Friday, 25 October 2013

Yatra Manual

व्यंग

                                        यात्रा मैनुअल

                                                                                  -हरिशंकर  राढ़ी

(यह व्यंग्य ‘जागरण सखी’ में प्रकाशित हो चुका है. यह दूसरी और अंतिम किश्त है। )

         स्लीपर क्लास में यात्रा के लिए जिन विशिष्ट  वस्तुओं की आवश्यकता  होती है, उनकी सूची एक्सक्लूसिवली यहां दी जा रही है। (खाना-पानी, बिस्तर-चादर जैसे सामानों का उल्लेख कर यहां मैनुअल का स्तर नहीं गिराया जाएगा।) यात्रीगण एक किता संड़सी, पेंचकस और मजबूत रस्सी प्राथमिकता के तौर पर रख लें। दरअसल, स्लीपर क्लास की कौन सी खिड़की की चिटकनी खराब है, किसका शीशा  टूटा हुआ है और कौन सी खिड़की का शटर या तो खुल नहीं रहा है या बंद नहीं हो रहा है, इसकी जानकारी संचार साधनों के इतने विकास के बावजूद आपको नहीं मिल पाएगी। बंद खिड़की को खोलने के लिए इन प्राथमिक हथियारों की नितांत आवश्यकताहोती है। मान लिया गर्मी का मौसम है और शटर या शीशा  ऊपर होकर अंटकता ही नहीं, अर्थात वह हमेशा  गिरी हुई राजनीति की स्थिति में रहता है तो आप आम आदमी होने के कारण अंदर-अंदर खौल कर रह जाने के सिवा कुछ नहीं कर पाएंगे। टीटी बाबू से शिकायत करेंगे तो वे आपको रेल डिब्बा कारखाना कपूरथला रेफर कर देंगे और अगर भूल से भी रेलवे पुलिस से कह दिया (हालांकि टीटी और रेलवे पुलिस- दोनों के दर्शन  आर्थिक लाभ दृष्टि गोचर  होने पर ही होते हैं) तो लेने के देने पड़ जाएंगे। अतः ऐसी दुर्दशा  में आप मजबूत रस्सी से शीशे को ऊपर अंटका सकते हैं। पेंचकस  के प्रयोग से आप पंखे की पंखुड़ी घुमाकर चालू कर सकते हैं या लाइट जला सकते हैं।
     यदि आप भोजन के हठी हैं तो आपको कम से कम पांच लीटर जलग्रहण क्षमता वाला एक जलपूर्ण डिब्बा अपरिहार्य रूप से रखना चाहिए। यह जल पीने के काम नहीं आएगा। उसे तो आप अलग से रखे ही होंगे। मुझे तो चिंता इस बात की है कि यदि आप यह उम्मीद लेकर गाड़ी के शौचालय में चले गए कि उसमें पानी होगा, तब आपका क्या होगा ? आप तो उस वर्ग के भी नहीं हैं कि टिस्सू पेपर या अखबार से काम चला लेंगे ! ध्यान रखें, डिब्बा ज्योंही खाली हो जाए, अगले स्टेशन  पर ट्रेन छूटने की चिंता न करते हुए इसे रिफिल कर लें। परिवार में  सदस्य ज्यादा हों तो अतिरिक्त डिब्बों की व्यवस्था कर लें। यह एक अलग मुद्दा है आप प्राकृतिक दबाव से मुक्ति का अवसर पाने के लिए गैलरी के अपार जनसमूह को लांघते हुए शौचालय तक पहुंच जाएं तो कम बहादुर नहीं हैं। 
      यदि आपकी यात्रा की श्रेणी साधारण या अनारक्षित है तो आप स्वयं को देश  का मूल निवासी समझें। आप ही असली वोट हैं और आप ही असली लोकतंत्र हैं। आप में ही भारत बसता है और आपके लिए ही सरकार है। आप वह महत्त्वपूर्ण प्राणी हैं जिसके लिए देश  की सारी योजनाएं बनती हैं। आपकी सुविधा के लिए ही सरकारी थाली की कीमत घटाकर बाईस रुपये कर दी गई है और आपके लिए ही गाडि़यों से साधारण डिब्बों को हटाकर ए.सी. या स्लीपर के डिब्बे नहीं लगाए गए। किसी प्रकार यदि अनारक्षित डिब्बे में प्रवेश  करने में सफल हो गए और नितम्बों को आधार मिल गया तो आप पहले गिरमिटिया के बराबर हो गए ! 
     वैसे इस श्रेणी के यात्रियों को चाहिए कि अपने साथ केवल एक ही सामान रखें और वह है कफन! न जाने कहां जरूरत पड़ जाए। आपकी बोगी सबसे आगे या सबसे पीछे है। आगे से ठुके तो भी और पीछे से ठुके तो भी, आपका कल्याण होना है। उसके आगे की यात्रा तो आपके सूक्ष्म जीव यानी आत्मा को ही करनी है। हां, जीवमुक्त लावारिश शरीर को मिट्टी तो चाहिए ही और उसके लिए कफन भी, सो बुद्धिमत्ता यही है कि अपना कफन साथ ले लें। हां, यह ध्यान जरूर रखें कि अपने कफन पर अपना नाम न मिटने वाली उस स्याही से जरूर लिखवा लें जो आपकी तर्जनी में लोकतंत्र के महायज्ञ में मतदान देते समय लगाई गई थी। ध्यान रखें, यदि कफन पर अमिट स्याही से नाम नहीं लिखा है तो आपकी काया को पंचभूत में नग्न ही विलीन होना है। प्राणहीन शरीर कफन की रक्षा नहीं कर पाएगा और यहां कफन के सौदागर बहुत हैं !
        और यात्रा ही क्या जो सरकारी बस या साझा किराए की टैक्सी से न की जाए। वैसे भी जहां कोई साधन नहीं पहुंचता, वहां अपने देश  में साझे किराए की टैक्सियां पहुंचती हैं। इनकी महत्ता और एडवासंवादिता का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि जहां ट्रेन समाप्त होती है, वहां से इनकी शुरुआत होती है। यही यात्री का उसके घर तक पहुंचा कर आती हैं। सरकारी बसें अब ऐसी नहीं रह गई हैं कि वे यात्री को ललचाती हुई निकल जाएं, भले ही आधी-अधूरी बची सीटें खाली ही जा रही हों। अब सरकारी अमला जिम्मेदार हो गया है और उसमें भी प्रबंधनशास्त्र पढ़ाई पढ़े हुए लोग आ रहे हैं। अब आलम यह है सरकारी कंडक्टर तो कंडक्टर, ड्राइवर भी हलक फाडकर चिल्लाएगा और बस है कि बिना भरे जाएगी ही नहीं। हां, ट्रेन से उतरते ही आपको सावधान हो जाना है। हो सके तो कमर को कसकर बांध लीजिए। सीजन यदि शादी-विवाह का है तो सीट घेरने में आपको निष्णात  होना चाहिए। ऐसे समय यदि वाया खिड़की आपको सामान घुसाने की कला आती हो तो आपकी सीट का आरक्षण पक्का है। हां, आपको ऐसी परिस्थिति का सामना यदि निरंतर करना पड़ता है तो आप किसी कुली से प्रशिक्षण ले लीजिए। यह बात अलग है कि यह प्रशिक्षण आपको तभी मिलेगा जब आप कुली का वेश धारण करेंगे। 
       सरकारी बसों में यात्रा का अपना अलग आनंद होता है। आप भरपेट केला खाकर छिलका  निस्संकोच भाव से खिड़की के रास्ते बाहर फेंक सकते हैं। जितना जी चाहे मूंगफली खाइए और छिलका सीट के नीचे बिखेरते जाइए। जहां चाहिए रुकवाइए और जो चाहे बाहर निकालिए।
          यदि आपने साझा किराए की टैक्सी में यात्रा नहीं की तो आपने न कोई यात्रा की और न कोई पर्यटन। अपने देश के विषय में तो आपकी जानकारी अधकचरी रह ही गई। यह बात अलग है कि ज्यादा जानकारी से दुख के बढ़ जाने का खतरा होता है। कहते हैं कि ये टैक्सियां पुष्पक  विमान होती हैं। सुना था किपुष्पक विमान में कितने भी लोग बैठते थे, एक सीट खाली रह जाती थी। इसीलिए राम इतनी बड़ी बानरी सेना मात्र एक विमान से लंका से अयोध्या आ गए थे। यह सिद्धांत साझा टैक्सियों पर लागू होता है। इसमें एक सीट हमेशा  खाली रहती है और यात्री स्थान की कमी से निराश  होकर रह नहीं जाता। इनके ड्राइवर जितने कुशल  होते हैं, उतने ही त्यागी। यहां तक की अपनी ड्राइविंग सीट पर दूसरों को बिठाकर और स्वयं येन-केन प्रकारेण लटककर भी गाड़ी चला लेते हैं। इस युग में इससे बड़ा परोपकार और कहां मिलेगा। और इसके अंदर बैठकर आप जो भी यात्रा करेंगे, वह आपको अपने अंदर झांकने को मजबूर कर देगी- यहीं से तो आत्मसुधार का रास्ता निकलता है।

