Sunday, 19 August 2012

hai hum kyon na bikey

व्यंग्य
                                                     हाय हम क्यों ऩा बिक़े ?
( दूसरी किश्त )                                                                                     (  हरिशंकर राढ़ी )


''हो सकता है कि आपकी बात ठीक हो, पर ऐसा पहले नहीं था। आजकल पतन थोड़ा ज्यादा ही हो गया है। आज तो लोग-बाग खामखाह ही बिके जा रहे हैं।''
बोधनदास जी कुछ व्यंग्य पर उतर आए। मुझे लक्ष्य करके बोले, ''सरजी, किस जमाने की बात कर रहे हो ? कहाँ से शुरू  करूँ ? किस युग का नाम पहले लूँ ? सतयुग ठीक रहेगा क्या ? आपको मालूम है कि सबसे बड़ा  और सबसे पहले बिकने वाला आदमी कौन था? उसे खरीदा किसने था ?''
अब मैं चुप ! बिलकुल चुप ! ऐसा नहीं था कि मुझे कोई उत्तर नहीं सूझ रहा था; मैं अपने आपको फंसता हुआ महसूस कर रहा था। मैंने नकारात्मक शैली  में सिर हिलाया।
 ''भाई मेरे, मनुष्यों  की बिक्री सतयुग से ही शुरू  है। आप उससे अच्छे जमाने की कल्पना तो कर ही नहीं सकते ! आपको याद है कि सतयुग में अयोध्या के परम प्रतापी राजा हरिश्चंद्र  बिके थे ? बिके क्या नीलाम ही हुए थे। हुए थे या नहीं ?''
इस बार तो जैसे मैं उछल ही पड़ा  । मुझमें जान आ गई। मुझे लगा कि अब प्वाइंट मिल गया है जिसपर मैं इन्हें लथेड  सकता हूँ। मैं उच्च स्वर में बोला, ''क्या बात करते हो अंकलजी, कहाँ राजा भोज और कहाँ गंगुआ तेली ! सत्य हरिश्चंद्र  की तुलना ? कहाँ वे और कहाँ ये आज के टुच्चे ? उन्होंने तो सत्य, धर्म और वचन की रक्षा के लिए पूरे परिवार का बलिदान कर दिया ।''

''तो उनके बिक जाने से कौन सा धर्म स्थापित हो गया ? जिस धर्म के लिए वे बिके थे, उसमें भी छल का ही प्रयोग किया गया था। आज भी लोग धर्म के नाम पर बिक रहे हैं और अपने को पता नहीं क्या-क्या समझ रहे हैं ! लोगों की तो बात छोड़ो, धर्म खुद ही बिक रहा है, सबसे ज्यादा बिक रहा है और वह भी डंके की चोट पर। फिर तुमने यह तो नहीं सोचा कि हरिश्चंद्र को खरीदने वाला कौन था? हरिश्चंद्र  बिकता है तो उसे एक डोम खरीद लेता है जिसे यह भी नहीं पता कि हरिश्चंद्र  की कीमत क्या है? कोई हो-हल्ला या हंगामा नहीं होता। कहानी सुनकर लोग आनन्दित हो लेते हैं, बस। अगर वहीं डोम बिकता और उसे हरिश्चंद्र  खरीद लेते तो यह अलोकतांत्रिक और असामाजिक हो जाता। कितने तो पुतले फूँक दिए गए होते और 'हरिश्चंद्र ' नाम के कितने बेगुनाह पिट गए होते ? हरिश्चंद्र  को खरीदने वाले डोम आज भी मानव बाजार पर कब्जा जमाए बैठे हैं। पहले के हरिश्चंद्र  सत्य के लिए जरूर बिके थे किन्तु एक बार बिकने की परम्परा पड  गई तो पड  गई। पहले  मनुष्य  सत्य के लिए बिका, बाद में अर्थ और काम के लिए। रह गया मोक्ष, उसका तो कोई स्कोप ही नहीं।''

