Monday, 15 December 2014

जामाता दशमो ग्रह:

इष्ट देव सांकृत्यायन

सतयुग की बात है. एक महान देश में महालोकतंत्र था. उस महालोकतंत्र में एक महान लोकतांत्रिक संगठन था और ऐसा नहीं था कि संगठन का मुखिया हमेशा एक ही कुल के लोग रहे हों. कई बार रद्दोबदल भी हुई. थोड़े-थोड़े दिनों के लिए अन्य कुलों से भी मुखिया उधारित किए गए. यह अलग बात है कि वे बहुत दिन चल नहीं पाए, क्योंकि पार्टी के योग्य और सक्षम आस्थावानों ने कई प्रकार के गुप्तयोगदान कर मौका पाते ही उन्हें निकासद्वार दिखा दिया तथा महान लोकतांत्रिक परपंरा निभाते हुए पुन: मूलकुल से ही मुखिया चुन लिया. वैसे संगठन में उदात्त मूल्यों के निर्वहन का जीवंत प्रमाण यह भी है कि मुखिया अन्यकुल का होते हुए भी हाईकमान की हैसियत में हमेशा मूलकुल ही रहा.

संगठन में एकता और मूल्यों के प्रति समर्पण के भाव का अनुमान आप इस बात से कर सकते हैं कि इसके सभी सदस्य अपने उदात्त मूल्यों का निर्वाह अपने पादांगुष्ठ से लेकर मेरुदंड और ब्रह्मरंध्र तक के मूल्य पर किया करते थे. कुछ भी हो जाए, वे मूलकुल और उसके उदात्त मूल्यों की रक्षा में सदैव तत्पर रहते थे. महाराज दशरथ ने जिस एक वचन की रक्षा के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा दी थी,  इसके सदस्य अपने मूलकुल की प्रसन्नता के लिए वैसे कई वचनों की बाजी लगाने को कोई महत्व ही नहीं देते थे. जैसा कि गोस्वामी जी ने कहा है... जहाँ सुमति तहँ संपति नाना, ऐसे संगठन के प्रभाव और उसकी समृद्धि के तो कहने ही क्या! यह संगठन के भीतर उदात्त मूल्यों के निर्वाह का ही परिणाम था कि एक-दो बार देश की बागडोर उसके हाथ से अवश्य गई, पर जिन हाथों में गई वे भी कभी मूलकुल के चरणों से ऊपर नहीं बढ़े.

इसी क्रम में सिंहासन पर बड़ा परिवर्तन हुआ और फिर जिन हाथों में बागडोर गई, वे चरणों से थोड़ा आगे, यानी टखनों की ओर बढऩे लगे. ख़ैर, वे बढ़े ही थे कि स्वयं उनका अपना ही घुटना बदल गया और संगठन फिर सिंहासन का स्वामी हो गया. यद्यपि इस बार तप-त्याग का परिचय देते हुए वह सिंहासन पर स्वयं आरूढ़ न हुआ. उसने वहां अपना अत्यंत विश्वस्त प्रतिनिधि बैठाया और स्वयं केवल हाईकमान बनकर संतुष्ट रहा. जैसे ही उसने बागडोर संभाली चारों तरफ़ सुख-शांति की बाढ़ आ गई. खाद्य पदार्थों सहित सभी वस्तुएं इतनी सस्ती हो गईं कि लोगों ने ख़रीदनी ही छोड़ दीं. सरकारी कार्यालयों में सभी काम इतने शिष्टाचारपूर्वक होने लगे कि लोग ख़ुशी से पागल होने लगे. मंत्रियों से लेकर अफ़सरों और बाबुओं तक को इतनी बड़ी-बड़ी राशियां चढ़ाने लगे कि देश के बैंक छोटे पडऩे लगे.
मूलकुल के नेतृत्व में संगठन के बढ़ते प्रताप को देख स्वर्ग के सम्राट का सिंहासन भी असंतुलित होने लगा. लेकिन, आलस्य के शिकार स्वर्गसम्राट ने सोचा कि जनता इतनी तो समझदार है नहीं. हो सकता है, अगली बार इसे न चुने. आश्चर्य, ऐसा हुआ नहीं. जनता की समझदारी के साथ-साथ तकनीकी चमत्कारों ने भी कमाल किया और उसका सिक्का फिर से जम गया. तब तो स्वर्गसम्राट की निद्रा ही उड़ायमान हो गई.

उन्होंने तुरंत देवगुरु से संपर्क किया. देवगुरु ने एक श्लोक सुनाया -
सदा वक्र: सदा क्रूर: सदा पूजामपेक्षते.
कन्याराशिस्थितो नित्यं जामाता दशमो ग्रह:..

अर्थात्, हे वत्स प्रभु स्वयं तो सीधे कुछ करते नहीं हैं. उन्हें जो कुछ भी करना होता है, उसके लिए वे हमेशा ग्रहों को ही माध्यम बनाते हैं और उन्हीं के स्थानों में कुछ फ़ेरबदल कर अपना इच्छित कार्य करवाते हैं. मुश्किल यह है कि पहले से मान्य नौ ग्रह तो अब इस कुल के समक्ष आत्मसमर्पण कर चुके हैं. अतः तुम्हारा त्राण तो अब केवल दसवाँ ग्रह ही कर सकता है. वही क्रूर ग्रह, जो हमेशा वक्री रहता है और पूजा की अपेक्षा करता है. सदैव कन्या राशि में ही स्थित रहने वाले उस दसवें ग्रह को जामाता अर्थात् दामाद कहते हैं.


नोट : लेखक टाइममशीन पर यहीं तक देख पाया था. इसके बाद बिजली चली गई. थोड़ी प्रतीक्षा करें, पता चलने पर हाल बताया जाएगा.

Wednesday, 10 December 2014

ग़ायब होने का महत्व

इष्ट देव सांकृत्यायन

परिवेदना के पंजीकरण और निवारण की तमाम व्यवस्थाएं बन जाने के बाद भी भारतीय रेल ने अपने परंपरागत गौरव को बरकरार रखा है। देर की सही तो क्या, कैसी भी सूचना देना वह आज तक मुनासिब नहीं समझती। जानती है कि हमसे चलने वाले ज़्यादातर लोग नौकरीपेशा हैं और वह भी तीसरे दर्जे के। इनके पास उपभोक्ता फोरम जाने तो क्या, चिट्ठी लिखने की भी फ़ुर्सत नहीं होती। ऊपर से शिकायत निवारण के हमारे विभिन्न तंत्रों ने इनकी पिछली पीढ़ियों को इतने अनुभव दिए हैं कि समझदार आदमी तो अगर फ़ुर्सत हो, तो भी यथास्थिति झेलते हुए मर जाना पसंद करे, पर शिकायत के लिए कोई दरवाज़ा न खटखटाए। ख़ासकर रेल के संबंध में। वैसे भी, हमारे पास दुनिया देखने का जो इकलौता मुनासिब साधन है वह रेल है, इसलिए अनुभव भी जितने हैं, सब रेल के ही दिए हुए हैं। तो जीवन का यह जो अनुभव मैं आपसे साझा करने जा रहा हूं, यह भी रेल का ही दिया हुआ है और पूरे होशो-हवास में बता रहा हूं कि मेरा अपना और मौलिक है।

हुआ यह कि हम सफ़र में थे। सफ़र से एक और सफ़र पर निकलना था, लिहाज़ा ठहरने के लिए जो ठीया चुना वह रेलवे स्टेशन के निकट का था। पहली बार जब स्टेशन पहुंचे तो मालूम हुआ कि हमारी अगली ट्रेन 2 घंटे लेट है। तय किया कि अभी इसी कमरे में पड़े रहते हैं, क्योंकि हमारा चेक आउट टाइम तीन घंटे बाद का है। पर जब अगली बार निकले तो नए दिन का किराया शुरू हो जाने की पूरी संभावना थी, लिहाज़ा सब साजो-सामान लेकर निकले। स्टेशन पहुंचने पर मालूम हुआ कि अब ट्रेन तीन घंटे और लेट हो गई है। लेकिन, अब निकलते तो जाते कहाँ? लिहाज़ा वहीं वेटिंग रूम में डेरा डाल दिया। इस तीन घंटे बाद फिर मालूम हुआ कि अब ट्रेन छह घंटे और लेट हो गई है। अब तक तो जैसे-तैसे बच्चों को चिप्स-कुरकुरे-कोल्ड ड्रिंक के दम पर रोक रखा था, पर अब बच्चे मानने वाले नहीं थे। जैसा कि भारत में आम तौर पर होता है, बड़े अपने बड़प्पन के खोल में दुबके पड़े रहें तो पड़े रहें, पर बच्चों को दूसरे बच्चे मिलते ही सारी दीवारें कूद-फांदकर अपने बचपन के मैदान में निकलते देर नहीं लगती। वहाँ उन्हें ट्रेन के इंतज़ार में बोर होते दूसरे बच्चे मिले और वे चल पड़े हाइड एंड सीक खेलने।

ग़ौर किया तो पता चला, यह वही खेल है जिसे हम अपने बचपन में आइस-पाइस कहा करते थे। एक बच्चे ने अपनी आँखें बंद कीं और बाक़ी ग़ायब। अब बेचारा वो ढूंढे बाकी को। एक वह है जिसकी तलाश किसी को नहीं है, और उसे सबकी तलाश है। उस बच्चे की स्थिति वैसी ही हो जाती है, जैसी हमारे देश के ज्ञात इतिहास में ईमानदारी की चली आ रही है। यहाँ वही महत्वपूर्ण होते हैं जो ग़ायब हो जाते हैं। जो सामने रहते हुए क़तई महत्वपूर्ण नहीं होते, ग़ायब होते ही बेहद महत्वपूर्ण हो जाते हैं। इसीलिए कई लोग, जो महत्वपूर्ण होने के लिए पहले ग़ायब नहीं हो पाते, महत्वपूर्ण होने के बाद ग़ायब होना सीख लेते हैं। इस तरह के महत्वपूर्णों की पहली कटेगरी में संत-महात्मा आते हैं। वे महत्वपूर्ण ही इसलिए माने जाते हैं क्योंकि उन्हें सबके बीच से बैठे-बैठे ग़ायब हो जाना आता है। इसे वे अंतर्धान हो जाना बोलते हैं। महत्वपूर्णों की एक दूसरी कटेगरी भी है, जिसमें जनप्रतिनिधि, सरकारी अफसर और बाबू लोग आते हैं। ये पहले महत्वपूर्ण बनते हैं, फिर ग़ायब हो जाते हैं। बाद में ग़ायब होने का यह आशय बिलकुल न लगाएं कि इनकी महत्वपूर्णता का इनकी ग़ायबता से कोई संबंध नहीं है। संबंध है।

