Friday, 30 August 2013

मैंगो मैन का बनाना रिपब्लिक

इष्ट देव सांकृत्यायन

भारतीय स्त्री को अगर कोई चीज़ सबसे ज़्यादा पसंद है तो वह है सोना. केवल क्रिया ही नहीं, संज्ञा और यहां तक कि विशेषण के रूप में भी. मेरे एक मामाजी तो कहा करते थे कि महिला लोगों का अगर वश चले तो पति को भी बेच कर सोना ख़रीद लें. जहां तक बात पति टाइप लोगों की है, तो वे उनकी सोने की मांग को केवल क्रिया के रूप में ही समझना चाहते हैं. लेकिन वाक़ई सोना कितना ज़रूरी है और आम आदमी के लिए इसकी कितनी अहमियत है, यह बात अब जाकर समझ में आई. तब जब भारत सरकार ने तय कर लिया है कि वह आम आदमी से सोना ख़रीदेगी. पहले तो मुझे लगा कि यार मैं भी आम आदमी हूं और इस लिहाज़ से मुझे भी सोना बेचना चाहिए. जब सरकार ही ख़रीदेगी तो ज़ाहिर है कि अच्छा दाम देगी.

श्रीमती जी से कहा कि सरकार सोना ख़रीदने की बात कर रही है, ऐसा करते हैं कि हम लोग भी कुछ बेच देते हैं. इतना कहना था कि श्रीमती जी फायर हो गईं, ‘आप क्या समझते हैं, आपका पड़े-पड़े सोना सरकार ख़रीदेगी? अगर क्रिया में सोना सरकार को ख़रीदना होता तो उसके लिए उसे जनता से गुहार लगाने की ज़रूरत नहीं पड़ती. इसके लिए उसकी पुलिस ही काफ़ी होती. किसी और डिपाट्मेंट की भी मदद की ज़रूरत नहीं होती.

फिर?’ मैंने एक सच्चे जिज्ञासु पति की तरह पूछा, ‘किस टाइप का सोना सरकार को चाहिए?’

सरकार को गहरी नींद वाला सोना नहीं, मेटल वाला सोना चाहिए.श्रीमती जी ने मेरा ज्ञान बढ़ाया.

अच्छा तो ठीक है, आपके पास तो वह भी है. दे दीजिए’, मैंने आग्रह किया, ‘बेच आते हैं.

अब तो उनका ग़ुस्सा और बढ़ गया. तुरंत सवाल उठ गया
,  अभी तक एक तोला सोना भी ख़ुद ख़रीदकर ले आए हैं, जो ले जाएंगे बेचने?’  

बड़ी मुश्किल है. पता नहीं, बेचने के साथ यह बुनियादी शर्त क्यों लगा दी गई कि चीज़ आपके पास हो भी. यानी कि आप ले आए हों. जो चीज़ आपके पास हो ही नहीं, यानी कि जिस पर आपका मालिकाना हक़ न हो, उसे आप बेच भी नहीं सकते. एक बार तो मुझे लगा कि फिर लोग कैसे कहते हैं कि नेता लोग देश बेच दे रहे हैं. जबकि देश पर उनका कोई मालिकाना हक़ नहीं है. देश पर मालिकाना हक़, सुनते हैं कि 26 जनवरी 1950 के बाद से जनता का हो गया. लेकिन फिर ख़याल आया कि जनता ने तो अपने इस मालिकाना हक़ को कभी स्वीकार किया ही नहीं. वह अपने पूरे मालिकाना हक़ का पावर ऑफ़ एटॉर्नी इन्हीं नेता लोगों को दे देती है, हर पांचवें साल. नेता लोग वह मालिकाना हक़ किसी एक साहब या साहिबा को दे देते हैं और उसके बाद देश की चिंता छोड़ देते हैं. पिछले पैंसठ वर्षों का इतिहास देखा जाए तो 55 वर्ष तो यह पावर ऑफ एटॉर्नी घूम-फिर कर एक कुनबे में ही रही है. बीच-बीच में मन बदलने के लिए कभी-कभी इधर-उधर भी हो आती है, जैसे आम आदमी कभी तीर्थयात्रा या पर्यटन कर आता है. या यूं कहें कि जब-तब ढाबे पर खाना खा आता है. जैसा कि भारत का संविधाननाम की एक किताब में लिखा है, उस पर अगर भरोसा किया जाए तो हर पांचवें साल यह मालिकाना हक़ हम, भारत के लोगही अपने-अपने मनपसंद नेताओं के ज़रिये उस कुनबे को सौंपते रहे हैं और उसके बाद हमारे लोकप्रिय नेतागण अपने जीवन का एकमात्र उद्देश्य उस कुनबे के होनहार को प्रधानमंत्री बनाना घोषित करते रहे हैं. भली ख़ुद होनहार जी की अपनी मंशा ऐसी कुछ भी कभी न रही हो. लब्बोलुआब यही निकलता है कि देश की आम जनता उस एक कुनबे को ही देश का मालिक मानती हैं, बाक़ी जो कुछ कहा जाता है, वह सब सिर्फ़ हल्ला है. बिलकुल वैसे ही जैसे कि लोकतंत्र.
अब ऐसा तो हो नहीं सकता कि प्रधानमंत्री जैसे बड़े आदमी ऐसे ही कोई बात कहें. आख़िर पीएम के कुछ कहने का कोई मतलब तो निकलना चाहिए. हो न हो, यह अलग बात है. जब उन्होंने कहा है तो ज़रूर आम आदमी के पास सोना होगा और उस पर उसका मालिकाना हक़ भी होगा. बड़ी देर तक सोचता रहा तो याद आया कि एक आम आदमी तो उसी कुनबे से जुड़े हुए हैं. वो थोड़े अंग्रेजी में आम आदमी हैं, यानी कॉमन मैन या आप चाहें तो मैंगो मैन भी कह सकते हैं. लेकिन हिंदी में तो वे आम आदमी ही हुए. आम आदमी की हैसियत से ही पिछले दिनों उन्होंने देश को बनाना रिपब्लिक बताया था. हालांकि यह स्पष्ट नहीं किया था कि इसमें कितना बनाना है और कितना रिपब्लिक. वैसे यह बात हम अपने अनुभव से जान चुके हैं कि किसी भी रिपब्लिक में बनाना की क्या अहमियत है और वह किस-किस काम आता है. यह एक ख़ास क़िस्म के बनाना का ही कमाल है कि सबकी आस्था उस एक कुनबे के इर्द-गिर्द ही संकेंद्रित हुई है. बनाना न हो तो जाने कब किसे ईमानदारी का प्रेत लग जाए और वह क्या-क्या साबित कर डाले!

