Wednesday, 25 April 2012

एक सवाल

प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति बनाना व्यक्तिगत मामला है. जज बनाना सार्वजनिक मामला कैसे हो सकता है? कृपया संदर्भ-प्रसंग रहित व्याख्या करें.

Tuesday, 24 April 2012

बाइट, प्लीज ( उपन्यास, भाग-4)


(जस्टिस काटजू को समर्पित, जो पत्रकारिता में व्याप्त अव्यवस्था पर लगातार चीख रहे हैं...)
8.
राष्ट्रीय स्तर पर संचालित ज्यादातर इलेक्ट्रानिक मीडिया कारपोरेट कल्चर में ढली हुई थी, सकेंद्रित पूंजी व्यवस्थित तरीके से इनके नसों में प्रवाहित हो रही थी। इस पूंजी के अनुकूल व्यवहार करने वाले मीडियार्मियों के हाथ में आभासी तौर पर इलेक्ट्रानिक मीडिया की लगाम थी, लेकिन हकीकत में ये लोग खुद अदृश्य इशारों पर थिरकते हुये उनके ज्ञात अज्ञात हितों को साधकर अपने व्यक्तित्व को उड़ान देते हुये उन सहूलियतों को हासिल करने की कोशिश कर रहे थे जिनसे जिंदगी आसान बनती है। राष्ट्रीय इलेक्ट्रानिक मीडिया में लगी पूंजी का माई-बाप सीधे तौर पर दिखाई नही देता था, क्योंकि सबकुछ कारपोरटे के सांचे में ढला हुआ था। अपनी हैसियत से आगे निकलकर कुछ पत्रकारों ने शेयर होल्डर के रूप में मालिकान का दर्जा तो हासिल कर लिया था, लेकिन कारपोरेट के स्थापित रास्तों से इतर जाने की कुव्वत उनमें भी नहीं थी। उत्पादों की तमाम कड़ियां एक- दूसरे से बुरी तरह से गुथकर छद्म रूप में राष्ट्रीय इलेक्ट्रानिक मीडिया में ऊपर के ओहदे पर बैठे लोगों को नियंत्रित और निर्देशित कर रही थी। संसद में तोलमोल करके भारत को नवउदारवाद के रास्ते पर बहुत पहले ही ढकेल दिया गया था और राष्ट्रीय मीडिया को कारपोरेट की निगरानी में नव उदारवाद के रास्ते में आने वाली अड़चनों को दूर करने के काम में झोंक दिया गया था। 
राष्ट्रीय मीडिया से इतर देश के अन्य सूबों में ज्यादातर इलेक्ट्रानिक मीडिया संगठित कारपोरेट पूंजी से मुक्त थी। नव उदारवाद की गंगोत्री से निकले अमीरजादे और नये तौर तरीकों में ढले पुराने सामंतों ने इसकी लगाम थाम ली थी। कई तरह के धंधों से स्थानीय स्तर पर बटोरी गई पूंजी का इस्तेमाल ये लोग मीडिया में करते हुये न सिर्फ अपने धंधों को सुरक्षित करने की कोशिश कर रहे थे, बल्कि स्थानीय स्तर पर अपने रसूख में इजाफा भी कर रहे थे। पारंपरिक सामंती पृष्ठभूमि से उठकर मीडिया के धंधे में हाथ डालने वाला सामंतो और अर्द्ध सामंतों का यह कौम अपने साथ पारंपरिक रीति-रिवाजों को कायम किये हुये था। टूटे-फूटे तौर पर कारपोरेट के स्थापित मानकों को अपनाते हुये ये लोग सामंती मनोवृति के वाहक थे। गालिब एक ढूंढो हजार मिलेंगे की तर्ज पर बड़ी संख्या में अधकचरे पत्रकार ऐसे सामंतो को सजदा करने के लिए हर वक्त तैयार रहते थे। सामंतों का यही कौम स्थानीय स्तर पर मीडिया कर्मियों का माई-बाप बना हुआ था। अपने स्थापित धंधों को ओट देने के लिए अब रत्नेश्रर सिंह भी बिहार में मीडियाकर्मियों के माई-बाप की भूमिका में आ रहे थे।                   
सूरज ढलने के करीब दो घंटे बाद चमचमाती हुई लाल और सफेद रंग के पजरो कार में रत्नेश्वर सिंह का आगमन हुआ। एक रईस की सारी अदा उनमें थी। सलीके से सजे बाल, करीने से कटी मूंछे, चमकते काले जूतों के साथ सफेद रंग की कमीज और और सफेद रंग का ही  हाफ शर्ट, कलाई पर चमकती टायटन की घड़ी, सोने की अंगूठियों में ग्रहों और नक्षत्रों को नियंत्रति करने के लिए जड़े हुये बेशकीमती पत्थरों से सजी उंगलियां और साथ में खुश्बूदार परफ्यूम की धमक, सबकुछ एक उम्दा रईस का अहसास करता था।  
माहुल वीर और रंजन के साथ मिलकर नरेंद्र श्रीवास्तव ने आगे बढ़कर जोरदार तरीके से उनका इस्तकबाल किया। दफ्तर के अंदर जगह कम होने की वजह से गेट-टुगेदर की सारी व्यवस्था गार्डेन में ही की गई थी। गार्डेन में लगी कुर्सियों पर सभी लोग बैठ गये।
मीडियाकर्मियों की खुद की पहचान तेजी गुम होती जा रही है, अब पत्रकार अपने नाम के बजाये संस्थान के नाम से जाने जाते हैं। अपनी ब्रांडिंग करते हुये मीडिया संस्थाओं ने पत्रकारों के नामों को पीछे धकेल दिया है। एक-एक करके सभी लोगों ने अपना परिचय देना शुरु किया, आमतौर पर लोग अपना नाम व उस स्थान का जिक्र कर रहे थे जहां के वे रहने वाले थे। साथ ही उन मीडिया हाउसों की भी जानकारी दे रहे थे जहां वे काम कर चुके थे या अभी काम कर रहे थे। 
परिचय का दौर खत्म होने के बाद रत्नेश्वर सिंह ने सीधे तौर पर सभी लोगों से मुखातिब होते हुये कहा,-
उम्मीद है कि आप सभी लोग मन लगा कर काम करेंगे, पैसों की चिंता आप बिल्कुल न करें। सब को समय पर पैसे मिलेगा और जो बेहतर काम करेंगे उन्हें पुरस्कार भी मिलेगा। किसी तरह की परेशानी आपको नहीं होने दी जाएगी। आप सिर्फ काम पर ध्यान दिजीये, तीन साल तक तो कुछ सोचना ही नहीं है। इस बीच किसी तरह की कोई भी समस्या हो तो आप सीधे मुझसे बात कर सकते हैं।
रत्नेश्वर सिंह की बातें सुनकर वह मौजूद तमाम लोगों को यह यकीन हो चला था कि उनकी गठरी में पैसे हैं और वह इस चैनल को बेहतर तरीके से चला पाएंगे। क्षेत्रीय मीडिया में लंबे समय चैनल बदलने के बाद मालिकान को देखने और उनसे बात करते ही वे लोग समझ जाते थे कि वह कितनी दूरी तय करने वाला घोड़ा है।
जिलों से आने वाले रंगरुटों का जोश खासतौर पर कुछ और बढ़ गया था, वैसे मन के किसी कोने में शंका भी हो रहा था।  एक जिले के प्रतिनिधि ने रत्नेश्रर सिंह से कहा-
शुरु-शुरु में तो सबकुछ ठीक चलता है, लेकिन बाद में प्रोब्ल्म होने लगता है। बातें छुपाई जाई हैं। हमलोग चाहेंगे अच्छा या बुरा कुछ भी हो, हमें कभी अंधकार में न रखा जाये। जहां तक खबरों का संबंध है मैं यकीन दिलाता हूं कि मेरे जिले से एक भी खबर नहीं छूटेगी, अन्य चैनलों के मुकाबले हम हमेशा आगे रहेंगे।