संबंध ऐसे है कि जब ये ग़ायब हो जाते हैं तो इनका महत्व और ज़्यादा बढ़ जाता है। हालांकि बढ़ता हुआ यह महत्व एक दिन चूक जाता है और तब इन्हें फिर से प्रकट होना पड़ता है। जब ये प्रकट होते हैं तो अपने साथ कई और महत्वपूर्ण रहस्य भी ले आते हैं प्रकट करने के लिए। हर बार इन रहस्यों की वृत्ति-प्रकृति सब अलग-अलग होती है और हर बार नए-नए रहस्यों का साक्षात्कार कर जनता दंग रह जाती है। इसके बाद वह फिर अपने विवेकानुसार कुछ को महत्वपूर्ण बनाती है और कुछ को नहीं बना पाती। जिन्हें वह दुबारा महत्वपूर्ण बना देती है, वे अपना महत्व और-और बढ़ाने के लिए फिर ग़ायब हो जाते हैं; जिन्हें नहीं बना पाती, वे ग़ायब भी नहीं होते। वे फिर अगले अवसर तक के लिए प्रकट रहते हैं। तब तक जब तक कि वे फिर से महत्वपूर्ण न बन जाएं। और महत्वपूर्ण बनते ही, आप तो जानते हैं, फिर से ग़ायब होना उनकी मजबूरी हो जाती है।

जैसा कि आप जानते ही हैं, आज़ादी के बाद हमारे देश में अगर सबसे ज़्यादा महत्व किसी का बढ़ा है तो वो हैं फाइलें। आदमी हो न हो, उसकी फाइल होनी चाहिए। हृदय परिवर्तन के पक्षधर हमारे लोकतंत्र ने मनुष्य में सुधार की संभावना को कितना ठीक से पहचाना है, इसका अंदाज़ा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि हमारे यहाँ अगर फाइल में कोई ग़लती हो जाए तो उसमें सुधार की कोई गुंजाइश नहीं हो सकती। फाइल के हिसाब से आदमी को सुधरना पड़ता है। क्योंकि फाइल तो कभी ग़लत होती ही नहीं। पिछले कुछ वर्षों में हमारे देश की फाइलों को भी अपनी इस महत्वपूर्णता का भान हो गया है और इसके साथ ही उन्हें ग़ायब होने से महत्व बढ़ने के संबंध का भी पता चल गया। ख़ैर, नतीजा वही हुआ जो होना था। अब अपना महत्व बढ़ाने के लिए फाइलों ने भी ग़ायब होना सीख लिया है। यह कला सीखते ही उन्होंने अपना महत्व बढ़ाना शुरू कर दिया है। पहले कुछ कोयला खदानों की फाइलों ने सोचा कि सचिवालय में हमारा क्या काम! और वे वहाँ से उठकर कोलियरी की ओर कहीं चली गईं। बहुत तलाशा लोगों ने, पर वे मिलीं नहीं। फिर कुछ खेल से संबंधित फाइलों ने महसूस किया कि सचिवालय में बैठे-बैठे उनका दम घुट रहा है। लिहाज़ा वे भी किसी मैदान की ओर कूच कर गईं। खिलाड़ी उन्हें तलाशने की कोशिश में जुटे हुए हैं, पर अभी तक उनका कुछ अता-पता चला नहीं। शायद तलाशने वाले हमारी तरह आइस-पाइस के खिलाड़ी हैं और फाइलें निशानेबाजी और कबड्डी वग़ैरह से संबंधित हैं। वे कबड्डी के मैदान की ओर रुख नहीं करेंगे और ये आइस-पाइस से मिलने वाली नहीं हैं। ख़ैर, हमें क्या? अभी पता चला है, कुछ चार्जशीट वाली फाइलें ग़ायब हो गई हैं। पता नहीं, वो चार्ज होने की हैं, या लेने की, या देने की या फिर करने की। बहरहाल जो भी हो, पर अब ग़ायब हो गई हैं तो महत्वपूर्ण मान ली जानी चाहिए।

मेरे एक मित्र बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों से देशप्रेम की भावना घट रही है। मेरे जैसा कमअक्ल आदमी इसका अर्थ यह लगाता है कि देश का महत्व घट रहा है। हे भगवान, कहीं अगर देश ने अपना महत्व बढ़ाने की ठान ली....?



Friday, 5 December 2014

चिंता से चतुराई घटे

इष्ट देव सांकृत्यायन

भारत हमेशा से एक चिंतनप्रधान देश रहा है। आज भी है। चिंतन की एक उदात्त परंपरा यहाँ सहस्राब्दियों से चली आ रही है। हमारी परंपरा में ऋषि-मुनि सबसे महान माने जाते रहे हैं, इसका सबसे महत्वपूर्ण कारण यही रहा है कि वे घर-बार सब छोड़ कर जंगल चले जाते रहे हैं और वहाँ किसी कोने-अँतरे में बैठकर केवल चिंतन करते रहे हैं। चिंतन से उनके समक्ष न केवल ‘इस’, बल्कि ‘उस’ लोक के भी सभी गूढ़तम रहस्य खुल जाते रहे हैं, जिसे वे समय-समय पर श्रद्धालुओं के समक्ष प्रकट करते रहे हैं। अकसर उनके चिंतन से बड़ी-बड़ी समस्याओं का समाधान भी निकल आता रहा है। कालांतर में चिंतन से एक और चीज़ प्रकट हुई, जिसे चिंता कहा गया। 

हालांकि यह चिंतन से अलग है, यह समझने में थोड़ा समय लगा। बाद में तो यहाँ तक पता चल गया कि यह चिंतन से बिलकुल अलग है, इतना कि चिंतन जितना फ़ायदेमंद है, चिंता उतनी ही नुकसानदेह। मतलब एक पूरब है तो दूसरी पश्चिम। इनमें एक पुल्लिंग और दूसरे के स्त्रीलिंग होने से इस भ्रम में भी न पड़ें कि ये एक-दूसरे के पूरक हैं। वास्तव में ऐसा कुछ भी नहीं है। ये कुछ-कुछ वैसा ही मामला है, जैसे किसी नामी कंपनी का प्रतिष्ठित उत्पाद कोई लोकल टाइप कारखाना मिलते-जुलते नाम से निकाल देता है। बुनियादी फ़र्क़ दोनों के बीच यह है कि एक विशिष्ट जनों द्वारा किया जाता रहा है, जबकि दूसरी सामान्य जन द्वारा। लेकिन, समय के साथ वर्ग-धर्म-जाति भेद मिटने और डुप्लीकेसी बढ़ने का नतीजा यह हुआ कि कई बार सामान्य जन भी चिंतन कर डालता है और विशिष्ट जन भी चिंता के जाल में फंस जाते हैं।

हाल में आई कौलीफेर्निया यूनिवर्सिटी की एक स्टडी के अनुसार विशिष्ट जन के चिंता के जाल में फंसने का सबसे पहला विवरण त्रेतायुग में पाया जाता है। भगवान राम के वनगमन के बाद महाराज दशरथ ग़लती से चिंता कर बैठे और उसका नतीजा अब आप जानते ही हैं। वास्तव में चिंता के साइड इफेक्ट का पता यहीं से चलना शुरू हुआ और इसके साथ ही इस पर शोध भी शुरू हुए। शोधों का निष्कर्ष यह निकला कि चिंता बहुत ही ख़तरनाक टाइप चीज़ है। इससे फ़ायदा कुछ नहीं है, जबकि नुकसान हज़ारों। और तो और, इससे कई तरह की बीमारियां भी हो सकती हैं। आयुर्विज्ञान विभाग वाले अनुसंधानकर्ताओं ने इससे हो सकने वाली बीमारियों की जो सूची दी, उसमें ब्लड प्रेशर और डायबिटीज़ से लेकर हार्ट अटैक तक का नाम शामिल था।

आनन-फानन जनकल्याण विशेषज्ञों और साहित्य के आचार्यों को बुलाया गया और इस विषय में जागरूकता फैलाने के लिए कोई प्रभावी उपाय निकालने को कहा गया। काफ़ी सोच-विचार के बाद उन्होंने एक स्लोगन निकाला और उसे हवा में तैरा दिया। वह स्लोगन है – चिंता से चतुराई घटे। वैसे इसे फैलाया तो हर ख़ासो-आम के लिए गया, पर जैसा कि आम तौर पर होता है, आम लोगों में इसे समझ कम ही पाए। अलबत्ता वे और ज़्यादा इसके फेर में फंस गए। जबकि ख़ास लोगों ने इसे ठीक से समझा और इसके फेर में फंसने से बचे। बाद में ग़ौर किया गया कि कुछ ख़ासजन भी इससे बच नहीं पाए। आम तो अकसर और कभी-कभी ख़ास जन भी किसी छोटी-मोटी ग़लती के कारण चिंता में फंसकर अपनी चतुराई घटाते रहे।

इसलिए ज़रूरी समझा गया कि इसके उपचार का कोई उपाय निकाला जाए। काफ़ी शोध-अनुसंधान के बाद मालूम हुआ कि दवा तो इसके मामले में कुछ ख़ास काम आती नहीं, हाँ एक उपाय ज़रूर है। उपाय यह है कि यह जैसे ही हो उसे जता दिया जाए। उस ज़माने में चूंकि कामकाज बहुत तेज़ गति से नहीं चलता था, इसलिए यह इतनी बात पता चलते-चलते बहुत देर लग गई। त्रेता से द्वापर युग आ गया। द्वापर में आपने देखा ही कि किस तरह चिंता ने पितामह भीष्म को आ घेरा। अच्छी बात यह रही कि उन्होंने लगातार आयुर्विज्ञानियों के निर्देशों का पालन किया और उन्हें जब-जब चिंता ने घेरा, वह उसे जता देते रहे।

उसके बाद तो हमारे देश में चिंता के फेर में पड़ते ही उसे जता देने का रिवाज़ सा चल पड़ा। हमारे नए दौर के विशिष्ट जन तो उसके फेर में पड़ने से पहले ही उसे जता देते हैं। आजादी के बाद से लेकर अब तक हम देखते आ रहे हैं कि विशिष्ट जन अकसर बहुत गंभीर मसलों पर सामान्य से लेकर गंभीर और कभी-कभी अति गंभीर टाइप की भी चिंता जताते रहते हैं। मामला चाहे बाढ़ का हो या अकाल का, महंगाई का हो या बेकारी का, दंगे का हो या आतंकवाद का, या फिर पड़ोसी देशों द्वारा हमारे देश में घुसपैठ का ही क्यों न हो... हमारे विशिष्टजन चिंता जताने में कोई कोताही नहीं बरतते। कई बार तो चिंता द्वारा घेरे जाने से पहले ही उसे जता देते हैं। हालांकि जनता टाइप लोगों को चिंता जताना पसंद नहीं आता। कई बार वे किसी विशिष्ट जन द्वारा चिंता जताए जाते ही चिढ़ जाते हैं। कहते हैं, ये तो पहले वाले भी कर रहे थे, फिर आपकी क्या ज़रूरत थी? असल में समझ ही नहीं पाते कि चिंता जताना अपने आपमें बहुत कुछ करना है। मेरी मानें तो आप भी इस पर अमल करें। यानी कोई चिंता आपको घेरे, इससे पहले ही उसे जता दें। क्योंकि चिंता से चतुराई घटे और आप जानते ही हैं, चतुराई घटने का आज के ज़माने में क्या नतीजा हो सकता है।


(यह व्यंग्य दैनिक जागरण में प्रकाशित हो चुका है.) 