एक सज्जन तो इस बेचारे आम आदमी के ही पीछे पड़ गए थे. ख़ैर, उनके लिए पहले ट्रांस्फर, फिर निलंबन और फिर बर्खास्तगी का बनाना काम आया. सब हो जाने के बाद तब जाकर आस्था के धनी सूबाई महामाननीय ने बताया कि वो तो बेचारे एक मामूली किसान हैं. ऐसा कभी-कभी होता रहता है. अफ़सरशाही में वैसे तो बहुत समझदार लोग हैं, लेकिन कभी-कभी कुछ नासमझ लोग भी चले आते हैं. जिनकी मानसिक डोलायमानता का असर कभी बालू खनने तो कभी ज़मीन पर क़ब्ज़े और कभी मक्खी-मच्छर टाइप लोगों की समयपूर्व परमधाम यात्रा प्रायोजित कर देने पर माननीयों थोड़ा-बहुत माननीयों को भी भुगतना पड़ जाता है. भला हो, जनता के प्रति सेवाभाव के धनी हमारे माननीयों का, जो ऐसे कष्ट को कोई कष्ट ही नहीं मानते.

आप तो जानते ही हैं, भारत एक कृषिप्रधान देश है और इस लिहाज़ से यहां किसान होना बहुत महत्वपूर्ण है. प्रागैतिहासिक काल में तो राजा-महाराजा तक यहां किसान बनते रहे हैं और इसके लिए प्रतीकात्मक रूप से हल चलाते रहे हैं. राजा जनक के बारे में भला कौन नहीं जानता! पौराणिक कथाओं पर मेरी पूरी आस्था है और उनके अनुसार किसानों को सोना ज़मीन में गड़ा हुआ मिलता रहा है. किसान लोग असल में इसीलिए हल चलाते रहे हैं. जब लोग हल चलाते हैं तो इससे कई फ़ायदे होते हैं. ज़मीन में दबा हुआ सोना निकल कर बाहर आ जाता है. अनुभवी किसान लोग उस निकले हुए सोने के छोटे-छोटे टुकड़े करवा डालते हैं और उसे फिरसे ज़मीन में बो देते हैं. उसी ज़मीन में जिस ज़मीन में पहले वे धान, गेहूं, सरसों, आलू टाइप की मामूली चीज़ें बोते रहे हैं. अब धान-गेहूं उगाने वाली ज़मीन में जब सोने के कण बोए जाते हैं तो ज़ाहिर है, उसका लैंडयूज़ तुरंत चेंज हो जाता है.
लैंडयूज़ चेंजियाते ही उस पर एक नए तरह की फ़सल खड़ी हो जाती है. देखने में तो वह फ़सल कंक्रीट का जंगल लगती है, लेकिन वास्तव में वह कंक्रीट सोना होती है. समझदार किसान उसे काट लेता है और आगे बढ़ जाता है. यह तो सबको मालूम है कि मामूली किसान जो है, वो आम आदमी होता है. इस लिहाज़ से देखें तो आम आदमी के पास वाक़ई बहुत सोना है. यानी कि हमारे प्रधानमंत्री बिलकुल सही हैं. आख़िर, दुनिया भर में आजकल उनकी ईमानदारी और अर्थशास्त्रीय विद्वता का डंका ऐसे ही थोड़े बज रहा है!



Saturday, 24 August 2013

कस्तूरी कुंडल बसै...

