Friday, 27 September 2013

कैसे कहूं?

इष्ट देव सांकृत्यायन 

ज़िंदगी से ज़िंदगी ही लापता है, कैसे कहूं?
हर ज़ख़्म ही दिया हुआ आपका है, कैसे कहूं?

हुक़ूमत क़ानून की है, ऐसा कहा जाए
और ये भी हुक़्म उनके बाप का है, कैसे कहूं?

सहाफ़त से शराफ़त के सारे रिश्ते ख़त्म 
सियासत सा ये धंधा पाप का है, कैसे कहूं?

किताब-ए-तर्ज़-ए-हुक़ूमत के हर सफ़े में सुन
उसी के गर्ज़ का फैला रायता है, कैसे कहूं?

झोपड़ी के सामने ही महल है, पर दरमियां
करोड़ों मील लंबा फ़ासला है, कैसे कहूं?
 


Thursday, 26 September 2013

क्या करेंगे आप?

इष्ट देव सांकृत्यायन 

इरादे बुनियाद से ही हिले हैं, क्या करेंगे आप?
झूठो-फ़रेब के ही सिलसिले हैं, क्या करेंगे आप?

इस समुंदर में रत्न तो लाखों पड़े हैं, मगर
जो मिले ख़ैरात में ही मिले हैं, क्या करेंगे आप?

हमको गुल दिखाकर खार ही कोंचे गए हैं हमेशा
आब उनके बाग में ही खिले हैं, क्या करेंगे आप?

अहा, अहिंसा! शान जिनके होंठों की है शुरू से
ठंडे गोश्त पर वे ही पिले हैं, क्या करेंगे आप?

एक-दो बटनें दबीं और सबके नुमाइंदे हो गए
किसके क्या शिकवे-गिले हैं, क्या करेंगे आप?



Sunday, 15 September 2013

मंडोर से आगे

हरिशंकर राढ़ी 

( गतांक से आगे )
वर्तमान समय में यह लगभग 82 एकड़ के उद्यान  क्षेत्र में फैला हुआ है। मंडोर उधान की यात्रा राजस्थानी संस्कृति  का साक्षात्कार कराने में सक्षम है।  उद्यान में प्रवेश करते ही वीरों की दालान (हॉल ऑफ़ हीरोज) के दर्शन  होते हैं जो एक ही चटटान को काटकर बनार्इ गर्इ है। 18वीं शताब्दी में निर्मित वीरों एवं देवताओं की दालान मारवाड़ी स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है।  उद्यान में एक संग्रहालय भी स्थापित है जिसमें तत्कालीन राजपरिवारों का इतिहास दर्शाया  गया है। इस संग्रहालय का सबसे आकर्शक पक्ष इसमें अनेक शास्त्रीय  राग-रागिनियों पर आधारित चित्रकला का प्रदर्शन  है। राग मालकोश , मधु-माधवी, आदि का विभिन्न भाव-भंगिमाओं एवं काल्पनिक परिसिथतियों के आधार पर अत्यंत भावनात्मक और कोमल चित्रांकन किया गया है।
वीरों  का दालान    छाया :  हरिशंकर राढ़ी 
   जनाना महल के बाहर इकथंबा महल नामक एक मीनार है जो तीन मंजिली है। इसका निर्माण महाराजा अजीत सिंह के काल (1705-1723 र्इ0) में हुआ था। परिसर में प्रचुर हरियाली और शांति  का वातावरण है। चिडि़यों का झुंड रह-रहकर आसमान को भर लेता है और उनके मधुर कलरव से मंडोर का उधान गुंजित हो जाता है। पता नहीं चलता कि वे आगंतुकों के लिए स्वागत गीत गा रही हैं या स्वयं के रनिवास में होने का उत्सव मना रही हैं। दूसरी ओर उधान में लगभग 120 फुट ऊंचा फव्वारा अपनी छटा बिखेर रहा होता है और मद्धिम फुहारों से मन को रोमांचित कर देता है। उद्यान परिसर में ही बने मंदिर की वास्तुकला और महीन नक्काशी  कम जादू नहीं करती। फव्वारे से ऊपर की तरफ हमने कुछ लोगों को आते-जाते देखा तो उत्सुकतावश  हम भी उधर ही चल पड़े। ऊपर पहाड़ी पर एक छोटा सा मंदिर था और बहुत से ध्वंसावशेष । महेश मंदिर अवशेष  और विष्णु  मंदिर अवशेष को देखकर फिर एक बार लगा कि तालिबानी मानसिकता की पृष्ठभूमि  में कोर्इ धर्मांध अपने धर्म को श्रेष्ठ  मानकर एक सुंदर संरचना को जमींदोज करके अपनी नजरों में ऊंचा उठ गया होगा और मानवता का इतिहास रोता रह गया होगा।
राग चित्रांकन    