Sunday, 20 October 2013

Yatra Manual

 व्यंग्य                      यात्रा मैनुअल

                                                                            -हरिशंकर  राढ़ी

(यह व्यंग्य ‘जागरण सखी’ में प्रकाशित  हो चुका है)
     
 अगर मैं महान दार्शनिकों  और धर्माचार्यों द्वारा स्थापित इस मत को नकार भी दूं कि जीवन एक यात्रा है, तब भी आज की यात्राओं की लंबाई और यात्रियों की संख्या अकूत रह जाएगी। उद्योगी पुरुषों  द्वारा परंपरागत उद्योगों को दरकिनार करके नए-नए उद्योग स्थापित किए जा रहे हैं। शिक्षा  उद्योग, धर्म उद्योग, प्रवचन उद्योग, वासना उद्योग, रोग उद्योग, फिल्म उद्योग, टीवी उद्योग के साथ-साथ पर्यटन उद्योग खूब विकसित हुआ है। यात्राओं की भरमार हो गई। यात्रावृत्तांतों से साहित्य और इंटरनेट को भर दिया गया। यात्रावृत्तांत एक विधा के रूप में स्थापित हो गया। कुछ बुद्धिमान लेखकों और सलाहकारों ने अपने लेख के माध्यम से यात्रा की तैयारियों और सावधानियों की दीक्षा भी दी। लेकिन सच तो यह है कि यात्रा के लिए निहायत जरूरी वस्तुओं तथा सावधानियों का जिक्र आज तक किसी अखबार या पत्रिका में हुआ ही नहीं, जिसका खामियाजा बेचारा अनुभवहीन यात्री बार-बार भुगतता है। अतः यात्रियों से निवेदन है कि इस यात्रा मैनुअल को ध्यान से पढ़ लें और बिना किसी कुतर्क के इसका पालन करें। इससे यात्रा सुखद होने का थोड़ा-बहुत चांस जरूर पैदा होता है। होना तो यह चाहिए कि टूर ऑपरेटर और पर्यटन विभाग इस मैनुअल को यथाशीघ्र  सर्कुलेट कराएं तथा इसका पालन अनिवार्य कर दें।
       यों तो यात्रा मैनुअल की शुरुआत मुझे हवाई यात्रा से करनी चाहिए, लेकिन जो नियमित हवाई यात्री हैं, उन्हें सलाह देने की हिमाकत करना अपनी सेहत के लिए ज्यादा मुफीद नहीं होगा। काफी पढे़-लिखे और धन-दौलत से ठसाठस व्यक्ति को सलाह देना कुल्हाड़ी पर पैर मारने के बराबर है। हां, पैसे की कीमत गिरने का एक दुष्परिणाम  यह जरूर हुआ है कि ‘घटिया श्रेणी’ के लोग भी हवाई जहाज में घुसने का कुत्सित प्रयास करने लगे हैं और पुश्तैनी  यात्रियों की शान  में बट्टा लगाए जा रहे हैं। इन नौसिखिया हवाई यात्रियों के लिए एक-दो बातें बताना यहां परमधर्म होगा जिससे यात्रा के दौरान जगहंसाई न हो। यह बताने की जरूरत नहीं कि हवाई जहाज में खाद्य पदार्थो की कीमत भी पूरी तरह हवाई होती है और जैसे-जैसे हवाई जहाज ऊपर जाता है, कीमतें भी ऊपर चढ़ती जाती हैं। अब जो यात्री हवाई यात्रा का टिकट किसी संगठन, मिशन  या सरकारी कमीशन  के अनुग्रह से प्राप्त करते हैं, उनके लिए खाद्यपदार्थों की ऐसी कीमतें जानलेवा साबित हो सकती हैं। ये इस बात को समझते हैं और कई बार अपने हैंडबैग में मोहल्ले की दूकान के पैकेट ठूंस कर चलते हैं। इस वर्ग की माताएं-बहनें (जो या़त्रा के समय ‘मैडम’ हो जाती हैं) तो आलू के परांठे या पूड़ी-सब्जी रखना नहीं भूलतीं। मगर हवाईयात्रा में यह महापाप है। यदि जहाज के अन्दर आपने ये पौष्टिक पदार्थ खोल लिए तो आपकी यात्रा का सत्यानाश हो गया और आप फ्लाइट में बैठकर भी स्लीपर की मानसिकता और अनुभूति से ऊपर नहीं उठ सके। लिहाजा, बड़ा बनने का अवसर मत चूकिए। सत्तर रुपए की पानी की बोतल और एक सौ बीस रुपए की कॉफ़ी  का आनन्द जरूर लीजिए। एअर होस्टेस की नजरों में ऊंचा बनिए और सहयात्रियों में अपना कद बढ़ाइए !
         रेलवे के प्रथम श्रेणी वातानुकूलित पर भी उपरोक्त नियम चिपकता है। उसमें चलने वाला आदमी श्रेष्ठ  होने के साथ-साथ प्रायः सरकारी अफसर होता है और उसकी बुद्धिमत्ता का प्रमाणपत्र लोक सेवा आयोग पहले ही जारी कर चुका होता है। चूंकि जो किराया इस श्रेणी का है, उससे कम में कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति हवाई जहाज में यात्रा कर सकता है, बशर्ते  पैसा उसकी जेब से न  लग रहा हो । क्योंकि सरकारी नियम ही ऐसे हैं कि सरकार इस श्रेणी के लिए अधिक किराए का भुगतान कर देगी, पास जारी कर देगी, लेकिन उससे कम रकम का भुगतान हवाई जहाज के लिए नहीं करेगी (उसकी नजर में ट्रेन का किराया कम और हवाई जहाज का ज्यादा होता है और प्राइवेट एअरलाइंस तो ज्यादा वसूलती ही हैं), इसलिए बहुत से अधिकारियों को मन मारकर इस क्लास में यात्रा करनी पड़ जाती है। वरना, कौन ऐसा हुआ है कि  महीनों  पहले आरक्षण के लिए डोलता फिरेगा?
     द्वितीय श्रेणी वातानुकूलित से यह यात्रा मैनुअल ज्यादा प्रभावी होता है। इस श्रेणी में वे लोग आने लगे हैं जो अभी आसन्न भूत में स्लीपर क्लास में यात्रा करते थे। चूंकि हर श्रेणी का यात्री अपने से नीचे वाले क्लास को पूरा पशु  मानता है , इसलिए उसका प्रयास होता है कि वह अपनी यात्रा का क्रम ऊपर की श्रेणी की ओर जारी रखे। इस क्लास में यात्रा करने वाला स्वयं को प्रथम श्रेणी के तुल्य और उसके समीप पाता है जिससे उसका मनोबल बढ़ता है। दिक्कत तब होती है जब ऊपर वाली बर्थ मिलती है क्योंकि तब उसे लगता है कि उसे केवल छत मिली है और पूरा ग्राउंड फ्लोर लोअर बर्थ वाले का है। अतः यात्री को यह प्रयास करना चाहिए कि येन-केन प्रकारेण उसे नीचे वाली बर्थ ही मिले। इस श्रेणी में भी घर से लाया खाना नहीं खाना चाहिए और रेलवे कैटरिंग द्वारा एल्युमिनियम फाॅइल में पैक सुदर्शन  खाना जरूर खरीदना चाहिए। पसंद तो नहीं ही आएगा, सो थोड़ा-बहुत चखकर शिकायत सहित फेंक देने में ही भलाई है। इससे स्वास्थ्य और सम्मान दोनों में वृद्धि होगी।
      ए.सी. थर्ड में यात्रा करने वाले प्राणी को ज्यादा कुछ नहीं करना है। उसे चाहिए कि वह ए.सी. प्रथम और द्वितीय के नियमित सफारिस्टों की नकल करने की कोशिश करे। उसे चाहिए कि यात्रा प्रारंभ से पूर्व कई जेबों वाला एक बरमूडा खरीद ले और ऊपरी अर्धांग के लिए मिसमैच करती हुई या लिप्यांकित बनियान खरीद ले। ध्यान रहे कि इस बनियान के ऊपर गलती से भी कुछ नहीं पहनना है। अंगरेजी का संक्षिप्त स्पीकिंग कोर्स भी उसके लिए आवश्यक है। उसे यह सोचना चाहिए कि वह भी अभिजात वर्ग में शामिल  हो गया है, भले ही बिरादरी से बाहर हो। मानसिकता में इस प्रकार का परिवर्तन होना चाहिए कि इससे नीचे के दर्जे में यात्रा करने वाले धरती के बोझ हैं। उसकी सोच कुछ इस प्रकार की होनी चाहिए जैसी कि सवर्णों में निचले स्तर के सवर्ण या पिछड़ों में अति पिछड़ों की होती है। एक बार बोगी में घुसकर उसे यह जरूर कहना चाहिए कि रश बहुत है और इस क्लास में सफर करने लायक नहीं है। पर क्या करें, रेलवे के नियमों और अचानक आ पड़ी जरूरत का, जिसके कारण इस भेडि़याधसान में यात्रा करनी पड़ रही है !
         यात्रा का असली मैनुअल स्लीपर क्लास से शुरू होता है। इस क्लास के लिए विशेष तैयारियां करनी पड़ती हैं। यात्रा से पूर्व शारीरिक और मानसिक क्षमता को विकसित किए बिना यहां यात्रा नहीं हो सकती। ज्ञानियों और तत्त्वदर्शियों  ने कहा है कि मनुष्य को आने वाली विपत्ति और कष्ट  के लिए तैयार रहना चाहिए। तो अब तैयार हो जाइए। न जाने क्या हो जाए? गुनगुनाते रहिए- इस पार प्रिये, मधु है, तुम हो; उस पार न जाने क्या होगा ! मानसिक रूप से तैयार हो जाने के बाद शरीर यात्रा के अनुकूल बन जाता है। कुछ कमी हो तो योग और ध्यान का अभ्यास कर लीजिए।
       वैसे एक नियम तो प्रत्येक श्रेणी की यात्रा पर लागू होता है। वह यह है कि आप अपनी हर यात्रा को अंतिम यात्रा मानकर चलें। कौन पता कब इस नगरी में फिर हो तेरा आना ! सो कूच करने से पहले अपने सगे-संबधियों को निहार लें। अगर आपके अंदर मोहग्रस्त अर्जुन वाला भाव आ जाए तो उसका निरादर न करें। उस पर पुनर्विचार की आवश्यकता  है। अपने साथ ऐसा कोई गोपनीय रहस्य लेकर न जाएं जिससे कुटुम्बियों को आर्थिक नुकसान हो या वारिसाना हक में जंग का सामना करना पड़े। सारा इंतजाम करने और परलोक तक की सोच लेने के बाद भी आप सकुशल वापस आ जाएं तो स्वयं को निर्विवाद भाग्यशाली  मान लें और ईश्वर  के अस्तित्व पर उठने वाले हर प्रश्न  को कचरा समझकर फेंक दें।