इष्ट देव सांकृत्यायन 

पता नहीं, भ्रष्टाचार जी ने कुछ लोगों का क्या बिगाड़ा है जो वे आए दिन उनके पीछे ही पड़े रहते हैं। कभी धरना दे रहे हैं कि भ्रष्टाचार मिटाओ, कभी प्रदर्शन, नारेबाजी, रास्ताजाम... और न जाने क्या-क्या! कभी दिल्ली का रामलीला मैदान भर डाला और कभी जंतर-मंतर पर लोगों का आना-जाना दुश्वार कर दिया। ख़ैर, भ्रष्टाचार जी को इससे फ़र्क़ ही क्या पड़ता है! उन्होंने ऐसे बहुत लोगों को आते-जाते देखा है। इसीलिए तो वह पूरे आत्मविश्वास के साथ गाते रहते हैं, 'तुमसे पहले कितने जोकर आए और आकर चले गए/कुछ जेबें भरकर गुज़र गए कुछ जूते खाकर चले गए....’। एक वही हैं जिनके लिए जाने कहां से लगातार यह सदा आती रहती है, 'वीर तुम बढ़े चलो/धीर तुम बढ़े चलो/.... सामने पहाड़ हो/ सिंह की दहाड़ हो/ तुम निडर हटो नहीं/ तुम निडर डटो वहीं...फ़िलहाल तक की हिस्ट्री तो यही है कि उन्हें भगाने जितने आए, ख़ुद ही चले गए। अब यह अलग बात है कि चले जाने के सबके अपने अलग-अलग तरीक़े थे। कुछ तोप चलाकर चले गए, कुछ जांच कराकर चले गए, कुछ हल्ला मचाकर चले गए, कुछ इलेक्ट्रॉनिक कैंपेन चलाकर चले गए, कुछ सलवार-समीज पहन कर चले गए, कुछ जूस पीकर चले गए... पर चले सभी गए।
एक भ्रष्टाचार जी ही हैं, जो अपनी सहोदरी भगिनी महंगाई की तरह लगातार बढ़ते गए हैं। पता नहीं, लोग क्यों उनके पीछे पड़े रहते हैं, जबकि उन्होंने भारतभूमि की महान परंपराओं का हमेशा पूरे मनोयोग से अनुपालन किया है। सच पूछिए तो उनके इस दूने रात चौगुने विकास का रहस्य भी यही है। कुछ लोग बताते हैं कि बहन महंगाई जी उनसे दो-चार दिन बड़ी हैं, कुछ कहते हैं कि दो-चार दिन छोटी और कुछ तो बताते हैं कि जुड़वां हैं। जो भी हो, पर दोनों देखे हमेशा साथ-साथ जाते हैं, हमेशा एक-दूसरे के सहयोग में प्राणप्रण से जुटे हुए। कभी भ्रष्टाचार जी आगे बढ़कर महंगाई जी को आगे निकलने का रास्ता दे देते हैं और कभी महंगाई जी थोड़ा आगे चलकर भ्रष्टाचार जी के लिए रास्ता बना देती हैं। आम तौर पर देखा यही जाता है कि जहां पुरुष अधिक होते हैं, वहां भाई यानी भ्रष्टाचार जी आगे बढ़कर बहन महंगाई जी के लिए रास्ता ख़ाली करा देते हैं और जहां महिलाएं अधिक होती हैं, वहां महंगाई जी आगे बढ़कर भाई के लिए रास्ता ख़ाली करा देती हैं। जिन सरकारी महकमों को सामंजस्य की कमी के लिए सबसे ज्य़ादा कोसा जाता है, वहां इनके सामंजस्य और समन्वय का असर तो देखते ही बनता है। रेलवे आरक्षण की खिड़की से लेकर सरकारी अस्पताल के मुर्दाघर तक... आप कहां-कहां देखना चाहते हैं, बताइए न। अब अगर ये आगे नहीं बढ़ेंगे तो और कौन बढ़ेगा? हिंदी के साहित्यकार, जो दिन-रात केवल एक-दूसरे की टांग खिंचाई में लगे रहते हैं।
लेकिन अब ईर्ष्या करने वालों का आप क्या कर लेंगे! पवित्र स्नेह के जीवंत उदाहरण बने भाई-बहन के इस जोड़े को लेकर भी जाने लोग कैसी-कैसी उल्टी-सीधी बातें करते रहते हैं। ख़ैर, आप तो जानते ही हैं, इस दुनिया में कुंठितों की कमी नहीं है और कुंठित लोग इसके अलावा कर ही क्या सकते हैं! कभी कहेंगे जांच कराओ। जांच करा के रपट भी मंगा दी तो कहेंगे कि नहीं, अब इससे नहीं उससे कराओ। लो भाई, उससे भी करा दी। तब कहेंगे कि चलो अब कोर्ट में साबित कराओ। कोर्ट भी ससम्मान दोषमुक्त कर दे तो पूछेंगे कि आय से अधिक वाले मामले की जांच क्यों नहीं होगी? अरे भाई, आय से अधिक का कोई मामला हो कैसे सकता है? जितना कुछ आया, वह आय ही तो है! अब जो आया, वह अगर आय नहीं तो और है क्या? और जब आय है तो फिर उससे अधिक की बात कहां से आ गई? कोर्ट का इतना सीधा सा तर्क भी लोग नहीं समझते। फिर कहते हैं कि कोर्ट ही ग़लत है। बस यही एक सही हैं, बाक़ी पूरी दुनिया ग़लत।
इसीलिए मैं तो कहता हूं कि कुंठित लोगों की बात ही मत सुनिए। अगर सुनना ही हो तो संतों के वचन सुनें, ज्ञानियों के लेख पढ़ें और विशेषज्ञों की बातें सुनें। अब देखिए, समझदार अर्थशास्त्रियों का मानना है कि भ्रष्टाचार जी असल में विकास जी के बहुत क़रीबी रिश्तेदार हैं। जहां-जहां विकास जी जाते हैं, वहां-वहां भ्रष्टाचार जी अपने आप पहुंच जाते हैं। हालांकि मुझे यह मामला थोड़ा उलटा दिखाई देता है। (वैसे आपकी सुविधा और मेरे हित के लिए मेरा पहले ही यह मान लेना ठीक रहेगा कि मुझे बहुत सारी चीज़ें उलटी दिखाई देती हैं। यह शायद किसी ज़माने में दर्शनशास्त्र का विद्यार्थी रहे होने का नतीजा हो। आप उसे अपने हिसाब से समझने के लिए स्वतंत्र हैं आप मेरे हिसाब से न भी समझें तो मैं आपका कर ही क्या लूंगा?) ख़ैर, तो मुझे ऐसा लगता है कि विकास जी बाद में, भ्रष्टाचार जी पहले पहुंचते हैं। यानी यह मामला आग और धुएं जैसा है। जिस प्रकार जहां-जहां आग है वहां-वहां धुआं है, ठीक उसी प्रकार जहां-जहां भ्रष्टाचार जी हैं, वहीं-वहीं विकास जी हैं।