        अगली सुबह हमारा पहला कार्यक्रम मेहरानगढ़ का किला देखना था। मेहरानगढ़ का किला काफी ऊंचार्इ पर बना है और किलों के प्रदेश राजस्थान में इसका बहुत महत्त्व है। यह दुर्ग एक ऊंची पहाड़ी पर बना है और इसकी खड़ी चारदीवारी इसे अतिरिक्त भव्यता प्रदान करती है। इस किले का निर्माण राव जोधाजी द्वारा सन 1454 में किया गया था। मेहर का अर्थ सूर्य होता है और राठौड़ों ने सूर्यवंशी होने के कारण इस किले को मेहरानगढ़ नाम दिया। क्षेत्रफल में यह दुर्ग बहुत विशाल  तो नहीं है किंतु वास्तु और महत्ता में किसी भी दुर्ग से कमतर नहीं है। दुर्ग की ऊंचार्इ तक पहुंचने में एक सामान्य व्यक्ति  को कम पसीना नहीं बहाना पड़ता है। दुर्ग के प्रथम पोल पर टिकटघर है जहां से टिकट लेकर ही किले में प्रवेश किया जा सकता है और फिर राव जोधाजी का फलसा पार करते हुए तीसरे पोल से दुर्ग में प्रवेश  हो पाता है। यहां राजस्थानी वेशभूषा  में (केशरिया साफा धारण किए) शहनार्इ वादकों का मधुर शहनार्इ वादन चढ़ार्इ की सारी थकान दूर कर देता है। किले के अंदर स्थापित संग्रहालय राजपूताना इतिहास की सुंदर झलक दिखाता है। किले के पीछे की तरफ स्थापित तोपखाना किले को और भी भव्यता प्रदान करता है। यहां से पूरे जोधपुर शहर को एक दृष्टि में देखा जा सकता है।



किले की नक्काशी        छाया : हरिशंकर राढ़ी 

विष्णु मंदिर ध्वन्शावशेष के सामने लेखक 

      किले में कर्इ दरवाजे हैं और सुरक्षा की दृष्टि से कभी ये बहुत महत्त्वपूर्ण रहे होंगे। इस दुर्ग में कर्इ खण्ड बने हुए हैं जिन्हें आवश्यकता  और स्तर के अनुसार प्रयोग किया जाता रहा होगा। उनमें मोतीमहल, शीश महल और फूलमहल प्रमुख हैं। मोतीमहल में राजा का दरबार लगा करता था और वह प्रजा से मुखातिब हुआ करता था। शीश महल में दीवारों पर शीशे जड़े हुए हैं जो कि प्रकाश  के प्रकीर्णन में वृद्धि करके भवन की सुंदरता प्रदान करते थे। फूलमहल  में राजा सुंदर नर्तकियों के नर्तन से अपना मनोरंजन किया करता था। इसके अतिरिक्त जनाना डयोढ़ी भी देखने लायक है। दुर्ग में ही सिथत चामुंडा माता का मंदिर है जो राव जोधाजी की इष्टदेवी  थीं।
मेहरान  गढ़ का किला                                 छाया:   हरिशंकर राढ़ी 

        मेहरानगढ़ का किला देख लेने के बाद हमारा अगला पड़ाव जसवंत थड़ा था। रिमझिम-रिमझिम बारिश  हो रही थी। अगस्त का मध्य था और राजस्थान में बारिश  का महत्त्व ही अलग होता है। जसवंथ थड़ा मेहरानगढ़ से बमुश्किल एक किलोमीटर की दूरी पर होगा और दुर्ग की उंचाइयों से साफ-साफ दिखता है। हम तीनों ही  पैदल चलने के शौकीन हैं और निर्णय हुआ कि बारिश  का आनंद लेते टहलते-टहलते निकल लेते हैं। आटो वाले वैसे भी जो किराया मांग रहे थे वह तार्किक नहीं था।
मंडोर उद्यान में मंदिर 
मंडोर उद्यान में इष्ट देव  सांकृत्यायन 

