Friday, 25 October 2013

Yatra Manual

व्यंग

                                        यात्रा मैनुअल

                                                                                  -हरिशंकर  राढ़ी

(यह व्यंग्य ‘जागरण सखी’ में प्रकाशित हो चुका है. यह दूसरी और अंतिम किश्त है। )

         स्लीपर क्लास में यात्रा के लिए जिन विशिष्ट  वस्तुओं की आवश्यकता  होती है, उनकी सूची एक्सक्लूसिवली यहां दी जा रही है। (खाना-पानी, बिस्तर-चादर जैसे सामानों का उल्लेख कर यहां मैनुअल का स्तर नहीं गिराया जाएगा।) यात्रीगण एक किता संड़सी, पेंचकस और मजबूत रस्सी प्राथमिकता के तौर पर रख लें। दरअसल, स्लीपर क्लास की कौन सी खिड़की की चिटकनी खराब है, किसका शीशा  टूटा हुआ है और कौन सी खिड़की का शटर या तो खुल नहीं रहा है या बंद नहीं हो रहा है, इसकी जानकारी संचार साधनों के इतने विकास के बावजूद आपको नहीं मिल पाएगी। बंद खिड़की को खोलने के लिए इन प्राथमिक हथियारों की नितांत आवश्यकताहोती है। मान लिया गर्मी का मौसम है और शटर या शीशा  ऊपर होकर अंटकता ही नहीं, अर्थात वह हमेशा  गिरी हुई राजनीति की स्थिति में रहता है तो आप आम आदमी होने के कारण अंदर-अंदर खौल कर रह जाने के सिवा कुछ नहीं कर पाएंगे। टीटी बाबू से शिकायत करेंगे तो वे आपको रेल डिब्बा कारखाना कपूरथला रेफर कर देंगे और अगर भूल से भी रेलवे पुलिस से कह दिया (हालांकि टीटी और रेलवे पुलिस- दोनों के दर्शन  आर्थिक लाभ दृष्टि गोचर  होने पर ही होते हैं) तो लेने के देने पड़ जाएंगे। अतः ऐसी दुर्दशा  में आप मजबूत रस्सी से शीशे को ऊपर अंटका सकते हैं। पेंचकस  के प्रयोग से आप पंखे की पंखुड़ी घुमाकर चालू कर सकते हैं या लाइट जला सकते हैं।
     यदि आप भोजन के हठी हैं तो आपको कम से कम पांच लीटर जलग्रहण क्षमता वाला एक जलपूर्ण डिब्बा अपरिहार्य रूप से रखना चाहिए। यह जल पीने के काम नहीं आएगा। उसे तो आप अलग से रखे ही होंगे। मुझे तो चिंता इस बात की है कि यदि आप यह उम्मीद लेकर गाड़ी के शौचालय में चले गए कि उसमें पानी होगा, तब आपका क्या होगा ? आप तो उस वर्ग के भी नहीं हैं कि टिस्सू पेपर या अखबार से काम चला लेंगे ! ध्यान रखें, डिब्बा ज्योंही खाली हो जाए, अगले स्टेशन  पर ट्रेन छूटने की चिंता न करते हुए इसे रिफिल कर लें। परिवार में  सदस्य ज्यादा हों तो अतिरिक्त डिब्बों की व्यवस्था कर लें। यह एक अलग मुद्दा है आप प्राकृतिक दबाव से मुक्ति का अवसर पाने के लिए गैलरी के अपार जनसमूह को लांघते हुए शौचालय तक पहुंच जाएं तो कम बहादुर नहीं हैं। 
      यदि आपकी यात्रा की श्रेणी साधारण या अनारक्षित है तो आप स्वयं को देश  का मूल निवासी समझें। आप ही असली वोट हैं और आप ही असली लोकतंत्र हैं। आप में ही भारत बसता है और आपके लिए ही सरकार है। आप वह महत्त्वपूर्ण प्राणी हैं जिसके लिए देश  की सारी योजनाएं बनती हैं। आपकी सुविधा के लिए ही सरकारी थाली की कीमत घटाकर बाईस रुपये कर दी गई है और आपके लिए ही गाडि़यों से साधारण डिब्बों को हटाकर ए.सी. या स्लीपर के डिब्बे नहीं लगाए गए। किसी प्रकार यदि अनारक्षित डिब्बे में प्रवेश  करने में सफल हो गए और नितम्बों को आधार मिल गया तो आप पहले गिरमिटिया के बराबर हो गए ! 