(शेष अगली किश्त में----)

Wednesday, 9 October 2013

बाबा की सराय में बबुए

इष्ट देव सांकृत्यायन 

इससे पहले - 

अपना सामान J कमरे में टिका कर और फ्रेश होकर नीचे उतरा तो संतोष त्रिवेदी, हर्षवर्धन, शकुंतला जी और कुछ और लोग लॉन में टहलते मिले. एक सज्जन और दिखे, जाने-पहचाने से. शुबहा हुआ कि दूधनाथ जी (जो कि थे भी) हैं. अनिल अंकित जी से कुछ बतिया रहे थे, लिहाजा बीच में टोकना अच्छा नहीं लगा. मैंने कहा बतिया लेने देते हैं, अपन बाद में तय करते हैं, वही हैं या कोई और. इस बीच अरविन्द जी के साथ बैठ गए. दुनिया-जहान की बातें होती रहीं. ख़ासकर भारतीय वांग़्मय में ही मौजूद विज्ञान कथाओं की तमाम संभावनाओं की. बीच-बीच में कुछ इधर-उधर जीव-जंतुओं को लेकर व्याप्त लोकभ्रांतियों की. इस बीच सिद्धार्थ आए, उन्होंने बताया कि उन्हें सपत्नीक किसी पुराने मित्र के यहां जाना है. थोड़ी देर में आते हैं. अरवंद जी भी फ्रेश होने अपने कक्ष में चले गए. तब तक दूधनाथ जी ख़ाली हो गए थे. अकेले टहल रहे थे. मैंने सोचा पूछ ही लेते हैं. ‘क्या आप दूधनाथ जी हैं...’ मैंने हाथ बढ़ाते हुए पूछा. ‘जी हां, मैं हूं...’ उनका सौजन्यपूर्ण जवाब था. हालांकि उनके चेहरे से ‘तू कौन?’ असमंजस साफ़ झांक रहा था. इसे भांपते हुए मैंने ख़ुद ही बता दिया, ‘मैं इष्ट देव’ एक क्षण फिर उनके माथे पर बल पड़ा, ‘अरे गोरखपुर?’ ‘जी हां, जी हां’ और इसके साथ ही उन्होंने मेरे कन्धे पर हाथ बढ़ाते हुए समेट लिया. उम्र का असर अभी उनके चेहरे तक ही है. क्या पता, थोड़ा-बहुत सक्रियता पर भी पड़ा हो. पर उनके स्वभाव की ख़ास ख़ासियत - आत्मीयता पर बिलकुल नहीं पड़ा. ‘कहां हो, क्या कर रहे हो, क्या लिख-पढ़ रहे हो, इधर क्या नया लिखना-पढ़ना हुआ, भविष्य की क्या योजना है.... आदि’ अरसे बाद हुई मुलाक़ात के साथ उठी कई जिज्ञासाएं. मालूम हुआ कि वे यहां बतौर गेस्ट राइटर रह रहे हैं. फिलहाल कुछ लिख-पढ़ रहे हैं. इस बीच संतोष जी भी हमारे साथ आ गए. उन्होंने दूधनाथ जी के साथ फोटो खिंचाने का प्रस्ताव भी किया और फोटो हमने खींच भी लिए. 

