Wednesday, 9 October 2013

बाबा की सराय में बबुए

इष्ट देव सांकृत्यायन 

इससे पहले - 

अपना सामान J कमरे में टिका कर और फ्रेश होकर नीचे उतरा तो संतोष त्रिवेदी, हर्षवर्धन, शकुंतला जी और कुछ और लोग लॉन में टहलते मिले. एक सज्जन और दिखे, जाने-पहचाने से. शुबहा हुआ कि दूधनाथ जी (जो कि थे भी) हैं. अनिल अंकित जी से कुछ बतिया रहे थे, लिहाजा बीच में टोकना अच्छा नहीं लगा. मैंने कहा बतिया लेने देते हैं, अपन बाद में तय करते हैं, वही हैं या कोई और. इस बीच अरविन्द जी के साथ बैठ गए. दुनिया-जहान की बातें होती रहीं. ख़ासकर भारतीय वांग़्मय में ही मौजूद विज्ञान कथाओं की तमाम संभावनाओं की. बीच-बीच में कुछ इधर-उधर जीव-जंतुओं को लेकर व्याप्त लोकभ्रांतियों की. इस बीच सिद्धार्थ आए, उन्होंने बताया कि उन्हें सपत्नीक किसी पुराने मित्र के यहां जाना है. थोड़ी देर में आते हैं. अरवंद जी भी फ्रेश होने अपने कक्ष में चले गए. तब तक दूधनाथ जी ख़ाली हो गए थे. अकेले टहल रहे थे. मैंने सोचा पूछ ही लेते हैं. ‘क्या आप दूधनाथ जी हैं...’ मैंने हाथ बढ़ाते हुए पूछा. ‘जी हां, मैं हूं...’ उनका सौजन्यपूर्ण जवाब था. हालांकि उनके चेहरे से ‘तू कौन?’ असमंजस साफ़ झांक रहा था. इसे भांपते हुए मैंने ख़ुद ही बता दिया, ‘मैं इष्ट देव’ एक क्षण फिर उनके माथे पर बल पड़ा, ‘अरे गोरखपुर?’ ‘जी हां, जी हां’ और इसके साथ ही उन्होंने मेरे कन्धे पर हाथ बढ़ाते हुए समेट लिया. उम्र का असर अभी उनके चेहरे तक ही है. क्या पता, थोड़ा-बहुत सक्रियता पर भी पड़ा हो. पर उनके स्वभाव की ख़ास ख़ासियत - आत्मीयता पर बिलकुल नहीं पड़ा. ‘कहां हो, क्या कर रहे हो, क्या लिख-पढ़ रहे हो, इधर क्या नया लिखना-पढ़ना हुआ, भविष्य की क्या योजना है.... आदि’ अरसे बाद हुई मुलाक़ात के साथ उठी कई जिज्ञासाएं. मालूम हुआ कि वे यहां बतौर गेस्ट राइटर रह रहे हैं. फिलहाल कुछ लिख-पढ़ रहे हैं. इस बीच संतोष जी भी हमारे साथ आ गए. उन्होंने दूधनाथ जी के साथ फोटो खिंचाने का प्रस्ताव भी किया और फोटो हमने खींच भी लिए. 

साहित्य की दुनिया में धीरे-धीरे व्याप रहा एक ख़ास क़िस्म का अनमनापन, कहानी-कविता जैसी विधाओं के सामने खड़ी नई चुनौतियां, इन चुनौतियों से निपटने के लिए ज़रूरी तैयारियां, भारत के हिंदीतर राज्यों का साहित्य हिंदी में लाए जाने, भाषा के प्रयोग में असावधानियां... जैसे कई मसलों पर बात हुई दूधनाथ जी से. ब्लॉगों पर किस तरह का साहित्य लिखा जा रहा है और हिंदी के विकास-प्रसार में ब्लॉग कैसे अपनी क्या भूमिकाएं तय कर सकते हैं, इस पर विचार भी हुआ. मैंने उन्हें ब्लॉगिंग के मैदान में उतरने के लिए भी न्योता, पर उन्होंने मेरा यह आग्रह हंसकर टाल दिया. कहने लगे, 'अब कौन कि टिर-पिटिर करना शुरू करे यार इस उमर में. कंप्यूटर-लैप्टॉप जैसी चीज़ों के साथ अपनी पटरी बैठ नहीं पाती.' इस पर मैंने उन्हें डॉ. उदय भान मिश्र और श्रीलाल शुक्ल के उदाहरण भी दिए. श्रीलाल जी ने तो इस काम के लिए ही बाकायदा एक टाइपिस्ट रख रखा था. (भाई! श्रीलाल जी को याद करते हुए बार-बार फुरसतिया जी का लिखा एक संस्मरण याद आ रहा है. मौक़ा मिले तो आप भी पढ़ लें. अच्छा लगेगा.) उदय भान जी कंप्यूटर-मोबाइल से खेलने का कुछ काम ख़ुद भी कर लेते हैं. बहरहाल, उस वक़्त तो दूधनाथ जी इस समुंदर में उतरने के लिए तैयार नहीं हुए. आगे की बात आगे.... J 