   
        जसवंत थड़ा जोधपुर के प्रसिद्ध राजा जसवंत सिंह द्वितीय की स्मृति में बनवाया गया एक सुंदर भवन है। इसे राजा जसवंत सिंह के पुत्र राजा सरदार सिंह ने 1899 में मकराना से लाए गए संगमरमर के पत्थरों से बनवाया था। यहां महराजा जसवंत सिंह की छतरी मंदिर के आकार में बनार्इ गर्इ है। इससे पूर्व मारवाड़ के राजाओं और महारानियों का अंतिम संस्कार मंडोर में होता था जो वहां की तत्कालीन राजधानी थी। महाराजा जसवंत सिंह को जोधपुर में देवता की भांति पूजा जाता था और उनके प्रति वहां के निवासियों  का सम्मान जसवंत थड़ा के रूप में देखा जा सकता है। इस भवन की सुंदरता को चांदनी रात में निहारने के लिए पर्यटक दूर-दूर से आते हैं। प्रात: आठ बजे से सायं आठ बजे तक इसकी सुंदरता का आनंद लिया जा सकता है और इसके लिए हल्का प्रवेश  शुल्क भी चुकाना पड़ता है।
जसवंत थडा 
         जोधपुर जाकर उम्मेद पैलेस न देखा जाए और देखकर भी उसका बयान न किया जाए तो जोधपुर यात्रा का कोर्इ अर्थ नहीं रहता। उम्मेद भवन पैलेस जोधपुर की शान और पहचान है। मेहरानगढ़ दुर्ग के बाद यही एक भवन है जो जोधपुर की राजतंत्रीय विरासत की पहचान है और ब्रिटिश कालीन भारत में निर्मित अंतिम महल है। यह भवन छीतर पत्थरों द्वारा निर्मित है। राठौड़ वंश  के अंतिम शासक महाराज उम्मेद सिंह ने इस भवन का निर्माण 1929 में शुरू करवाया था और लगभग सोलह वर्षों  में यह भवन तैयार हो पाया था। इसके निर्माण के पीछे केवल वैभव प्रदर्शन  नहीं था बलिक लोककल्याण की भावना छिपी थी। दरअसल उस समय भीषण अकाल से जूझते स्थानीय निवासियों को रोजगार देने के लिए इसका निर्माण किया गया था। यह भी कहा जाता है कि 347 कमरों वाला यह भवन अपने निर्माण के समय विश्व का सबसे बड़ा निजी आवासगृह था। यह भी एक तथ्य है कि महाराज उम्मेद सिंह पाश्चात्य  स्थापत्य कला के दीवाने थे और उन्होंने इसके निर्माण के लिए एडवर्ड लुटियन के समकालीन और समकक्ष वास्तुकार हेनरी वान लैशेस्टर की सेवाएं ली थीं। आज भी इसकी भव्यता देखते ही बनती है। वर्तमान में इसमें एक संग्रहालय खोल दिया गया है और इसका एक बड़ा हिस्सा पांच सितारा होटल में तब्दील कर दिया गया है।
        जोधपुर के निकटवर्ती अन्य दर्शनीय स्थलों में कर्इ झीलें हैं जिनमें कायलाना झील प्रमुख है। यह झील शहर से आठ किमी की दूरी पर सूरसागर रोड पर सिथत है। चारों  तरफ से पहाड़ी से घिरी होने के कारण यह बहुत सुंदर दिखती है। कायलाना के ही निकट माचिया सफारी पार्क भी पर्यटकों को बहुत आकर्षित करता है।
        जोधपुर और उसके आस-पास देखने के लिए बहुत कुछ है, लेकिन हर पर्यटक के पास इतना समय नहीं होता कि सब कुछ देख सके और उसे अपनी मजबूरियों के मद्देनजर सफर को समेटना पड़ता है। आखिर दुनिया है भी तो बहुत बड़ी और घूमने-देखने के लिए बहुत कुछ बचा रह जाता है। उम्मेद पैलेस देखते-देखते शाम घिर आर्इ थी और दिल्ली के लिए मंडोर एक्सप्रेस हमारा इंतजार कर रही थी। शहर के अंदरूनी हिस्सों का भ्रमण हमने पहले ही कर लिया था। हां, जोधपुर की कचौडि़यां (विशेषतः  प्याज की) खाना हम नहीं भूले थे। राजस्थान के शहर अपने स्वादिष्ट  व्यंजनों का अलग आकर्षण रखते हैं।
उमेद सिंह पैलेस 
        खाने के अलावा जोधपुर की बंधेज की साडि़यां और लाख की चूडि़यां बहुत मशहूर हैं। लाख की चूडि़यों पर इस शहर और आस-पास की एक बहुत बड़ी जनसंख्या निर्भर है किंतु सिंथेटिक जमाने में इनकी घटती मांग ने लाख के कारीगरों के पेट पर लात मारना शुरू  कर दिया है। ये दोनों चीजें यहां की विशेष पहचान हैं इसलिए मैंने और हमने भी साडि़यां और चूडि़यां खरीदीं। आखिर पत्नी को तो खुश करना ही था।
            नि:संदेह जोधपुर एक आकर्षक पर्यटन स्थल है। लेकिन, अधिकांश  पर्यटक इस ऐतिहासिक शहर को घूमकर वापस चले जाते हैं। बहुत ही कम लोगों को मालूम होता है कि इस शहर से थोड़ी दूर एक पर्यावरण बलिदान स्थल भी है और उसे देख आना ही उन बलिदानियों के प्रति श्रद्धांजलि है। यदि हमें पर्यावरण की तनिक भी चिंता होती तो आज प्रकृति को हम इतना दमघोंटू बनाकर ही क्यों रखते? बिना किसी पुरस्कार और प्रचार की लालच में यदि कुछ लोग वृक्ष जैसी जड़ सृष्टि की रक्षा के लिए गर्दन कटवा दें तो कटवाते रहें, हमें क्या? हम तो आधुनिक और विकसित हैं। अपने जैसे दूसरे मनुष्य की गर्दन को हम गर्दन समझते ही कब हैं? फिर क्यों याद करें खेजड़ली जैसे छोटे से गांव को, जंगल में मोर नाचा किसने देखा?




                                         