साहित्य की दुनिया में धीरे-धीरे व्याप रहा एक ख़ास क़िस्म का अनमनापन, कहानी-कविता जैसी विधाओं के सामने खड़ी नई चुनौतियां, इन चुनौतियों से निपटने के लिए ज़रूरी तैयारियां, भारत के हिंदीतर राज्यों का साहित्य हिंदी में लाए जाने, भाषा के प्रयोग में असावधानियां... जैसे कई मसलों पर बात हुई दूधनाथ जी से. ब्लॉगों पर किस तरह का साहित्य लिखा जा रहा है और हिंदी के विकास-प्रसार में ब्लॉग कैसे अपनी क्या भूमिकाएं तय कर सकते हैं, इस पर विचार भी हुआ. मैंने उन्हें ब्लॉगिंग के मैदान में उतरने के लिए भी न्योता, पर उन्होंने मेरा यह आग्रह हंसकर टाल दिया. कहने लगे, 'अब कौन कि टिर-पिटिर करना शुरू करे यार इस उमर में. कंप्यूटर-लैप्टॉप जैसी चीज़ों के साथ अपनी पटरी बैठ नहीं पाती.' इस पर मैंने उन्हें डॉ. उदय भान मिश्र और श्रीलाल शुक्ल के उदाहरण भी दिए. श्रीलाल जी ने तो इस काम के लिए ही बाकायदा एक टाइपिस्ट रख रखा था. (भाई! श्रीलाल जी को याद करते हुए बार-बार फुरसतिया जी का लिखा एक संस्मरण याद आ रहा है. मौक़ा मिले तो आप भी पढ़ लें. अच्छा लगेगा.) उदय भान जी कंप्यूटर-मोबाइल से खेलने का कुछ काम ख़ुद भी कर लेते हैं. बहरहाल, उस वक़्त तो दूधनाथ जी इस समुंदर में उतरने के लिए तैयार नहीं हुए. आगे की बात आगे.... J 

इसी बीच सिद्धार्थ जी का फोन आया. ‘आपको पता ही होगा, 8 बजे वीसी साहब के यहां चलना है. डिनर पर. आपको, मनीषा जी को और अरविंद जी को भी.’ पता तो नहीं था, लेकिन अब पता चल गया. टाइम कम बचा था. सोचा चलो अब आराम कर लेते हैं. उनका यह भी निर्देश था कि ‘क्या पता अरविंद जी को ध्यान हो या नहीं, तो मैं उन्हें भी रिमाइंड करा दूं.’ लेकिन मुश्किल यह थी कि मेरे पास उनका सेल नंबर नहीं रह गया था और रूम नंबर ख़ुद मालूम नहीं था. वहां मौजूद एक कर्मचारी से पूछा, वह भी नहीं बता सका. बहरहाल, अपन ने मान लिया कि उन्हें पता ही होगा और थोड़ी देर आराम करने चले गए. शाम को ठीक साढ़े सात बजे फिर सिद्धार्थ का फोन आ गया, बतौर रिमाइंडर. मैंने पूछा कि भाई अरविन्द जी का पता नहीं चल सका. उन्होंने अरविंद जी कमरा नंबर बताया. मैं तेजी से तैयार हुआ और अरविंद मिश्र के पास पहुंचा. वह भी तेजी से तैयार हुए और थोड़ी ही देर में हम लोग डॉ. राय के घर की ओर चल पड़े. नागार्जुन सराय के पीछे ही है कुलपति निवास.


एक बात का ज़िक्र छूट गया. बताता चलूं..... विभूतिनारायण राय मेरे प्रिय रचनाकारों में रहे हैं. ख़ासकर ‘शहर में कर्फ्यू’ और ‘किस्सा लोकतंत्र’ पढ़ने के बाद से. ‘एक छात्र नेता का रोज़नामचा’ ने इस लेखक से मेरा लगाव और बढ़ाया था. मन हुआ कि कभी इस शख़्स का इंटरव्यू करूंगा. लेकिन बीच-बीच में राय साहब के बारे में आती रही विभिन्न लोगों की अलग-अलग राय (जिन्हें मैं सही तो नहीं मान सकता था, पर किसी से ख़ुद मिले बग़ैर ग़लत भी कैसे कह सकता था?), ने मेरे विचार को कभी प्रयास के उत्साह में बदलने नहीं दिया. इसका एक कारण शायद मेरे अपने अवचेतन का यह आग्रह भी रहा हो कि इतने लंबे समय तक पुलिस की नौकरी कर चुका कोई शख़्स सहज हो भी कैसे सकता है (?). पर एक ही मुलाक़ात ने सारी धारणाओं और नकारात्मक सोच को ध्वस्त कर दिया. वैसे भी, साहित्य की दुनिया में कैसे-कैसे लोगों द्वारा, किस-किस उद्देश्य से, कैसी-कैसी बातें, कहां-कहां फैलाई जाती हैं ........ किसे बताने की ज़रूरत है. हम लोग उनके घर पहुंचे तो वे स्वयं एक सामान्य सद``गृहस्थ की तरह मेहमाननवाजी के लिए सपत्नीक प्रस्तुत थे.

Sunday, 6 October 2013

ब्लॉग बनाम माइक्रोब्लॉग

इष्ट देव सांकृत्यायन 

इससे पहले :  वर्चुअल दुनिया के रीअल दोस्त और आयाम से विधा की ओर

इस सत्र के बाद मेरे पुराने साथी अशोक मिश्र से मुलाक़ात हुई. मालूम हुआ कि अब वे वहीं विश्वविद्यालय की ही एक साहित्यक पत्रिका का संपादन कर रहे हैं. ज़ाहिर है, पुराने दोस्तों से 
मिलकर सबको जैसी ख़ुशी होती है, मुझे भी हुई. हम लोग जितनी देर संभव हुआ, साथ रहे. प्रेक्षागृह के बाहर निकले तो मालूम हुआ कि अभी आसपास अभी कई निर्माण चल रहे हैं. ये निर्माण विश्वविद्यालय के ही विभिन्न विभागों, संकायों, संस्थानों और छात्रावासों आदि के लिए हो रहे थे. विश्वविद्यालय से ही जुड़े एक सज्जन ने बताया कि तीन साल पहले तक यहां कुछ भी नहीं था. जैसे-तैसे एक छोटी सी बिल्डिंग में सारा काम चल रहा था. राय साहब के आने के बाद यह सारा काम गति पकड़ सका और विश्वविद्यालय ने केवल पढ़ाई, बल्कि साहित्य-संस्कृति की दुनिया में भी अपनी धाक जमाने लायक हो पाया. अब तो टीचरों से लेकर स्टूडेंटों तक में (माफ़ करें, ये उन्हीं के शब्द हैं) काफ़ी उत्साह है. लोग इसे आपकी दिल्ली के जेएनयू से कम नहीं समझते. अच्छा लगा जानकर कि विश्वविद्यालय तरक्की की ओर है.

