशेष भीड़ होती है। रुद्राभिषेक  पूजा के लिए शुल्क  निर्धारित हैं। कोई भक्त अपने नाम पर्ची कटाकर चला आए तो उसके नाम की पूजा कर दी जाती है और प्रसाद उसके पते पर डाक द्वारा भेज दिया जाता है।

घृष्णेश्वर  दर्शन  के पश्चात  अभिषेक  की पर्ची लेकर हम परिसर से बाहर आए। यह सोचते हुए की इस देश  में भ्रमण को कितना महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया होगा कि दर्शन  के बहाने ही सही, लोग कहां -कहां चले आते हैं। अपने आप को भाग्यशाली  मानते हुए हम मंदिर के वास्तु को निहारते रहे। कुछ देर मंदिर के बाहर बिताकर और भगवान शिव को अपने इस स्वरूप के पास बुलाने का आभार ज्योतिलिंग स्त्रोत के शब्दों में  देते  हुए अगले पड़ाव एलोरा की ओर चल पड़े -
इलापुरे रम्यविशालकेऽस्मिन समुल्लसन्तं जगद्वरेण्यम्।
वन्दे महोदारतरस्वभावं, घृष्णेश्वराख्यं  शरणं प्रपद्ये।।


घृष्णेश्वरमंदिर के पास      छाया : हरिशंकर राढ़ी 



Thursday, 6 March 2014

ब्रांड के आदी मुंबईकरों ने पहचानी जेनरिक की महत्ता



मुंबई शहर अपने आप में एक ब्रांड है। यहाँ रहने वाले लोग भी ब्रांडेड हैं। उनके कपड़े, गाड़िया सब के सब ब्रांडेड हैं, यहाँ तक की उनकी सोच भी ब्रांडेड हो गयी है। जाहिर सी बात है कि ये तथाकथित ब्रांडेड लोग दवाइयां भी ब्रांड देखकर खरीदते हैं। लेकिन जब जेनरिक मेडसिन के बारे में इन्हें जानकारी मिली तो उन्हें जेनरिक पर भरोसा हुआ और ब्रांड का मोह भंग हो गया। और इस शुभ कार्य में कड़ी का कार्य प्रसिद्ध पर्यावरणविद दंपति नूसरत खत्री और अफजल खत्री ने किया। उन्होंने स्वस्थ भारत विकसित भारत अभियान चला रही संस्था प्रतिभा-जननी सेवा संस्थान के राष्ट्रीय संयोजक आशुतोष कुमार सिंह को मुंबई के मालाड स्थित रहेजा टिपको हाइट्स के क्लब हाउस में जेनरिक मेडसिन पर व्याख्यान देने के लिए बुलाया।

व्याख्यान सुनने पहुंचे लोगों के मन में जेनरिक दवाइयों को लेकर तरह-तरह के भ्रम थे। वे ब्रांड से इतर कुछ समझने के लिए शुरू में तैयार नहीं थे लेकिन जैसे-जैसे आशुतोष कुमार सिंह ने उनके मन के अंदर के भ्रम को दूर किया, उन्हें लगा कि दवाइयों में ब्रांड की जरूरत नहीं है। आशुतोष कुमार सिंह ने अपने व्याख्यान में इस बात पर जोर दिया की इस देश को गुणवत्तायुक्त सस्ती दवाइयों की जरूरत है न की ब्रांडेड दवाइयों की। इस मौके पर प्रतिभा-जननी सेवा संस्थान के चेयरमैन मनोज सिंह राजपूत ने अपनी संस्था द्वारा चलाए जा रहे स्वस्थ भारत विकसित भारत अभियान के बारे में लोगों को बताया। इस व्याख्यान को आयोजित कराने में रहेजा सोसाइटी के संजय रुंगटा, हेमेन्द्र मेहता, सुधीर तिवारी, पराग जर्दोश सहित अल्का अग्रवाल की प्रमुख भूमिका रही। इस व्याख्यान के बाद आम लोगों के मन में एक ही सवाल था कि आखिर ये जेनरिक स्टोर सरकार खोल क्यों नहीं रही है।  

Tuesday, 4 March 2014

दवाई उद्योग का असली फार्म्युला

ये दो अलग-अलग विषयों पर की गई फेसबुकीय टिप्पणियां हैं. टिप्पणियां अपने ही एक पोस्ट पर आशुतोष कुमार सिंह ने की हैं. ब्लॉग की दुनिया से जुड़े लोग भी जान सकें, इस इरादे से इसे यहां दे रहा हूं.

