Wednesday, 27 March 2013

जोगी जी वाह जोगी जी!


इष्ट देव सांकृत्यायन



चढ़ते फागुन में
हम मूढ़ों को 
ज्ञान बताने आए 

खेल धर्म का 
खेल चुके तो खुलकर 
जात बचाने आए

कबीरा सारारारा........
जोगीरा रारारारा .........
जोगी जी वाह जोगी जी!

किसकी कीच, कमल किसका है,
किसका रंग किसकी पिचकारी 
सभी शरीफ़ों की
है आपस में
गहरी रिश्तेदारी.

जांच-फांच की नौटंकी पर धमक जताने आए
कबीरा सारारारा जोगीरा रारारारा
जोगी जी वाह जोगी जी!

दूर बहुत दिखता है उसको
जो घर में सुन भी ना पाए
इधर जो मौक़ा लहे ज़रा सा
लेकर धोकरा दौड़ा आए

पंचतत्त की होली में सब दही भुजाने आए
कबीरा सारारारा जोगीरा रारारारा
जोगी जी वाह जोगी जी!

सबने पी है छक कर यारां
बादल बरसे भंग
गेरुआ बाना भीगा देखो
नसों से निकला रंग

फागुन में जभी तो वो मल्हार गाने आए
कबीरा सारारारा जोगीरा रारारारा
जोगी जी वाह जोगी जी!