Monday, 9 September 2013

जहां वृक्ष ही देवता हैं

हरिशंकर राढ़ी

जब हमारा ऑटोरिक्शा  जोधपुर शहर  से बाहर निकला तो हमें कतई एहसास नहीं था कि जहां हम जा रहे हैं वह स्थान पर्यावरण का इकलौता तीर्थ होने की योग्यता रखता है। सदियों पहले जब पर्यावरण संरक्षण के नाम पर न कोई आंदोलन था और न कोई कार्यक्रम, तब वृक्षों के संरक्षण के लिए सैकडो़ं अनगढ़ और अनपढ़ लोगों ने यहां आत्मबलिदान कर दिया था। आत्माहुति का ऐसा केंद्र किसी तीर्थ स्थल से कम नहीं हो सकता। लेकिन विडम्बना यह है कि पर्यावरण संरक्षण के मुद्दे पर इतनी चिल्ल-पों मचने और पर्यटन के धुंआधार विकास के बावजूद यह स्थल अपनी दुर्दशा  पर रोने के सिवा कुछ नहीं कर पा रहा है। इसे तो स्वप्न भी नहीं आता होगा कि देश  के पर्यटन मानचित्र में कभी इसका नाम भी आएगा !
खेजडली का शहीद स्मारक                                            छाया : हरिशंकर राढ़ी 
       राजस्थान के ऐतिहासिक शहर  जोधपुर से मात्र 25 किलोमीटर की दूरी पर प्रकृति के अंचल में बसा खेजड़ली गांव किसी भी पर्यावरण प्रेमी के लिए विषेश महत्त्व का हो सकता है। घुमक्कड़ी के क्रम में  जब जोधपुर यात्रा का कार्यक्रम बना तो निश्चित हुआ कि खेजड़ली गांव हर हाल में देखना है। मैं उनसे सहमत था। राजस्थान को विषेशतः किलों और महलों का प्रदेश  के रूप में जाना जाता है और जो भी वहां  जाता है, इनसे बाहर नहीं निकल पाता। हमने सोचा कि इस बार उस भूमि को प्रणाम करके आना है जहां आज से लगभग ढाई सौ वर्ष पहले इस प्रकार की चेतना पैदा हो चुकी थी कि ‘‘सिर साटैं रूख रहे तो भी सस्तो जांण’’ अर्थात् यदि शी  देकर भी वृक्षों की रक्षा हो सके तो उसे सस्ता जानो।
       यह भी कम हैरान कर देने वाली बात नहीं है कि पर्यावरण रक्षा के नाम पर हम जिस चिपको आंदोलन की सराहना करते नहीं थकते और जिसका श्रेय हम आज के जिन पर्यावरणविदों को देते हैं, वे उसके अधिकारी नहीं हैं। वृक्षों के संरक्षण का महत्त्व तो यहां तब से दिया जा रहा है जब पर्यावरण प्रदूषण नामक समस्या का जन्म ही नहीं हुआ था। वन संरक्षण की शिक्षा तो इस देश  की अनपढ़, अनगढ़ जनता और जनजातियां देती रही हैं। शायद हमारे भी मन में यह भ्रम रह जाता कि चिपको आंदोलन तो उन्नीसवीं सदी की देन है, यदि हम खेजड़ली की यात्रा पर नहीं जाते और बिश्नोइयो  का वह त्याग न देखते।
       चैदह अगस्त का दिन था। आसमान में बादल छाए हुए थे और रह-रहकर फुहारें आ रही थीं। राजस्थान में बादलों की उपस्थिति और फुहारों का पड़ना कुछ अलग ही आनंददायक होता है। रेलवे स्टेशन  के पास अपने होटल से निकलकर जब हमने ऑटोरिक्शा वालों से खेजड़ली चलने की बात की ऐसा नहीं लगा कि वे वहां जाने के अभ्यस्त हैं और प्रायः जाया करते होंगे। कइयों ने अनभिज्ञता प्रकट की तो कुछ ने हमसे ही जानना चाहा कि क्या उसी खेजड़ली चलना है जहां लड़ाई हुई थी? ले-देकर एक ऑटो वाला जानकार निकला जो साढ़े तीन सौ रुपए में आने-जाने के लिए तैयार हो गया। लेकिन कुल मिलाकर उसे भी पूरी तरह यह विश्वास  नहीं हो पा रहा था कि हम लोग वहां मात्र घूमने और शहीद स्थल देखने जा रहे हैं।