उस प्रतिनिधि की इस बात पर तालियों की एक जोरदार गड़गड़हट गूंज उठी। वहां मौजूद सभी लोगों के दिलों में उत्साह की एक लहर दौड़ रही थी। इस उत्साह में इजाफा करते हुये नरेंद्र श्रीवास्तव ने खबर न्यूज डाट काम को लांच करने की घोषणा की। खबर न्यूज डाट को चलाने की जिम्मेदारी सुयश मिश्रा को सौंपी गई थी। सुयश मिश्रा कोलकाता के उसी अखबार से आया था जिस अखबार के मुज्जफरपुर संस्कर में नरेंद्र श्रीवास्तव संपादक रह चुके थे।
नरेंद्र श्रीवास्तव के कहने पर  सुयश मिश्रा खबर न्यूज चैनल में आने के लिए तैयार हो गया था। यहां पर उसे न्यूज एडिटर का पद दिया गया था,  फिलहाल चैनल शुरु नहीं हुआ था, जिसकी वजह से उसे खबर न्यूज डाट काम की जिम्मेदारी दे दी गई थी। सुयश मिश्रा ने अपना लैपटाप खोलकर रत्नेश्वर सिंह के सामने रख दिया। सुयश मिश्रा के कहने पर रत्नेश्वर सिंह ने कुछ आइकान पर क्लिक किया और फिर जैसे ही खबर न्यूज डाट काम का पेज खुला, एक बार फिर तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा गार्डेन गूंज उठा। इस मौके पर वृद्ध मकान मालिक भी मौजूद था। रत्ननेश्वर सिंह ने वहां मौजूद लोगों से रू ब रू होने के लिए आमंत्रित किया। वहां व्याप्त उत्साह को देखकर वह भी उत्साहित था। लोगों को संबोधित करते हुये उसने कहा, आप सभी पढ़े लिखे लोग हैं। पत्रकारों के कौम पर समाज की बहुत बड़ी जिम्मेदारी होती है। सरकार और जनता के बीच में आप पुल का काम करते हैं। आप सभी लोगों के लिए मैं अपनी शुभकामनाएं देता हूं। इस मकान में काम करते हुये आपको मेरी ओर से कोई समस्या नहीं आएगी।
मकान मालिक के संबोधन के बाद रत्नेश्वर सिंह ने सभी लोगों को खाने पर आमंत्रित किया। मकान के दूसरे हिस्से में बने रास्ते पर खाने का काउंटर सज चुका था। लोग बारी-बारी से लाइन में लग कर अपना प्लेट भरकर साइड हो रहे थे।
अपना प्लेट भरने के दौरान नीलेश की आंखों में पांच साल पहले का 15 अगस्त का दिन घूम रहा था। एक राष्ट्रीय अखबार द्वारा लांच किये जा रहे एक चैनल के कार्यक्रम में उस दिन वह मौजूद था। इस मौके पर अखबार के सभी बड़े और छोटे ओहदेदार मौजूद थे। इस मौके पर चैनल हेड का ओहदा संभालने वाले अविजीत साही ने अपने खास अंदाज में कहा था, इलेक्ट्रानिक मीडिया में काम करने वाले लोगों की समझ अखबारों में काम करने वाले लोगों की समझ से कम होती है। इलेक्ट्रानिक मीडिया में शोर अधिक है, जबकि प्रिंट मीडिया में लोग गंभीरता से काम करते हैं। ऐसे में प्रिंट मीडिया के लोगों के सामने मेरा कुछ भी बोलना उचित नहीं होगा। इलेक्ट्रानिक मीडिया में तो बस भेड़ों की भीड़ होती है। रिपोटरों का सारा समय बाइट के लिए मारा मारी करने में ही निकल जाता है। मैं पूरी कोशिश करूंगा कि जिस तरह से यह अखबार नंबर वन है, उसी तरह से इस अखबार से जुड़ा चैनल भी नंबर वन बने। अविजित साही के इस कथन के आधार पर नीलेश वहां मौजूद लोगों की मानसिकता को समझने की कोशिश कर रहा था। क्या वाकई में इन लोगों में बिहार की मीडिया को एक नई दिशा देने की कुव्वत है, यहां पर कितने लोग हैं जिन्होंने प्रिंट मीडिया में कलम घिसा हो ? हालांकि वहां मौजूद लोगों के उत्साह को देखकर उसे लग रहा था जो कुछ भी हो रहा है बेहतर ही हो रहा है। मीडिया में लोगों को तरासने का काम तो निरंतर चलने वाली एक प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया से गुजर कर इनमें से कुछ बेहतर पत्रकार जरूर निकलेंगे।     
खाने के बाद एक दूसरे से विदा लेते हुये लोगों की आंखों में आत्मविश्वास के साथ कुछ कर गुजरने की चमक स्पष्ट रूप से देखी जा सकती थी।
9.                    
खबर न्यूज के दफ्तर में गेट-टुगेदर पार्टी को हुये दस दिन से ऊपर हो गये थे। अब तक नीलेश को दफ्तर की ओर से न तो नियुक्ति पत्र ही मिला था और न ही कोई फोन आया था। इस बीच सुकेश से फोन पर कई बार बात हो चुकी थी। सुकेश ने उसे बताया था कि जिस राष्ट्रीय चैनल के साथ खबर न्यूज का टाईअप हो रहा था वह टूट गया है। अब एक नये चैनल वाक्स इंडिया का लाइसेंस पर नये सिरे से इसे लाने की कवायद हो रही है। अब चैनल का नाम कंट्री लाइव होगा, खबर न्यूज नहीं। इसका हेड क्वार्टर रांची में होगा, पटना में सिर्फ ब्यूरो आफिस ही रहेगा। यही वजह है कि हमलोगों को अभी तक नियुक्ति पत्र नहीं मिला है, हालांकि जिलों से रिपोटरों को नियुक्त कर लिया गया। ये सारा डेवलपमेंट माहुल वीर के दिल्ली जाने के बाद हुआ है। चैनल के सभी दिग्गज अभी दिल्ली में ही हैं। दो दिन बाद सब रांची पहुचेंगे। पिछले कुछ दिनों से कंट्री लाइव का दो ओबी पटना की सड़कों पर घूम रहा है। माहुल वीर से लगातार संपर्क बना हुआ है। आगे जैसा वह कहेंगे वैसा किया जाएगा। यदि वाक्स इंडिया के साथ बात बन गई तो यह चैनल जल्द लांच हो जाएगा।
वाक्स इंडिया टीवी का आगाज दिल्ली में शानदार तरीके से हुआ था। इन्फ्रास्ट्रक्चर के लेवल पर कई बड़े मीडिया हाउसों का यह कान काट रहा था। देश में पत्रकारिता जगत के कई बड़े नाम तेजी से इससे जुड़े थे। कई बड़े पत्रकारों ने ज्वाइन कर लिया था और कई ज्वाइन करने की कतार में थे। शुरुआती दौर में ही ऊंचे ओहदों पर उठा पटक शुरु हो गई थी। एक राष्ट्रीय अखबार के संपादक ने पहले चैनल हेड के तौर पर इसे ज्वाइन किया और फिर कुछ दिन के बाद ही संस्थान से बाहर हो गये। इसे लेकर परस्पर विरोधी खबरें उड़ती रही। एक ओर यह प्रचारित हो रहा था कि वह वाक्स न्यूज टीवी के लिए सफेद हाथी साबित हो रहे थे, खुद तो मोटी सैलरी ले ही रहे थे साथ में अपने लोगों की ताबड़तोड़ भरती करवा कर उन्हें भी मोटी सैलरी दिलवा रहे थे। दूसरी ओर यह कहा जा रहा था कि मालिकानों के अत्यधिक हस्तक्षेप की वजह से वह इस संस्थान में अपने आप को सहज महसूस नहीं कर रहे थे। मामला चाहे जो हो, एक बार इस हाउस में लोगों के आने-जाने का सिलसिला जारी हुआ तो बस चलता ही रहा। साल भर के अंदर ही यह चैनल तेजी से ढलान की ओर बढ़ता चला गया। स्थिति इतनी खराब हो गई कि यहां काम करने वाले लोगों को तीन-तीन महीने तक का वेतन बकाया रहने लगा। इस बीच इस चैनल पर अधिकार को लेकर भी इसके पार्टनरों में मतभेद शुरु हो गया और मामला कोर्ट तक पहुंच गया। इधर चैनल के कर्मचारी आलिशान दफ्तर के अंदर नारेबाजी करते रहे, उधर चैनल पर मालिकाना हक को लेकर पार्टनरों के वकील कोर्ट में जिरह करते रहे। अंतत:  चैनल में ताला लटक गया।