अगला सत्र पूरी तरह तकनीकी था. सिद्धार्थ के औपचारिक आह्वान के बाद शैलेष भारतवासी, आलोक कुमार और डॉ. विपुल जैन ने मोर्चा संभाला. ब्लॉग कैसे बनाएं, किस तरह पोस्ट लिखें और कैसे उसे जन-जन (अगर सरकारें इसी तरह रोटी महंगी कर लैप्टॉप और टैब्लेट बांटने का वादा करती रहीं और उसे पूरा भी करती रहीं, तो यक़ीन मानें J वह दिन दूर नहीं) तक पहुंचाएं, इस पर लंबी चर्चा हुई. ज़ाहिर है, अपनी समझ में ब्लॉग बनाने और उस पर साहित्य ठेलने से अधिक कुछ समझ में आने वाला तो था नहीं, और उतना अपन करी चुके हैं. इस बीच यह सूचना भी मिली कि कुलपति ने विश्वविद्यालय की ओर हिंदी ब्लॉग्स का अपना एक एग्रीगेटर बनाने का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया है. बेशक़, इसमें थोड़ा समय लगेगा, लेकिन यह एक महत्वपूर्ण बात होगी. http://www.blogvani.com/ के बाद से आई रिक्तता को भरने में इसकी भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है. इसमें कोई दो राय नहीं कि हिंदी और साहित्य दोनों ही के विकास में इसका योगदान सुनिश्चित किया जा सकता है, अगर बनने के बाद इसे ढंग से चलाया जाए तो. हालांकि पूरे आयोजन के दौरान फेसबुक-ट्विटर जैसे माइक्रोब्लॉग्स, जिन्हें सोशल नेटवर्किंग साइट भी कहा जा रहा है का ख़ौफ़ चिट्ठाकारों पर छाया रहा. लोगों को यह भय है कि कहीं इनके चलते ब्लॉगिंग की विधा पीछे न छूट जाए. वैसे इस भय को निराधार नहीं कहा जा सकत. लेकिन, कुलपति विभूति नारायण जी ने अपने संबोधन में चिट्ठाकारों को आश्वस्त किया. उनका मत था, 'जब टेलीविजन आया था, तब अख़बारों के बारे में लोग ऐसा ही सोचते थे. लेकिन घटे सिर्फ़ वो जिन्होंने अपने को अपडेट नहीं किया. जिन अख़बारों ने अपने को अपडेट कर लिया, उनका प्रसार सिर्फ़ बढ़ा ही है. मुझे तो यह लगता है कि फेसबुक-ट्विटर ब्लॉग की पठनीयता बढ़ाने के काम लाए जा सकते हैं.' इस बीच मनीषा पांडे भी आ गई थीं. उन्होंने स्त्री विमर्श पर अपनी बात रखते हुए लिखने-पढ़ने की दुनिया में लड़कियों को आगे आने के लिए कहा. अंत में कुलपति डॉ. विभूति नारायण राय ने प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र बांटे. विश्वविद्यालय में ही स्थित  मीडिया अध्ययन केन्द्र के निदेशक डॉ. अनिल के राय अंकित ने धन्यवाद ज्ञापन किया और आयोजन के समापन की घोषणा हुई.

बाहर निकलने पर अशोक मिश्र ने फिर से राय साहब से मिलवाया और उन्होंने तुरंत कहा, ‘आइए, आपको विश्वविद्यालय का संग्रहालय देखाते हैं.’ शायद मनीषा जी की पहले ही उनसे इस विषय पर कुछ चर्चा चल रही थी. मुझे अन्दाज़ा भी नहीं था कि यह कैसा संग्रहालय होगा. धारणा मेरी यही थी कि जैसे आम तौर पर सभी संग्रहालय होते हैं, यह भी होगा. कुछ पुरानी मूर्तियां, कुछ तथाकथित बड़े लोगों द्वारा उपयोग की गई चीज़ें.... ख़ैर, हम लोग (राय साहब, मनीषा और मैं) उनकी ही गाड़ी से संग्रहालय के लिए चल पड़े. थोड़ी ही देर में हम सहजानंद सरस्वती संग्रहालय पहुंच भी गए. एक अन्य वाहन से अंकित जी के साथ-साथ डॉ. अरविंद और अशोक जी भी पहुंचे. हालांकि उस दिन रविवार होने के कारण संग्रहालय तो बंद था, पर कुलपति वहां पहुंच चुके थे, लिहाजा किसी को उसे खोलने के लिए बुलवाया गया. जब तक वे आते, तब तक हम लोगों ने उनका मीडिया लैब देखा. वाक़ई, अगर ढंग से काम किया जाए तो वहां से एक छोटा टीवी चैनल एवं एफएफ बैंड चलाने तथा सापताहिक अख़बार निकाले जाने भर की व्यवस्था तो हो गई है. इसी बीच मालूम हुआ कि मनीषा जी अपना कैमरा कहीं छोड़ आईं. उन्हें तुरंत किसी वाहन से सभागार भेजा गया. थोड़ी देर बाद वह लौटीं तो मालूम हुआ कि उनका कैमरा उन्हें मिल गया. अच्छा लगा जानकर कि अभी ईमानदारी की नब्ज पूरी तरह डूबी नहीं है. J थोड़ी देर हम मीडिया अध्ययन केंद्र के निदेशक अंकित जी के कक्ष में भी बैठे. अंकित जी ने हमारे लिए जल और चाय की व्यवस्था भी बनवाई. 

इसके बाद संग्रहालय देखा गया. सचमुच, यह एक अत्यंत समृद्ध संग्रहालय है. हिंदी के कई महत्वपूर्ण लेखकों की पांडुलिपियां, चिट्ठियां और उनकी उपयोग की हुई कई तरह की सामग्रियां यहां संग्रहीत हैं. निश्चित रूप से यह एक भागीरथ प्रयास का ही नतीजा हो सकता है. जब तक कोई निजी तौर पर रुचि लेकर इस दिशा में अथक प्रयास न करे, ऐसा संकलन संभव नहीं है. यह सब देखने के बाद डॉ. राय ने कहा कि चलिए अब आप लोगों को नज़ीर हाट दिखाते हैं. बीच में हम लोग थोड़ी देर गांधी हिल पर भी ठहरे. नयनिभिराम दृश्य है वह. अलबत्ता राय साहब ने ख़ुद ध्यान दिलाया कि यहां गांधी जी ख़ुद दुबले, लेकिन उनकी बकरी थोड़ी ज़्यादा मोटी बन गई है. मुझे लगा कि निश्चित रूप से इस बकरी को इसका पूरा चारा J मिल गया है, वरना क्या मज़ाल.... बीच में उन्होंने राहुल सांकृत्यायन केंद्रीय ग्रंथालय भी दिखाया. हालांकि उसमें अंदर जाने की व्यवस्था आज नहीं हो सकती थी. वैसे भी शाम ढलने के क़रीब आ गई थी. नज़ीर हाट भी उम्दा बाज़ार की शक्ल अख़्तियार कर रहा है. यहां दुकानों के नाम भी ‘मसि-कागद’, ‘झकाझक’ जैसे दिलचस्प रखे हुए हैं. ये सारे नाम किसी न किसी कविता या पद से लिए हुए ही हैं. विश्वविद्यालय की सड़क़ों, छात्रावासों, अतिथि गृह से लेकर सभागारों तक के नाम किसी न किसी रचनाकार या हिंदीसेवी के नाम पर रखे गए हैं. निश्चित रूप से यह हिंदीसेवियों के एक सुखद बात है. नज़ीर हाट में राय साहब ने एक दुकान पर हमें वर्धा की ख़ास मिठाई गोरस पाक खिलाई. यह कुछ-कुछ ग़ाज़ियाबाद में मिलने वाली नानखटाई जैसी चीज़ होती है. नागार्जुन सराय छोड़ते हुए पूछा, ‘आप ठहरे कहां हैं?’ मैंने बताया, ‘अभी तक तो बुल्के बाबा की कुटिया में हैं.’  उन्होंने कहा, ‘अब तक तो कई लोग जा चुके हैं. नागार्जुन सराय में जगह ख़ाली हो गई होगी. देखते हैं, कोई कमरा ख़ाली हो तो यहीं आ जाइए, सबसे अलग क्यों पड़े रहेंगे अकेले में!’ मैं तो ख़ुद यही चाहता था. ख़ैर, उन्होंने पहुंचते ही किसी सज्जन को बुलाया और उन्हें मेरा सामान इधर शिफ्ट करने का निर्देश जारी करके चले गए. मेरा सामान था ही क्या! कुल जमा एक बैग, वह मैं ख़ुद लिए आकर बाबा की सराय में जम गया.