Thursday, 6 November 2014

पत्रकार, गिरगिट और झाड़ू की सींक

घर से निकला ही था कि देखा, मेरी फटफटिया के सीट पर गिरगिट जी विराजमान हैं. मैंने पूछा - कौन हैं सर आप? यहां कैसे विराज रहे हैं? आप तो इसे शायद चला भी नहीं पाएंगे? 
उन्होंने मेरे किसी भी सवाल का जवाब देने के बजाय उलटा सवाल ठेल दिया - जर्नलिस्ट हो क्या बे? एक साथ इत्ते सारे सवाल .... और पहचानते भी नहीं मुझे? 
मैंने कहा - हूं तो, पर आपने जान कैसे लिया? 
'बिना सोचे-समझे इत्ते सारे सवाल कोई जर्नलिस्ट ही कर सकता है', उनका जवाब था, 'गनीमत है कि तुम प्रिंट मीडिया वाले लगते हो.'
मैं तो हैरान, 'आप तो महाज्ञानी हैं सर! ये भी आपने कैसे जान लिया...?'
'इसलिए कि तुम प्रासंगिक सवाल कर रहे हो. माइक-कैमरा वाले होते तो सवाल-जवाब दोनों के सिर-पैर से तुम्हारा कोई मतलब नहीं होता.'
'वाह! आप तो केवल अंतर्यामी ही नहीं, बुद्धिजीवी भी लगते हैं. ऐसी तार्किक सोच तो ज्ञानीजनों में भी दुर्लभ है.' मैंने स्तुति में नतमस्तक होते हुए अपनी शंका उनके समक्ष रखी, 'हे सर, अब तो अपना परिचय दें.' 
‘अरे मूर्ख, अब तक नहीं पहचाना मुझे? मैं वही हूं जिसे 49 सर ने अपने चुनाव चिन्ह के रूप में मांगा है.’ 
‘ओह यानी आशुतोष दादा सही बता रहे थे?’
’तुम जर्नलिस्टों के साथ यही दिक़्क़त है. जो सही सूचना होती है, वह तुम्हें मज़ाक लगती है और जो मज़ाक होता है, पुख़्ता ख़बर लगती है. पता नहीं कैसे विश्वसनीय होते हैं तुम्हारे सूत्र.’ 
’अच्छा सर, लगे हाथ एक बात और बता दीजिए!’ मैंने विनती की.
‘पूछ, क्या जानना चाहता है.’ 
आयसु पाय भला मैं कहां चुप रहने वाला था. मैंने पूछा, ‘आपसे गले मिलने वाले वे दूसरे सज्जन कौन हैं, जिनके बारे में Manoj Sahu जी ने पूछा है.’ 
‘अबे बकलोल इतना भी नहीं समझता.....’ उन्होंने मेरी ओर रहस्यमय मुस्कान फेंकी, ‘सब मुझसे ही कहलवाएगा? ऐं?’ 
‘सर आप स्वयं कहें तो ज़्यादा अथेंटिक बात होगी न!’
‘ये ज़्यादा और कम अथेंटिक क्या होता है बे? अरे या तो अथेंटिक या ग़ैर-अथेंटिक!’ उन्होंने डपटा. 
‘माफ़ करें सर, ग़लती हो गई,’ मैंने हाथ जोड़े, ‘पर मेरा ज्ञान तो बढ़ाइए.’ 
‘अरे वो और कौन हो सकता है उनके सिवा जिनके लिए मैंने चुनाव लड़ा था और जिनकी मदद से 49 दिन सरकार चलाई थी. 
‘अच्छा सर, अब आप चलें. मुझे जल्दी दफ्तर पहुंचना है.’ 
‘ऐं, मैं क्यों चलूं? मैं तो यहां धरना देने आया हूं,’ वो तो अड़ ही गए. 
मैंने कहा, ‘प्रभु, पर मैं तो एक अदना जर्नलिस्ट हूं. मेरे पास धरना देकर क्या मिलेगा आपको? मैं तो अपनी मांगे मानने की भी हैसियत में नहीं हूं. आपकी क्या मानूंगा?’
इससे पहले कि वे कुछ बोलते पड़ोसी का बच्चा झाड़ू की सीक लिए आ गया और उसे देखते ही वो........

Thursday, 30 October 2014

आक्थू !!!

इष्ट देव सांकृत्यायन 

कहीं पान खाकर, तो कहीं गुटखा, कहीं तंबाकू खाकर और कहीं बिन कुछ खाए, ऐसे ही ... बेवजह... आक्थू! कहीं कूड़ा देखकर, तो कहीं गंदगी और कहीं बिन कुछ देखे ही, ऐसे ही मन कर गया..... लिहाज़ा .... आक्थू! चाहे रास्ता हो, या कूड़ेदान, स्कूल हो या तबेला, रेलवे या बस स्टेशन हो या फिर हवाई अड्डा, यहाँ तक कि चाहे बेडरूम हो या फिर तीर्थ ... जहां देखिए वहीं आक्थू! हमारे लिए थूकदान कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे कहीं से ढोकर लाना या फिर किसी प्रकार का श्रम करना ज़रूरी हो। हम थूकने की क्रिया में असीम श्रद्धा और विश्वास के कारण जहां चाहते हैं वहीं और जिस चीज़ को चाहते हैं उसे ही अपनी सुविधानुसार थूकदान बना लेते हैं।

शायद यही वजह है कि जिस तरह दूसरे देशों में हर मेज़ पर ऐश ट्रे यानी राखदान पाई जाती है, वैसे ही हमारे यहाँ कुछ सफ़ाईपसंद घरों में पीकदान या थूकदान पाया जाता है। यह अलग बात है कि वहाँ भी थूकदान का इस्तेमाल थूकदान की तरह कम ही होता है। यहाँ तक कि ख़ुद वे लोग भी, जो घर में सफ़ाई के मद्देनज़र थूकदान रखते हैं, बाहर निकलने पर सफ़ाई का ध्यान रखना ग़ैर ज़रूरी ही नहीं, लगभग बेवकूफ़ी जैसा कुछ समझते हैं। ख़ास तौर से ऐसी जगहों पर, जहाँ ‘यहाँ थूकना मना है’ या ‘कृपया यहाँ न थूकें’ जैसी चिप्पियाँ लगी होती हैं, न थूकना तो हम अपनी शान के ख़िलाफ़ समझते हैं। 

समझदार लोग श्रुति परंपरा को मानने वाले अपने देश में लिखे हुए की अहमियत को जानते हैं। इसीलिए वे अपनी संपत्ति में ऐसा कुछ लिखवाने के बजाय, जहाँ कहीं भी थूके जाने की आशंका होती है, वहाँ कुछ प्रतिमाएं या चित्र आदि रख देते हैं। हालाँकि आख़िरकार उनकी यह तरकीब भी काम नहीं आती, क्योंकि जैसे कुछ जंतु किसी साफ़-सुथरे स्थान पर शंका समाधान किए बग़ैर नहीं रह सकते, वैसे ही हम भारतीय थूके बग़ैर नहीं जी सकते। भले कचहरी का बाबू रिश्वत लिए बिना जी ले, बिजली परिषद का बाबू बिल में हेराफेरी किए बिना रह ले, स्कूल मैनेजमेंट जबरिया वसूली किए बिना चल ले, मीडिया वाले ख़बर मैनिपुलेट किए बिना जी लें और हम ख़ुद दो-चार दिन ऑक्सीजन लिए बिना जी लें; लेकिन भाई, ना, ये थूके बिना जीना हमारे लिए संभव नहीं है।

वैसे सरकारें यहाँ अकसर समझदारी भरे निर्णय लेती रहती हैं, लेकिन जाने क्या बात है कि केवल एक समझदारी वाला निर्णय लेने से वे अकसर चूक जा रही हैं। आज़ादी के बाद जाने ‘राष्ट्रीय’ के नाम पर ‘पशु-पक्षी’ से लेकर ‘पेड़-चिह्न’ तक क्या-क्या चीज़ें घोषित हुईं, पर हमारी राष्ट्रीय क्रिया का कहीं कोई ज़िक्र तक नहीं होता। हैरत है कि आज तक इस बारे में सोचा भी नहीं गया। ऐसा तब है, जबकि सोचने के मामले में दुनिया भर में हमारे देश का कोई सानी ही नहीं है। विश्व ही नहीं, ब्रह्मांड में सबसे महान सोचक-चिंतक-विचारक होने के कई ज्वलंत प्रमाण हम आदिकाल से ही प्रस्तुत करते आए हैं, जो कि आज तक अपने संपूर्ण प्रभाव के साथ अस्तित्वमान हैं। फिर भी अपनी राष्ट्रीय क्रिया के बारे में सोचने से हम चूक गए और इसका परिणाम यह हुआ कि दुनिया भर में हमारी प्रतिष्ठा एक निकम्मे राष्ट्र के रूप में हो गई।

बेहतर होगा कि हम इस विषय पर नए सिरे से विचार करें और थूकने को ही अपनी राष्ट्रीय क्रिया घोषित कर दें। यक़ीन मानें, यह जब मैं कह रहा हूँ तो बहुत सोच-समझ कर कह रहा हूँ और वाक़ई इससे देश को बड़े फ़ायदे होंगे। क्योंकि पहली तो बात यह कि इस क्रिया के लिए हमारे देश में जैसा मुफ़ीद माहौल है, वैसा दुनिया के शायद ही किसी और देश में हो; और दूसरी यह कि हमारे देश में ख़ास इस क्रिया के लिए जैसा मुफ़ीद माहौल है, वैसा शायद ही किसी और क्रिया के लिए हो। घर-परिवार और समाज से लेकर सरकार तक निरंतर इसके लिए अनुकूल वातावरण के निर्माण हेतु प्राणप्रण से जुटे रहते हैं। मैंने तो यहाँ तक सुना है कि विकसित देशों में जहाँ भारी संख्या में भारतीय रहते हैं, वहाँ उन्हें भारत जैसे अपनेपन का फील देने के लिए कुछ ऐसे ख़ास बाज़ार बनाए गए हैं, जहाँ दीवारों के कोनों पर पान की पीक के निशान पेंट किए गए हैं। हालांकि इस बनावटी पीक के बनावटी निशान में वह बात तो भला क्या आएगी, फिर भी अपनी मिट्टी की सोंधी ख़ुशबू जैसी थोड़ी-थोड़ी फील तो आने ही लगती है।
मुझे हैरत है कि अभी तक इस थूक या पीक पर जो भी बात हुई, वह सिर्फ़ इसके नुकसान पर हुई। लोग केवल इतना ही जानते हैं कि इससे गंदगी फैलती है, कीटाणु फैलते हैं और बीमारियाँ फैलती हैं। ठीक भाई, बिलकुल ठीक! लेकिन यह बताइए कि ऐसा कौन सा काम है जिससे गंदगी, या कीटाणु या बीमारियां न फैलती हों? अरे भाई, ये फैलने वाली चीज़ें हैं, फैलेंगी। आपके बस की बात अगर इन्हें रोकना हो तो रोक लीजिए। हमारे यहाँ तो ये तीनों चीज़ें खाने तक से फैलती हैं, तो क्या खाना छोड़ दें? हमारे यहाँ पार्टी होती है। ढेर सारा खाना बनता है और उससे भी ज़्यादा लोग अपने प्लेट में परोस लेते हैं। खा नहीं पाते तो बचे हुए खाने को फेंका जाता है। अब ख़ुद फेंकें वे भले डस्टबिन में, हालांकि इतनी ज़हमत भी कम ही लोग उठाते हैं, और अंत में डस्टबिन का पेट भी ख़ाली सड़क पर ही होता है। खाना बनाकर खुला छोड़ दिया जाता है, और तो और, कभी-कभी तो किचन के स्लैब पर ही रोटी बेल दी जाती है। कभी आपने सोचा है, इससे कितने कीटाणु फैलते हैं? अच्छा जाने दीजिए, डॉक्टर साहब से तो मिले ही होंगे। नमक से ब्लड प्रेशर, चीनी से डायबिटीज, चावल से मोटापा, दाल से प्रोटीन की अधिकता और उससे यूरिक एसिड, आलू से स्टार्च और फिर डायबिटीज़..... अरे यार, कोई ऐसी भी चीज़ है, जिससे कोई बीमारी न होती हो? तो बताओ, क्या बीमारियों के डर से हम खाना ही छोड़ दें? तो श्रीमान! बीमारियों के डर से अगर खाना नहीं छोड़ सकते तो थूकना क्यों छोड़ दें भला?   