हरियाली और मृग शावक                                 छाया : हरिशंकर राढ़ी 
       इस बार जोधपुर में कुछ बारिश  हुई थी और इसके प्रमाण में दूर-दूर तक हरियाली फैली थी। मुख्य मार्ग छूट चुका था और अब हम हर सामान्य भारतीय गांव की ओर जाने वाली टूटी-फूटी एकल सड़क पर चले जा रहे थे। कुछ ही दूर गए होंगे कि घास के मैदान में मृगशावकों का झुंड देखकर मन उछल पड़ा। ऐसा नहीं था कि हम पहली बार हिरन देख रहे थे। हां, प्रकृति की गोद में इस तरह उन्मुक्त विचरण करते हुए मृगसमूह देखने का यह पहला अनुभव था। ये मासूम चार पैरों के हिंसक पशुओं  से बच भी जाएं, मगर इन्हें दो पैरों के हिंसक समाज से कौन बचाए? यही कारण है कि मानव समाज की अपेक्षा जंगलों में स्वयं को ज्यादा सुरक्षित महसूस करते हैं। लेकिन याद आया कि यह इलाका कुछ अलग किस्म के लोगों का है। ये वही लोग हैं जिन्होंने एक हिरन के शिकार के अपराध में फिल्म जगत की एक मशहूर  हस्ती को भी दंड दिलाने में कोई रियायत नहीं बरती थी। ऐसे लोगों के बीच हिरन स्वच्छंद क्यों न विचरें?
     मृगशावकों का कलोल देखने से हम भी स्वयंको रोक न सके और ऑटो  रुकवाकर उतर पड़े। कैमरा निकाला और दो चार फोटो खींचे। एक झुंड  निकलता तो दूसरा आ जाता और खेलते-कूदते उड़ंछू हो जाता छोटे शावक टेढ़े-मेढ़े उछलते हुए अपनी मांओं के चक्कर लगाते और शैतानी करते हुए दूर तक भाग जाते। माताएं परेशान  होतीं, शावकों को   मजा आता। बीच-बीच में वे दो चार घासें भी चर लेते, लेकिन लगता था कि वे घासें कम, वातावरण का स्वाद ज्यादा ले रहे थे। पेड़ों पर पक्षी कलरव कर रहे थे। पेड़ भी कौन से थे- अधिकांशतः  बबूल, कीकर और खेजड़ी के, जिनका अधिकांश  जीवन गुरबत में ही बीतता है- पानी की एक-एक बूंद के लिए संघर्ष  करते हुए। इस वर्ष  कुछ बारिश  हो गई थी इसलिए इनकी खुशी  का पारावार नहीं था। वह ख़ुशी  इनके चेहरे पर दिखाई दे रही थी। इनके भी दिन बहुर आए थे और वही संतुष्टि  दिख रही जो गरीब को भरपेट भोजन मिल जाने पर होती है। इनका तो जीवन ही ऐसा है कि भूखे पेट भी दूसरों के लिए संघर्ष  करते रहते हैं।
खेजडली का वृक्ष पकड़े  वेराराम जी 
       खेजड़ली गांव के शहीद स्मारक से ऑटो  ड्राइवर भी पूरी तरह परिचित नहीं था। गांव में एक-दो लोगों से पूछकर वह शहीद  स्मारक के सामने ऑटो  लगा दिया। कुछ छिटपुट ग्रामीण इधर-उधर घूम रहे थे। सामने चारदीवारी से घिरा एक बेतरतीब सा बाग नजर आ रहा था। एक सामान्य से गेट को पारकर हम तीनों लोग अंदर घुसे तो हमारा स्वागत रास्ते के दोनों ओर घूम रहे मोरों ने किया। बारिश का मौसम था ही और मोर भी अपने पूरे रवानी में थे। रह-रहकर उनकी कुहुक रोमांचित कर जाती थी और इस प्रारंभिक स्वागत से ही मन बाग-बाग हो उठा। अभी दो-चार कदम ही चले होंगे कि घुटनों तक धोती और बनियान पहने एक देहाती से सज्जन हमारी ओर बढ़े। बड़े ही सलीके से हाथ जोड़कर उन्होंने हमें नमस्ते किया और परिचय पूछा। हम उनके राजस्थानी शिष्टाचार  और सादगी से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके। वैसे भी गांव में पले-बढ़े हम तीनों यात्री माटी की खुशबू  को खूब पहचानने वाले थे। ये सज्जन थे शहीद स्थल के कर्मचारी वेराराम जी। हमारा परिचय पाकर और विषेशतः यह जानकर कि हम खेजड़ली के इतिहास और बलिदान स्थल को प्रणाम करने आए हैं, बहुत खुश  हुए।
        घटना सन् 1730 की है। जोधपुर के तत्कालीन राजा अभय सिंह अपने किले का विस्तार कराना चाहते थे और इसके लिए उन्हें खेजड़ी के वृक्षों की आवश्यकता  थी। खेजड़ी के वृक्षों से चूना तैयार किया जाता था। खेजड़ली गांव के आस-पास इन वृक्षों की बहुतायत है और राजा ने अपने मंत्री गिरधर भंडारी को खेजड़ी के तमाम वृक्षों को कटवा लाने का आदेश  दिया। जब मंत्री महोदय राजाज्ञा के पालन हेतु दल-बल सहित इसे इलाके में पहुंचे  और खेजड़ी वृक्षों को कटवाना शुरू  किया तो यह खबर गांवों में जंगल की आग की तरह फैली। गुरु जम्भेश्वर  में अटूट आस्था रखने वाले बिश्नोई  समाज के लोग खेजड़ी वृक्ष की सुरक्षा के लिए कटिबद्ध होकर विरोध करने लगे। जब मंत्री ने सैन्यबल का प्रयोग किया तो 84 गांवों के बिश्नोई  इकट्ठा हो गए और अमृता देवी के नेतृत्व में उन्होंने वृक्षों को अपनी बाहों में भर लिया और किसी भी कीमत पर छोड़ने को तैयार नहीं हुए। उन्होंने नारा दिया कि ‘‘सिर साटैं रूख रहे तो भी सस्तो जांण’’। आत्मबल और सैन्यबल का भयंकर संघर्ष  हुआ जिसमें 363 बिश्नोई  मारे गए। खबर जब राजा अभय सिंह के पास पहुंची तो उन्होंने इस जनांदोलन के सामने झुकने में ही भलाई समझी। यह विश्व  का पहला चिपको आंदोलन था जो बहुत बड़ी कीमत चुकाकर सफल हुआ था। आज खेजड़ी राजस्थान का राजकीय वृक्ष है।
क्षेत्रीय बच्चों के साथ लेखक (टोपी लगाए ) और बद्री प्रसाद यादव 
        पर्यावरण संरक्षण हेतु आज का सुषिक्षित और जागरूक समाज इतना बड़ा बलिदान षायद ही दे ! वेराराम जी की वर्णन षैली और गाथा की गंभीरता से हम रोमांचित हो चुके थे। उनसे कुछ देर बाद पुनः मिलने का वादा कर हम षहीद स्मारक की ओर चल पड़े। उद्यान परिसर में ही एक कोने में एक छोटा किंतु अच्छा सा स्मारक बना हुआ है। यह भी देखकर सुखद लगता है कि इसकी साफ-सफाई भी अन्य षहीद स्मारकों की तुलना में अधिक है। पूरी घटना को संक्षेप में बयान करता हुआ एक बोर्ड भी लगा हुआ है जो अभी अच्छी हालत में है। स्मारक पर हम भी नतमस्तक हुए। बच्चों का एक समूह वहां घूम रहा था। अपनी अधिकतम जानकारी उन्होंने हमें दी और बताया कि साल में एक बार इस स्मारक पर बड़ा जमावड़ा होता है। वह दिन बलिदान दिवस की बरसी के रूप में मनाया जाता है। स्मारक के पीछे गुरु जम्भेष्वर जी का एक मंदिर निर्माणाधीन था जो बिष्नोइयों की प्रकृति प्रियता और श्रद्धा का प्रतीक है।
         पूरा पर्यावरण शहीद स्मारक खेजड़ी के वृक्षों से आच्छादित है जहां भांति-भांति के पक्षी स्वच्छंद भाव से घूमते मिल जाते हैं। वापसी में वेराराम जी से दोबारा बातचीत हुई। हमने यह तलाशने  की कोशिष  की कि क्या वहां के लोगों में पेडों  और जानवरों की सुरक्षा को लेकर वही जज्बा है जो उनके पूर्वजों ने लगभग ढाई सौ साल पहले दिखाया था। उन्होंने बताया कि प्राणों की तुलना में पेड़ों की कीमत तो उनकी परंपरा रही है, वह कैसे अलग हो सकती है!