Monday, 18 March 2013

बात का मर्म




इष्ट देव सांकृत्यायन

लोकतंत्र न हुआ, मुसीबत हो गई। किसी महामानव ने कुछ कहा नहीं कि बवाल शुरू। गोया बड़े लोगों को बेवजह छोटा बनाने और उन्हें भी अपनी ही औकात में लाने का सबको पूरा ह$क मिल गया हो। पांच साल में एक बार बड़े लोग मंच से हाथ क्या जोड़ लेते हैं, लोगों का मन इतना बढ़ जाता है कि वे उन्हें हमेशा हाथ जोड़े ही देखते रहना चाहते हैं। भूल ही जाते हैं कि सरकार और सरकारी अफसरों के शासक के बजाय सेवक होने की बात किताब में केवल लिखे जाने के लिए लिख दी गई है। असलियत से उसका संबंध उतना ही है, जितना राजनीति का नीति और डिग्री का योग्यता से।
मुझे ठीक-ठीक याद है गर्मी नहीं, जाड़े के दिन थे वे। वह भी ऐसा जाड़ा कि लोगबाग परेशान। दिन में धूप भले निकल आए, पर रात एकदम सर्द। ऊपर से हर तीसरे दिन बारिश और उसमें ओलापात भी। इधर बजट आया, उसने सर्दी से भी ज्य़ादा लोगों के हाथ-पांव टैक्सों के ज़रिये सुन्न कर दिए। भिन्न-भिन्न प्रकार के नेतृत्वविलीन और नेतृत्वविहीन आंदोलनकारियों की पिछले तीन-चार वर्षों में जो दशा हुई, उसने जोशे-जवानी को ठंडई में पहले ही बदल दिया था। माहौल में ऐसा कुछ भी नहीं था, जिसके चलते किसी तरह की गर्मी आने के बारे में सोचा जाता, लेकिन लोगों की उस अक्ल का क्या करेंगे जो महाजनों की कोई बात सुनते ही एकदम से वहीं अटक जाती है। बात के मर्म तक पहुंचने लायक अक्ल तो उन्हें विधाता ने थमाई नहीं और समझे ब$गैर अक्ल के फारेनहाइट को ही सेल्सियस कर देना सबकी आदत अलग हो गई है।
किसी सूबे का आला हाकिम कुछ कहे और लोग उस पर $गौर न $फरमाएं, ऐसा हो ही नहीं सकता। बिजली के दाम बढ़े। लोगों ने थोड़ी नाराज़गी जताई। उन्होंने कह दिया कि भाई बिल कम करना है तो कूलर छोड़ो, पंखा चलाओ। $कायदे से यह एक नेक सलाह भर थी, जनता की भलाई के लिए। कोई मैंडेटरी आदेश नहीं था, जिसे मानना ही हो। लेकिन, जनता भी कई बार पार्टी के व$फादार सिपाहियों जैसा व्यवहार करने लगती है। यह अलग बात है कि उनके जैसे अनुशासन का परिचय वह कई बार तो पुलिस के डंडे की चपेट में आकर भी नहीं दे पाती। जबकि पार्टी के सिपाही आलाकमान के मुंह से निकली फूंक को भी ईश्वरीय मंत्र मानते हैं। प्रश्न उठाना तो दूर, उस पर अमल से पहले वे 'हाऊ टु डूÓ पढऩे की ज़रूरत भी नहीं समझते। जबकि जनता? बात समझे-न समझे, उसे आलोचना तो करनी ही है।
बात समझे ब$गैर पिल पडऩा लोगों की आदत सी हो गई है। कहां की बात कहां पहुंचा दी। आला हाकिम ने बात तो की पंखे-कूलर की और लोगों ने इसे आटे-दाल से जोड़ दिया। मसलन ये कि यानी आटा महंगा हो गया तो कम खाओ। हो सकता है, इसका यह आशय भी हो सकता है। लेकिन, जैसे लोग निकालते हैं, वैसे तो बिलकुल नहीं। पहले के ज़माने में ये परंपरा थी कि जब कोई महामानव कुछ कहे तो पहले उसके मर्म को समझा जाए। मर्म को समझे ब$गैर कोई बात न की जाए।
बड़े लोगों की बातों के पीछे बड़े मर्म होते हैं। पहली तो बात यह समझी जानी चाहिए कि उन्होंने कूलर की ही बात क्यों की? पंखा चलाने से मना नहीं किया और एयरकंडिशनर से भी नहीं। सबसे पहले तो यह समझना चाहिए उन लोगों को जो 30 रुपये से ऊपर कमाने वालों को अमीर मानने पर सवाल उठा रहे थे। उन्हें समझना चाहिए कि सरकार ने $गरीबों का कितना ख़्ायाल रखा है। ध्यान रखना चाहिए कि 30 रुपये तक रोज़ कमाने वाले पंखा तो चला ही सकते हैं और इन्कम टैक्स देने वाले तो एसी आराम से चला सकते हैं। जब इन्कम टैक्स पेइयों को मेट्रो सिटीज़ में दो हज़ार रुपये महीने किराये पर आराम से घर मिल सकता है तो उन्हें एसी चलाने में क्या प्रॉब्लम है? कुल मिलाकर यही तो दो वर्ग हैं देश में, एक $गरीबी रेखा के नीचे और एक अमीरी वृत्त के ऊपर। बीच में तो कोई तबका बचा नहीं। 
इतनी सुविधा के बावजूद अगर कोई कूलर चलाता है तो मेरे हिसाब से तो वह अपराध कर रहा है। अपराध इसलिए कर रहा है, क्योंकि इतनी अधिक मात्रा में क्लोरोफ्लोरो कार्बन गैस अति महत्वपूर्ण व्यक्तियों के मुंह से भी नहीं निकलता, जितना कूलर से। उनके मुंह से निकला क्लोरोफ्लोरो कार्बन तो केवल भारतीय उपमहाद्वीप के समाज को ही तोड़ता है, लेकिन ये वाला कोई एक-दो समाज नहीं, पूरी दुनिया से भी ऊपर वो जो ओज़ोन वाली परत है, उसी को फाड़ डालता है। इसके अलावा यह हल्ला भी बहुत मचाता है। इसके हल्ले से सत्ता के कान पर जूं भले न रेंगे, लेकिन पर्यावरण के कान एकदम फट जाते हैं। ऐसा वे पर्यावरणविद बताते हैं जो जागरूकता के नाम पर अपने हर आयोजन के ज़रिये $करीब दस हज़ार डेसिबल का योगदान करते हैं। निश्चित रूप से आला हाकिम उनसे बहुत प्रभावित हैं। नहीं चाहते कि हमारा पर्यावरण प्रदूषण का शिकार हो। 
आला हाकिम को पता है कि पर्यावरण कोई समाज जैसा मसला नहीं है। समाज की तो एक सीमा है, लेकिन पर्यावरण की कोई सीमा नहीं है। उससे पूरी दुनिया ही नहीं, पूरा सौरमंडल प्रभावित होता है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए इधर आटे-दाल के दाम भी दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की कर रहे हैं। आप क्या समझते हैं, ज्य़ादा खाना बहुत अच्छी बात है? अगर ऐसी सोच आपकी है तो जनाब आप भ्रम में न रहें। ज़रा स्लिमिंग सेंटरों और जिमों पर भी नज़र डालें। जितना आप खाने पर ख़्ार्च नहीं करते, उससे कई गुना ज्य़ादा कुछ लोगों को खाया हुआ पचाने पर ख़्ार्च करना पड़ रहा है। सरकार जानती है कि अगर अधिक खाएंगे तो कल ऐसे ही आपको भी ख़्ार्च करना पड़ेगा। वह आपका योगक्षेम वहन करती है। अगर वह आपकी परवाह नहीं करेगी तो कौन करेगा? वह आपको अपनी सेहत ख़्ाराब करते और इस दारुण ख़्ार्च में पड़ते नहीं देखना चाहती। इसलिए सरकार की आलोचना की नकारात्मक मनोवृत्ति छोड़ें। पॉजि़टिव एटीट्यूड अपनाएं और सरकार की मंशा को समझते हुए कूलर को मारिए गोली। आज ही से शुरू कर दें पंखा और एसी चलाना।