सही पूछिए तो थूकना हमें छोड़ना चाहिए भी नहीं। यह अलग बात है कि आपको कभी बताए नहीं गए, लेकिन इसके फ़ायदे बहुत हैं। थूकने से गंदगी फैलती है, यह सिक्के का एक पहलू है। दूसरा पहलू यह है कि इससे गंदगी को फैलने से रोका भी जाता है। मुझे याद है, दो दशक पहले तक मेरे गाँव में लोग चोरी करने वालों पर थूकते थे। रिश्वत लेने, लड़की छेड़ने, दलाली करने, झूठ बोलने और यहाँ तक कि कोई वादा करके मुकर जाने वालों पर भी लोग थूकते थे। हालाँकि यह थूकना असल में नहीं, केवल सांकेतिक होता था। मने लोग बोल देते थे थू-थू और मान लिया जाता था कि थूक दिया गया। कोई भौतिक रूप से थूकता नहीं था। इतने के ही डर से बहुत सारे लोग ऐसे गंदे काम करने से बचते थे और बुराइयाँ फैलने से रुक जाती थीं। जैसे-जैसे लोगों ने इन पर थूकना कम किया इनके कीटाणु बहुत तेज़ी से फैलने लगे। और अब तो आप देख ही रहे हैं।

और तो और, हमारे देश की सेहत व्यवस्था को बनाए रखने में भी इस क्रिया का बड़ा महत्वपूर्ण योगदान है। ज़रा सोचिए, एक अनार सौ बीमार की कहावत ऐसे ही तो नहीं आई होगी! ज़ाहिर है, हमारे यहाँ अस्पताल व्यवस्था का आदिकाल से ही वही हाल है, जो आज दिखता है। इसीलिए बीमार पड़ने पर स्वस्थ होने के बजाय हम स्वर्ग के लिए सीढ़ी बना लेना बेहतर समझते थे। यह शायद अस्पतालों की कमी का ही नतीजा है कि पहले असाध्य बीमारियों से ग्रस्त सदस्य को लोग अपने घरों से निकाल देते थे। अब समय बहुत तरक़्क़ी कर गया है। योग्य बच्चे बुढ़ापे की ओर बढ़ते ही अपने माता-पिता को ओल्ड एज होम का रास्ता दिखा देते हैं। जहाँ शारीरिक रोगों का ही यह हाल हो, वहाँ मानसिक बीमारियों के लिए इलाज़ की सुविधा का अंदाज़ा आप आसानी से लगा सकते हैं। अब ज़रा सोचिए, जहाँ चिकित्सा की आधुनिक तकनीक का उपयोग जन्म लेने से पहले ही बेटियों को मार देने के लिए किया जाता हो, दहेज के लिए हाथों की मेंहदी छूटने से पहले ही बहू की चिता सजा दी जाती हो, प्रेम करने के अपराध में युवाओं को पेड़ पर लटका दिया जाता हो, भ्रष्ट अफ़सर को विधिनिर्माता बनाने का रास्ता दिया जाता हो और ईमानदार अफ़सर को एक बार हुए तबादले की जगह ज्वाइन करने से पहले ही दूसरी जगह और दूसरी जगह निकलने से पहले ही तीसरी जगह तबादले का ऑर्डर थमा दिया जाता हो, कुल पड़े वोटों का पंद्रह फ़ीसद पाकर सौ फ़ीसद जनता के प्रतिनिधित्व का दावा किया जाता हो और इस नाम पर कुछ भी अनाप-शनाप क़ानून बनाने की छूट ली जाती हो, बलात्कार करने वाले को नाबालिग मान लिया जाए, आतंकवादियों को देश का बेटा-बेटी बताया जाए, आतंकवादियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई में शहीद हुए अफ़सर की शहादत पर सवाल उठाए जाएं, अपनी जान पर खेलकर भी जो ईमानदार अफ़सर बच जाएं उन पर रिटायरमेंट के बाद अपराधियों की तरह मुकदमा चलाया जाए और सिपाही बने ग़रीब बेटों की धोखे से जान लेने को क्रांति माना जाए और अच्छे उद्देश्यों के साथ शुरू हुई किसी भी क्रांति को मैनिपुलेट करके हास्यास्पद बना दिया जाता हो ... ज़रा कल्पना करें, अगर वहाँ मानसिक चिकित्सालय भी सही हालात में न हों, तो आदमी मानसिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए करे क्या? ज़ाहिर है, उसके पास एक ही रास्ता बचता है। और वह है – आक्थू!!!



Thursday, 2 October 2014

अजंता: जहां पत्थरों में अध्यात्म है

-हरिशंकर राढ़ी

बस में अजंता की ओर  :  छाया - हरिशंकर राढ़ी 
एलोरा तो देख आए किंतु अजंता का आकर्षण  एलोरा से भी बड़ा था। कारण जो भी रहा हो, चाहे वह अजंता - एलोरा के युग्म में पहले आता है, इसलिए या फिर अब तक की पढ़ाई लिखाई और इंटरनेट से एकत्र की गई जानकारी के कारण। जलगांव में रात अच्छी गुजरी थी और नींद तो खूब आई ही थी। सुबह की चाय के बाद नाश्ता  और दो बार चाय लेने के बाद मन में उत्साह थोड़ा और बढ़ गया। लगभग दस बजे हम जलगांव से अजंता की गुफाओं के लिए कूच कर गए। बैग - सैग गाड़ी में ही जमा लिया क्योंकि वापसी हमें भुसावल से करनी थी। जलगांव से अजंता गुफाओं की दूरी 62 किलोमीटर है और भारतीय राजमार्ग की परंपरा के अनुसार तेज चलने पर भी लगभग डेढ़ घंटा लग ही जाता है। हम लोग तो वैसे भी तसल्ली से चलने रास्ते का आनंद लेने वाले पथिक हैं, सो डेढ़ घंटे से कुछ                                                                                             ज्यादा ही समय खर्च कर अजंता गुफाओं तक पहुंच                                                                                         गए।

विश्व धरोहर अजंता 

गुफा परिसर में प्रवेश के बाद  : छाया - हरिशंकर राढ़ी
अजंता को यूनेस्को द्वारा विश्व  विरासत घोषित किया है, सो इसका प्रभाव वहां के वातावरण पर पड़ना ही है। मजबूरी में ही सही, नियमों का पालन करना है, साफ-सफाई दिखानी ही है, सो यह सब अंतर साफ दिखा। अपनी अर्वाचीन भारतीय संस्कृति का जो जादू - रेहड़ी, खोमचा, भुट्टा वगैरह का अतिक्रमणीय दृष्य अपने पर्यटन स्थलों पर देखने को अनिवार्य रूप से देखने को मिल जाता है, वह यहां नहीं था। उसका परिणाम यह होता है कि एक आम भारतीय दर्शक को लगता है कि किसी महत्त्वहीन जगह पर आ गया है। परंतु हम कर भी क्या सकते हैं, भारतीय नियमों को मानें या न मानें, अंतर्राष्ट्रीय  नियमों को तो मानना ही पड़ेगा। और फिर जिसे यूनेस्को ने गोद ले रखा हो, उसे हम आंखें तरेर भी कैसे सकते हैं ?
दीवारों पर गज़ब के  मिथुन :  छाया - हरिशंकर राढ़ी

चलिए, एक सुखद एहसास हुआ कि हम हल्ला-गुल्ला और शोर -शराबे  से बच गए।  जिस पर्वतीय हिस्से में अजंता की गुफाएं स्थित हैं, उसके पद तक ही सामान्य वाहनों को जाने की अनुमति है। गाडि़यों वहीं पार्क करने की सुविधा है। वहां से आगे पुरातत्व विभाग की देख-रेख में प्रदूषण  रहित मिनी बसें  प्रशासन  की ओर से चलाई जाती हैं और हर पर्यटक को उन्हीं बसों में बैठकर गुफा तक जाना होता है। हाँ, ये बसें निश्शुल्क  नहीं हैं परंतु किराया तार्किक है। ऐसी ही एक बस में हम तेरह जने सवार हुए और सर्पाकार मार्ग का आनंद लेते हुए गुफा के प्रवेशद्वार  तक पहुंच लिए। यहां  टिकट लेकर हम भी निर्देशित  दिशा  में गुफा की ओर चल पड़े।

अभी अप्रैल  की शुरुआत ही थी और लगभग ग्यारह बजे होंगे किंतु धूप उस सूखी पहाड़ी में खलनायिका की तरह हमें तंग कर रही थी। वैसे भी यह प्रदेश  कर्क रेखा क्षेत्र में पड़ता है और सूर्य उत्तरायण की स्थिति में कर्क से संक्रांति करने वाला था। (अजंता  की भौगोलिक स्थिति 20°31अक्षांश  उत्तर है जो कर्क रेखा - 230 उत्तर से बहुत निकट है) इस बात को मैं समझ रहा था किंतु समझने से धूप कम नहीं हो जाती। ऊपर से अंदर किसी भी प्रकार के खान-पान की व्यवस्था नहीं क्योंकि विश्व  धरोहर के क्षतिग्रस्त होने का खतरा। सो, हम अपने साथ ले मौजूद पानी की एक बोतल पर निर्भर थे। गर्मी के कारण आस-पास के पेड़-पौधे और झाडि़यां सूख रही थीं। लेकिन मन में खुशी  थी कि आज हम उस स्थान तक आ ही गए जो विश्व  विरासत घोषित  हो चुका है। आखिर क्या रहा होगा उन लोगों के मन में जिन्होंने इस प्रकार के गैर व्यावसायिक कार्य में इतना पैसा लगाया ? यह प्रश्न  मेरी मानसिकता की उपज नहीं था अपितु उस विचारधारा के विरुद्ध था जिसमें समाज का एक वर्ग केवल आर्थिक प्रगति को ही मानव का विकास मानता है; केवल उसे ही सार्थक कार्य मानता है जिससे उसकी मूल आवश्यकताओं के अतिरिक्त भोग - विलास की सामग्री पैदा हो सके। उसकी नजर में कला, साहित्य और शिल्प  सिवाय चोंचलेबाजी के कुछ नहीं है। इस बात से असहमत नहीं हुआ जा सकता है कि मानवता यह है कि हर मनुष्य  की मूल आवश्यकताओं की पूर्ति होनी ही चाहिए और हमारा प्रथम प्रयास भी इस दिशा  में होना चाहिए। किंतु केवल मूल आवश्यकताओं की पूर्ति में इतना व्यस्त हो जाए कि वह अपनी मानसिक भूख की चिंता ही न करे और अपनी सभ्यता के आयाम ही छोड़ दे, यह भी न्याय नहीं होगा। मुझे याद आया कि औद्योगीकरण के युग में योरोप में एक समय ऐसा आया था जब कविता और साहित्य की प्रासंगिकता पर आक्षेप लगने शुरू  हो गए थे। तब साहित्य की प्रतिरक्षा में फिलिप सिडनी ने ‘एन अपोलोजी फाॅर पोएजी’ लिखकर निहायत भौतिकवादियों को जवाब दिया था। आज फिलिप सिडनी का वह लेख मील के पत्थर के रूप में याद किया जाता है।
विहंगम दृश्य :  छाया - हरिशंकर राढ़ी