        मन आश्वस्त  हुआ कि शायद प्रकृति बची रहे। जब तक हमारी बहुसंख्यक आबादी ग्रामीण रहेगी और प्रकृति में ईश्वर  के वास का ‘अंधविश्वास ’ बचा रहेगा, धरती पर मानव के अतिरिक्त दूसरे जीव और पेड़-पौधे भी जीवित रहेंगे। लेकिन दुख इस बात का है कि प्रकृतिरक्षा के इस तीर्थ को मानो गोपनीय रखा गया है। न तो कोई प्रचार-प्रसार, न तो पाठ्यक्रम में चर्चा और न तो वहां तक पहुंचने की सुविधाएं। जो प्रेरणा नई पीढ़ी को यहां से मिल सकती है, वह शायद ही कहीं से मिले। हम कितने भी वन्य जीव अभयारण्य बना लें, बायो रिजर्व स्थापित करने का दावा कर लें और कितने भी कानून बना लें, विलुप्त होने की कगार पर खड़ी प्रजातियों को विलुप्त होने से नहीं रोक पांएगे। हमें ऐसे अनेक ‘खेजड़ली’ तलाशने  और तराशने  होंगे। हमने इसे भोली मानसिकता को प्रणाम किया और वेराराम जी को धन्यवाद देकर जोधपुर वापस चल पड़े। 
हमारा अगला प्रोग्राम ऐतिहासिक स्थल मंडोर देखने का था। अपराह्न ढाई बजे हम मंडोर पहुंचे तो मौसम उमस भरा हो चुका था और धूप चुभने लगी थी। अन्य पर्यटक स्थलों की भांति यहां भी रेहड़ी-खोमचे तथा अन्य विक्रेताओं की भीड़ और शोर  मौजूद था। मंडोर जोधपुर शहर से लगभग 8 किलोमीटर उत्तर की ओर एक छोटी से पहाड़ी नदी नागाद्रि के किनारे बसा हुआ है जो अब नागादड़ी कहलाती है। मंडोर का प्राचीन नाम मांडव्यपुर था और यह नगर सन् 1459 तक राठौड़ों की राजधानी के रूप में प्रसिद्ध था। इसी वर्ष  राव जोधा जी ने आसपास के क्षेत्रों को अपने राज्य में मिलाया और नए बसे शहर जोधपुर को अपनी राजधानी बनाया। बहुत दिनों तक मंडोर-जोधपुर राजघराने के दिवंगतों का दाह संस्कार यहीं होता रहा जिससे यहां अनेक शासकों के देवल (स्मारक स्थल) भी मिलते हैं।  
(शेष भाग शीघ्र ही … )
खेजडली उद्यान में नीम के वृक्ष पर बैठे मोर का वास्तविक दृश्य                                                       छाया : हरिशंकर राढ़ी 

(यह वृत्तान्त समग्र रूप में दो किश्तों में पोस्ट किया जा रहा है. पहली किश्त में केवल खेजडली और दूसरी में शेष जोधपुर आपके लिए कुछ दिनों बाद।  )

Monday, 2 September 2013

जो फाइलें सोचती ही नहीं

इष्ट देव सांकृत्यायन
भारत एक प्रबुद्ध राष्ट्र है, इस पर यदि कोई संदेह करे तो उसे बुद्धू ही कहा जाएगा. हमारे प्रबुद्ध होने के जीवंत साक्ष्य सामान्य घरों से लेकर सड़कों, रेल लाइनों, निजी अस्पतालों और यहां तक कि सरकारी कार्यालयों तक में बिखरे पड़े मिलते हैं. घर कैसे बनना है, यह आर्किटेक्ट के तय कर देने के बावजूद हम अंततः बनाते अपने हिसाब से ही हैं. आर्किटेक्ट को हम दक्षिणा देते हैं, यह अलग बात है. इसका यह अर्थ थोड़े ही है कि घर बनाने के संबंध में सारा ज्ञान उसे ही है. ऐसे ही सड़कों पर डिवाइडर, रेडलाइट, फुटपाथ आदि के सारे संकेत लगे होने के बावजूद हम उसका इस्तेमाल अपने विवेकानुसार करते हैं. बत्ती लाल होने के बावजूद हम चौराहा पार करने की कोशिश करते हैं, क्योंकि बत्ती का क्या भरोसा! पर अपने आकलन पर हम भरोसा कर सकते हैं. सरकारी दफ्तरों में नियम-क़ानून किताबों में लिखे रहते हैं, लेकिन काम अपने ढंग से होते हैं.