मुझे लगा कि मेरा दाँव खाली गया और बोधनदास जी यह प्रतियोगिता जीत जाएंगे। दरअसल मेरा 'राष्ट्रीय  दर्द' अब एक प्रतियोगिता बन गया था और मैं इसे हारना नहीं चाहता था। मेरे हर नहले पर बोधनदास जी दहला लगाए जा रहे थे और मैं निरुत्तर होता जा रहा था। अब मेरे सामने एक ही रास्ता था कि क्यों न एक बुद्धिजीवी की भांति बाल की खाल निकालकर बात को उलझाया जाए और कम से कम बराबरी या अनिर्णय जैसी स्थिति में मामले को छोड़ा  जाए। बहस जितनी ही उलझे, बुद्धिजीवी उतना ही बड़ा होता है। सो, मैंने कहा,'' देखिए, ये बात अलग है और आपने इसका गलत अर्थ निकाला है। सत्य हरिश्चंद्र  का बिकना गर्व की बात है। ऐसे तो पता नहीं कितने लोग बिके हैं। मीराबाई ने तो कहा कि वे गिरिधर के हाथ बिकी हुई हैं। कबीरदास किसी 'रंगरेजवा' के हाथ बिके थे। कितने क्रान्तिकारी अपने देश  के लिए बिक गए। ऐसे लोगों को यहाँ तुलना में भी खड़ा  करना एक तरह से पाप होगा।''


''देखिए राढ़ी साहब, बाजार पाप और पुण्य के रेट से नहीं चलता। यह तो मुनाफे के दम पर चलता है, अर्थशास्त्र  के सिद्धान्त पर चलता है। हाँ, इधर विज्ञापन के आधार पर भी चलने लगा है। पहले विज्ञापन नहीं था तो केवल मांग और आपूर्ति का नियम चलता था। एक बात और थी कि भाव क्रेता और विक्रेता की हैसियत के आधार पर भी तय होते थे। ग्राहक  विदेशी  हो तो पूछना ही क्या ? कुछ लोग तो विदेशी के हाथों बिकने को सौभाग्य मानते थे। स्वयं को इम्पोर्ट क्वालिटी का समझने लग जाते थे। विदेशी  ग्राहक कीमत ऊँची लगाते थे और माल के साथ-साथ समय की भी कीमत समझते थे। देशी  ग्राहकों की तरह वे भाव गिरने का इन्तजार नहीं करते थे।बल्कि आप यूँ भी कह सकते हैं कि वे गरम भाव का सामान खरीदना पसन्द करते थे। मीर जाफर की ही ले लो। सही समय पर सही ग्राहक के हाथ बिक गया। खुद के साथ-साथ देश को भी बेच दिया कि नहीं ? बस, कीमत सही लग गई थी। अब इतनी ऊँची कीमत कोई देशी डोम तो देने से रहा। आज मीर जाफर का भी नाम इतिहास में अमर है कि नहीं ? नियमतः तो अंगरेज बहादुर को उसके जन्मदिन पर छुट्टी रखनी चाहिए और उसकी जन्मशती  मनानी चाहिए।''


मुझे लगा कि बोधनदास जी भी अब मेरे ही ट्रैक पर आ रहे हैं क्योंकि उनका स्वर व्यंग्यात्मक हो रहा था। मीर जाफर जैसे लोगों की बिक्री से वे भी आहत हैं। अब वे भी मान जाएँगे कि जिस तरह की मण्डी आजकल लग रही है, वह गलत है और इसपर हर देशवासी  को विक्षुब्ध होना ही चाहिए। प्रकारान्तर से यह मेरे पक्ष की जीत है और मैं चाहता भी यही था। परन्तु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ और बोधनदास जी बढ़ते ही गए। आगे उन्होंने जारी रखा, ''और तुम्हें पता है कि यह परम्परा अभी भी जारी है। पहले तो एक ही मीर जाफर था, अब गिनती से परे हैं। कितने ही 'जिम्मेदार नागरिक' सेना और सुरक्षा की गोपनीय जानकारियाँ  मुल्क को देकर उपकृत करते रहे और उपकृत होते रहे, तब तो तुम यह रोना कभी नहीं रोए कि आदमी बिका जा रहा है। दरअसल तुम बिक्री से आहत नहीं हो, तुम तो केवल विक्रयमूल्य से आहत हो। इन 'मीर जाफरों' की कीमत गोपनीय रही इसलिए तुम्हारा ध्यान गया ही नहीं ! आज जब एक खिलाडी  दस करोड  में बिक गया तो यह कीमत तुमसे हजम ही नहीं हुई ! ये तो कम से कम डंके की चोट पर नीलाम हो रहे हैं। मैंने पहले ही याद दिलाया कि दुनिया एक बाजार है और बिकने खरीदने का काम तो यहां चलता रहेगा। रह गई आदमी की बात तो वह तो सबसे बड़ा  बिकाऊ माल है।''