गुफाओं की खोज

ये गुफा  महल ! : छाया - हरिशंकर राढ़ी
यद्यपि आज यह स्वीकार किया जा चुका है कि गुफाओं का निर्माण 200 ई0पू0 शुरू  हुआ था और अनेक कालों से गुजरता हुआ यह छठी शताव्दी तक पूरा हुआ था, किंतु इसकी खोज 1819 में संयोगवश  हो गई थी। मद्रास प्रेसीडेंसी  का अफसर जाॅन स्मिथ यहां शेर  के शि कार की तलाश  में अचानक ही पहुंच गया था। जब वह गुफा नंबर 10 के सामने पहुंचा तो स्थानीय लोग गुफा का प्रयोग प्रार्थना स्थल के रूप में कर रहे थे और वहां आग जल रही थी। दरअसल ये गुफाएं पर्वत के अंदरूनी हिस्से में बनी हुई हैं। चारो तरफ ऊंची पहाडि़यां, पेड़-पौधे और घनी झाडि़यां थीं जिनके अंदर यह कहीं एक रहस्य की भांति समा गई थी। जाॅन स्मिथ गुफाओं को देखकर हैरान हो गया और उसके लौटने के बाद ब्रिटिश  सरकार ने सुध लेना शुरू   किया और अजंता की गुफाएं आज विश्व धरोहर  में शीर्षस्थ  रूप से स्थापित हो चुकी हैं।



                                                                                    गुफाओं का स्थापत्य और सौंदर्य


देवताओं की मूर्तियां :     छाया - हरिशंकर राढ़ी
एलोरा की गुफाओं की भांति अजंता की गुफाओं को क्रमांकित किया गया है। गुफाओं की कुल संख्या 29 है और जैसे -जैसे आगे बढ़ते हैं, गुफाओं का सौंदर्य बढ़ता सा प्रतीत होता है। इन गुफाओं को संभवतः कालक्रम के अनुसार निर्मित किया गया और उसी के अनुसार इन्हें बांटा भी जाता है। ऐसा माना जाता है कि गुफा क्रमांक  9, 10, 12, 13  एवं 15 ई0पू0 100 से लेकर 100 ई0 सन् के बीच बनाई गई थीं।  इस समय सत्त्वाहन वंश   का राज्य था और वे कला के बड़े  समर्थक थे। इन गुफाओं में क्रमांक 9,10ए19ए26 तथा 29 चैत्यगृह और शेष  विहार हैं। इतिहासकारों द्वारा निर्माणकाल एवं शैली  के आधार पर गुफाओं को मुख्यतः दो भागों में बांटा गया है। कुल छह गुफाओं को उत्खनन बौद्धकाल के हीनयान युग में हुआ। गुफा संख्या 8,10,12, 15 अ, ईसा पूर्व की हैं।

गुफाओं के निर्माण का दूसरा काल ईसा की पांचवीं -छठी शती हैं। इनके उत्कीर्णन का प्रयोजन संभवतः वाकटकों के प्रति सामंतों की निष्ठां  का  प्रदर्शन  था। इसका समर्थन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा अजंता गुफाओं  के परिसर में  लगाया गया शिलालेख भी है। वाकाटक नरेश  हरिषेण  के मंत्री वराहदेव ने गुफा संख्या 16 का निर्माण कराकर बौद्धसंघ को समर्पित किया। चीनी घुमक्कड़ ह्वेनसांग ने भी गुफाओं का जिक्र किया है जबकि वह यहां नहीं आया था। इस गुफा के संबंध में भारतीय पुरातत्व कहता है कि गुफा संख्या 16 महायान संप्रदाय से संबंधित है। यह एक उत्कृष्ट  कृति है जिसमें भगवान बुद्ध के जीवन की घटना का चित्रण है। इसके प्रदक्षिणापथ चंवरधारी बोधिसत्त्व एवं मालाधारी गंधर्व आकृतियों से घिरे सिंहासनस्थ बुद्ध का चित्रण है। मरणासन्न राजकुमारी, असित की भविष्यवाणीं , नंद का मनपरिवर्तन, माया का स्वप्न, श्रावस्ती का चमत्कार एवं सुजाता का खीर प्रदान करना प्रमुख चित्र हैं।
यह भी एक गुफा है !   :छाया - हरिशंकर राढ़ी

भित्तिचित्र:  

अजंता गुफाओं में जहाँ  विशाल पहाड़ को काटकर अथक श्रम एवं अजेय धैर्य से सुंदर उत्कीर्णन किया गया है, वहीं भित्तिचित्रों को विशेष  स्थान दिया जाना चाहिए। विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में पिछड़ा युग  कहलाने वाले उस युग में जिस प्रकार चित्रकारी करके उसे संरक्षित किया, वह किसी भी संवेदनशील  मनुष्य  को दाँतों तले उँगली दबाने पर मजबूर कर देगा। इसमें संदेह नहीं कि समय के साथ इनका बहुत क्षरण हुआ है, फिर भी विशेषज्ञों  की सहायता से इन भित्तिचित्रों को संरक्षित करने का सराहनीय प्रयास किया गया है। इनके स्वास्थ्य को देखते हुए भित्तिचित्रों वाली गुफाओं में फोटोग्राफी निषिद्ध  है। हाँ, फ़्लैश  चमकाए बिना फोटोग्राफी करते हुए लोग देखे जा सकते हैं, किंतु नीम उजाले में लिए गए फोटो बेकार से ही नजर आते हैं।
छाया - हरिशंकर राढ़ी

सभी भित्तिचित्र बौद्धकथाओं  को ही आधार बनाकर चित्रित किए गए हैं। स्पष्ट  है कि उस समय बौद्ध धर्म के प्रति लोगों के मन में विशेष  रुझान रहा होगा। तमाम राजाओं ने रुचि एवं उदारतापूर्वक इन गुफाओं के निर्माण में अकूत धन खर्च किया होगा। अजंता गुफाओं के बड़े -बड़े हाॅलों को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि कितनी चोटों से ये आग्नेय शैलें  कटी होंगी और छेनी हथौड़ी की हर चोट पर कितना धन खर्च हुआ होगा। ईश्वर  को इसलिए भी धन्यवाद देना चाहिए कि ये गुफाएँ धर्मांधता की भेंट नहीं चढ़ीं, हालांकि उसके पीछे इनकी दुर्गमता और अज्ञात होना अधिक महत्त्वपूर्ण कारक है।

वाल्टर एम स्पिंक का शोध :  

मिशिगन  विश्वविद्यालय में  एशियाई कला एवं इतिहास (Asian Art and  History ) के प्रोफेसर वाल्टर एम स्पिंक ने अजंता पर गहन एवं आधिकारिक शोध  किया और आज हम उन्हीं के शोध  के बल पर अजंता गुफाओं के बारे में कुछ कह पाते हैं। हार्वर्ड जैसे प्रतिष्ठित  विश्व विद्यालय के इस विद्वान ने भारत सरकार के अनुरोध पर अजंता, एलोरा और एलीफैंटा गुफाओं पर गहन शोध  किया। सन् 2010 तक इनकी पुस्तक अजंता: हिस्ट्री एंड डिवैलपमेंट (Ajanta : History and Development ) के पांच खंड आ चुके हैं। स्पिंक ने उत्कीर्णन एवं कला की शैली  जैसे साक्ष्यों के आधार पर संक्षिप्त विधि से पूरी जानकार दी है और अजंता के निर्माण को तिथिवार विभाजित किया है।
घोड़े की नाल का नज़री नक्शा :   छाया - हरिशंकर राढ़ी  

दूर से देखने पर गुफाएँ घोड़े की नाल के आकार की नजर आती हैं। अंततः हम भी इन्हें देखते - समझते दूसरे सिरे पर जा पहुँचे और थककर बैठ गए। अन्य पर्यटकों को देखने समझने का भी एक अलग मजा होता है। सबके अपने दृष्टिकोण  होते हैं और अपने मूल्यांकन। कुछ देर विश्राम करके हमने वापसी का मन बनाया। 
पहाड़ी को काट कर बना स्तम्भ  :   छाया - हरिशंकर राढ़ी

मोलभाव वाला भोजनालय:

 गुफाओं से बाहर निकले तो भूख का तीव्र एहसास हुआ। प्रवेशद्वार से अंदर पहुंच जाने के बाद तो खाने की कोई सामग्री मिलती नहीं, अतः लौटते-लौटते भूख भयंकर होने लग जाती है। प्रवेशद्वार  के पास ही एक रेस्टोरेंट था, सो हम भी उधर ही खिंचे चले गए। दोपहर हो गई थी, अतः भोजन कर लेने में ही भलाई थी। परंतु, रेस्टोरेंट में प्रवेश करने पर एक विचित्र स्थिति का सामना करना पड़ा, जैसा कभी किया ही नहीं था। वहाँ कोई स्थिर मूल्यसूची हमें देखने को नहीं मिली। पर्यटन का अनुभव हमें यही बताता है कि ऐसी जगहों पर रेट मालूम करके ही खाना पीना चाहिए, क्योंकि खाना कोई ऐसी चीज नहीं है जिसका भाव पसंद न आने पर आप वापस कर सकें । फिर या तो गला दबाकर भुगतान करिए या फिर लड़ाई। यहाँ रेस्टोरेंट का माहौल न जाने क्यों संतोषजनक सा नहीं लग रहा था। सो हमने आॅर्डर देने से पहले रेट मालूम किया। उसने प्रति थाली 150 रुपये बताया। अन्य ग्राहक भी भोजन कर रहे थे और थाली की शक्ल  देखकर वह भोजन आधी से कम कीमत का लग रहा था। सो हमने वहां से निकल जाने में भलाई समझी। कुल मिलाकर हम तेरह जने थे, सो मालिक ने अपने एक कारिंदे को हमारे पीछे लगाया।  फुटपाथी दलाल की तरह उसने अपनी उसी थाली का रेट घटाना शुरू  किया और लगभग सौ मीटर तक पीछा करते-करते 40 रुपये तक आ गया। भोजन के मामले में ऐसी बार्गेनिंग हमने आज तक नहीं देखी थी। इस पर मुझे बहुत चिढ़ आती है और वहां भी आ रही थी। इष्टदेव जी भी गुस्से वाले मोड में आ गए थे। अंततः उसे डांटते हुए यह कहकर वापस भेजा गया कि तुम मुफ्त  में खिलाओ तो भी हम तुम्हारे यहां नहीं खाने वाले!
और भूख को जज़्ब करके हम प्रदूषणरहित बस में बैठे। पार्किंग में अपनी गाड़ी पकड़ी और भोजन रास्ते में करने का निश्चय करके (और हमने रास्ते में ठीक से भोजन किया) भुसावल जंक्शन के लिए रवाना हो गए। वहाँ से अपनी ट्रेन जो थी दिल्ली के लिए !
अंतिम गुफा के पास बैठे बच्चे   :   छाया - हरिशंकर राढ़ी