Saturday, 5 October 2013

आयाम से विधा की ओर

इष्ट देव सांकृत्यायन 


वर्धा स्थित सेवाग्राम अश्रम परिसर में बापू कुटी
अगले दिन सुबह मैं ठीक समय पर तैयार होकर नागार्जुन सराय आ गया. बस निकलने ही वाली थी, इसलिए और कुछ भी किए बग़ैर मैं सीधे बस में बैठ गया. बस में भरपूर हंसी-ठिठोली करते थोड़ी ही देर में हम लोग सेवाग्राम पहुंच गए. बिलकुल प्राकृतिक वातावरण में मौजूद एक बड़े से परिसर में कई छोटे-छोटे घर... प्रकृतिप्रदत्त सुविधाओं से संपन्न. खपरैल के इन्हीं  घरों में से एक में गांधी जी का ऑफिस हुआ करता था, एक में वह रहते थे और एक में भोजन करते थे. एक घर के बारे में बताया गया कि यहां एक बार जब वे बीमार पड़ गए थे, तब रहे थे. यह उनके लिए उद्योगपति जमनालाल बजाज ने बनवाया था. कुछ लोग बड़ी श्रद्धापूर्वक गांधी जी को याद कर रहे थे, कुछ उनके ब्रह्मचर्य के प्रयोगों की चर्चा में मशगूल थे, कुछ क्रांतिकारियों के प्रति उनके दृष्टिकोण और कुछ उनके अहिंसा और सत्य पर किए गए प्रयोगों के. वैसे यशपाल के माध्यम से गांधी जी को जानने वालों की भी कमी नहीं थी. अच्छी बात यह थी कि सभी ने सच्चे गांधीवादी होने का परिचय दिया. बीच-बीच में व्यंग्यकार संतोष त्रिवेदी सबका भरपूर मनोरंजन भी करते रहे. मतों का आधिक्य और भेद भरपूर था, लेकिन टकराव बिलकुल नहीं. J लौटते हुए मेरा मन राष्ट्रपिता के प्रति श्रद्धा से भर आया था. वाक़ई क्रांति तो ऐसे ही करनी चाहिए. आगे-पीछे दो-चार सेठ जी लोगों की मदद हो, थोड़ा-बहुत हो-हल्ला, थोड़ी-बहुत नारेबाजी, दो-चार दिन धरना-प्रदर्शन, बहुत हुआ जेल चले गए... बस और क्या! पुलिस के लात-जूते खाने-पिटने के लिए दो-चार लाख टुटपुंजिए मिल जाएं, (मने अपने न पिटना हो) तो वाक़ई अहिंसा से बेहतर प्रयोग हो ही नहीं सकता. ये क्या कि चिरकुटों की तरह जंगल-जंगल भागते रहें, पुलिस से लेकर सेना तक से बचो, न खाने-पीने का ठिकाना, न रहने का बसेरा और घर-परिवार की बर्बादी अलग. पकड़े गए तो जेल-फेल टाइप मामला नहीं, सीधे फांसी. ये भी कोई क्रांति हुई, न अपना भला न दूसरे का!
चूंकि सेवाग्राम में ही काफ़ी देर हो गई थी और हमें अपना कार्यक्रम भी समय से शुरू करना था, लिहाज़ा तय किया गया कि पवनार आश्रम का कार्यक्रम फ़िलहाल मुल्तवी किया जाए. पवनार विनोबा जी का आश्रम है. हालांकि मन मेरा पवनार जाने का ज़रूर था, पर इस बार नहीं हो सका. मेरे इलाके में जो इकलौता इंटर कॉलेज है, उसमें विनोबा भावे के भूदान आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण योगदान रहा है. बुज़ुर्गों में ऐसे लोग अभी भी मिल जाते हैं, जिन्हें अपने सर्वोदयी होने पर गर्व है. ये अलग बात है कि उनमें से किसी ने भी चुनाव वगैरह लड़ने जैसा कोई पुण्यकार्य नहीं किया. ये लोग केवल स्कूल-अस्पताल टाइप चीज़ें ही बनवाते रह गए. बाक़ी  अपने लिए उनमें से कोई कुछ ख़ास कर पाया हो, ऐसा ज्ञान प्राप्त नहीं होता. (मैं तो पवनार का आश्रम असल में देख नहीं पाया, आपके लिए गूगल बाबा से साभार लेकर लगा दे रहा हूं.)