हिन्दुस्तान के बाजारों में जो कुछ भी बिक रहा है अथवा बेचा जा रहा है उसकी मार्केटिंग का एक बेहतरीन फार्मुला है भ्रम फैलाओं, लोगों को डराओं और मुनाफा कमाओं। जो जितना भ्रमित होगा, जितना डरेगा उससे पैसा वसूलने में उतना ही सहुलियत होगी। डर और भ्रम को बेचकर मुनाफा कमाने की परंपरा तो बहुत पुरानी रही है, लेकिन वर्तमान में इसकी होड़ मची हुई है। लाभ अब शुभ नहीं रह गया है। लाभालाभ के इस होड़ में मानवता कलंकित हो रही है। मानवीय स्वास्थ्य से जुड़ी हुई दवाइयों को भी इस होड़ ने अपनी गिरफ्त में ले लिया है। दवाइयों की भी ब्रान्डिंग की जा रही है। दवाइयों को लेकर कई तरह के भ्रम फैलाएं जा रहे हैं। दवाइयों के नाम पर लोगों को डराया जा रहा है।
 
ब्रांडेड व जेनरिक दवाइयों को लेकर हिन्दुस्तान के मरीजों को भी खूब भ्रमित किया जा रहा है। मसलन जेनरिक दवाइयाँ काम नहीं करती अथवा कम काम करती हैं। जबकि सच्चाई यह है कि हिन्दुस्तान में लिगली जो भी दवा बनती है अथवा बनाई जाती है, वह इंडियन फार्मा कॉपी यानी आईपी के मानको पर ही बनती हैं। कोई दवा पहले 'दवा' होती है बाद में जेनरिक अथवा ब्रांडेड। दवा बनने के बाद ही उसकी ब्रांडिंग की जाती है यानी उसकी मार्केटिंग की जाती है। मार्केटिंग के कारण जिस दवा की लागत 2 रुपये प्रति 10 टैबलेट है उपभोक्ता तक पहुँचते-पहुँचते कई गुणा ज्यादा बढ़ जाती है। फलतः दवाइयों के दाम आसमान छुने लगते हैं। ये तो हुई ब्रांड की बात। अब बात करते हैं जेनरिक की।

सबसे पहला प्रश्न यही उठता है कि जेनरिक दवा क्या है। इसका सीधा-सा जवाब है, जो दवा पेटेंट फ्री है वह जेनरिक है। इसको एक उदाहरण से समझा जा सकता है। मोहन की दवा कंपनी ने वर्षों शोध कर एक नई दवा का आविस्कार किया। अब उस दवा पर विशेषाधिकार मोहन की कंपनी का हुआ। इस दवा को ढूढ़ने से लेकर बनाने तक जितना खर्च होता है, उसकी बजटिंग कंपनी की ओर से किया जाता है। उसका खर्च बाजार से निकल आए इसके लिए सरकार उसे उस प्रोडक्ट का विशेषाधिकार कुछ वर्षों तक देती है। अलग-अलग देशों में यह समय सीमा अलग-अलग है। भारत में 20 तक की सीमा होती है। बाजार में आने के 20 वर्षों के बाद उस दवा के उस फार्मुले का स्वामित्व खत्म हो जाता है। ऐसी स्थिति में कोई भी दूसरी फार्मा कंपनी सरकार की अनुमति से उस दवा को अपने ब्रांड नेम अथवा उस दवा के मूल साल्ट नेम के साथ बेच सकती है। जब दूसरी कंपनी उस दवा को बनाती है तो उसी दवा को समझने-समझाने के लिए जेनरिक दवा कहा जाने लगता है। इस तरह से यह स्पष्ट होता है कि जेनरिक दवा कोई अलग किस्म या प्रजाति की दवा नहीं हैं। उसमें भी मूल साल्ट यानी मूल दवा वहीं जो पहले वाली दवा में होती है। केवल दवा बनाने वाली कंपनी का नाम बदला है, दवा नहीं बदली है।

वैसे भी पहले दवा ही बनती है, बाद में उसकी ब्रांडिग होती है। यदि भारत जैसे देश में जहाँ पर आधिकारिक तौर पर गरीबी दर 29.8 फीसद है या कहें 2010 के जनसांख्यिकी आंकड़ों के हिसाब से यहां साढ़े तीन सौ मिलियन लोग गरीब हैं। वास्तविक गरीबों की संख्या इससे काफी ज्यादा है। जहाँ पर दो वक्त की रोटी के लिए लोग जूझ रहे हैं, वैसी आर्थिक परिस्थिति वाले देश में यदि दवाइयों के दाम जानबूझकर ब्रांड के नाम पर आसमान में रहे तो आम जनता अपने स्वास्थ्य की रक्षा कैसे कर पायेगी!