अपने संबंधों का पेशवराना इस्तेमाल करते हुये माहुल वीर  इस चैनल पर मालिकाना दावेदारी करने वाले एक पार्टनर से साल में एक मुश्त रकम की एवज में लाइसेंस हासिल करने में कामयाब हो गया  और इसके साथ ही अस्तित्व में आने से पहले ही खबर न्यूज चैनल का गर्भपात हो गया। खबर न्यूज को फ्रेन्चाइची के आधार पर लाने की तैयारी थी। नरेंद्र श्रीवास्त की अगुवाई में दिल्ली स्थित महावीर टीवी के साथ मोटी रकम का लेन-देन भी हो गया था, लेकिन माहुल वीर अंत समय में रत्नेश्वर सिंह को यह समझाने में सफल हो गया कि महावीर चैनल के साथ तालमेल उनके लिए घाटे का सौदा साबित होने वाला है।
वाक्स न्यूज चैनल के साथ सांठ-गांठ के बाद कंट्री लाइव का प्रादुभाव हुआ। आधे-अधूरे मन से नरेंद्र श्रीवास्तव ने भी इस पर अपनी सहमति दे दी। खबर न्यूज चैनल का लोगो कंट्री लाइव में तब्दील हो गया और माहुल वीर का कद मालिकान रत्नेश्वर सिंह की नजर में कुछ और ऊँचा हो गया।
इस नये एग्रीमेंट में माहुल वीर के साथ रंजन ने भी महत्वपर्ण भूमिका निभाई थी, रत्नेश्वर सिंह की नजर में उसका ग्राफ भी तेजी से बढ़ रहा था, जो माहुल वीर को खटक रहा था।  
माहुल वीर ने नरेंद्र श्रीवास्तव के साथ शराबखोरी करते हुये उन्हें अहसासा कराया कि संस्थान को एक ऐसे व्यक्ति की जरूरत है जिसकी बिहार के प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में गहरी पैठ हो और महेश सिंह का नाम बिहार के ब्यूरो प्रमुख के रूप में सुझाया। उस रात साथ नरेंद्र श्रीवास्तव के लिए शराब बहाने में महेश सिंह ने भी कोई कोताही नहीं बरती। चूंकि महेश सिंह उसी अखबार के पटना संस्करण में क्राइम रिपोटर था, जिस अखबार के मुजफ्फरपुर संस्करण में नरेंद्र श्रीवास्तव स्थानीय संपादक के पद पर रह चुके थे इसलिये महेश सिंह का रास्ता आसानी से साफ हो गया। एक साथ मिलकर की गई शराबखोरी कारगर साबित हुई।
इसके अलावा महेश सिंह के मामले में जातीय फैक्टर भी काम कर रहा था। नरेंद्र श्रीवास्तव और माहुल वीर रत्नेश्वर सिंह को यह संदेश देना चाहते थे कि ब्यूरो हेड के प्रमुख पद पर एक राजपूत व्यक्ति को बैठाया जा रहा है, जिसकी चौतरफा पकड़ है और जो संस्थान के हितों का बेहतर ख्याल रखेगा। इस तरह रत्नेश्वर सिंह के जातीय भावना को तुष्ट करने की नीति भी अंदरखाते काम कर रही थी।   
सामूहिक शराबखोरी के दौरान ही नरेंद्र श्रीवास्तव ने रंजन को ब्यूरो प्रमुख के रूप में महेश सिंह का लेटर तैयार करवाने का हुक्म दिया। इस आदेश से रंजन थोड़ी देर के लिए हक्का-बक्का रह गया, क्योंकि अब तक के परिदृश्य में रंजन और सुयश मिश्रा ही कंट्री लाइव न्यूज चैनल को बिहार से लीड  कर रहे थे। ब्यूरो प्रमुख के रूप में महेश सिंह की इंट्री इन दोनों के लिए परेशानी खड़ी करने वाली थी। ब्यूरो प्रमुख के रूप में एक नये पद का सृजन करके स्पष्टतौर पर इनके अधिकारों में कटौती तो हो ही रही थी, संस्थान के अंदर शक्ति के एक नये केंद्र का भी गठन किया जा रहा था। बिहार के तमाम स्टाफों में महेश सिंह की सैलरी सबसे अधिक रखी गयी। रंजन और सुयश मिश्रा की पूरी कोशिश यही थी कि किसी भी कीमत पर महेश सिंह की इंट्री रुक जाये। इसके लिए उन्होंने हर संभव उपाय किया, यहां तक कि लेटर निकलवाने में देर करते रहे। नरेंद्र श्रीवास्तव ने जब बार-बार रंजन से लेटर निकालने को कहा तो अंत में लेटर पर बिहार ब्यूरो प्रमुख की जगह पटना ब्यूरो हेड लिखकर लेटर निकाल दिया।              
इधर खबर न्यूज से कंट्री लाइव बनने की प्रक्रिया में रत्नेश्वर सिंह अच्छी खासी राशि पुराने एग्रीमेंटे में फंस गई। चूंकि चैनल को बिहार इलेक्शन 2010 के पहले लांच करने की जल्दी थी और महावीर चैनल ने यह वादा किया था कि उसके इक्यूपमेंट का इस्तेमाल कंट्री लाइव कर सकता है और समय के साथ बाकी बचे पैसों को वह वापस कर देगा इसलिये रत्नेश्वर सिंह भी नये एग्रीमेंट के पक्ष में खड़े थे।
बहरहाल, शुरुआती दौर में तमाम उठा पटक के बीच नीलेश और सुकेश को कंट्री लाइव में जगह नहीं मिली और दोनों इस बात को लेकर चिंचित थे।
कंट्री लाइव में महेश सिंह की इंट्री के कुछ दिन बाद रंजन ने  सुकेश को फोन किया और कहा कि हो सके तो एक बार रांची जाकर माहुल वीर से मिल ले। चूंकि पटना में अब कोई जगह नहीं है और अब हेड आफिस रांची में ही बनने वाला है। ऐसे में बेहतर होगा कि वह रांची जाकर माहुल से बात करके रांची में ही ज्वाइन कर ले। बाद में पटना में उसका आसानी से तबादला हो जाएगा। कमोबेश यही बात उसने नीलेश को भी कहा। सुकेश और नीलेश ने आपस में बात करने के बाद फैसला किया कि जितना जल्दी हो सके दोनों को रांची निकल जाना चाहिये। लेकिन रांची निकलने से पहले माहुल वीर से बात करना जरूरी था। जब सुकेश ने माहुल वीर को फोन लगाया तो उधर से भी रांची आने के लिए हरी झंडी मिल गई। फिर दोनों एक साथ रांची निकलने की तैयारी करने लगे।
जारी.....
                                                                   