विश्वविद्यालय परिसर पहुंचने के बाद थोड़ी ही देर में तैयार होकर सभी हबीब तनवीर सभागार पहुंच गए. प्रेक्षागार है तो छोटा ही, लेकिन हमारे आयोजन के लिए पर्याप्त थी. पहले सत्र का संचालन मुझे ही करना था. यह साहित्य के उन आयामों पर केन्द्रित था, जिन्हें ब्लॉग और इंटरनेट जगत समेट और सहेज सका है. विज्ञान कथाकार डॉ. अरविंद मिश्र, कवि-सैलानी ललित शर्मा, व्यंग्यकार अविनाश वाचस्पति मुन्नाभाई, हमारे पुराने साथी रह चुके डॉ. अशोक मिश्र, डॉ. मनीष मिश्र, चिकित्सक ब्लॉगर डॉ. प्रवीण चोपड़ा, संस्कृत साहित्य से आज के हिंदी जगत को परिचित कराने में लगी शकुंतला शर्मा और कई विधाओं में निरंतर सक्रिय वंदना अवस्थी दुबे इस सत्र के प्रतिभागी थे. आरंभ डॉ. अरविंद मिश्र से हुआ, जिन्होंने ब्लॉगिंग को एक अलग विधा के ही रूप में देखने का आग्रह किया और इससे ही जोड़कर ब्लॉगिंग में आई साहित्य की विधाओं पर बात की जानी चाहिए. इसके साथ ही वहां मौजूद कई चिट्ठाकारों की विचारोत्तेजक टिप्पणियां आने लगीं, जो अगर अधिक खिंच जातीं तो बहुत हद तक आशंका इस बात की थी कि कहीं हमें पटरी ने छोड़ देनी पड़े. कई लोगों की असहमतियों के चलते उठ रही बहस को शायद विराम देने के इरादे से ही सिद्धार्थ जी ने विधाओं का समुच्चय बताने की कोशिश की. ललित जी ने इस चर्चा को आगे बढ़ाते हुए ब्लॉग पर उपलब्ध साहित्य के विभिन्न आयामों की बात की. अविनाश जी ने ब्लॉग और साहित्य के रिश्तों पर प्रकाश डाला. अशोक जी ने साहित्य और मीडिया के अंतर्संबंधों का ज़िक्र करते हुए साहित्य के प्रसार और उसकी पहुंच बढ़ाने में ब्लॉग की भूमिका पर प्रकाश डाला. ब्लॉग ने जिस तरह गुदड़ी छिपे साहित्य के लालों को दुनिया के सामने आने, पढ़े जाने और लोकप्रिय होने का मौक़ा दिया, वह सचमुच महत्वपूर्ण है. इस महत्व को रेखांकित करते हुए उन्होंने इसे साहित्यालोचन का विषय बनाए जाने की बात भी की. आम तौर पर हिंदी की बात जब की जाती है तो उसका दायरा केवल रचनात्मक साहित्य यानी कविता-कहानी तक सीमित कर दिया जाता है. लेकिन साहित्यकारों से कहीं ज़्यादा हिंदी की सेवा वे लोग कर रहे हैं, जो तथाकथित (इसे अन्यथा अर्थ में न लें) साहित्य नहीं रच रहे हैं. उन्हें अपने साहित्यकार या कुछ विशिष्ट कर रहे होने का कोई दंभ भी नहीं है, जबकि भाषा और समाज के हित में विशिष्ट कर वही रहे हैं. दुर्भाग्य यह है कि उनके रचनाकर्म पर हिंदी के ठेकेदार विचार तक नहीं कर रहे हैं, जो हिंदी साहित्य जगत की पिछड़ी मानसिकता के अलावा किसी और बात का परिचय नहीं देती. स्वभावतः सहज और विनम्र चिकित्सक डॉ. प्रवीण चोपड़ा ने बिलकुल ऐसा ही कहा तो नहीं, लेकिन उनकी बातें सुनकर यह विचार मेरे मन में आया. साहित्य के आलोचक तो यह काम करेंगे नहीं (जो ठेठ साहित्य के साथ ही न्याय करने को अपने साथ अन्याय मानते हैं, उनसे ऐसी बेजा उम्मीद भला कैसे की जा सकती है!), इसके लिए ब्लॉग जगत में कुछ लोगों को सामने आना चाहिए.  शकुंतला जी ने ब्लॉग को साहित्य के 10 रसों के इतर एक और यानी 11वां रस बताकर यह स्पष्ट कर दिया साहित्य के बहुतेरे आयामों को समेटने का काम ब्लॉग जगत बख़ूबी कर रहा है. मुंबई से डॉ. मनीष ने साहित्य के इतर ब्लॉग के अन्य आयामों की भी चर्चा की और अंत में वंदना अवस्थी दुबे ने कहा कि ब्लॉग साहित्य आयामों को सहेजने का काम बख़ूबी कर रहा है. मैंने हिंदी की कुछ महत्वपूर्ण साहित्यिक कृतियों के इंटरनेट और चिट्ठों पर उपलब्ध न होने की बात भी उठाई. केवल दो पोर्टल हैं; एक तो http://kavitakosh.org/ और दूसरा http://gadyakosh.org/gk/ जिन्होंने हिंदी के आदिकाल से लेकर आधुनिक काल तक के साहित्य को बिना किसी पूर्वाग्रह के एक साथ समेटने की कोशिश की है. मुश्किल ये है कि ये साइटें भी ललित कुमार अपने निजी संसाधनों से चला रहे हैं और निजी संसाधनों से कोई प्रयास कब तक जारी रखा जा सकता है, यह कहना मुश्किल है. इसीलिए मैंने अंग्रेजी के http://www.online-literature.com/ जैसा कोई पोर्टल विकसित किए जाने के प्रयास की बात भी की. संयोग से इस बीच कुलपति विभूति नारायण राय भी आकर दर्शक दीर्घा में बैठ गए थे. उन्होंने स्पष्ट किया कि इसका प्रयास चल रह है और काफ़ी हद तक सफल भी हो रहा है. विश्वविद्यालय के ही पोर्टल http://www.hindisamay.com/ पर कई महत्वपूर्ण कृतियां उपलब्ध कराई जा चुकी हैं. आगे और रचनाएं उपलब्ध कराने का काम भी चल रहा है. साथ ही, सिद्धार्थ ने भी http://www.hindisamay.com/ पर उपलब्ध कई कृतियों का ब्योरा भी दे दिया. अच्छी बात यह थी कि इस सत्र में ब्लॉगरों, प्रतिभागियों, अध्यापकों और छात्रों सबको अपने मत रखने और प्रश्न उठाने यानी विमर्श की पूरी स्वतंत्रता थी. संचालक होने के नाते मेरी यह ज़िम्मेदारी थी कि इस लोकतंत्र को भारत के लोकतंत्र की तरह केवल घोषणा तक सीमित न रहने देकर सही मायने में कम से कम आयोजन का ज़मीनी सच बनाऊं और बिलकुल मैत्रीपूर्ण माहौल के नाते इस बात का भरोसा भी था कि इसे कोई अन्यथा नहीं लेगा. यह अलग बात है कि ब्लॉग को एक अलग विधा मानने की अरविंद जी की बात से जो चखचख शुरू हुई और उसमें छात्र तो कम दर्शक दीर्घा में मौजूद अनूप शुक्ल, हर्षवर्धन त्रिपाठी जैसे विशेषज्ञों ने अपनी निर्णयात्मक स्थापनाओं की जो आहुति डाली J उसे संभालते हुए सत्र को समय से संपन्नता के मकाम तक पहुंचा पाना मुश्किल लगने लगा था. 