ये सभी बातें इस बात का जीवंत साक्ष्य हैं कि हम बाक़ी किसी भी चीज़ से ज़्यादा अपने विवेक पर भरोसा करते हैं. हमें अपने सोचने पर और किसी भी चीज़ से ज़्यादा भरोसा है, क्योंकि यूरोप के एक दार्शनिक रेने देकार्त ने किसी के होने का प्रमाण ही यह माना है कि वह सोचता है. उनका तर्क है, मैं सोचता हूं, इसलिए मैं हूं. मतलब यह कि जो नहीं सोचता है, वह है ही नहीं. वो तो भला हो भारत के डॉ. जगदीश चंद बसु और डॉ. सलीम अली का जिन्होंने वैज्ञानिक रूप से यह साबित कर दिया कि पौधे और पक्षी भी सोचते हैं, वरना मुझे तो यह मानने में भी हिचक होती कि वे हैं. सडक पर लगी लालबत्ती या कार सोचती है, ऐसा अभी तक कोई वैज्ञानिक प्रमाणित नहीं कर सका है. अब जो सोचता ही नहीं, वह है, ऐसा हम कैसे मान लें? बस इसीलिए सामने से आता हुआ ट्रक या रेलगाड़ी है और वह हमारी तरफ़ आ रहा या रही है, ऐसा हम मानते ही नहीं.

प्रबुद्ध राष्ट्र होने के नाते हमारे यहां हर शख़्स सोचता है. वह उस विषय पर भी सोचता है, जिस पर उसे सोचना चाहिए और उस विषय पर भी जिस पर उसे नहीं सोचना चाहिए. अव्वल तो असली प्रबुद्ध लोग उस विषय पर कम ही सोचते हैं, जिस पर उन्हें सोचना चाहिए. वे अधिकतर उसी विषय पर सोचते हैं जिस पर सोचने की अपेक्षा उनसे नहीं की जाती और अकसर वह सोच डालते हैं जो नियम-क़ानून के जानकार बताते हैं कि उन्हें नहीं सोचना चाहिए. सोचने की इस प्रक्रिया का हमारे यहां निर्बाध विकास इसलिए भी हो रहा है, क्योंकि हमारी उदार सरकार ने एक अत्यंत योग्य अर्थशास्त्री के प्रधानमंत्री होने के बावजूद अभी तक सोचने पर कोई कर नहीं लगाया है. यहां तक कि कोई छोटा-मोटा अधिभार भी नहीं लगाया. यह जानते हुए भी कि अगर सोचने पर कर लगा दिया जाए तो लोगों की तमाम बेईमानियों के बावजूद केवल इस एक कर से हम अपनी अर्थव्यवस्था को सारे संकटों से उबार सकते हैं. अकेले इस कर से हम इतना धन जुटा लेंगे जितना नीदरलैंड्स यौन व्यवसाय और स्विट्ज़रलैंड दुनिया भर से अपने यहां आने वाले श्याम धन पर कर लगा कर भी नहीं जुटा पाते.

अव्वल तो इसमें लोग कोई बेईमानी भी नहीं करेंगे, बल्कि इसके लिए टैक्स देना गर्व की बात समझेंगे. इनकम टैक्स देकर भी जो लोग अपना स्टेटस नहीं बना पाए, वे सोचने पर टैक्स देकर अपना स्टेटस बढ़ाने की पूरी कोशिश जी-जान से करेंगे. अगर आपको इसका यक़ीन न हो तो आप फेसबुक या ट्विटर पर किसी का भी स्टेटस देख सकते हैं. इसके बावजूद उन्होंने इस पर टैक्स नहीं लगाया तो केवल इसलिए कि वे नहीं चाहते, सोचने की यह जो प्रक्रिया है, उसकी महान परंपरा के विकास में कोई बाधा आए. आख़िर ऋषि-मुनियों का देश है भारत. इसमें सोचने की प्रक्रिया का विकास रुक गया तो बाक़ी सारा विकास करके ही हम क्या करे लेंगे! ख़ैर इसके लिए अपने अत्यंत लोकप्रिय और योग्य प्रधानमंत्री को हम एक मामूली धन्यवाद के अलावा और दे ही क्या सकते हैं! अगर मेरे बस में होता तो इसके लिए मैं उन्हें एक वोट देकर ही कम से कम अपने ऊपर लदे उनके एहसान के बोझ को थोड़ा कम कर लेता. लेकिन मुझे मालूम है कि मेरे जैसे किसी भी मामूली नागरिक के वोट का उनके लिए कोई अर्थ ही नहीं है. अव्वल तो हम जैसे चिरकुट उन्हें वोट दे ही नहीं सकते. क्योंकि वे केवल माननीयों के अति मूल्यवान वोट से चुने जाते हैं और अब तक के भारत के ऐसे इकलौते व्यक्ति हैं, जो केवल एक वोट से प्रधानमंत्री बनते हैं.
     