अब मुझे अपनी पराजय बहुत निकट लगने लगी क्योंकि बोधनदास जी के तर्कों की काट मुझे कहीं भी नहीं मिल रही थी। मन ही मन मुझे अपनी गलती महसूस होने लगी थी। फिर भी मैंने मन मारकर आखिरी वार किया, ''अंकलजी, आपने तो थोड़ी  ज्यादा ही फिलॉसफी झाड  दी। माना कि कभी-कभी ऐसी स्थिति आ सकती है कि आदमी को बिकना पड  जाए। मजबूरी की बात अलग है। कई तो अपना पेट भरने के लिए बिकते हैं, कुछ ऐसे हैं जो अपने किसी सगे-सम्बन्धी की दवा-दारू के लिए बिकने को तैयार हो जाते हैं। कुछ मजनूं  टाइप के लोग 'प्यार' पर भी न्योछावर होकर मण्डी में बिकने आ जाते हैं। परन्तु एक अच्छे-खासे, खाते-पीते सुखी इंसान को बिकने की क्या जरूरत है? आपको नहीं लगता कि यह सब नैतिक पतन के कारण हो रहा है? इसके विरुद्ध समाज में आवाज नहीं उठनी चाहिए ?''बोधनदास जी बोले, ''श्रीमान राढ़ी साहब, किसी की जरूरत  निश्चित  करने का अधिकार आपको किसने दिया? बिकने वाले खुद को बेचने की आवश्यकता  समझते हैं, तभी बिकते हैं। हाँ, इतना अवश्य  है कि रेट बिकने वाले की आवश्यकता  के स्तर से ही तय होते हैं। प्रश्न  यह है कि आप स्वयं को किस उद्देश्य  के तहत बेच रहे हैं? यदि आपकी आवश्यकता छोटी और घटिया है तो आपका रेट भी कम लगेगा। यदि आप भूखे हैं और खुद को रोटी के लिए नीलाम कर रहे हैं तो आपकी बोली भी रोटी की ही लगेगी। फिर आपका यह सोचना कि आपका भी भाव दस करोड  हो जाए, नामुमकिन होगा। दवा-दारू के लिए खुद को बेच रहे हैं तो कीमत भी उसी हिसाब से तय होगी। अगर आप एक सुखी, वैभव शाली  या फाइव स्टार जीवन की कल्पना करके बाजार में खड़े  हैं तो कीमत भी फाइव स्टार की होगी। राढ़ी जी, देह का व्यापार बहुत पुराना है। इसी बाजार में एक देशी , कमसिन किन्तु हिन्दीभाषिणी  नवयौवना का सुगठित शरीर  दस-बीस रुपए में बिकता है क्योंकि वह रोटी का लक्ष्य लेकर पैदा होती है और इतने के लिए ही मण्डी में आती है; वहीं एक अर्धनग्न, बुढि या सी अंगरेजीभाषिणी  रुपए में नहीं डॉलरों में बिकती है। उसकी आवश्यकता रोटी से कहीं ऊपर उठ चुकी है। उसे आत्मज्ञान हो चुका है, यानी वह अपने शरीर  और बाजार की कीमत जानती है। अब आप स्वर्णबाजार छोड कर शाक बाज़ार  में घूमेंगे तो आपकी कीमत तो शाक -भाजी की ही लगेगी न?