इसी बीच सिद्धार्थ जी का फोन आया. ‘आपको पता ही होगा, 8 बजे वीसी साहब के यहां चलना है. डिनर पर. आपको, मनीषा जी को और अरविंद जी को भी.’ पता तो नहीं था, लेकिन अब पता चल गया. टाइम कम बचा था. सोचा चलो अब आराम कर लेते हैं. उनका यह भी निर्देश था कि ‘क्या पता अरविंद जी को ध्यान हो या नहीं, तो मैं उन्हें भी रिमाइंड करा दूं.’ लेकिन मुश्किल यह थी कि मेरे पास उनका सेल नंबर नहीं रह गया था और रूम नंबर ख़ुद मालूम नहीं था. वहां मौजूद एक कर्मचारी से पूछा, वह भी नहीं बता सका. बहरहाल, अपन ने मान लिया कि उन्हें पता ही होगा और थोड़ी देर आराम करने चले गए. शाम को ठीक साढ़े सात बजे फिर सिद्धार्थ का फोन आ गया, बतौर रिमाइंडर. मैंने पूछा कि भाई अरविन्द जी का पता नहीं चल सका. उन्होंने अरविंद जी कमरा नंबर बताया. मैं तेजी से तैयार हुआ और अरविंद मिश्र के पास पहुंचा. वह भी तेजी से तैयार हुए और थोड़ी ही देर में हम लोग डॉ. राय के घर की ओर चल पड़े. नागार्जुन सराय के पीछे ही है कुलपति निवास.


एक बात का ज़िक्र छूट गया. बताता चलूं..... विभूतिनारायण राय मेरे प्रिय रचनाकारों में रहे हैं. ख़ासकर ‘शहर में कर्फ्यू’ और ‘किस्सा लोकतंत्र’ पढ़ने के बाद से. ‘एक छात्र नेता का रोज़नामचा’ ने इस लेखक से मेरा लगाव और बढ़ाया था. मन हुआ कि कभी इस शख़्स का इंटरव्यू करूंगा. लेकिन बीच-बीच में राय साहब के बारे में आती रही विभिन्न लोगों की अलग-अलग राय (जिन्हें मैं सही तो नहीं मान सकता था, पर किसी से ख़ुद मिले बग़ैर ग़लत भी कैसे कह सकता था?), ने मेरे विचार को कभी प्रयास के उत्साह में बदलने नहीं दिया. इसका एक कारण शायद मेरे अपने अवचेतन का यह आग्रह भी रहा हो कि इतने लंबे समय तक पुलिस की नौकरी कर चुका कोई शख़्स सहज हो भी कैसे सकता है (?). पर एक ही मुलाक़ात ने सारी धारणाओं और नकारात्मक सोच को ध्वस्त कर दिया. वैसे भी, साहित्य की दुनिया में कैसे-कैसे लोगों द्वारा, किस-किस उद्देश्य से, कैसी-कैसी बातें, कहां-कहां फैलाई जाती हैं ........ किसे बताने की ज़रूरत है. हम लोग उनके घर पहुंचे तो वे स्वयं एक सामान्य सद``गृहस्थ की तरह मेहमाननवाजी के लिए सपत्नीक प्रस्तुत थे.

14 comments:

  1. कठिनता की पगडण्डी के अन्त में पहुँचा राही सहज रह पाये, कठिन होता है।

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  2. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (11-10-2013) को " चिट़ठी मेरे नाम की
    (चर्चा -1395) "
    पर लिंक की गयी है,कृपया पधारे.वहाँ आपका स्वागत है.
    नवरात्रि और विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनायें

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  3. सहजता और सरलता कुलपति जी की सबसे बड़ी मजबूती है।
    देखिए इस रिपोर्ट में उनका एक और सहज, सरल और मजबूत बयान
    http://satyarthmitra.blogspot.in/2013/10/blog-post_8.html

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    1. आपकी यह रपट मैंने कल ही देखी है सिद्धार्थ जी. मुझे तो इसमें उनकी सहजता से भी बड़ी बात लगी साफ़गोई. वह भी बिलकुल सादे और संतुलित ढंग से. किसी का पैरोकार या एजेंडा फ़रमाबरदार बने बग़ैर. वाक़ई यह गुण मिला हुआ नहीं होता, अर्जित करना पड़ता है.

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  4. सच में दूधनाथ जी से मिलकर मैं भी रोमांचित हुआ था।
    चित्र आपको भेज दूँगा।

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    1. दूधनाथ जी हैं बहुत दिलचस्प व्यक्ति संतोष जी. एकदम सादे, ठेठ गंवई मनई. बात व्यवहार से लेकर अपने लेखन तक में.

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  5. अच्छा है ...हम भी जान रहे हैं आपके विचार यूँ संसरण रूप में पढ़कर

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  6. अब क्लाइमैक्स आने वाला है :-)

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  7. मेरी बिगड़ गए स्‍वास्‍थ्‍य ने मुझसे यह मौका भी छीन लिया। पर आपका संस्‍मरण पढ़कर महसूस हुआ कि अपना ही पढ़ रहा हूं।

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