सच तो यह है कि भारत में स्वास्थ्य को लेकर न तो आम जनता सचेत है और न ही सरकारी स्तर पर ऐसा कुछ दिख रहा है। पिछले 65 वर्षों में सरकार ने क्या किया है इसकी पोल रिसर्च एजेंसी अर्नेस्ट एंड यंग व भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग महासंघ (फिक्की) की ओर से जारी एक रिपोर्ट में खुल कर सामने आया है। इस रिपोर्ट में स्वास्थ्य संबंधित जो मुख्य बातें बतायी गयी है उसके मुताबिक लगभग 80 फीसदी शहरी परिवार और 90 फीसदी ग्रामीण परिवार वित्तीय परेशानियों के कारण अपने वार्षिक घरेलू खर्च का आधा हिस्सा भी ठीक से स्वास्थ्य सुविधाओं पर खर्च नहीं कर पाते। सन् 2008 में किए गए अध्ययन के आधार पर जारी इस रिपोर्ट में सबसे चौकाने वाला तथ्य यह है कि स्वास्थ्य सेवाओं से संबंधित खर्च के कारण भारत की आबादी का लगभग 3 फीसदी हिस्सा हर साल गरीबी रेखा के नीचे फिसल जाता है। यहाँ पर यह भी ध्यान देने वाली बात है कि स्वास्थ्य सेवाओं पर कुल खर्च का 72 प्रतिशत केवल दवाइयों पर खर्च होता है। रिसर्च एजेंसी अर्नेस्ट एंड यंग व फिक्की के संयुक्त तत्वाधान में जारी इस रिपोर्ट में सार्वभौमिक स्वास्थ्य देखभाल लक्ष्य के बेहतर क्रियान्वयन के लिए एक रूपरेखा बनाने की आवश्यकता पर सरकार का ध्यान आकृष्ट किया गया है। रिपोर्ट में यह अनुमान लगाया गया है कि अगर जीडीपी का 4 फीसदी हिस्सा स्वास्थ्य सुविधाओं पर खर्च किया जाए, तो अगले 10 सालों में सबके लिए सार्वभौमिक स्वास्थ्य देखभाल लक्ष्य को हासिल किया जा सकेगा।

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि चीन एकमात्र ऐसा देश है जो अपनी विशाल जनसंख्या के कारण इसी तरह की स्वास्थ्य समस्याओं का सामना कर रहा है, बावजूद इसके पिछले दो-तीन वर्षों में वह 84 फीसदी जनसंख्या को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने में सफल रहा है और फिलहाल जीडीपी का 5 फीसदी हिस्सा स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च भी कर रहा है। भारत में स्वास्थ्य पर जीडीपी का एक फीसदी भी ठीक से खर्च नहीं होता।

मुंबई में पिछले दिनों प्रतिभा जननी सेवा संस्थान की ओर से स्वस्थ भारत विकसित भारत अभियान के अंतर्गत चलाएं जा रहे जेनरिक लाइए पैसा बचाइए कैंपेन के तहत तीन-चार सभाओं में बोलने का मौका मिला था। मुंबई के पढ़े-लिखे लोगों के मन में भी जेनरिक को लेकर अजीब तरह का भ्रम था। किसी को लग रहा था कि ये दवाइयां सस्ती होती है, इसलिए काम नहीं करती। ज्यादातर लोग तो ऐसे थे जिन्होंने जेनरिक शब्द ही कुछ महीने पहले सुना था। कुछ लोगों को लग रहा था कि जेनरिक दवाइयां विदेश में बनती हैं। इसी संदर्भ में सामाजिक कार्यकर्ता अफजल खत्री ने एक वाकया सुनाया। उन्होंने बताया कि जब वे ठाकुर विलेज स्थित एक दवा दुकान पर गए और दवा दुकानदार से डायबिटिज की जेनरिक दवा माँगे तो वहाँ खड़ी एलिट क्लास की कुछ महिलाएं मुँह-भौ सिकुड़ते हुए उनसे कहाँ कि जेनरिक दवाइयां गरीबों के लिए बनती है, वो यहाँ नहीं मिलेगी किसी झुग्गी-झोपड़ी वाले इलाके के दवा दुकान पर चले जाइए। अफजल खत्री के जिद पर दवा दुकानदार ने जेनरिक दवा उनको आखिरकार दी।
उपर की बातों से स्पष्ट हो जाता है कि आज भी हमारा पढ़ा-लिखा समाज सच्चाई जाने बिना आधे-अधूरे जानकारी के आधार पर किसी चीज के बारे में गलत-सही जो धारणा-अवधारणा बना लेता है, उसे त्यागने के लिए वह तैयार नहीं है। फिर भी हमारे लिए यह सुखद रहा कि जेनरिक दवाइयों के बारे में व्याप्त भ्रम के बारे में पूरी बात जानने के बाद ज्यादातर सभा में आए ज्यादातर लोग इस भ्रम से निकल चुके हैं।