 ''फिर आज के बाजार में माल से ज्यादा रैपर की कीमत है। इस सत्य को जो नहीं पहचानेगा, वह रोटी के भाव ही बिकेगा। हिन्दी रैपर की चीज सस्ती बिकती है। इसके ग्राहकों की क्रय क्षमता और भावग्राह्यता ही कम होती है। वही शरीर अंगरेजी रैपर में लपेट दिया जाए तो फाइव स्टार श्रेणी का हो जाता है और कई बार तो एक्सपोर्ट क्वालिटी का भी हो जाता है। अंतर्राष्ट्रीय  बाजार का भाव तो तुम्हें पता ही है। यह भी जानते ही होगे कि क्रिकेट का रैपर कितना शानदार  है। अब तुम हॉकी या कबड्‌डी को ले लो। रैपर देशी  है, ये रोटी के भाव भी नहीं बिकेंगे। हाँ, हम लोग किसी भाव नहीं बिक सके क्योंकि हम डिस्प्ले पर थे ही नहीं, स्वयं को कभी माल समझे ही नहीं। अब तो बस बाजार देखते जाओ और इसे एक मनोरंजन मानते रहो।''
मैं जैसे जमीन पर आ चुका था। आँखों के सामने वे सारे दृश्य घूम गए जब मैं बिक सकता था। बोधनदास एक विजयी योद्धा की भांति मुझे व्यर्थ का जीवनदान देकर जा चुके थे और मेरे मन में समस्त प्रश्नों  का एकमात्र निचोड़ घूम रहा था- हाय, हम क्यों ना बिके ?



Wednesday, 8 August 2012

hai hum kyon na bikey

व्यंग्य                      

                   हाय, हम क्यों न बिके ?

                                                                 - हरिशंकर  राढ़ी

(यह व्यंग्य 'समकालीन अभिव्यक्ति' के जनवरी-मार्च २०१२ अंक में 'वक्रोक्ति' स्तम्भ के अंतर्गत प्रकाशित   हुआ था।)
 
मैं शाम  की चाय का सुख लेने ही जा रहा था कि बोधनदास पधार गए। वे मेरे अज़ीज़  और अजीब पडोसी  हैं और अक्सर पधारते ही रहते हैं। आप एक सरकारी महकमे से सेवानिवृत्त हो चुके हैं, इसलिए दुनिया का सर्वोत्तम व्यावहारिक ज्ञान रखते हैं। ऐसे समय पर आते हैं कि चाय भी मिल जाए और समय भी कट जाए। इसके बदले वे अपना उपदेश  रूपी ट्यूशन पढ़ा  जाते हैं, ऐसा माना जा सकता है। मेरा भभका हुआ किन्तु निराश  सा चेहरा देखकर वे अपने कर्तव्यपथ पर आ डटे। शायद उन्हें एहसास हो गया कि कोई जोर का झटका लगा है। 

बोधनदास जी बिना किसी औपचारिकता के सामने वाली कुर्सी को सुविधानुसार व्यवस्थित करके जम गए। छूटते ही बोले,'' भाई क्या बात है? बेवक्त ही चेहरे पर बारह क्यों बज रहे हैं ? क्या हो गया ? घर में सब ठीक तो है ?'' मन में आया कि कह दूँ कि आप जैसे लोगों ने ही तो देश  का बेडा गर्क कर रखा है ! 'घर' से बाहर न निकलने की तो जैसे कसम ही खा ली है। सारा जीवन अपने और अपने घर के बारे में ही तो सोचते रहे। घर के बाहर तो मानो कोई दुनिया ही नहीं। फिर भी मैं प्रतिक्रियाशून्य  रहा। मेरी भाव शून्य  स्थिति से मेरा भाव  बढ़ा । इस बार उन्होंने वॉल्यूम बढाया , ''अरे भाई राढ़ी साहब, बात क्या हुई? कुछ बताओ तो सही ! कोई विशेष  घटना तो नहीं हो गई ?''