कम से कम अपने बगल वाले शुक्ला जी को देखते हुए तो मैं यह बात दावे के साथ कह सकता हूं। शुक्ला जी जब तक अपने तृतीय श्रेणी कर्मी पिता के बताए आदर्शों पर चलते रहे,  प्रशासनिक अफसर होकर भी बेचारे क्लर्कों जैसा जीवन जीते रहे। पोस्टिंग भी कहीं ढंग की नहीं मिली। वही सचिवालय में फाइलों की ठेले बने रहे...। वो तो भला हो उनकी शिक्षकतनया भार्या का, जिसने महंगाई देवी का हवाला देते हुए उन्हें ज़माने का चलन समझाया। जैसे ही शुक्ला जी ने उसकी दी हुई शिक्षा के अनुरूप यह चलन समझा और भ्रष्टाचार जी के शरण में गए, उनके यहां विकास जी के आने की फ्रीक्वेंसी ऐसी बढ़ी कि साल बीतते-बीतते कॉलोनी के सारे विकासधर्मा महापुरुष उनसे जलने लगे। तो जनाब यह बात मैं अपने निजी अनुभव के आधार पर कह रहा हूं, इसे आप कोई दार्शनिक तर्क न मानें। ऐसे कई और जीवंत प्रमाण मेरे पास हैं, जिनमें आधुनिक विकास जी की प्रक्रिया ही भ्रष्टाचार जी के बाद शुरू हुई और इसीलिए मैं आग भ्रष्टाचार जी को मानता हूं, बाक़ी विकास जी तो सिर्फ़ धुआं हैं। सेंसेक्स की तरह आते-जाते, चढ़ते-उतरते रहने वाले, अस्थिर और कुछ-कुछ मायावी टाइप।
वैसे प्रवचन-लेख, साक्ष्य-विधि वाले थोथे तर्कों के बूते की यह बात भी नहीं है कि वे भ्रष्टाचार जी को साबित कर सकें। यक़ीन न हो तो आज़ादी के बाद से लेकर अब तक के सारे मामलों पर नज़र डाल लें। भ्रष्टाचार जी वस्तुत: सिर्फ़ अनुभवगम्य हैं। अपने निजी अनुभव के अलावा और किसी भी तरह से उन्हें जाना नहीं जा सकता। वैसे ही जैसे कि भगवान। कहीं न होते हुए भी वह हर जगह हैं, कण-कण में व्याप्त हैं। 'हो भी नहीं और हर जां (जगह) हो...टाइप। वह किसी को दिखाई नहीं देते हैं, लेकिन असल में सबकी आंखों के नूर वही हैं। अगर किसी की आंखों में वह नहीं हैं, तो उसकी आंखों में जो नूर है... धत्तेरे की, भला वह भी कोई नूर है! इसीलिए सीबीआइ उन्हें ढूंढने जाती है और नहीं पाती। माननीय न्यायालय में विद्वान न्यायाधीश साक्ष्यों पर सदियों सिर धुनते हैं और उन्हें नहीं पाते। हीरों के भंडार ख़त्म हो जाते हैं, लेकिन कोयले की खदानों के आवंटन में भ्रष्टाचार जी की भूमिका की जांच पूरी नहीं हो पाती। ... और भारतवर्ष के किसी भी सरकारी दफ्तर में उनके बग़ैर कोई काम नहीं होता। आप इसे कुछ यूं भी समझ सकते हैं कि हर मंत्री-अफ़सर बड़े गर्व से यह घोषणा करता है कि उसके विभाग में बिलकुल भ्रष्टाचार नहीं है और दूसरी तर$फ उसे मिटाने के दावे भी करता है। दफ़्तरों के बाहर भ्रष्टïाचार जी के ख़िलाफ़ बड़े-बड़े इश्तहार टंगे हैं, क़ानून की किताबों में बड़ी भयानक क़िस्म की,  लगभग दैत्य टाइप, धाराएं छुपी पड़ी हैं। सबमें दावे हैं कि इस तरह से भ्रष्टाचार को मिटाना है। यह कुछ उन गुरुओं की आस्था जैसा मामला है जो एक तरफ़ तो कहते हैं कि भगवान सब देख रहा है और दूसरी तरफ़ न देखने लायक सारे काम भी किए जा रहे हैं।
इसीलिए जब कोई मंत्री या अफसर अपने विभाग में भ्रष्टाचार जी के न होने का दावा करता है और उन्हें इनाम देने की घोषणा करता है जो भ्रष्टाचार जी को ढुंढवाने में मदद करें तो मुझे कबीर याद आते हैं, 'कस्तूरी कुंडल बसै, मृग ढूंढत बन माहिं...। तो हे वत्स, भ्रष्टाचार जी को जानने के लिए तर्कों और इंद्रियगम्य साधनों का सहारा लेना छोड़ दें। साफ़ तौर पर जान लें कि इन्हें सिर्फ़ अपने अनुभव से जाना जाता है और अनुभवगम्य मामलों को समझने में बाहरी कर्मकांड बहुत काम नहीं आते। जिस प्रकार पूजा-पाठ, भजन-कीर्तन से भगवान को प्रसन्न तो किया जा सकता है पर जाना नहीं जा सकता, ठीक उसी प्रकार भ्रष्टाचार जी को भी दान और स्तुतिगान से प्रसन्न तो किया जा सकता है, लेकिन जाना नहीं जा सकता। परमपिता परमेश्वर की ही तरह उन्हें भी जानने के लिए अंतर्दृष्टि की आवश्यकता होती है और आप तो जानते ही हैं, यह कम ही महापुरुषों के पास होती है। जिनके पास होती है, वे जानते हैं कि जो सबसे ज्य़ादा बढ़-चढ़ कर भ्रष्टाचार जी का विरोध कर रहा है, वास्तव में वही उनका सबसे बड़ा सेवक है। आप तो जानते हैं कि बड़े भक्तों ने भगवान को गालियां तक दी हैं और भगवान ने बर्दाश्त ही नहीं किया, उन्हें इसके बावजूद आशीष और वरदान भी दिए हैं। यह कुछ वैसा ही मामला है, जैसे कुछ बुद्धिजीवी सेमिनारों में अनीश्वरवाद पर लंबे प्रवचन देने के बाद घर पहुंचते ही श्री सत्यनारायण व्रत कथा सुनते हैं। ग्रह शांति कराते हैं। बकलोल लोग उनकी अनीश्वरवादिता पर मुग्ध और समझदार लोग विद्वानों के झोले ढोकर प्रवचन के निहितार्थ जान लेते हैं। ऐसे ही बकलोल लोग भ्रष्टाचार जी के पीछे पड़े रहते हैं और समझदार लोग आगे बढ़कर उनके स्वागत में रेड कार्पेट बिछा देते हैं। आगे तो आप बस यूं समझें कि रेस्ट विल बी हिस्ट्री...।