(आशुतोष स्वस्थ भारत विकसित भारत अभियान चला रही प्रतिभा-जननी सेवा संस्थान के राष्ट्रीय समन्वयक व युवा पत्रकार हैं। संपर्क-zashusingh@gmail.com)

Monday, 3 March 2014

जेनरिक के बारे में जागरूक हुईं महिलाएं

मुंबई में जेनरिक दवाओं के बारे में महिलाओं की जागरूकता के लिए एक सेमिनार का आयोजन किया गया। इस जेनरिक व्याख्यान की सबसे बड़ी विशेषता यह रही की जितनी भी महिलाएं आयीं थी उन सबने खुलकर जेनरिक के बारे में सवाल-जवाब किया और अंत में जेनरिक दवाइयों के भ्रम से मुक्त होकर लौटीं। स्वस्थ भारत विकसित भारत अभियान के अंतर्गत जेनरिक लाइए पैसा बचाइए कैंपेन चला रही संस्था प्रतिभा जननी सेवा संस्थान(पी.जे.एस.एस) के नेशनल-को-आर्डिनेटर आशुतोष कुमार सिंह ने कहा कि भारत जैसे गरीब देश में आम लोगों को सस्ती दवाइयों के बारे में जागरूक करना बहुत जरूरी है। इस संदर्भ में जेनरिक दवाइयों का प्रचलन एक रास्ता हो सकता है। वो जोगेश्वरी स्थित बिमल अपार्टमेंट में आयोजित जेनरिक लाइए पैसा बचाइए कैंपेन के तहत आयोजित सेमिनार में स्थानीय महिलाओं को संबोधित कर रहे थे। कार्यक्रम की शुरूआत में पी.जे.एस.एस द्वारा चलाए जा रहे ‘स्वस्थ भारत विकसित भारत’ अभियान के बारे में पावर प्वाइंट प्रेजेंटेशन के माध्यम से संस्था के चेयरमैन मनोज सिंह राजपूत ने अपनी बात रखी। उन्होंने बताया कि किस तरह से संस्था ने पिछले दो वर्षों में दवाइयों कीमतों को कम करने के लिए सरकार पर दबाव बनाया है। 

ऑल इंडिया वुमेंस कॉफ्रेंस, जोगेश्वरी व वुमेन फॉर गुड गवर्नेंस की महिलाओं को जेनरिक दवाइयों के बारे में बताते हुए पीजेएसएस के नेशनल को-आर्डीनेटर आशुतोष कुमार सिंह ने कहा कि अब जरूरत है कि हम लोग दवाइयों ब्रांड के प्रयोग का विरोध करें। हमें दवाइयों की जरूरत है न की ब्रांडेड दवाइयों की। इस संदर्भ में जेनरिक दवाइयों का प्रचलन जरूरी है। उन्होंने राजस्थान व तमिलनाडु का उदाहरण देते हुए बताया की किस तरह से वहाँ की राज्य सरकारों ने जेनरिक दवाइयों के माध्यम से लोगों को सस्ती दवाइयां उपलब्ध करवाया है। जेनरिक पर अपना व्याख्यान देते हुए श्री आशुतोष ने लोगों के मन में जेनरिक के बारे में जितने भी भ्रम है उसे दूर किया। 

इस जेनरिक व्याख्यान की सबसे बड़ी विशेषता यह रही की जितनी भी महिलाएं आयीं थी उन सबने खुलकर जेनरिक के बारे में सवाल-जवाब किया और अंत जेनरिक दवाइयों के भ्रम से मुक्त होकर लौटीं। ऑल इंडिया वुमेन कॉन्फ्रेंस की अध्यक्षा आशा मुनी ने इस तरह के कार्यक्रम होते रहने पर जोर देते हुए अपनी संस्था की ओर से इस कैंपेन को आगे बढ़ाने का भरोसा दिलाया। जेनरिक लाइए पैसा बचाइए व्याख्यान का आयोजन ऑल इंडिया वुमेन कॉंफेंस, जोगेश्वरी व वुमेन फॉर गुड गवर्नेंस के संयुक्त तत्वाधान में किया गया। इस कार्क्रम में पी.जे.एस.एस के दिवाकर शर्मा, अभिनेता इंद्रजीत, टीवी कलाकार व गायक अमरेन्द्र शर्मा, डॉ. सागर, निर्भय यादव, समाज सेविका नूसरत खत्री, सामाजिक कार्यकर्ता राकेश अग्रवाल, बिन्दु दलाल व आर्युवेदाचार्य व फिल्म लेखिका डॉ भारती भट्ट की उपस्थिति ने इस सेमिनार को इंटरैक्टिव बना दिया। कार्यक्रम का संचालन नेहल दलाल ने किया।