Friday, 4 October 2013

वर्चुअल दुनिया के रीअल दोस्त

इष्ट देव सांकृत्यायन 

डॉ. अरविंद मिश्र का ब्लॉग क्वचिदन्यतोsपि बहुत दिनों से पढ़ता आ रहा था. वैज्ञानिक विषयों पर और उससे इतर भी, लोकजीवन के विविध विषयों पर उनका लेखन प्रभावित करने वाला है. हमारा एक-दूसरे के ब्लॉग पर आना-जाना लगभग अच्छे पड़ोसियों जैसा रहा है, यह अलग बात है कि मुख़ातिब नहीं हो सके थे, पर होने का मन था. वयंग्यकार और आम बातचीत को भी तुकबंदी में ढालने की क्षमता रखने वाले अविनाश वाचस्पति मुन्नाभाई से काफ़ी पहले एक बार की मुलाक़ात तो थी. यह मुलाक़ात लगभग उन्हीं दिनों की थी, जब ब्लॉगबुखार वैसे ही फैल रहा था, जैसे आजकल डेंगू. उसके बाद फ़ोन पर हमारी बातचीत ज़रूर हुई, लिखना-पढ़ना तो लगा ही रहा, पर मुलाक़ात नहीं हुई. ब्लॉगिंग के बिलकुल शुरुआती दौर में ही मुलाक़ात हुई थी फ़ुरसतिया यानी अनूप शुक्ल जी से. संस्थागत मीटिंग के लिए कानपुर गया था. गीतकार साथी विनोद श्रीवास्तव से ब्लॉग में साहित्य का ज़िक्र चला तो उन्होंने बताया कि यहां फुरसतिया जी हैं. यह तो मालूम था कि अच्छा लिखने-पढ़ने वाले हैं, क्योंकि उनका ब्लॉग मैं देख चुका था. साहित्य के अलावा और भी बहुत कुछ था हिन्दिनी पर, रोचक और महत्वपूर्ण. विनोद की बात हुई तो उन्होंने तुरंत मिलने की हामी भी भर दी और हमारे ठहरने वाले स्थल पर चले भी आए. लेखन तो उनका प्रभावित करने वाला था ही, व्यवहार की सहजता उससे भी ज़्यादा प्रभावित कर गई. हालांकि उसके बाद मुलाक़ात नहीं हो सकी. हर्षवर्धन जी से फ़ोन पर बातचीत तो थी, लेकिन मुलाक़ात नहीं हुई थी. सिद्धार्थ भाई तो ख़ैर, इस पूरे आयोजन के सूत्रधार ही हैं और हमारा साथ भी काफ़ी पुराना है. एक ही मिट्टी से जुड़े लोग हैं हम, यह अलग बात है कि भेंट कम ही हो पाती है. इधर मिले एक अरसा गुज़र गया था. उन्होंने एक-दो ऐसे आयोजन किए भी जिनमें मिला जा सकता था और मिलने का मन भी था, पर अफ़सोस कि हर आदमी को मयस्सर नहीं इंसां होना..... और मैं कोई हर आदमी से अलग तो हूं नहीं J इधर जब सिद्धार्थ जी ने वर्धा में ब्लॉगरों के आयोजन में न्योता (और वह भी पिछली कई वादाख़िलाफ़ियों की याद दिलाते हुए, शिकायत+धमकी के साथ) तो मैंने भी तय कर लिया कि चलना ही है. सिद्धार्थ जी से ये मालूम हो गया था कि इतने लोग तो आ रहे हैं और आसानी से सबसे मिलना कहां हो पाता है! फ़ोन पर शिवकुमार मिश्र (व्यंग्य जिनका धर्म है और हास्य अधिवास) से भी बात हुई थी, पर उन्होंने अन्यत्र व्यस्तता बताई. ख़ैर.    
20 सितंबर की रात लगभग 10 बजे नागपुर स्थित बाबासाहब अंबेडकर हवाई अड्डे पर उतर कर बाहर निकला तो विश्वविद्यालय के दो लोग गाड़ी सहित पहले से मौजूद थे. उनके साथ चला और क़रीब दो घंटे के सफ़र के बाद विश्वविद्यालय परिसर पहुंचा. बीच-बीच में सिद्धार्थ जी की कॉल कई बार आती रही. ज़ाहिर है, सभी दोस्तों को मेरी ही तरह मिलने की आतुरता थी, भले हममें से कई पहले कभी मिले नहीं थे. पता नहीं, लोग क्यों कहते हैं कि तकनीक लोगों को दूर करती है, तोड़ती है. यह लगाव एक तकनीक की ही देन था, जिसकी उम्र भारत में तो सिर्फ़ 15 साल है. ख़ासकर यह मुलाक़ात उसी की एक संतान की देन थी, जिसके चलते कुछ लोगों को आपस में दोषारोपण, गाली-गलौज, लगभग दुश्मनों जैसे लड़ने-भिड़ने का एक मंच मिला (शायद यही असली वैचारिक समानताओं वाले लोग थे J) तो बहुत लोगों को अलग-अलग पृष्ठभूमि, शैक्षिक क्षेत्र, व्यवसाय और बिलकुल भिन्न वैचारिक आग्रहों-प्रतिबद्धताओं के बावजूद विचारों-अनुभवों की साझेदारी के लिए एक प्रीतिकर खुला मैदान. सबने अपने-अपने हिसाब से लोगों को चुना और दूर गए या क़रीब आए. बाक़ी तकनीक तो बस तकनीक है.



हां, वाक़ई यह इसी तकनीक का ही एक पक्ष था. रात 12 बजे जब मैं विश्वविद्यालय परिसर पहुंचा तो अधिकतर दोस्त नागार्जुन सराय के सामने कैंप फायर जैसा माहौल बनाए मिले. ये अलग बात है कि अब सभा विसर्जन की ओर अग्रसर थी. वैसे भी कवियों, ब्लॉगरों, पत्रकारों और पुलिस वालों की बात छोड़ दी जाए तो कोई शरीफ़ आदमी तो रात 12 बजे के बाद जागना पसंद करता नहीं. सबसे मिलकर बेहद प्रसन्नता हुई, लेकिन यह प्रसन्नता तुरंत अपने-अपने दिल के कोने में दबाए सब अपने-अपने कमरों की ओर भाग चले, क्योंकि बूंदा-बांदी टाइप का माहौल भी बन रहा था. सिद्धार्थ ने बताया कि मेरे लिए फ़ादर कामिल बुल्के की कुटिया में जगह बनाई गई है और भोजन कमरे में ही रख दिया गया है. मुझे एक जन के साथ उन्होंने भेजा. चलते-चलते उन्होंने यह भी बता दिया कि सबेरे 6 बजे ही सेवाग्राम आश्रम के लिए निकलना है. मौक़ा मिला तो वहीं से पवनार भी चलेंगे. इसलिए सुबह जल्दी तैयार होकर आ जाएं. हर्षवर्धन जी पवनार आश्रम के निकट धाम नदी में नहाने का कार्यक्रम भी बनाने लगे. कमरे में पहुंच कर मैंने फटाफट भोजन किया और सो गया.


Thursday, 3 October 2013

होरी खेलूंगी कह कर बिस्मिल्लाह

भाई ख़ुर्शीद अनवर की फेसबुकिया दीवार से बाबा बुल्ले शाह (बुल्ला की जाणां मैं कौण .... तो सुना ही होगा आपने रब्बी शेरगिल का, वही वाले) एक दिलकश कलाम : 


होरी खेलूंगी कह कर बिस्मिल्लाह

नाम नबी की रतन चढी, बूँद पडी इल्लल्लाह
रंग-रंगीली उही खिलावे, जो सखी होवे फ़ना-फी-अल्लाह
होरी खेलूंगी कह कर बिस्मिल्लाह

अलस्तु बिरब्बिकुम पीतम बोले, सभ सखियाँ ने घूंघट खोले
क़ालू बला ही यूँ कर बोले, ला-इलाहा-इल्लल्लाह
होरी खेलूंगी कह कर बिस्मिल्लाह

नह्नो-अकरब की बंसी बजायी, मन अरफ़ा नफ्सहू की कूक सुनायी
फसुम-वजहिल्लाह की धूम मचाई, विच दरबार रसूल-अल्लाह
होरी खेलूंगी कह कर बिस्मिल्लाह

हाथ जोड़ कर पाऊँ पडूँगी आजिज़ होंकर बिनी करुँगी
झगडा कर भर झोली लूंगी, नूर मोहम्मद सल्लल्लाह
होरी खेलूंगी कह कर बिस्मिल्लाह

फ़ज अज्कुरनी होरी बताऊँ , वाश्करुली पीया को रिझाऊं
ऐसे पिया के मैं बल जाऊं, कैसा पिया सुब्हान-अल्लाह
होरी खेलूंगी कह कर बिस्मिल्लाह

सिबगतुल्लाह की भर पिचकारी, अल्लाहुस-समद पिया मुंह पर मारी
नूर नबी डा हक से जारी, नूर मोहम्मद सल्लल्लाह
बुला शाह दी धूम मची है, ला-इलाहा-इल्लल्लाह
होरी खेलूंगी कह कर बिस्मिल्लाह