Tuesday, 20 August 2013

apsamskriti ka khatra

व्यंग्य
                                                     अपसंस्कृति का खतरा
                                                                                                           -हरिशंकर राढ़ी
दूसरी किश्त 

सड़कीय समारोहों पर प्रतिबंध् आसन्न अपसंस्कृति का सबसे बड़ा उदाहरण है। देश  के लोगों की रंगीनियत, जज्बे और मितव्ययिता का सम्मिलित रूप है सड़कों का ऐसा प्रयोग! गैरसरकारी संगठनों, सरकारों और न्यायालयों का यातायात के लिए परेशान होना सर्वथा अनावश्यक और तर्कहीन है। अपने देश का यातायात आज तक कभी रुका है क्या? यातायात रुक जाएगा, ऐसा सोचकर आप अपने देश  के वाहन चालकों की क्षमता का अपमान नहीं कर रहे हैं ? किस देश  के ड्राइवर अपने देश के ड्राइवरो से ज्यादा कुशल हैं? ऐंड़े-बैंड़े, आड़े-तिरछे, पटरी-फुटपाथ और डिवाइडर तक पर भी चलवाकर देख लीजिए। कहीं रुक जाएं और मात खा जाएं तो आपकी जूती और मेरा सिर। जहां के लोग जाम और रेड लाइट को कुशलतापूर्वक जंप करना जानते हों, वहां सड़कीय समारोह  यातायात का क्या बिगाड़ लेंगे? लेकिन यहां तो पश्चिमी अंधानुकरण  है। अजी अमेरिका में सड़क पर कोई रुक नहीं सकता, थूक नहीं सकता और यहां तम्बू गाड़ देंगे। इसे तो रोकना ही होगा! पर इतना ध्यान नहीं है कि समारोहों पर प्रतिबंध् लगाकर आप कैसी भयानक अपसंस्कृति फैला रहे हैं!
इन सबसे भी हास्यास्पद बात यह कि आप सड़क के किनारे पेशाब नहीं करेंगे। लाखों करोड़ों रुपये इसी के लिए विज्ञापन पर फूंके जा रहे हैं कि विदेशियों की नजर में देश  की इमेज खराब होती है। आखिर हर चीज को विदेशी  नजरिए से देखने की कौन सी जरूरत आ पड़ी और वह भी अचानक? कभी-कभार तो अपने देश  की पुरानी संस्कृति को देशी नजरिए से भी देख लिया करिए। अब आपसे बंदे की पेशाब भी नहीं देखी जा रही है? कुछ तो ऐसा रहने दीजिए कि उसे लगे वह अपने देश में है और उसमें देशभक्ति की भावना बनी रहे। आप तो खामखां देश  को थाईलैण्ड और मलेशिया बनाए जा रहे हैं कि सड़क किनारे थूके-मूते तो जुर्माना भरो या जेल जाओ !

यह मानवता ही नहीं, प्रकृति के नियमों के भी खिलाफ है। इसीलिए अंगरेजी में इसे ‘कॉल  ऑफ  नेचर’ कहते हैं। प्रतिबंध् लगाकर आप नेचर के विरुद्ध  जाने का काम कर रहे हैं। इससे ज्यादा आजादी तो पशुओं को है। उन्हें जब, जहां और जैसे जरूरत पड़ती है, वे अपना ‘कॉल  ऑफ  नेचर’ पूरा कर लेते हैं। इसीलिए उन्हें पेट की बीमारियां नहीं होतीं। बात तो की जाती है मानवाधिकार की और पशु अधिकार  के भी लाले पड़े हैं। आयुर्वेद भी इस मत का समर्थन करता है- वेगान् न धरयेत्। वेगों  को नहीं रोकना चाहिए अर्थात् मल-मूत्र के वेग को रोकना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। इन वेगों को धरण करना कितना कष्टप्रद और इनसे मुक्ति पाना कितना सुखद है, यह कोई रहस्य की बात नहीं। यह तो जन-जन का अनुभव है।
सड़क के किनारे मीलों-मील, भरे बाजार में और संभ्रांत इलाकों में सार्वजनिक शौचालयों का न होना अपनी पुरानी संस्कृति है। खुदा न खास्ता यदि कहीं हो भी तो उसका भरा होना भी अपने यहां की पहचान है। ठीक भी हो तो उसके अगल-बगल खड़े होकर ‘कॉल  ऑफ  नेचर’ पूरा कर लेना सहज पद्धति  है। महिला शौचालय पर कामसूत्र के वाक्य लिख देना और खजुराहो के चित्र बना देना देशी शृंगारबोध् के प्रमाण हैं। इससे आमजन की जिजीविषा परिलक्षित होती है। रेल की  पटरी के किनारे बैठकर ‘कॉल  ऑफ  नेचर’ पूरा करना और जाती हुई ट्रेन को दार्शनिक भाव से निहारना जीवन का एक सुख है। अब विदेशी भय से संस्कृति का यह सुख भी आप छीनना चाहते हैं ?