Tuesday, 10 April 2012

बाइट, प्लीज (उपन्यास, भाग -3)

(जस्टिस काटजू को समर्पित, जो पत्रकारिता में व्याप्त अव्यवस्था पर लगातार चीख रहे हैं...)

6.

नीलेश को गेस्ट हाउस पहुंचने में करीब 40 मिनट लग गये। यहां रूट पर आटो चलती थी। एक साथ आठ दस सवारी आटो में बैठते थे। यहां तक कि अगली सीट पर भी चार-चार सवारी बैठते थे। गर्दनीबाग के पास नया ओवरब्रीज बनने के बाद तमाम आटो वहीं से होकर गुजरते थे, चितकोहड़ापुल से इक्का दुक्का ओटो ही जाता था। अलीनगर के पास आटो के इंतजार में ही पंद्रह मिनट निकल गये। बड़ी मुश्किल से एक आटो में उसे आगे की सीट मिली जिस पर पहले से ही तीन लोग सवार थे। ओटो में सवार होते वक्त उसे दिल्ली के आटो की कमी खल रही थी। वहां तो बस आटो में बैठो ओर मीटर चालू करवाओ और जहां जाना है सहजता से पहुंच जाओ। लेकिन यहां मामला दूसरा था। चितकोहड़ापुर पार करने के बाद एयरपोर्ट वाले रोड पर उसे काफी देर तक इंतजार करने के पश्चात पता चला कि इस रूट में ओटो नहीं चलता है। बड़ी मुश्किल से एक मोटरसाइकिल वाले से लिफ्ट लेकर वह गेस्ट हाउस पहुंचा। गेस्ट हाउस में एक बड़ी सी जीप लगी हुई थी जिसपर प्रेस लिखा हुआ था। जीप को देखते ही नीलेश समझ गया कि सभी लोग इसी गेस्ट हाउस में मौजूद हैं। पूछने पर गेस्ट हाउस के गार्ड ने उसे माहुल वीर के कमरे तक पहुंचा दिया।