 ''अरे होना क्या था ? टीवी देखा आपने आज ? जानते हैं क्या हुआ, वो अपना ढिमाके बल्लेबाज पूरे दस करोड  में बिका है आज आइ.पी.एल.में ! पूरे दस करोड .....! क्या हाल बना रखा है इस देश  का ? रोटी-दाल, नून-तेल और यहाँ तक कि पानी का बिकना भी मान लिया; पर अब आदमी भी बिकने लगा यहाँ !'' मैं जैसे बिफर गया ।

बोधनदास जी हल्का सा मुस्कराए, जैसे कितने बड़े सुलझे हुए सूफी-संत या महात्मा हों। मेरे प्रश्न  एवं मेरी बेचैनी में उन्हें कोई दम ही नहीं दिखा। सारी समस्या जैसे उपेक्षित करते हुए बोले, ''बै यार, यह भी कोई बात हुई ? ये सब तो चलता ही रहता है। मैंने पहली बार किसी को टीवी की खबर देखकर इतना दुखी होते देखा है। मैं तो यही मानता था कि टीवी-सीवी का कोई असर ही नहीं होता। अब चाय-साय मंगाओ और कहीं घूमकर आते हैं।'' चिढ़ा  तो मैं पहले से ही था, अब और चिढ  लग गई। कोई है ही नहीं इस  देश में जो  देश के बारे में, गरीबों के बारे में, यहाँ की असमानता और उलटे अर्थशास्त्र  के बारे में सोचे ! गरीब का घर जले और गुंडे हाथ सेंकें । 
 
''आपको पता भी है कि कितनी-कितनी बोली लगी है आज ? खिलाड़ी  ऐसे नीलाम हो रहे थे जैसे कोई प्लॉट हों या फिर कोई जानवर। ना जाने क्या होगा इस  देश का ? आप पर तो कोई फर्क ही नहीं पड ता !'' मैंने उन्हें खा जाने वाली नजर से देखा।

अब वे गंभीर हो गए। बोले, ''तो तुम्हें क्या लगता है कि यहाँ आदमी आज पहली बार बिका है ? इससे पहले आदमी यहाँ बिकता ही नहीं था ? आज टीवी पर दिख गया तो तुम्हें भी पता लग गया, वरना तुमने यह मान लिया था कि ऐसा यहाँ कुछ होता ही नहीं था? आदमी बिका कब नहीं है ?''

इस बीच धर्मपत्नी चाय दे गई। दोनों ने शांतभाव  से चाय सुड़की, शायद  यह सोचते हुए कि अगला हमला कैसे करना है और हमले का जवाब कैसे देना है। अब गेंद मेरे पाले में थी। चाय के दौरान बोधनदास के जवाब से मेरी अकल भी कुछ ठिकाने आ चुकी थी। पर हारना मैं भी नहीं चाहता था, इसलिए एक बुद्धिजीवी की भांति तर्कशास्त्र  पर उतर आना जरूरी हो गया था। बोधनदास की बात में कुछ वजन था क्योंकि हर न समझ में आने वाली बात में कुछ वजन माना जाता है। मुझे लगा कि उनकी बात  थोड़ी -बहुत तो मान ही लेनी चाहिए। अब मैं कोई वकील तो हूँ नहीं कि दूसरे की बात मानी तो अपनी जाति धर्म और पेशे  से गया ! सो बोला, ''भाई, बात तो आपकी सौ फीसदी सही है, पर इस बार तो हद ही हो गई ! एक बन्दा अपने ठुक्क-ठाँय के खेल के लिए पूरे दस करोड  पा रहा है और एक है कि खुद को बेचकर नून-तेल-लकड़ी  जुटाने को तैयार है पर कोई ग्राहक ही नहीं है। क्या नीलामी हो रही है ! एक-एक खिलाडी  बिका जा रहा है। अंगरेज कट लोग बोली लगाए जा रहे हैं। कोई दस करोड  में तो कोई पाँच करोड  में। गोया मण्डी लग रही हो और आदमी आदमी न होकर ढोर-ढंगर हो। जो ज्यादा ऊँची बोली लगाए, हाँक ले जाए। दूसरी तरफ देखिए तो एक आबादी इतनी बड़ी  है जो सचमुच में ढोर-ढंगर की तरह ही जी रही है।''