इंडियन कल्चर की परवाह हम इंडियन भले न करें, पर विदेशी  जरूर करते हैं। अमेरिका में रहने वाले मेरे एक दूर के सम्बन्धी  ने बताया कि वहां जगह-जगह इंडियन मार्केट बनाए गए हैं और उन्हें इंडियन लुक देने की कोशिश की गई है । अपने समझ में यह बात नहीं आई तो उन्होंने फरमाया कि पान-गुटका और असली तेंदू पत्ते की बीड़ी का विशेष  इंतजाम तो वहां होता ही है, सबसे बड़ी बात यह कि इमारत के कोनों और सीढि़यों के घुमावों पर पान-गुटके की गहरी पीक का भी प्रभाव छोड़ा और देखा जाता है। प्रयुक्त सामानों के रैपरों को भी यत्र-तत्र फैलाकर भारतीय सभ्यता और संस्कृति को जीवंत किया जाता है। तब जाकर मुझे इंडियन लुक का अर्थ समझ में आया। यह बात अलग है कि अभी सात समंदर पार जाकर ऐसी जीवंत संस्कृति का दर्शन नहीं कर पाया।

यहां इसका ठीक उल्टा हो रहा है। नियम पास कर दिया गया कि सार्वजनिक स्थान पर धूम्रपान  निषिद्ध  है। पान-गुटका खाकर सड़क पर थूकना दंडनीय है। अट्ठारह साल से कम उम्र के व्यक्ति को गुटका-बीड़ी-सिगरेट बेचना कानूनन जुर्म है (अट्ठारह साल से कम उम्र का व्यक्ति इन्हें बेच सकता है)। इतना ही नहीं, सरकार तो इसे सख्ती से लागू भी करवा देती। उसे देश  की संस्कृति से क्या लेना देना ? यह तो भला हो पुलिस और कार्यपालिका का कि येन-केन प्रकारेण वह गुटका-बीड़ी संस्कृति को अक्षुण्ण बनाए हुए है और धूम्रपान विहीन अपसंस्कृति को पांव फैलाने से रोके हुए है। हालांकि गुटका-पान जैसी भारतीय संस्कृति का समूल नाश करने में दिल्ली मेट्रो ने कोई कसर नहीं छोड़ी है और गंदगी से बैर भाव रखकर स्वयं को पाश्चात्य लुक देने में जी जान से लगी है। यह तो भला हो अपने देशवासियों का कि महिलाओं के लिए आरक्षित डिब्बों में यात्रा करके, महिलाओं और बुजुर्गों को उनकी आरक्षित सीटें  न देकर और दरवाजों पर भारी मजमा लगाकर भारतीय संस्कृति को बचाए हुए हैं। किंतु सख्त होते नियमों को देखकर लगता नहीं कि हम इसके उलट अपसंस्कृति के प्रसार से बच पाएंगे।

देश  की संस्कृति और पहचान विलुप्त होने की कगार पर है। अब वह दिन दूर नहीं दिखता जब लोगों के घर के सामने सरकारी सड़क पर और गलियों में गाडि़यां खड़ी हुई नहीं दिखेंगी। घर के अगल-बगल गैराज नहीं होंगे  और जुगाड़ तकनीक का सर्वथा अभाव हो जाएगा। सरकारी इमारतें तो होंगी लेकिन उनके सीढि़यों के घुमाव पर पान-गुटका की सुर्ख पीकें नहीं होंगी। जो पान-गुटका वे महागरीबी में भी खरीदते और खाते आए, वही अब डॉलर और एटीएम हो जाने के बाद भी नहीं खरीद पाएंगे क्योंकि थूकने की अनुमति नहीं होगी।

थूकने में हमारा कोई जवाब नहीं है। हम सदियों से लगातार थूकते आए हैं। हमारी उदारता यह है कि हम जिसे अच्छा मानते हैं, उस पर भी थूकते हैं। जिसका सम्मान करते हैं, उसके नाम पर भी थूकते हैं। कोठी-कटरा, महल-अटारी, बंगला-अट्टालिका, जनपथ और राजपथ से लेकर शौचालय तक समान भाव से थूकते हैं। कुछ लोगों ने तो शायद आसमान और सूरज पर भी थूका होगा जिससे ऐसी थूक मुहावरा बनकर भाषा को समृद्ध कर रही है। कुछ लोग इससे भी आगे चले जाते हैं और थूककर चाटने में बड़ा विश्वास  रखते हैं। सुना है ऐसे लोग दुनिया में सफलता के झंडे गाड़ देते हैं। यह नीति राजनीति में भी बहुत समर्थ मानी जाती है।

बहरहाल, सरकारी और न्यायालयी सख्ती से तो यही लगता है कि अपनी पान-गुटका संस्कृति का लोप हो जाएगा और बदले में विदेशी ब्लैक एंड व्हाइट अपसंस्कृति टांग फैलाए मिलेगी। शादियां सड़कों पर नहीं होने दी जाएंगी (यों भी शादियां करना कौन चाहता है)। विशेषज्ञों की मानें तो यह लिव इन रिलेशनशिप वालों की चाल है। न शादियों  के लिए मुफ्त की जगह मिलेगी और न मां-बाप अपने प्राणप्यारों पर शादी करने का दबाव डालेंगे। यहां तक कि गर्भवती प्रेमिकाएं भी शादी के लिए जिद नहीं करेंगी। दावतें बंद हो जाएंगी जिससे समाज में वैमनस्य का बोलबाला होगा। अभी तक आपसी मेलजोल और कार्यसिद्धि के लिए जिस दावतबाण का प्रयोग किया जाता था वह निष्प्रभावी हो जाएगा। बिना दावत के समाज में किसी का किसी से परिचय नहीं होगा और कार्यसंस्कृति का लोप हो जाएगा। और ऐसा हुआ तो अपना विश्वगुरू बनने का सपना तो अधूरा  ही  रह जाएगा न ! तो क्यों न आगे बढ़कर हम अपसंस्कृति के खतरे को रोकने का प्रयास करें और अपने पुराने मूल्यों को पुनरस्थापित करें?