कमरा में दाखिल होते ही उसकी नजर सुकेश विद्वान पर पड़ी, जो एक सोफे पर आराम से बैठा हुआ था। कमरे में दो लोग और मौजूद थे। एक की लंबाई कुछ कम थी और उसके बाल और दाढ़ियों में से सफेदी झलक रही थी, जबकि दूसरा कुछ मोटा-ताजा था और पूरी तरह से क्लीन सेव था। माहुल वीर कमरे में दिखाई नहीं दे रहा था। नीलेश पर नजर पड़ते ही सुकेश ने कहा, सही समय पर आये हो, तुम्हारा ही इंतजार हो रहा था। माहुल स्नान करके बस निकलने ही वाला है।

यहां की ट्रैफिक बहुत ही होरिबल है, अपने आप को सहज करने की कोशिश करते हुये नीलेश ने कहा और बगल के सोफे पर धंस गया। कुछ देर तक इधर-उधर की बातें होती रही। थोड़ी देर बाद बाथरूम का दरवाजा खुला और गंजी पहने और कमर में तौलिया लपटे माहुल वीर बाहर निकला। उसका पूरा शरीर भींगा हुआ था और उसकी बड़ी-बड़ी आंखें चमक रही थी।

कैसे हो नीलेश? दिल्ली में बहुत क्रांति कर ली। अब बिहार में काम किया जाये, तुम जैसे लोग बिहार में काम करेंगे तो बिहार जरूर बदल जाएगा, सीधे तौर पर नीलेश को संबोधित करते हुये उसने कहा। उसके आवाज में हमेशा एक खनक होती थी, जो इस वक्त भी बरकरार थी। हर स्थिति में वह सहज रहता था और अपने साथ रहने वाले लोगों का विश्वास जल्द ही हासिल कर लेता था। नीलेश उसे एक लंबे अरसे के बाद देख रहा था और यह समझने की कोशिश कर रहा था कि उसमें क्या बदलाव हुआ है। मंडी हाउस में माहुल वीर अक्सर सिगरेट के साथ नजर आता था। एक जलती हुई सिगरेट अमूमन हर वक्त उसकी अंगुलियों में फंसी होती थी। सिगरेट को वह सूटे के अंदाज में पीता था, जैसे कोई अल्हड़ किसान बीड़ी पीता है।

यही सोच कर मैं भी बिहार आया हूं, नीलेश ने जवाब दिया।

आराम से बैठो, मैं जरा पूजा पाठ कर लूं, इतना कहने के बाद माहुल बिछावन पर पालथी मारकर बैठ गया और अपनी आंखें बंद करके किसी मंत्र को धीरे-धीरे बुदबुदाने लगा। चाहे कुछ भी हो जाये सुबह में स्नान करने के बाद माहुल वीर पूजा करना कभी नहीं भूलता था। रात में जमकर शरबाखोरी करने के बावजूद सुबह उसकी शुरुआत पूजा से ही होती थी।

माहुल वीर मंत्र बुदबुदता रहा और सभी लोग खामोश होकर एक-दूसरे को देखते रहे। मंत्र की समाप्ति के बाद उसने अपनी आंखे खोली और नीलेश को उन दो अजनबी लोगों से परिचय करवाया जो सुकेश के अतिरिक्त उस वक्त कमरे में मौजूद थे। अधपके बालों वाले व्यक्ति की ओर इशारा करते हुये उसने कहा, ये हैं रंजन, काफी ऊंची चीज है। अब हमलोगों की टीम में हैं।

नीलेश ने शालिनता के साथ रंजन का अभिवादन किया, प्रत्युत्तर में रंजन ने भी मुस्कराकर अपना सिर हिला दिया। इसके बाद मोटे ताजे व्यक्ति की तरफ मुखातिब होते हुये माहुल ने कहा, ये हैं पियुस मिश्रा, हैदराबाद की एक टीवी में काम कर रहे थे। अब ये भी अपने साथ हैं। मैं कोशिश कर रहा हूं कि एक अच्छी टीम बन जाये। फिर नीलेश की तरफ इशारा करते हुये उन दोनों से बोला, यह नीलेश है, कुछ क्रांतिकारी प्रवृति का है। कभी दिल्ली में इसकी चमक देखते ही बनती थी। हमलोगों ने साथ-साथ काफी वक्त बिताया है। यह भी हमलोगों के साथ जुड़ रहा है। सुकेश तो परिचय का मुहताज है नहीं, इसे तो आप लोग जान ही रहे हैं।

अभी खबर न्यूज चैनल की स्थिति क्या है? ”, नीलेश ने सवाल किया।

एक दो दिन में मीटिंग होने वाली है। लोगों को बहाल करना है, उसके बाद ही कुछ काम शुरु हो पाएगा। अभी तो जिलों में संवाददाता रखे जाएंगे, फिर यहां डेस्क पर लोग चाहिये, रिपोर्टर चाहिये, क्यों रंजन क्या लगता है ये सब कब तक हो जाएगा ?”, रंजन की तरफ देखते हुये माहुल ने पूछा और फिर खुद ही बोल पड़ा, अभी तो नरेंद्र श्रीवास्तव जी दफ्तर में इतंजार कर रहे होंगे। एक सप्ताह के भीतर ये सब हो जाना चाहिये, यह कह कर माहुल उठ खड़ा हुआ और पहले से बिछावन पर रखे हुये अपने कपड़े पहनने लगा। कपड़ा पहनने के दौरान ही उसे सिगरेट की तलब महसूस हुई है और अपनी जेब से सिगरेट के डब्बे को हाथ में लेते हुये उसमें से एक सिगरेट निकालकर नीलेश की ओर बढ़ाया और दूसरे सिगरेट को अपने होठों के बीच दबाकर माचिस की तलाश करने लगा। इस बीच नीलेश की नजर टेबल पर पड़े माचिस पर पड़ी। माचिस में से तिली निकाल कर उसने पहले माहुल की सिगरेट सुलगाई और फिर अपनी। सिगरेट का एक लंबा कश लेने के बाद मुंह से धुआं निकालते हुये उसने माहुल से पूछा, मेरी पोजिशन क्या होगी? ”

रूमाल रख के जो पोस्ट मन करे लूट लेना, चिंता क्यों कर रहे हो, माहुल ने हंसते हुये कहा और झुककर बिना मोजे के ही अपने जूते पहनने लगा।

इसके बाद सब एक साथ कमरे के बाहर निकले। जीप की ड्राइविंग सीट पर बैठते हुये माहुल ने कहा, अब मैं दफ्तर जा रहा हूं। कोशिश करूंगा एक दो दिन में सबकुछ हो जाये।

माहुल से मुलाकात के बाद नीलेश को इस बात की तसल्ली हो गई थी कि इस खबर न्यूज में उसे काम मिल जाएगा। बाद में बातचीत के दौरान सुकेश ने भी यह यकीन दिलाया कि अभी तक सबकुछ योजना के मुताबिक ही चल रहा है, लेकिन इस बात की गारंटी नहीं है कि चैनल कब तक लांच होगा। वैसे कोशिश यही हो रही है कि इलेक्शन के पहले चैनल को लांच कर दिया जाये। इलेक्शन में अच्छी कमाई के आसार हैं और चैनल के मालिक रत्नेश्रर सिंह भी यही चाह रहे हैं कि चुनाव में उनका चैनल दिखने लगे। सुकेश से विदा लेते वक्त नीलेश के शाश्वस्त था।

7.