ख़ैर, सोचने के इसी क्रम में कई बार लोग वैसे भी सोच जाते हैं, जैसे कि उन्हें नहीं सोचना चाहिए. अगर आप बुरा न मानें तो साफ़ कहूं कि उलटा सोच जाते हैं. हाल की ही एक बात ले लीजिए. जाने कैसे कुछ लोग यहां तक सोच गुज़रे कि मंत्रालय में पड़ी सारी फाइलों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी माननीय मंत्रीगण की है. इसे सरकार की महती कृपा ही माना जाना चाहिए कि ऐसा सोचने वाले लोगों में से किसी के भी गुज़रने की ख़बर अभी तक नहीं आई है. सरकार ने उनकी ऊटपटांग बात को बिलकुल उसी तरह लिया है, जैसे वह सड़क या रेलमार्ग पर होने वाले ऐक्सीडेंट को लेती है. बल्कि उससे भी हल्के ढंग से. ऐक्सीडेंट पर तो वह कई बार शोक संवेदना जारी कर देती है, इस पर वह भी नहीं किया. मान लिया कि जिस प्रकार सड़क या रेलमार्ग पर अधिक भीड़ होने पर वहां ऐक्सीडेंट की आशंका बढ़ जाती है, ठीक उसी तरह विचारों की भीड़ जाने पर दिमाग़ में भी ऐक्सीडेंट की आशंका बढ़ जाती है और ऐसी स्थिति में लोग कुछ भी सोच या कह गुज़रते हैं.

मुझे लोगों द्वारा ऐसा सोचे जाने पर सिर्फ़ हंसी आती है. ऐसा केवल वही लोग सोच सकते हैं जिन्होंने कभी सफ़र नहीं किया. वैसे सफ़र न करने के और भी कई नुकसान हैं, पर फिलहाल बात केवल सुरक्षा की है. यातायात के सभी सार्वजनिक साधनों में एक बात ज़रूर लिखी होती है और वह यह कि यात्री अपने जान-माल की सुरक्षा स्वयं करें. मतलब हमारी ज़िम्मेदारी सिर्फ़ आपको यहां से ले चलने भर तक ही सीमित है. अगर आप अपने गंतव्य तक पहुंच भी जाएं तो इसके लिए हमारे साथ-साथ ईश्वर को भी धन्यवाद दें. भले ही आप नास्तिक हों. न पहुंच पाएं तो मामला सिर्फ़ आपके और जीवन बीमा कंपनी के बीच का ही है. इसमें हमारा कोई दोष न मानें.

अब यह तो आप जानते ही हैं कि फाइलों में दुनिया भर का ज्ञान भरा होता है. दुनिया भर तमाम पढ़-लिखे अफसर तक अपनी कोई राय बनाने के लिए इन्हीं फाइलों में भरे ज्ञान पर निर्भर होते हैं. वे अपने सोचने की प्रक्रिया ही तब शुरू करते हैं, जब फाइलों से सूचनाएं ले लेते हैं. अब जिनसे सूचनाएं लेकर बड़े-बड़े साहेबान और माननीयगण के सोचने की प्रक्रिया शुरू होती हो, आप कैसे सोच सकते हैं कि वे फाइलें नहीं सोचती होंगी? फाइलें सोचती हैं, यही वाक़ई उनके भी होने का प्रमाण है. जब वे सोचती हैं तो ज़ाहिर है कि समझदार भी हैं. और जो लोग समझदार होते हैं, उनसे यह अपेक्षा तो की ही जानी चाहिए कि वे अपनी सुरक्षा स्वयं कर सकते हैं. सोचने-समझने वाले लोगों को ऐसा नाबालिग तो नहीं ही माना जा सकता कि कोई भी उन्हें बरगला कर कहीं भी लिए जाए और उनसे सामूहिक दुष्कर्म तक करा ले.

वैसे मेरे एक अज़ीज़ मित्र फाइलों की सुरक्षा के नज़रिये से एक फाइल मंत्रालय बनाए जाने का सुझाव दे चुके हैं, लेकिन मैं विनम्रतापूर्वक उनके इस सुझाव से अपनी असहमति जता चुका हूं. एक बार फिर मैं उनसे अपनी विनम्र असहमति जता रहा हूं, इस सुझाव के साथ कि जो फाइलें अपनी सुरक्षा स्वयं न कर सकें उनके बारे में यह मान लिया जाए कि वे हैं ही नहीं और कभी थीं भी नहीं. यहां तक कि उनके कभी हो पाने की कोई संभावना भी नहीं है. क्योंकि अगर कोई अपनी सुरक्षा न कर सके तो इसका मतलब यही है कि वह समझदार नहीं है और अगर कोई समझदार नहीं है तो इसका सीधा अर्थ है कि वह सोचता नहीं है. अब भला बताइए, जो सोचता ही न हो, वह है, ऐसा कैसे मान लिया जाए? मैं एक बार फिर विनम्रतापूर्वक उनसे अपनी गंभीर असहमति दस्तावेज़ी तौर पर दर्ज़ करा दे रहा हूं. इसे मैंने लिख इसलिए दिया है ताकि सनद रहे और वक़्त-ज़रूरत पर काम आवे.