Tuesday, 13 August 2013

अपसंस्कृति का खतरा

हरिशंकर राढ़ी

ऐसा पहली बार होगा कि देश की संस्कृति की चिन्ता करने वाले मेरी किसी बात से इत्तेफाक रखेंगे। बात यह है कि अब मैं भी यह मानने लगा हूं कि देश  में अपसंस्कृति का प्रसार हो रहा है। हालांकि इस प्रकार की स्वीकारोक्ति से मैं देश  की युवाशक्ति  का समर्थन खो दूंगा और मेरी गणना भी खब्तियों में होने लगेगी। युवाशक्ति के समर्थन से हिम्मत दुगुनी रहती है और इस बात का गुमान रहता है कि मैं भी युवा हूं। युवाशक्ति से मेरा कोई प्रत्यक्ष हितलाभ नहीं है क्योंकि मैं कोई चुनाव लड़ने नहीं जा रहा जिसके लिए मुझे युवाशक्ति के रैपर में लिपटे वोट की दरकार हो। फिर भी आत्मरक्षा की दृष्टि  से इस वर्ग से पंगा लेना ठीक नहीं। जब भी ऐसी चर्चा होती है कि देश  में अपसंस्कृति का प्रसार हो रहा है, युवावर्ग फायरिंग पोजीशन  में आ जाता है। कुछ युवापार लोग भी इनके समर्थन में आ जाते हैं क्योंकि इसी अपसंस्कृति के चलते उन्हें  भी सुखद मौके मिल जाते हैं । ऐसी दशा  में संस्कृति के संवाहकों की चुनौती दोहरी हो जाती है। जिसे अपनी टीम का खिलाड़ी होना चाहिए, वह विपक्षी टीम में शामिल हो जाए तो मुश्किल बढ़ेगी ही।
मैं वह पुराना राग नहीं अलापने जा रहा हूं कि अपसंस्कृति का खतरा पश्चिमी सभ्यता के अंधानुकरण से बढ़ रहा है। दरअसल, असली खतरा तो अंदरूनी होता है जिसे सभी देशी इतिहासकार मानते हैं। ‘घर का भेदी लंका ढाए’ ऐसे ही नहीं कहा गया है। हां, इतिहास को जानना अलग है और उससे सीख लेना अलग (जिसके लिए हम कतई तैयार नहीं)। अब इधर  अपसंस्कृति का जो खतरा पैदा हुआ है वह हमारा अपना बनाया हुआ है और शुद्ध  देशी  है। मजे की बात यह है कि संस्कृति भी देशी है और खतरा भी देशी। दो ‘देशियों’ में लड़ाई की स्थिति है। सदियों से चली आ रही परंपरा और पद्धति  को अपने ही देश की सरकार मिटाने पर तुली हुई है।
सदैव अपनी ही सुविधा और फायदे का ध्यान रखना हमारी पुरानी संस्कृति रही है। अपना बाल भी बांका न हो और दूसरे की गर्दन कट जाए तो भी ठीक है। लब्बो-लुआब यह कि दुनिया की सारी सुविधाएं मेरे लिए ही बनी हैं, दूसरे के लिए नहीं। दूसरा है भी तो क्यों है? पहले तो उसे होना नहीं चाहिए और है भी तो उसे मेरी सुविधा  का खयाल पहले रखना चाहिए। हम चाहे जो करें, जैसे रहें, हमारी मर्जी ! हमारा मन है कि हम बीच सड़क पर लट्ठ घुमाते हुए चलेंगे तो क्यों न चलें? हमें इसमें मजा आ रहा है तो आप कौन हैं रोकने वाले? अगर आपको भी सड़क पर चलना है तो यह आपका सिरदर्द कि मेरे लट्ठ से कैसे बचें। आपको सड़क पर निकलने का बस यही समय मिला था? फिर मैं लट्ठ घुमाते हुए जा रहा हूं तो आप पूरी तरह से फुटपाथ पर क्यों नहीं चलते? फुटपाथ भी अगर लट्ठ की परिधि  में  आ रहा है तो क्या सड़क के बगल में खेत नहीं है? बेवजह मेरा लट्ठ रोकेंगे तो मुझे गुस्सा आएगा या नहीं? फिर आप  कहेंगे कि मैं सुसंस्कृत नहीं हूं और लड़ाई पर आमादा हूं। इतना ही नहीं जनाब, आप उसे रोडरेज का नाम देकर संस्कृति का क्षय बताएंगे। अब क्या कोई  राजतंत्रा या शाही जमाना रहा है कि मुझे अभिव्यक्ति की आजादी नहीं है? भाई साहब, शुद्ध  क्या विशुद्ध  लोकतंत्र है और लोकतंत्र को बचाने के लिए मैं चाहे जैसे प्रयोग करूं!
हम उदारचरित संस्कृति वाले नागरिक रहे हैं। फायदा हो तो अपने-पराए का भेद नहीं मानते। सार्वजनिक संपत्ति और सार्वजनिक स्थल को अपना न मानने की भूल कभी भी नहीं करते! संस्थागत चीजों को व्यक्तिगत समझते आए लेकिन हमारी इस समृद्ध  संस्कृति में न्यायालय का हस्तक्षेप बढ़ना शुरू  हो गया और अपसंस्कृति का खतरा शुरू  हो गया । पहला यह कि आप सरकारी सड़क पर पार्किंग नहीं कर सकते, गैराज नहीं खोल सकते और भैंस नहीं बांध सकते। अगर आप ऐसा करते हैं तो दंड संहिता के अंतर्गत दंड के भागी बनेंगे। अगर आप सड़क पर गाड़ी जमाते हैं तो उसे उठा लिया जाएगा या चालान काट दिया जाएगा। आप रिहायशी इलाकों में गैराज नहीं खोल सकते। ऐसा ही प्रतिबंध् बैंक और दूसरी संस्थाओं पर लग गया है। दुनिया जानती है कि अपने देश  की पहचान ही इसी पद्धति  से रही है। भइया, यहां तो ऐसा सदियों से होता आया है। अब आप इसे क्या अमेरिका, कनाडा और आस्ट्रेलिया बनाने पर तुले हुए हैं? माचिस की एक डिबिया लेनी हो तो अंडरग्राउंड पार्किंग से कार निकालूं और साढ़े चैदह किमी दूर शापिंग मॉल  भागूं? कार धक्के से स्टार्ट होने लगे तो कंपनी के सर्विस सेंटर को फोन लगाऊं और वे उसे उठाने के लिए क्रेन भेजें, जॉब कार्ड बनाएं और उनका इंजीनियर चेक करके एस्टीमेट दे, इसके बाद बने, बिल पेमेंट हो और फिर किसी तरह माचिस की डिबिया आए। भाई साहब, यह पश्चिमी अंधानुकरण नहीं तो और क्या है? एक नौजवान या नौजवानिन पश्चिमी फैशन के तहत थोड़ा शरीर दिखा दे (जिसे देखकर आप भी खुश और ऊर्जावान महसूस करें) तो यह अपसंस्कृति का प्रसार है और सैकड़ों वर्षों की अपनी बनी-बनाई पड़ोसगीरी संस्कृति की सुविधा  का फायदा लेने के बजाय अनावश्यक रूप से संसाधनों  का अपव्यय करके यहां-वहां दौड़ लगाते रहें तो यह अपसंस्कृति नहीं है?
आप यह भूल गए कि यहां पश्चिमी दशों  की तरह केवल ‘घर’ नहीं घर-द्वार होता है। घर के सामने जो भी होता है वह द्वार होता है और अगर सरकार ने सड़क बना दी है तो यह उसकी गलती है। द्वार का ध्यान उसे रखना चाहिए था। यह भी अटल सत्य है कि घर के सामने की हवा और धूप  गृहस्वामी की होती है। बिना उसकी अनुमति के उध्र से गुजरने वाला वहां की हवा और धूप  नहीं ले सकता। ऐसी स्वामित्व की स्थिति में यदि वह अपनी गाड़ी खड़ी कर लेता है तो सरकार के पेट में दर्द क्यों? घर के सामने गाड़ी खड़ी करना समृधि  और रुतबे का प्रतीक है। यह हमारी संस्कृति का अंग है और ऐसा करने से रोकना संस्कृति का कत्ल है।