अखबारों से इतर इलेक्ट्रानिक मीडिया ने पत्रकारिता की इच्छा रखने वाली नई पीढ़ी में एक ललक पैदा की है। दिल्ली से लेकर दूरदराज के कस्बाई इलाकों में हाथ में माइक और कंधे पर कैमरा लेकर पत्रकारों की एक नई फौज नये रंग ढंग मे पसरती जा रही है। जब कहीं कोई नये मीडिया हाउस की शुरुआत होती है तब यह पसरी हुई भीड़ तेलचट्टों की तरह उस मीडिया हाउस के नए दफ्तर पर हल्ला बोल देती है। खबर न्यूज चैनल की चर्चा सूबे के मीडियाकर्मियों के बीच पिछले कई दिनों से हो रह थी, आखिरकार वह दिन भी आ गया जब लोगों को यहां इंटरव्यू के लिए बुलाया गया।

सुबह से ही खबर न्यूज के पटना दफ्तर में लड़कों की भीड़ लगी हुई थी। दूर-दराज के जिलों से इस यकीन के साथ वे पटना आ रहे थे कि राजधानी के एक टीवी चैनल से नाता जोड़ने का मौका मिलेगा और यदि बात बन गई तो अपने जिले में वे एक नई रुतबा के साथ दाखिल होंगे। बांस घाट का वह दफ्तर पत्रकारिता के रंगरुटों से गुलजार था, वैसे हर वक्त फिजां में रहने वाली मुर्दों की महक अभी भी मौजूद थी। जब कोई नई लाश को मशीन पर फेंका जाता था तो उसकी दुर्गन्ध तेजी से अगल-बगल के वातावरण को अपने चपेटे में ले लेती थी। दफ्तर में एक साथ इतने सारे लोगों की उपस्थिति की वजह से आज दुर्गन्ध की तीव्रता कुछ कम महसूस हो रही थी।

दफ्तर में कुछ लोगों का बायोडाटा पहले से उपलब्ध था और कुछ अपने साथ लेकर आये थे। काम को लेकर आपस में मौखिक सहमति पहले से ही बनी हुई थी, हालांकि आधिकारिक तौर पर अभी उन पर मुहर लगना बाकी था।

मीडिया की दुनिया में जब तक नियुक्ति पत्र आपके हाथ में न आ जाये और आप काम पर न लगे तब तक आप पेंडूलम की तरह अनिश्चय की स्थिति में ही डोलते रहते हैं। अनिश्चितता और मीडिया मैन का संबंध चोली-दामन का है और यही अनिश्चितता बेहतर पत्रकारों को गढ़ने का भी काम कर रही है और उन्हें अंधेरे सुरंग में भी दूर तक धकेल दे रही है। राष्ट्रीय स्तर से लेकर कस्बाई पत्रकारों की स्थिति इस मामले में कमोबेश एक जैसी ही है।

खबर न्यूज के दफ्तर में ज्यादातर उन्हीं लोगों को बुलाया गया था जिनसे पहले से बात हो चुकी थी। लेकिन इसके साथ ही कुछ ऐसे लोग भी चले आये थे, जिन्हें खबर न्यूज में बहाली की सूचना उड़तेउड़ते हुये अपने सगे-साथियों से मिली थी।

सूबे के चैनलों में आमतौर पर क्षेत्र में काम करने वाले रिपोटरों द्वारा विज्ञापन के रूप में धन वसुल करने का रिवाज पुख्तातौर पर स्थापित हो चुका था। छोटे और मझोले मीडिया हाउसों में काम करने वाले लोग इस संस्कृति को पोषित करने में लगे हुये थे। खबरों से ज्यादा जरूरी था चैनल को जिंदा रखना और चैनल को जिंदा रखने के लिए अधिक से अधिक पैसों की जरूरत पड़ती थी। विज्ञापन के लिए अलग से व्यक्ति रखने के बजाय ऐसे लोगों की खपत ज्यादा थी जिनमें वाजिब और गैर वाजिब तरीके से धन वसुल कर लाने की कुव्वत हो।

कई महत्वपूर्ण ओहदों पर बैठे लोगों की पहली जिम्मेदारी यही थी कि एड वसूल करने वाले रिपोटरों को ही बहाली किया जाये। इस तरह की संस्कृति कमोबेश सभी स्थानीय चैलनों में जोर पकड़ चुका था, केबल चैनल तो बुरी तरह से इसकी लपेट में थे। रिपोटर लोग भी इसी संस्कृति में ढल से गये थे। एक तरह से इसी संस्कृति को उन्होंने यहां की पत्रकारिता का सच बना दिया था, इससे इतर सोचने की गुंजाईश नहीं थी, खासकर उन रिपोटरों के लिए जो सूबे के जिलों और प्रखंडों में पत्रकारिता की धमक बिखेर रहे थे या फिर धमक बिखरने का दम भर रहे थे। इलेक्ट्रानिक मीडिया की पत्रकारिता का पताका इन्हीं पत्रकारों के हाथों में थी। जिलों से किसी भी चैनल का प्रतिनिधि होने के लिए बस दो अहर्ताएं काफी थी- हाथ में अपना कैमरा और वसुली की हुनर।