Monday, 4 March 2013

जमूरियत तरक्की पर

- ऐ जमूरे!
- हां उस्ताद.
- खेल दिखाएगा?
- दिखाएगा.
- जो कहेगा, करेगा?
- करेगा, बिलकुल करेगा. काहें नईं करेगा उस्ताद?
- ओह! तू तो उल्टा सवाल करने लगा बे. लगता है आज बड़ी तड़ी में है!
- तड़ी में अपन क्या खा के होएंगा उस्ताद? अपन तो बस तुम्हारे हुकुम का ग़ुलाम है. जो बोलेगा करेंगा.
- अच्छा. तो जो बोलेंगा, वो तू करेंगा?
- हां, बिलकुल करेंगा उस्ताद. आख़िर पापी पेट का सवाल है.
- हुंह! अच्छा तो चल चाकू निकाल.
- निकाला उस्ताद.
- अब चल जिबह कर.
- किसे उस्ताद?
- वो जो दो अंगुल का जीव दिखता है न, उसी को.
- क्यों उस्ताद?
- सुन ज़्यादा सवाल मत किया कर. ये जमूरियत के लिए नुकसानदेह होता है. 
- ओह! माफ़ करना उस्ताद. तू ठीक कहता है. जमूरियत में तो सवाल करने के भी पैसे लगते हैं. 
- पर चल, तू पूछता है तो अपन बता देता है. असल में तो वो पहले से ही बेजान है. 
- कैसे पता उस्ताद?
-बेवकूफ़, तूने फिर सवाल किया.
-ओह! ग़लती हो गई. माफ़ करुं उस्ताद. आइन्दा नहीं करेगा.
- अच्छा चल माफ़ किया. अब पूछ ही लिया है तो जान ले. देख, वो अगर जानदार होता तो क़ानून-फ़ानून इंसानियत-फिंसानियत जैसी फ़ालतू बात न करता. आजकल ये सब ज़िन्दा होने के सिंबल नहीं. जो ज़िंदा होता है वो मुर्दा चीज़ों के पीछे थोड़े भागता. वो तो बस वो करता है, जो राजा कहता है. बिना कुछ पूछे, बिना कोई सवाल किए. चुपचाप करता चला जाता है. 
-ठीक है उस्ताद. अपन काम में लगता.

(गहरा सन्नाटा)

- लो उस्ताद जिबह कर दिया.
- अबे कुछ तो इंसानियत का ख़्याल रख. 
-???
- अबे बकलोल की तरह क्या देखता है बे? घबरा मत, सुन ये भी आख़िर पापी वोट का सवाल है. समझा?
- हुंह! समझा उस्ताद, समझा.
- अबे चुप्प. समझा. क्या समझा?
- कुछ नहीं समझा उस्ताद. कुछ नहीं. जो तू समझाएगा, बस वो ही समझेगा.
- अच्छा चल, तब एक काम कर.
- हुकुम उस्ताद! 
देख, ये प्यारे-प्यारे क्यूट-क्यूट शेर जी लोग कई दिनों से भूखे हैं न! इसके टुकड़े कर और इनके आगे डाल दे.
- डाल दिया उस्ताद.
- शाब्बाश! अब सुन.
- हां उस्ताद.
- ज़रा उधर तालाब में देख!
- देखा उस्ताद!
- क्या देखा?
- तालाब में देखा उस्ताद, जो तूने कहा बिलकुल वोई.
- बिलकुल वोई?
- हां उस्ताद, बिलकुल वोई!
- मगरमच्छ लोग को देखा?
- हां उस्ताद, लोग कितने सुकून से बैठा है! बहुत क्यूट लग रहा है. एकदम संतों जैसा.
- एकदम संतों जैसा न?
- हां उस्ताद, एकदम संतों जैसा.
- जानता है? वो लोग बहुत दिन से तपस्या में है.
- अच्छा!
- हां, पिछले तीन साल से.
- ओह!
- अच्छा, अब ऐसा कर कि जो बचा है न, वो सब उनको स्नैक्स के तौर पे डाल दे. तुझे बहुत सबाब मिलेगा.
- डाल  दिया उस्ताद.
- डाल दिया न?
- हां डाल दिया.
- शाब्बाश! जमूरियत तरक्की पर है. तू भी तरक्की करेगा.