उपयोगी जानकारियाँ:

अजंता किसी भी ट्रेन  रूट पर सीधे नहीं पड़ता। दिल्ली मुंबई रूट (वाया भुसावल) पर जलगाँव या भुसावल उतरकर रोडवेज बस या टैक्सी से अजंता गुफाओं तक पहुंचा जा सकता है। टैक्सी कर लेना बेहतर होता है। जलगाँव स्टेशन  से अजंता की दूरी 52 किलोमीटर और भुसावल जंक्शन  से 62 किमी है। औरंगाबाद  से यह दूरी 100 किमी है। पूरे महाराष्ट्र  में बस सेवा अच्छी है।

कब जाएँ: 

 अजंता की भौगोलिक स्थिति कर्क रेखा के आस-पास है अतः यहां
गर्मी ज्यादा पड़ती है। सर्वाधिक उपयुक्त मौसम अक्टूबर से मार्च तक का होता है।
दर्शन  समय: साप्ताहिक दिनों में प्रतिदिन प्रातः 9 बजे से सायं 5 बजे तक, सोमवार बंद।
प्रवेश  शुल्क : भारतीय और दक्षिण एषियाई (सार्क देषों के ) नागरिकों के लिए - 10ध्. प्रति व्यक्ति, विदेशी  - 5 अमेरिकी डाॅलर या 250 भारतीय रुपये। 15 वर्ष तक के बच्चे निःशुल्क।
बुद्ध की लेटी  हुई प्रतिमा :    छाया - हरिशंकर राढ़ी

Friday, 29 August 2014

एलोरा: जहां पत्थर बोलते हैं

-हरिशंकर राढ़ी 

गुफा पर नक्काशी                             छाया : हरिशंकर राढ़ी 
घृष्णेश्वर  के बाद हमारे आकर्षण  का केंद्र एलोरा की गुफाएं थीं। अजंता - एलोरा की गुफाएं एक तिलिस्म के रूप में मन में किशोरावस्था से ही स्थापित थीं। उनके  विषय  में छठी से आठवीं कक्षा के दौरान हिंदी की पाठ्यपुस्तक में पढ़ा था। तब पाठ्यक्रम में बड़ी उपयोगी बातें शामिल  की जाती थीं और पाठ्यक्रम का संशोधन  कम होता था। भारत और दुनिया के तमाम पर्यटन एवं धर्मस्थलों की जानकारी दी गई होती। बच्चे इसमें रुचि दिखाते थे। शायद  अतिबुद्धिजीवी लोगों की पैठ पाठ्यक्रम में नहीं रही होगी और मनोविज्ञान तथा आधुनिकता के नाम पर उबासी लाने वाली विषयवस्तु कम से कम छात्रों को ढरकी (बांस की एक छोटी नलकी जिससे पशुओं को बलपूर्वक दवा पिलाई जाती है, पूर्वी उत्तर प्रदेश  में इसे ढरकी कहा जाता है।) के रूप में नहीं दी जाती थी। कंबोडिया के अंकोरवाट तक के  मंदिरों का यात्रावृत्त उस समय के छात्र ऐसी ही पुस्तकों में पढ़ते थे। उसी समय मेरे किशोर  मन में देश -दुनिया घूमने - देखने की अभिलाषा  पैदा हुई थी जो अब कार्यरूप में परिणित हो रही है।

कैलाश मंदिर बाहर से         छाया : हरिशंकर राढ़ी 
घृष्णेश्वर से एलोरा गुफाओं की दूरी लगभग एक किलोमीटर होगी। दोपहर ढल रही थी। बच्चे भूख -भूख का शोर  मचा रहे थे।घृष्णेश्वर में खाने - पीने का कोई अच्छा ठिकाना नहीं दिखा। अब हमारे पास एलोरा खिसकने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। अपना सामान घसीटते हुए हम उस तरफ निकल पड़े। वहां हमारे एक और मित्र श्री विनय ओझा जी सपरिवार हमारी प्रतीक्षा में थे। दरअसल उन दिनों वे मुंबई में पोस्ट थे। उन्हें जब इष्टदेव  जी ने बताया कि हम लोग महाराष्ट्र  भ्रमण पर जा रहे हैं, तो उन्होंने भी एलोरा में हमारा साथ पकड़ने का निश्चय  कर लिया। वे एक बड़ी गाड़ी लेकर आए थे जिसमें हम तीनों का परिवार आसानी से आ जाए।

भोजनोपरांत हम प्रवेश  टिकट लेकर गुफाओं की तरफ चल पड़े। आज न जाने कितनी लंबी प्रतीक्षा के बाद मेरी यह इच्छा पूरी होने जा रही थी कि भारत की इस अनमोल धरोहर का साक्षात्कार होने जा रहा था। और यह भी सच है कि गुफाओं का साक्षात्कार कम विस्मयकारी नहीं था। पहली ही गुफा से यह एहसास होने लग जाता है कि मानवमन और मष्तिष्क  का कोई शानी  नहीं है। कितनी कल्पना है, कितना धैर्य है और कला के प्रति कितना अनुराग है उसका ! यह अनुराग तो उसे भौतिकवाद से भी कहीं दूर ले जाता है और भर्तृहरि की बात को बरबस मानना ही पड़ता है कि साहित्य संगीत और कला से युक्त मनुष्य  ही मनुष्य  है, इतर जन तो पषु ही हैं। न जाने कितने वर्षों  तक अपनी कल्पना को वह छेनी हथौड़ी से साकार करता रहा और परिणाम के रूप में अजंता - एलोरा की गुफाएं सामने आईं।
एलोरा का एक विहंगम दृश्य                           छाया : हरिशंकर राढ़ी 

एलोरा की अधिकांश गुफाएं एक ही पत्थर को काटकर बनाई गई हैं लेकिन आभास होता है कि यह कोई नक्काशीदार भवन है। एलोरा में कुल 34 गुफाएं हैं जिन्हें जैन, बौद्ध और हिंदू धर्म को समर्पित हैं। इनमें से 12 गुफाएं महायान बौद्ध, 17 गुफाएं हिंदू धर्म और 5 गुफाएं जैन धर्म का प्रतिनिधित्व करती हैं। ऐसा माना जाता है कि इन गुफाओं का निर्माण काल 550 ई0 से 1000 ई0 तक है। बौद्ध गुफाएं सर्वाधिक प्राचीन हैं और इनका सृजनकाल 550 से 650 ई0 रहा होगा, जबकि हिंदू गुफाओं का सृजन 600 से 875 ई0 तक हुआ। सबसे अंत में जैन गुफाएं बनाई गईं जिनका समय 800 ई0 से 1000 ई0 तक है। हालांकि इनका क्रम काल एवं स्थान के रूप में व्यवस्थित नहीं है।
आखिरी गुफा                        छाया : हरिशंकर राढ़ी 

बौद्ध गुफाएं क्रम संख्या एक से बारह तक फैली हैं। इनमें जगह - जगह बुद्ध की आकृति बनी है। गुफा संख्या 12 में बुद्ध की एक बड़ी प्रतिमा है जो उनके समाधिस्थ रूप को दिखाती है। क्रम संख्या 14 से 29 तक की गुफाएं हिंदू देवी - देवताओं की मूर्तियां उत्कीर्ण हैं। अधिकांश  गुफाओं में शिव  की मूर्तियां और नक्काशी  है जिससे यह प्रमाणित होता है कि उस समय शैव  धर्म की प्रधानता थी। पंद्रहवीं गुफा में दशावतार का चित्रण है।

बाहर से दृश्य            छाया : हरिशंकर राढ़ी 
 सबसे बड़ा आकर्षण :यहां का सबसे बड़ा आकर्षण  कैलाश  मंदिर है जो गुफा संख्या 16 के रूप में क्रमबद्ध है। इसकी वास्तुकला अवर्णनीय है। एक ही विशाल  शिला  को काटकर बनाया गया यह मंदिर चमत्कार से कम नहीं है। वास्तुकार की कल्पना निश्चित  ही अप्रतिम ऊंचाई पर पहुंची हुई दिखती है। इसमें लंकाधिपति राक्षसराज रावण को कैलाश पर्वत को हिलाते हुए दिखाया गया है। 

जैन गुफाएं: क्रम संख्या 30 से 34 तक की गुफाएं जैन धर्म को  प्रदर्शित  करती हैं। ये गुफाएं हिंदू गुफाओं के बाद शुरू  होती हैं। इंद्रसभा गुफा जैन गुफाओं में सबसे सुंदर है। इसके अतिरिक्त तीर्थंकर पारसनाथ और गोमतेष्वर की मूर्तिया मनमोहक हैं। जगन्नाथ सभा भी ध्यान  आकर्षित   करने की शक्ति  रखती है। हां, हिंदुस्तानी धर्मों के साथ अत्याचार का मामला यहां भी पीछा नहीं छोड़ता और अनेक गुफाओं में सुंदर मूर्तियों का धर्मांधतावश  खंडित किया गया है जो टीस छोड़ ही जाता है। आखिर वह कौन सी मानसिकता है जो कला को भी धर्मों में बांटती है?