राष्ट्रीय चैनलों को क्षेत्र विशेष में घटी घटनाओं की फीड इन्हीं धुरंधरों से मिलती थी, खबर के मुताबिक इन्हें ठीक-ठाक पैसा भी मिल जाता था और कभी-कभी कभार चैनलों में नाम भी चमक जाता था। इससे क्षेत्र में इनकी धमक कुछ और बढ़ जाती थी। गलियों, मुहल्लों और सोसाइटी के विभिन्न हलकों में इनकी मजबूत पैठ बनी हुई थी। सही मायने में ये खबरों के लिए जूझ भी रहे थे और चैनलों को सांसे भी दे रहे थे और खुद के लिए सांस बटोर भी रहे थे। खबरों की गुणवत्ता उससे प्राप्त होने वाले धन के आधार पर आंकी जाती थी, कम से कम छोटे और मझोले चैनलों का मापदंड तो यही था। अधिक धन लाने वाला चैनल का सबसे दुलारा रिपोटर होता था।

ये लोग मुख्यरुप से सुबे के मझोले चैनलों के लिए काम कर रहे थे, जो प्रखंड की खबरों को तेजी से चलाने से विश्वास करते थे और इसी के बुनियाद पर छोटी बड़ी राशि निकाल पाने में सफल होते थे जिससे इनका बाकी का इन्फ्रास्ट्रक्चर मेन्टेन होता था। चैनल से मिलने वाला पैसा इनके लिए बोनस था और यह बोनस उन्हें वसुली के आधार पर ही मिलता था।

खबर न्यूज के दफ्तर में छुपी बेरोजगारी के शिकार क्षेत्रीय स्तर पर अपने हुनर से अपने वजूद का अहसास कराने वाले हासिये पर खड़े होकर मुस्तैदी से जुझ रहे इलेक्ट्रानिक मीडिया के इन योद्धाओं की भीड़ लगी हुई थी। माहुल वीर और रंजन बार-बार अंदर बाहर कर रहे थे, जबकि नरेंद्र श्रीवास्तव अकेले में बैठकर किसी पुराने पन्ने पर कोई शायरी लिख रहे थे। शब्दों से खेलते रहने की उनकी आदत थी, और उनका शुमार भी एक शायर के रूप में ही था। अखबारों की संपादकगिरी करते हुये उन्होंने अपने अंदर के शायर को मरने नहीं दिया था। वह दिल से शायर थे और अक्सर शायरी में ही रमे रहते थे। गुनगुनाते रहने की उनकी आदत थी, अधिकतर पुरानी फिल्मों की सदाबहार गीतों को ही गुनगुनाते थे। भीड़भाड़ से कट कर अपने आप में मस्त रहते हुये अखबारी नौकरी करने की कला उन्होंने अपने तरीके से विकसित कर ली थी और कम से कम अखबारों को हांकने में तो दक्ष हो ही गये थे। वे बहुत बेबाकी से स्वीकार करते थे कि इलेक्ट्रानिक मीडिया का उन्हें एबीसी भी नहीं आता है, बहाली के लिए आये रंगरुटों को भर्ती करने की जिम्मेदारी उन्होंने पूरी तरह से माहुल वीर पर डाल दी थी और माहुल वीर इस जिम्मेदारी को बखुबी निभा रहा था, जिसके एवज में उसे जिलों से आये रंगरुटों का डायरेक्ट दंडवत मिल रहा था और एक अभ्यस्त मीडियामैन की तरह, जो लंबे समय तक समय तक पत्रकारों की फौज को हांक चुका होता है, वह इन दंडवतों पर ध्यान तक नहीं दे रहा था। जैसा कि ऐसे मौके पर होता है पूरी बहाली में दंडवत संस्कृति एक प्रमुख फैक्टर के रूप में काम कर रही थी, यह निष्ठा का मापदंड बना हुआ था। और संभवत: जिलों से चुन-चुन कर वैसे लोगों को ही बुलाया गया था जिन्हें माहुल वीर निजी तौर पर जानते थे।

मीडिया की दुनिया मेंखासकर क्षेत्रीय हिन्दी मीडिया की दुनिया में-व्यक्तिगत निष्ठा को अहम स्थान पर रखने की परंपरा विकसित हो चुकी है और इसको मापने का सबसे बेहतर तरीका है सामने वाले के ध्यान देने न देने के बावजूद व्यक्ति पैरों पर कितनी बार और कैसे झुकता है।

रंजन माहुल वीर का लेफ्टिनेंट बना हुआ था, बौद्धिक लेफ्टिनेंट। आने वाले लोगों को प्रोपर तरीके से बैठने और बैठाने की व्यवस्था करके खुद माहुल के साथ एक केबिन में जम गया। बायोडाटा लेकर बारी-बारी से अंदर भेजने की जिम्मेदारी सुकेश विद्वान ने संभाल ली। एक कंप्यूटर पर बैठकर सबका नाम दर्ज करते हुये नीलेश उसकी मदद कर रहा था।

पिछले कुछ दिनों से वह सुकेश को लगातार कंप्यूटर पर काम सीखने के लिए प्रेरित कर रहा था। हिन्दी टाइपिंग पर वह खासतौर पर जोर दे रहा था। पूर्व में एक अड़ियल संपादक ने उसके दिमाग में यह बात ठोक पीटकर बैठा दी थी कि हिन्दी टाइपिंग के बिना पत्रकार बना ही नहीं जा सकता है। चाहे फिल्ड में रिपोर्टिंग करो या फिर डेस्क पर बैठकर एडिटिंग, टाइपिंग की जरूरत हर हालत में पड़ेंगी ही। उसी अड़ियल संपादक की बातों का असर था कि नीलेश पत्रकारिता में सक्रिय हर उस व्यक्ति पर चढ़ बैठता था जिसे टाइपिंग नहीं थी और अपनी ओर से पूरी कोशिश करता था कि इस जरूरत को वह खुद महसूस करे। टाइपिंग को वह जर्नलिज्म का मौलिक जरूरत मानता था और जैसे-जैसे वह अपने कैरियर में उतार चढ़ाव के दौर से गुजरता रहा उसकी यह अवधारणा और भी बलवती होती गई।

टाइपिंग सीखने की बात वह जब भी सुकेश करता था तो सुकेश यह कह कर टाला जाता कि अभी इसकी जरूरत नहीं है, जब जरूरत होगी तो सीख लेंगे।

करीब तीन घंटे तक लोगों के अंदर-बाहर जाने का सिलसिला जारी रहा। अचानक बिलजी गुल हो जाने से मकान के अंदर के हिस्सों में भूतिया अंधेरा छा गया। बाहर सूरज की भरी रोशनी के बावजूद अंदर बैठे लोग अंधेरे की वजह से अपनी हाथों को भी नहीं देख पा रहे थे।