एक साहब एक गैर-सरकारी संगठन चलाते हैं। सड़कों से पार्किंग और गैराज हटाने की खुराफात उन्हीं को सूझी थी। बकौल एनजीओ साहब, इससे आवागमन में दिक्कत होती है और जाम लगता है। इसके अलावा गैराज वाले इंजन के शोर से जीना मोहाल कर देते हैं। न चैन से बैठने को मिलता है और न सोने को। यह अपनी पुरानी दिक्कत रही है। बैठने वालों और सोने वालों के लिए काम करने वाले और व्यस्त रहने वाले हमेशा से एक बड़ी समस्या रहे हैं। जब देखो काम ही काम। एक मिनट शांति से बैठकर जीवन को समझने की कोशिश नहीं करेंगे। देश के राजनैतिक और आर्थिक हालात क्या हैं, इसकी कोई चिंता ही नहीं! 

इधर  सड़कों के बहुआयामी प्रयोग पर प्रतिबंध् की वकालत की जाने लगी है। ऐसे प्रावधन हो चुके हैं कि सड़कों का प्रयोग बहुविध  होने  के बजाय एकल होना चाहिए। अपनी बहुत पुरानी संस्कृति रही है कि हर वस्तु का प्रयोग बहुउद्देश्यीय हो। इससे संसाध्नों की बचत होती है और वस्तु विशेष की उपयोगिता बढ़ती है। सड़कों के साथ ऐसा प्रयोग हम करते आए हैं। सड़कों पर सूखने के लिए गन्ने की खोई डाल देना, महीन करने हेतु भूसे को फैला देना या फिर घर का कूड़ा डाल देना ऐसे ही बहुउद्देश्यीय ग्रामीण प्रयोग रहे हैं । यह तो आप मानेंगे कि समारोह किसी भी संस्कृति के प्राण हैं और हमारे यहां आधे  से  ज्यादा समारोह सड़कों पर ही होते हैं।

शादियां तो सड़कों के उपयोग बिना हो ही नहीं सकतीं। आज शहर  में पचास फीसदी से अध्कि लोगों की गृहस्थी जमाने का श्रेय सड़कों को ही जाता है। मोहल्ले की सड़क पर तम्बू गाड़ा, हलवाई बिठाए और बिटिया के हाथ पीले! बाबुल प्यारे जिम्मेदारी से मुक्त और लाडो पिया के घर! कन्यादान महादान। सड़क के बिना कहां का कन्यादान? इधर  जबसे सड़क पर तम्बू गाड़ने पर प्रतिबंध् लगा, शहर   में शादियाँ  कम हो गईं। अब कन्या के लिए सुयोग्य वर की तलाश  आसान लेकिन समारोह स्थल का जुगाड़ असंभव। कैसे हो कन्यादान महादान ? चलिए, जैसे -तैसे कहीं पचास वर्गफुट जगह मिल भी गई तो बारात कैसे जाए ? नहीं साहब, आप सड़क पर नाच-गा नहीं सकते। इससे यातायात बाधित  होता है। होता होगा। कुछ लोग होते ही ऐसे हैं कि उन्हें नाच-गाना सुहाता ही नहीं और दूसरों की खुशी देखी नहीं जाती। इतने सारे दुखों के बीच बंदा खुशी का एक मौका निकालता है, वह भी आपसे बर्दाश्त  नहीं होता ! क्या समां होता है थोड़ी देर के लिए। जेनरेटर दगदगा रहा होता है और रंग-बिरंगी लाइटें  दमदमा रही होती हैं। हर आय और आयुवर्ग का बंदा एंड़े-बैंड़े घूम रहा होता है। संगीत की धारा  बह रही होती है और  आधा  किलोमीटर की दूरी भद्रजन दो घंटे में तय कर रहे होते हैं। वरना इसी सड़क पर लोग उड़ रहे होते हैं और खून की नदियां बह रही होती हैं। आप उसी उड़ान के लिए वकालत कर रहे हैं ? दो घंटे की रौनक आपसे देखी नहीं जाती?
( शेष  दूसरी  किश्त में )
(यह व्यंग्य ‘समकालीन अभिव्यक्ति’ के जनवरी-मार्च 2013अज्ञात रचनाकार विशेषांक में प्रकाशित हुआ था)