कैलाश मंदिर का आतंरिक दृश्य           छाया : हरिशंकर राढ़ी 
शाम  हो चली थी। न तो यहां ठहरने की अच्छी सुविधा है और न हमारा ठहरने का मन था। अगले दिन हमें अजंता की गुफाएं देखनी थीं और इसके बाद भुसावल से दिल्ली की ट्रन पकड़नी थी। अब तक हमारा कार्यक्रम योजनानुसार चल रहा था। इसे बिगाड़ना नहीं था। सो हम अपनी गाड़ी में बैठे। गाड़ी चली और साहित्य, दर्शन  एवं व्याकरण की बहस भी चल पड़ी। आधा रास्ता कब गुजर गया, पता ही नहीं चला। पता तब चला जब मेरे बेटे ने सिर में दर्द और उल्टी की शिकायत की और कुछ दूसरे बच्चों ने थकान और भूख की। थोड़ा आराम करके, चाय वगैरह लेकर तथा बच्चों को चिप्स-कुरकुरे का उत्कोच देकर हम अपने रात्रि पड़ाव जलगांव की ओर चल पड़े। 
विनय ओझा ,  लेखक  और इष्टदेव जी

बच्चे मौज़ में 
कैसे जाएं, कहां ठहरें: एलोरा गुफाएं औरंगाबाद शहर से 30 किमी की दूरी पर हैं। बसें और टैक्सियां लगातार जाती रहती हैं। हां, टैक्सियों के रेट से जरा संभलकर रहें और मोल भाव कर लें। ठहरने के लिए औरंगाबाद शहर ही ठीक रहेगा। यहां मध्यम दर्जे के होटल नहीं हैं। ढाबे खूब हैं और भोजन की दिक्कत नहीं है।

Sunday, 20 July 2014

श्रीशैलम : बांध लेता है यह छंद मुक्त-2

इष्ट देव सांकृत्यायन 


यहां देखें :  इस लेख का पहला भाग

मंदिर से बाहर निकले तो धूप बहुत चटख हो चुकी थी। जनवरी के महीने में भी हाफ शर्ट पहन कर चलना मुश्किल हो रहा था। फुल मस्ती के मूड में बच्चे न जाने किसे शो ऑफ करने में लगे थे। उधर साथ की देवियां ख़रीदारी के मूड में थीं और मंदिर के चारों तरफ़ फैले बाज़ार की एक-एक दुकान पर सामान देखने व मोलभाव का मौक़ा हाथ से निकलने नहीं देना चाहती थीं। भला हो बच्चों का, जिन्हें एक तो डैम देखने की जल्दी थी और दूसरे भूख भी लगी थी। इसलिए बाज़ार हमने एक घंटे में पार कर लिया। बाहर गेस्ट हाउस के पास ही आकर एक होटल में दक्षिण भारतीय भोजन किया।
श्रीशैलम की मनोरम पहाड़ियां 

बच्चे डैम देखने के लिए इतने उतावले थे कि भोजन के लिए अल्पविश्राम की अर्जी भी नामंजूर हो गई और हमें तुरंत टैक्सी करके श्रीशैलम बांध देखने के लिए निकलना पड़ा। श्रीशैलम में एक अच्छी बात यह भी थी कि यहां तिरुपति की तरह भाषा की समस्या नहीं थी। वैसे यहां मुख्य भाषा तेलुगु ही है, लेकिन हिंदीभाषियों के लिए कोई असुविधा जैसी स्थिति नहीं है। हिंदी फिल्मों के गाने यहां ख़ूब चलते हैं। जिस टैक्सी में हम बैठे उसमें 'बजावें हाय पांडे जी सीटी पहले से ही जारी था। मैंने ड्राइवर से पूछा, 'इसका मतलब समझते हो?

'मतलब? हां, मतलब टीक से समझता हाय’ उसने दोनों तरफ़ सिर हिलाते हुए कहा, यहां टूरिस्ट लोग ख़ूब आता रहता है न, तो हम लोग हिंदी अच्चे से जानता है।’  आगे तो उसने पूरा वृत्तांत बताना शुरू कर दिया। यहां कब-कब किस-किस फिल्म की शूटिंग हुई, विशेषकर श्रीशैलम मंदिर के माहात्म्य को ही लेकर कौन-कौन सी फिल्में बनीं। कौन-कौन से मशहूर लोग यहां अकसर मल्लिकार्जुन स्वामी के दर्शन के लिए आते हैं... आदि-आदि। क़स्बे से डैम तक पहुंचने में केवल आधे घंटे का समय लगा, वह भी तब जबकि रास्ते में हमने साक्षी गणपति का भी दर्शन कर लिया। ऐसी मान्यता है कि मल्लिकार्जुन स्वामी के दर्शन-पूजन के लिए जो लोग आते हैं, उनका हिसाब-किताब गणपति ही रखते हैं और यही उनका साक्ष्य देते हैं। इसीलिए इनका नाम साक्षी गणपति है।
जल विद्युत परियोजना

बंद डैम का आनंद
डैम पहुंच कर बच्चे अभिभूत थे। हालांकि इस समय यहां पानी कुछ ख़ास नहीं आ रहा था और पानी के अभाव में न तो कोई टर्बाइन चल रही थी, न कोई और ही गतिविधि जारी थी। लेकिन, चारों तरफ़ पहाड़ों से घिरी नदी की गहरी घाटी, उस पर बनी विशाल बांध परियोजना और दूर-दूर तक ख़तरनाक मोड़ों वाली बलखाती सड़क... बच्चों के लिए यह सौंदर्य ही काफ़ी था। वहां हमारे जैसे और भी कई पर्यटक मौजूद थे और सबके नैसर्गिक मनोरंजन के लिए बंदरों के झुंड भी। व्यू प्वाइंट पर ही कुछ स्थानीय लोग मूंगफली बेच रहे थे और चाय की भी एक दुकान थी। चारों तरफ़ पहाड़, सामने नदी, पेड़ों की छाया और आसपास उछलते-कूदते बंदरों के झुंड, कहीं गिलहरियां और कहीं तरह-तरह के पक्षियों की चहचहाहट, बीच-बीच में आ जाती गाय... कुल मिलाकर यह माहौल अत्यंत मनोहारी हो गया था। बच्चे अपनी प्रकृति के अनुकूल एक साथ बहुत कुछ जान लेना चाहते थे। मसलन यह कि यह पानी बिजली कैसे बना देता है, यह पहाड़ कितनी दूर तक फैला है और यहां कोई बंदर से डरता क्यों नहीं है? अरे, हां वाक़ई। हम तो वहां से आए थे जहां लोग मंगल को बंदर को भोग भी खिलाते हैं और बाक़ी दिन उसे देखकर उनकी जान भी निकल जाती है। यहां लोग अपने हाथों में मूंगफली दिखा रहे थे और बंदर उसे निकाल-निकाल कर खा रहे थे। बच्चों ने ऐसा करना चाहा, पर उनकी हिम्मत नहीं पड़ी। यहां तक कि हमारे ख़ुद करके दिखाने पर भी। यह शायद वन्य जीवों के स्वभाव से उनके अपरिचय का प्रभाव था।
डैम पर खाद्य सामग्री की ताक में लगे बंदर 

डैम पर हालांकि इस समय उत्पादन बंद था, लेकिन इसकी भव्यता से इसकी महत्ता को समझा जा सकता था। नल्लामलाई (श्रेष्ठ पर्वतशृंखला) पर्वतशृंखला में कृष्णा नदी पर बना यह डैम देश का तीसरा सबसे बड़ा जलविद्युत उत्पादन केंद्र है। समुद्रतल से 300 मीटर ऊंचाई पर बने इस बांध की लंबाई 512 मीटर और ऊंचाई करीब 270 मीटर है। इसमें 12 रेडियल के्रस्ट गेट्स लगे हैं और इसका रिज़र्वायर 800 वर्ग किलोमीटर का है। इसके बाएं किनारे पर मौजूद पावर स्टेशन में 150 मेगावाट के छह रिवर्सिबल फ्रांसिस पंप टर्बाइंस लगे हुए हैं और दाहिने किनारे पर 110 मेगावाट के सात फ्रांसिस टर्बाइन जेनरेटर्स हैं। इसकी उत्पादन क्षमता 1670 मेगावाट बताई जाती है। इसके अलावा यह कुर्नूल और कडप्पा जिले के किसानों को सिंचाई के लिए पानी भी उपलब्ध कराता है। यह तब है जबकि इसमें बाढ़ के दौरान आने वाला बहुत सारा पानी इस्तेमाल किए बग़ैर छोड़ दिया जाता है। वजह यह है कि अगर बाढ़ के समय इसे रोकने की कोशिश करें तो आफत आ जाए। इसके अलावा पहाड़ों का
मेरे अनुज अभीष्ट, राढ़ी जी और मैं 
बेतहाशा खनन और पेड़ों की अंधाधुंध कटाई
, जिसमें से अधिकतम काम अवैध तरीक़े से माफियाओं के संरक्षण में हो रहा है, के चलते इसके रिज़र्वायर में शिल्ट भरती जा रही है। जिसे अभी तो ऑफ सीज़न में साफ़ कर लिया जाता है, लेकिन बाद में यह भी नहीं हो सकेगा और यह बेहद ख़तरनाक स्थिति होगी। अगर यहां उपलब्ध जलस्रोत का पूरा इस्तेमाल किया जा सके तो दक्षिण में पेयजल, सिंचाई और बिजली कोई समस्या ही न रहे। सब जानकर लगा कि अपने देश में कहीं भी चले जाएं, वस्तुस्थिति जानने के बाद दुखी होने के अलावा कोई चारा नहीं बचता। यह सब जानते-देखते शाम के पांच बज गए थे और अब लौटना ज़रूरी था। लिहाज़ा हम वापस श्रीशैलम लौट चले।

जागता है शहर
मल्लिकार्जुन मंदिर का रात्रिकालीन दृश्य 
थोड़ी देर विश्राम के बाद शाम सात बजे फिर निकल पड़े, नगर दर्शन के लिए। थोड़ी देर मंदिर के मुख्यद्वार के सामने बैठे रहे। गोपुरम वहां से साफ़ दिखाई दे रहा था और उसकी रात्रिकालीन सज्जा भी अद्भुत थी। झिलमिलाती लाइटों से सजे गोपुरम की छटा देखते ही बनती थी। पूरे दिन गर्मी झेलने के बाद अब शाम की ठंडी-ठंडी हवा हमें बेहद सुकून दे रही थी। थोड़ी देर बैठने के बाद हम नगर दर्शन के लिए निकल पड़े। छोटे क़स्बे के लिहाज़ से देखें तो बाज़ार बड़ा है, लेकिन अन्य धार्मिक स्थलों की तरह यहां भी पूरा बाज़ार केवल पूजा सामग्रियों से ही अटा पड़ा है। दुकानों पर मोमेंटोज़ ख़ूब मिलते हैं, लेकिन इनका मूल्य काफ़ी अधिक है। ख़रीदने लायक चीज़ों में यहां जंगल का असली शहद और काजू की गजक है। शहद के बारे में एक स्थानीय व्यक्ति ने पहले ही बता दिया था कि इसमें धोखाधड़ी बहुत है। बताया जाता है कि यह जंगल से वनवासियों का निकाला हुआ शुद्ध शहद है, लेकिन होता मिलावटी है। अगर आपको असली शहद लेना हो तो उसे म्यूजि़यम (चेंचू लक्ष्मी ट्राइबल म्यूजि़यम) से ही लें। गजक भी 400 रुपये किलो था। घूमने से इतना तो मालूम चला कि यह देर रात तक जागने वाला शहर है।