मकान के अंदर के हिस्सों में कबूतर खानों की तरह छोटे-छोटे दरबे बना दिये गये थे, जिसकी वजह से रोशनी बाहर ही ठिठक जा रही थी। एक गली तो ऐसा था कि उसमें से आमने- सामने से एक साथ दो लोग भी बिना टकराये नहीं निकल सकते थे। कुल मिलाकर दफ्तर का वह हिस्सा एक अंधेरी सुरंग की तरह था। बिजली न होने की वजह से उसके ओर और छोर का भी पता नहीं चल रहा था। थोड़ी देर तक बिजली का इंतजार करते हुये लोग बिलबिलाने लगे और फिर एक-एक करके बाहर निकलने लगे, ठीक वैसे ही जैसे बिल में पानी डालने के बाद चूहे बाहर निकलने लगते हैं। देखते ही देखते ही बाहर गार्डेन में लोगों की अच्छी खासी भीड़ जमा हो गई। कुछ देर के बाद अंदर की कुर्सियां भी बाहर बिछने लगी।

रंजन के कहने पर इंटरव्यू का सिलसिला वहीं पर जारी हो गया।

पूरी तरह नम्रता बरतते हुये एक कुशल प्रबंधक व पत्रकार की तरह रंजन जिलों के प्रतिनिधियों से मोलभाव कर रहा था। सामने बैठने वाले प्रतिनिधियों को यह यकीन दिलाने में उसे गर्व महसूस हो रहा था कि उनसे सिर्फ और सिर्फ खबरें ली जाएंगी, दूसरे चैनलों की तरह उनसे विज्ञापन लाने को नहीं कहा जाएगा। उनका काम होगा सिर्फ खबरों के बारे में सोचना और अपने क्षेत्र की बेहतर खबर को हंट करना। इसके एवज में उन्हें महीने में एक मुश्त रकम दी जाएगी। यानि कि इस चैनल में उन्हें सिर्फ और सिर्फ एक रिपोटर की हैसियत से काम करना है। जिलेवार रिपोटरों को पेमेंट का दायरा प्रत्येक माह पांच हजार रुपये से लेकर सात हजार रुपये तक था। रंजन की जिम्मेदारी इसी दायरे में सबको निपटाना था।

लंबे समय तक क्षेत्रीय चैनलों में जूता घिसटने के बावजूद पत्रकारिता की चलंत बुराइयों से रंजन कोसो दूर था। शराब की बात तो दूर, चाय तक से उसे परहेज था। इस बात के लिए उसे अक्सर माहुल वीर से ताना भी सुनना पड़ता था, जो नियंत्रण में रहकर पीते हुये लोगों को मोबाइलज करने की कला में दक्ष था और अक्सर बेफिक्र अंदाज में कहता था, शराब नहीं पीने वाले लोग पत्रकारिता क्या खाक करेंगे। पत्रकार बनने का पहला वसुल है शराबखोरी।

कुछ लोग शराब को पीते हैं, कुछ लोगों को शराब पीती है, और कुछ लोग इसलिए शराब पीते हैं कि उनके संपर्क सूत्र की गांठ और मजबूत हो और नये संपर्क सूत्र बनते जाये, ताकि मकसद के रास्ते में आनेवाली कंटीली झाड़ियों का सफाया करने तरीका मिलता रहे। माहुल वीर दूसरी श्रेणी का शराबी था। रात में कुछ घूंट कंठ के नीचे उतारना उसके लिए जरूरी हो जाता था। यदि महफिल में बैठकर वह पी रहा होता तो उसका ध्यान हमेशा अपने मकसद को साधने पर ही लगा होता था। पत्रकारिता की डगर पर आगे बढ़ते हुये शराब का इस्तेमाल अपने हित में करने की कला वह बहुत पहले सीख चुका था।

इसके विपरित रंजन ने अपने हलक के नीचे कभी एक बूंद तक नहीं उतारी थी। अपनी इच्छा के विरुद्ध जब कभी उसे शराबी पत्रकारों के महफिल में घसीटा जाता, तो वह सिर्फ शाकाहारी चखने से ही अपना काम चला लेता था। इस मामले में रंजन ने नरेंद्र श्रीवास्तव को भी काफी निराश कर दिया था, जो सूरज ढलने के बाद अक्सर महफिल सजाने के बारे में ही सोचते थे और उनकी कोशिश होती थी कि हर महफिल कल रात की महफिल से बेहतर हो। शराब के साथ-साथ खाने पर भी वे खूब जोर देते थे, अनवरत चलने वाले पैग के साथ मछली और मीट उनका पसंदीदा आहार था। जैसा की अल्हड़ शराबियों के साथ होता है, कई अहम निर्णय वे पीने –पीलाने के इसी दौर में ले लेते थे। जब से उन्हें पता चला था कि रंजन शराब से दूर है, उसकी ओर से वह थोड़े लापरवाह हो गये थे। हालांकि अपनी ओर से उन्होंने कई बार रंजन से थोड़ी सी चखने को कहा था लेकिन रंजन बार-बार इंकार करता रहा और इसके साथ ही नरेंद्र श्रीवास्तव के साथ उसकी दूरी बढ़ती गई। शराब की वजह से माहुल वीर नरेंद्र श्रीवास्तव के काफी करीब आ गया था। उसकी कोशिश होती थी कि शराबखोरी के दौरान ही नरेंद्र श्रीवास्तव से महत्वपूर्ण फैसलों पर हामी भरवा ले और काफी हद तक वह कामयाब भी होता था।

शाम ढलते-ढलते रंजन ने सारा काम माहुल वीर के मन मुताबिक निपटा दिया। लगभग वहां आये सभी लोगों को नियुक्ति का यकीन दिलाते हुये वादा किया गया कि अगले एक सप्ताह के अंदर उन्हें नियुक्ति पत्र भेज दिया जाएगा। साथ में उनसे आग्रह किया गया कि आज रात का भोजन करके ही यहां से निकले। थोड़ी देर में मालिकान रत्नेश्वर सिंह आने वाले हैं। उनकी इच्छा आप सबों से मुलाकात करने की है। दूर दराज के जिलों के कुछ लोग जल्द से जल्द घर निकलना चाह रहे थे, लेकिन रत्नेश्वर सिंह के आने की बात सुनकर उन्होंने अपना इरादा बदल दिया। मालिकान के साथ रू--रू होना मीडिया की दुनिया में एक अहम बात होती है।

जारी.....

(अगला अंक अगले शनिवार को)