     वैसे इस श्रेणी के यात्रियों को चाहिए कि अपने साथ केवल एक ही सामान रखें और वह है कफन! न जाने कहां जरूरत पड़ जाए। आपकी बोगी सबसे आगे या सबसे पीछे है। आगे से ठुके तो भी और पीछे से ठुके तो भी, आपका कल्याण होना है। उसके आगे की यात्रा तो आपके सूक्ष्म जीव यानी आत्मा को ही करनी है। हां, जीवमुक्त लावारिश शरीर को मिट्टी तो चाहिए ही और उसके लिए कफन भी, सो बुद्धिमत्ता यही है कि अपना कफन साथ ले लें। हां, यह ध्यान जरूर रखें कि अपने कफन पर अपना नाम न मिटने वाली उस स्याही से जरूर लिखवा लें जो आपकी तर्जनी में लोकतंत्र के महायज्ञ में मतदान देते समय लगाई गई थी। ध्यान रखें, यदि कफन पर अमिट स्याही से नाम नहीं लिखा है तो आपकी काया को पंचभूत में नग्न ही विलीन होना है। प्राणहीन शरीर कफन की रक्षा नहीं कर पाएगा और यहां कफन के सौदागर बहुत हैं !
        और यात्रा ही क्या जो सरकारी बस या साझा किराए की टैक्सी से न की जाए। वैसे भी जहां कोई साधन नहीं पहुंचता, वहां अपने देश  में साझे किराए की टैक्सियां पहुंचती हैं। इनकी महत्ता और एडवासंवादिता का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि जहां ट्रेन समाप्त होती है, वहां से इनकी शुरुआत होती है। यही यात्री का उसके घर तक पहुंचा कर आती हैं। सरकारी बसें अब ऐसी नहीं रह गई हैं कि वे यात्री को ललचाती हुई निकल जाएं, भले ही आधी-अधूरी बची सीटें खाली ही जा रही हों। अब सरकारी अमला जिम्मेदार हो गया है और उसमें भी प्रबंधनशास्त्र पढ़ाई पढ़े हुए लोग आ रहे हैं। अब आलम यह है सरकारी कंडक्टर तो कंडक्टर, ड्राइवर भी हलक फाडकर चिल्लाएगा और बस है कि बिना भरे जाएगी ही नहीं। हां, ट्रेन से उतरते ही आपको सावधान हो जाना है। हो सके तो कमर को कसकर बांध लीजिए। सीजन यदि शादी-विवाह का है तो सीट घेरने में आपको निष्णात  होना चाहिए। ऐसे समय यदि वाया खिड़की आपको सामान घुसाने की कला आती हो तो आपकी सीट का आरक्षण पक्का है। हां, आपको ऐसी परिस्थिति का सामना यदि निरंतर करना पड़ता है तो आप किसी कुली से प्रशिक्षण ले लीजिए। यह बात अलग है कि यह प्रशिक्षण आपको तभी मिलेगा जब आप कुली का वेश धारण करेंगे। 
       सरकारी बसों में यात्रा का अपना अलग आनंद होता है। आप भरपेट केला खाकर छिलका  निस्संकोच भाव से खिड़की के रास्ते बाहर फेंक सकते हैं। जितना जी चाहे मूंगफली खाइए और छिलका सीट के नीचे बिखेरते जाइए। जहां चाहिए रुकवाइए और जो चाहे बाहर निकालिए।
          यदि आपने साझा किराए की टैक्सी में यात्रा नहीं की तो आपने न कोई यात्रा की और न कोई पर्यटन। अपने देश के विषय में तो आपकी जानकारी अधकचरी रह ही गई। यह बात अलग है कि ज्यादा जानकारी से दुख के बढ़ जाने का खतरा होता है। कहते हैं कि ये टैक्सियां पुष्पक  विमान होती हैं। सुना था किपुष्पक विमान में कितने भी लोग बैठते थे, एक सीट खाली रह जाती थी। इसीलिए राम इतनी बड़ी बानरी सेना मात्र एक विमान से लंका से अयोध्या आ गए थे। यह सिद्धांत साझा टैक्सियों पर लागू होता है। इसमें एक सीट हमेशा  खाली रहती है और यात्री स्थान की कमी से निराश  होकर रह नहीं जाता। इनके ड्राइवर जितने कुशल  होते हैं, उतने ही त्यागी। यहां तक की अपनी ड्राइविंग सीट पर दूसरों को बिठाकर और स्वयं येन-केन प्रकारेण लटककर भी गाड़ी चला लेते हैं। इस युग में इससे बड़ा परोपकार और कहां मिलेगा। और इसके अंदर बैठकर आप जो भी यात्रा करेंगे, वह आपको अपने अंदर झांकने को मजबूर कर देगी- यहीं से तो आत्मसुधार का रास्ता निकलता है।

3 comments:

  1. वाह, इसका शीर्षक होना था, यात्रा का देशीय चरित्र..

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  2. Pandeyji,
    Title suggested by you is not only good but also a suitable comment for this 'Vyangya'

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  3. एकबारगी तो शिवानी जी की लिखी कहानी सती के दृश्य सामने आ गये । साधुवाद हरिशंकर जी ।

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