राजा का सम्मान
रात का भोजन हमने फिर एक रेस्टोरेंट में लिया और इसके बाद सो गए। अगली सुबह हमारा इरादा नागार्जुनसागर टाइगर रिज़र्व घूमने का था। हम सब आठ बजे तैयार हो गए। टाइगर प्रोजेक्ट जाने का उपाय पता किया तो मालूम हुआ कि यहां से सुन्नीपेंटा तक आपको कोई टैक्सी लेनी पड़ेगी। टैक्सी लेकर हम सुन्नीपेंटा पहुंचे। पहुंचने पर मालूम हुआ कि यह तो उसी रास्ते पर है, जिससे हम पिछले दिन डैम देखने आए थे। वहां प्रवेश शुल्क तो केवल 10 रुपये है, लेकिन अपने वाहन से आप जंगल के अंदर नहीं जा सकते। जंगल के भीतर सैर-सपाटे के लिए जीप सफारी लेनी थी, जो हमें उस दिन 10 बजे के बाद ही उपलब्ध होती। इसका शुल्क 800 रुपये है। थोड़ी देर इंतज़ार के बाद हमें सफारी उपलब्ध हो गई और हम चल पड़े। जंगल के भीतर थोड़ी दूर ही अच्छी सड़क है। इसके बाद कच्चा रास्ता और वह भी थोड़े दिन पहले बारिश होने के नाते कई जगह कीचड़ से भरा हुआ था। इस रास्ते पर चलना सधे हुए ड्राइवरों के ही बस की बात है।
जंगल में सेही 

बीच-बीच में पहाड़ों और तरह-तरह की झाडिय़ों से भरा यह जंगल कहीं-कहीं इतना घना है कि दोपहर में ही घुप्प अंधेरा जैसा लगता है। ऐसी जगह आने से पहले ही ड्राइवर-सह-गाइड महोदय हमें आश्वस्त कर देते थे, 'डरने का तो कोई बात नहीं। जानवर लोग कोई हमला नहीं करता, बस ये रहे कि आप लोग  चीखना मत। जानवर ऐसे ई घूमता, कुछ नहीं बोलता। हम भी आश्वस्त थे। जानवर अगर बोलेगा तो क्या बोलेगा? बहुत होगा तो एंट्री पास मांगेगा, तो वो दिखा देंगे। बाक़ी भाषा तो न हमारी वह समझेगा और न उसकी हम। खुले में घूमते और अपने-आप में मस्त जानवरों को देख-देख कर बच्चे मन ही मन ख़ुश हो रहे थे। चूंकि उन्हें पहले ही समझा दिया गया था कि यहां हल्ला मचाना जीवन के लिए ख़तरनाक हो सकता है, इसलिए वे अपनी प्रसन्नता स्वाभाविक रूप से प्रकट नहीं कर पा रहे थे। इशारों-इशारों में एक-दूसरे से काफ़ी बातचीत कर ले रहे थे। अगर कभी कोई ज़ोर से बोल देता तो होंठों पर उंगली रख उसे समझाना पड़ता। ऐसी नौबत अकसर तब आती जब कहीं जंगल का राजा दिख जाता। बहरहाल, बच्चे ऐसे समय में सिर्फ़ इशारा कर देने पर जैसी समझदारी दिखाते, उससे इतना तो एहसास हुआ कि कुछ भी हो राजा की इज़्ज़त सभी करते हैं। भले देश में लोकतंत्र आ गया हो।

बादशाह की सवारी
मुश्किल तब हुई, जब चौकड़ी भरता हिरनों का एक समूह हमारे सामने ही सड़क पर भागने लगा। ड्राइवर ने जीप रोकी और तुरंत मुड़कर इशारा किया। उसके चेहरे पर जैसा ख़ौफ़ दिखा, उसने बच्चों की सिट्टी-पिट्टी गुम कर दी। अब कोई बोल नहीं रहा था। आगे बैठे होने के नाते उसने मुझे कोहनी मार कर समझा दिया था कि ये नाटक है। लेकिन धीरे से उसने यह भी बताया, 'अब्बी, एकदम अब्बी कहीं से राजा आएगा। बोलने का नईं, एकदम नईं। बस देखो, चुपचाप देखो।और हम ठहरे रहे। क़रीब बीस मिनट बाद जंगल में बाईं तरफ़ इशारा किया। घने जंगल में वाक़ई महाराजाधिराज सपरिवार चले जा रहे थे और वे बड़े इत्मीनान से जा रहे थे। इसके पहले कि बच्चे कुछ बोलें, उन्हें एक बार फिर चुप रहने का इशारा कर दिया गया। क़रीब दस मिनट तक हम सब उन्हें जाते हुए निहारते रहे और जब वे घने जंगलों में गुम हो गए तो हम भी आगे बढ़ गए। वाक़ई चलता तो शेर ही है।

जंगल की एक-एक गतिविधि पर नज़र गड़ाए कब फरहाबाद व्यू प्वाइंट पहुंच गए, पता ही नहीं चला। काफ़ी ऊंचाई पर मौजूद इस जगह से जंगल की गतिविधियां देखी जा सकती हैं। बेहतर हो कि अपने साथ दूरबीन रखें, जो हमारे पास नहीं थी। सागौन और गूलर के पेड़ तो इस जंगल में ख़ूब हैं और जानवरों की भी हज़ारों प्रजातियां हैं। सौ से ज्य़ादा प्रजातियां तो केवल तितलियों की हैं। पतंगे भी कई तरह के हैं। चिडिय़ों के मामले में यह जंगल काफ़ी धनी है। परिंदों की 200 से अधिक प्रजातियां यहां हैं। इसके अलावा सांभर, भालू, चीते, लकड़बग्घे, सियार, हिरन, चौसिंघा हिरन, ढोल, सेही, नीलगाय सभी यहां पर्याप्त संख्या में हैं। बताया गया कि यहां हनी बैजर भी पाया जाता है, हालांकि हम देख न सके।

जंगल घूम कर हम दो बजे तक वापस एंट्री गेट पर थे। टैक्सी ली और फिर श्रीशैलम पहुंचे। अब हमारे पास और घूमने का वक़्त नहीं था, क्योंकि अगले दिन हैदराबाद से दिल्ली के लिए ट्रेन पकडऩी थी और यह तभी संभव था जब आज ही निकल चलते।

थोड़ा और वक़्त होता तो
हालांकि घूमने के लिए यहां और भी कई जगहें हैं। इनमें पंचमठम का श्रीशैलम के इतिहास और संस्कृति में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उच्च अध्ययन को समर्पित इन मठों में घंट मठम, भीमशंकर मठम, विभूति मठम, रुद्राक्ष मठम और सारंगधारा मठम शामिल हैं। इन मठों का इतिहास सातवीं शताब्दी से शुरू होता है। तब यहां कई मठ थे। अब केवल यही पांच बचे हैं और वह भी जीर्ण हालत में हैं। ये मठ श्रीशैलम मुख्य मंदिर से क़रीब एक किलोमीटर दूर पश्चिम दिशा में स्थित हैं।

श्रीशैलम से 8 किमी दूर स्थित शिखरम समुद्रतल से 2830 फुट की ऊंचाई पर है। शिखरेश्वरम मंदिर में गर्भगृह और अंतरालय के अलावा 16 स्तंभों वाला मुखमंडपम भी है। यहां के इष्ट वीर शंकर स्वामी हैं, जिन्हें शिखरेश्वरम के रूप में पूजा जाता है। स्कंद पुराण के अनुसार इसके शिखर के दर्शनमात्र से मल्लिकार्जुन स्वामी के दर्शन का फल प्राप्त होता है। इसके वर्तमान स्वरूप का निर्माण रेड्डी राजाओं ने सन 1398 में कराया था।

सुंदर जलप्रपात फलधारा पंचधारा क़स्बे से पांच किलोमीटर और अक्क महादेवी की गुफाएं क़रीब 10 किलोमीटर दूर हैं। समय हो तो आप हटकेश्वरम, कैलासद्वारम, भीमुनि कोलानू, इष्ट कामेश्वरी मंदिर, कदलीवनम, नगालूती, भ्रमरांबा चेरुवु, सर्वेश्वरम और गुप्त मल्लिकार्जुनम को भी अपनी यात्रायोजना में शामिल कर सकते हैं। यहां आकर हमें एहसास हुआ कि इस छोटे से क़स्बे की घुमक्कड़ी का पूरा आनंद लेने के लिए कम से कम एक हफ़्ते का समय चाहिए। हम इकट्ठे तो इतना समय निकाल नहीं सकते थे, लिहाज़ा 4 बजे की बस से भारी मन लिए हैदराबाद के लिए रवाना हो गए। अपने आप से इस वादे के साथ कि फिर मिलेंगे, ज़रूर मिलेंगे। आगे बढ़ने पर तो श्रीशैलम से हैदराबाद के बीच प्रकृति की मनोरम झांकियों ने हमारे मन का भारीपन भी ख़ुद हर लिया।
नदी, पहाड़ और जंगल से गुज़रता रास्ता 


                       जान कर चलें
कैसे पहुंचें
जो रास्ता हमने चुना, वह चुनने की ग़लती आप न करें तो ही ठीक। हैदराबाद तक भारत के हर बड़े शहर से हवाई, रेल और सड़क सभी मार्गों का सीधा संपर्क है। लेकिन इसके बाद आपके पास एक ही रास्ता बचता है और वह है सड़क। आप चाहें तो अपने वाहन से भी जा सकते हैं, वरना साधारण और लग़्ज़री - सभी तरह की बसें नियमित रूप से उपलब्ध होती हैं। हैदराबाद से 215 किलोमीटर की यह दूरी तय करने में आम तौर पर चार से छह घंटे लगते हैं। स्थानीय भ्रमण के लिए आप टैक्सी या ऑटो कुछ भी ले सकते हैं।

कहां ठहरें
शहर में बड़ी संख्या में बजट होटल, गेस्ट हाउस और धर्मशालाएं हैं। कुछ में आप पहले से बुकिंग भी करा सकते हैं। न भी हो सके, तो चिंता न करें। वहां पहुंच कर भी ठहरने की व्यवस्था आसानी से हो जाएगी।

खाना-पीना
दक्षिण भारतीय शाकाहार आपको कहीं भी आसानी से मिल सकता है। रोटीप्रेमी उत्तर भारतीयों को थोड़ी समस्या हो सकती है, लेकिन थोड़े दिन स्वाद बदलने का भी अपना अलग मज़ा है। धार्मिक स्थल होने के नाते मांसाहार और सुरापान यहां वर्जित है।

कब जाएं
जा तो आप कभी भी सकते हैं, लेकिन अक्टूबर से फरवरी तक का समय बेहतर होता है। इसमें भी अक्टूबर-नवंबर में यहां बारिश होती है। बाक़ी समय सर्दी की फ़िक्र करने की यहां कोई ज़रूरत ही नहीं है। यहां का औसत तापमान 27 डिग्री सेल्सियस होता है। हां, गर्मी में यह चढ़कर 44 डिग्री तक चला जाता है।

धरती उत्सवों की
उत्सव यहां पूरे साल चलते रहते हैं, लेकिन फरवरी/मार्च में होने वाला महाशिवरात्रि का उत्सव विशिष्ट होता है। इस अवसर पर यहां बहुत बड़ा मेला लगता है, जो पूरे एक सप्ताह चलता है। मार्च/अप्रैल में मनाया जाने वाला तेलुगु नववर्ष उगाडि (संभवत: युगादि का बदला हुआ रूप) प्रमुख उत्सवों में है। इसके अलावा कुंभोत्सवम, संक्रांति उत्सवम, अरुद्रोत्सवम, कार्तिक महोत्सवम और श्रवण नामोत्सवम भी प्रमुख उत्सवों में हैं।