बोधनदास जी पुनः मंद-मंद मुस्कराते हुए या यों कहें कि मेरे ऊपर कुछ दया सी दिखाते हुए बोले, ''भाई, इसमें इतना इमोशनल  होने या क्रान्तिकारी होने की कोई आवश्यकता  मुझे तो दिखती नहीं। किसने कहा गरीबों को पैदा होने के लिए? और पैदा भी होना था तो यही एक  देश मिला था? अब पैदा हुए तो भुगतो ! खिलाड़ी ऊँची कीमत पर बिक रहे हैं तो तुम्हें किस बात की जलन ? जब यही खिलाडी  मैच जीतते हैं तो तुम भी बादशाह  बन जाते हो। तब तो ऐसा लगता है कि पटाखे और मिठाइयाँ फ्री के आ रहे हैं। उस दिन तो तुम दिहाड़ी  भी छोड  देते हो। पडोसी  मर भी गया हो तो उसके  लिए शमशान  तक नहीं जा सकते और मैच चल रहा हो तो सी.एल.- ई.एल.सब ले डालते हो। जब भाव बढाया  है तो बन्दा तो बिकेगा ही। यही क्या कम है कि कोई तो ऊँची कीमत पर बिका ! वरना यहाँ आदमी की कीमत है ही कितनी? जहां तक बिकने की बात है, तो बिकना कौन  नहीं चाहता है? ग्राहक ही न मिले तो खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे!''
 
मुझे लगा कि बोधनदास जी के भी मर्म पर चोट लगी है। बिकना चाहते रहे होंगे पर बिके नहीं होंगे, सो सारा गुबार आज निकाल दे रहे हैं । सरकारी मुलाजिम वैसे ही रहे हैं; क्या भरोसा ? मैं पूरी तरह सहमत नहीं हुआ उनके तर्क से। गुस्सा भी आया किन्तु गुस्से को हलक से नीचे उतार कर वितृष्णा  के स्वर में बोला, ''नहीं साहब, ऐसा नहीं है। हर आदमी बिकने वाला नहीं है। मैं बड़ों  की बात तो नहीं जानता, पर जिन्हें आप गरीब कह रहे हैं वे तो कतई नहीं बिकते। एक वे ही तो हैं जिनके अन्दर आत्मा बची हुई है और जो भगवान से डरते हैं। वैसे भी इस  देश में ऐसे-ऐसे महान लोग हुए हैं जिन्हें दुनिया की कोई ताकत नहीं हिला सकी है। धन की क्या बिसात है जो उन्हें खरीद ले?''

इस बार भी बोधनदास जी ने पूर्व की भांति ही मेरे ऊपर तरस खाने का भाव बनाया। स्वर में थोड़ा दर्द डाला और बोले, ''अरे भाई राढ़ी , तुम रहते किस दुनिया में हो ? बिकना कौन नहीं चाह रहा और बिकने का आत्मा से क्या लेना-देना ? ये तो सारी दुनिया ही एक बाजार है, मेला है; ऐसा संतों ने कहा है। आज के सत्संगी संतजन भी यही कह रहे हैं। जब उन्हें दुनिया बाजार नजर आती है तो तुम कौन हो संदेह खड़ा  करने वाले ? भाई मेरे, जहाँ जिन्दगी और मौत सरेआम बिकती है वहाँ आदमी बिक गया तो कौन सी आफत आ गई ? लोग तो यहाँ देश  सहित बिकने को तैयार हैं, बस अवसर और ग्राहक चाहिए ।''
(शेष अगली किश्त  में ......)