Monday, 23 January 2012

vyangya banam mahila visheshank

                               व्यंग्य बनाम महिला विशेषांक 
                                                                                   -हरिशंकर  राढ़ी
(दूसरी किश्त )
(यह व्यंग्य  समकालीन अभिव्यक्ति के नारी विशेषांक के 'वक्रोक्ति ' स्तम्भ के लिए लिखा गया था और अप्रैल -अक्टूबर २०११ अंक में प्रकाशित हुआ था .)
''व्यंग्यकार हो सका हूँ? अरे यह क्यों नहीं कहते कि जिनके कारण जिन्दगी स्वयं व्यंग्य हो चुकी है उसी पर व्यंग्य लिखना है! चलिए, मान लिया कि श्रीमती जी पर व्यंग्य लिख भी दूँ, फिर इस बात की क्या गारंटी है कि मेरे प्राण संकट में नहीं होंगे? मैं अपनी ही छत के नीचे अपरिचित नहीं हो जाऊँगा? अच्छी खासी दो रोटी मिल रही है, वह भी मुश्किल  हो जाएगी। कोई अंगरेजी लेखक भी नहीं हूँ कि प्रकाशक  इतनी रायल्टी दे देगें कि ढाबा ही अफोर्ड कर लूँ। या फिर इस बात की क्या गारंटी कि मेरे विरुद्ध प्रदर्शन  नहीं होगा या कानून नहीं उठ खड़ा होगा? सिर को मूड  कह देने से कोई बड़ा  फर्क पड  जाएगा क्या? क्या मेरी पत्नी महिला नहीं है?''


''यहीं आप सचमुच में गच्चा खा गए राढ़ी साहब। सच तो यह है कि आप महीन बातें समझते ही नहीं। पत्नी महिला होते हुए भी सही अर्थों में महिला नहीं होती। पत्नी एक इकाई होती है, निजी सम्पत्ति होती है जबकि महिला से एक समाज का बोध होता है । जब आप अपनी पत्नी के लिए कुछ कहते-करते हैं तो वह आपका निजी मामला होता है। उस पर संज्ञान नहीं लिया जाता है। वहीं अगर आप महिला शब्द  का इस्तेमाल करके कुछ कहते हैं तो वह एक समाज के प्रति हो जाता है। उसका अपना एक प्रदर्शनकारी  , हंगामाकारी सेल है। उसमें आपकी पत्नी भी शामिल  हो सकती है किन्तु आपकी पत्नी के साथ महिला समाज शामिल  हो, यह जरूरी नहीं। आप इसे यों समझ सकते हैं कि पत्नी आपके पारिवारिक मामले में आती है जबकि महिला राष्ट्रीय मामले में। कभी-कभी यह समस्या अन्तरराष्ट्रीय  भी हो सकती है। अतः आपके लिए पत्नी पर लिखना सुरक्षा की दृष्टि  से ठीक रहेगा।''

-''लेकिन मैंने तो कई बार देखा है कि पत्नी के मामलों में भी प्रदर्शन  की नौबत आ जाती है और आयोग तक जवाब मांगने लग जाते हैं।''

''होता है ऐसा। किन्तु यह दो स्थितियों में ही होता है - एक तो जब पत्नी जवान और सुन्दर हो, अर्थात लोगों की निगाह में हो। लोग यह समझते रहे हों कि इससे तो अच्छा वह उनके काम आ जाती। दूसरा तब, जब वह स्वयं को महिला मान ले और किसी महिला संगठन के उद्देश्यों  में सहायक होने के योग्य हो। चुनाव नजदीक हों तो पत्नी के साथ हुए अत्याचार विरोधी दल के भी काम आ सकते हैं। वैसे भी पत्नी एक उम्र तक ही पत्नी रहती है और बाद में दूसरे रोल में आ जाती है जबकि महिला किसी भी उम्र की हो सकती है परन्तु विशेष  परिस्थितियों में ही। वरना, अधिकांश  महिलाएं सामान्यतः स्वयं को महिला मानने से गुरेज करती हैं।''

यह रहस्योद्‌घाटन मेरे लिए किसी बम विस्फोट से कम नहीं था। ऐसा कैसे हो सकता है? एक महिला स्वयं को किन हालात में महिला नहीं मानेगी और ऐसा करने से उसे क्या लाभ होगा?
इस बार घसीटा भाई को मेरे ऊपर गुस्सा भी आया और तरस भी। बोले-'' दरअसल व्यंग्यकार महोदय, आपके अन्दर सौन्दर्यबोध है ही नहीं। शायद  यही कारण है कि व्यंग्यकार होकर रह गए।''


इस बार मैंने हिकारत भरी दृष्टि  घसीटा भाई पर डाली- तो सौन्दर्यबोध लेकर ही क्या कर लेता?
 या तो हुश्न &-इश्क  की गज़लें लिख लेता या फिर छायावादी कवि बनकर रह जाता । एक ही भाव और एक ही रस। वैसे भी इस नाभि और जघनदर्शना  दूरदर्शनी  युग में सौन्दर्य और श्रृंगार की कविताएं पढ  कौन रहा है\ vkजकल जिसे ज्यादा सौन्दर्यबोध हो जाता है वह अपने शयन कक्ष  में सौन्दर्यसाधना कर लेता है। इससे अच्छा तो मेरा व्यंग्य ही है। कम से कम सत्य का पुट तो है !
^^तो व्यंग्य में ही कौन सा नवरस विद्यमान होता है \ मक्खी की तरह ढूँढ -ढूँढ  कर गन्दगी निकालते रहो। तुम्हें कोई अच्छाई भी दिखती है किसी में\ महिला के विभिन्न रूपों में अन्तर तो ढूँढ  ही नहीं सके और चले हैं महिला विशेषांक  पर व्यंग्य लिखने! हुँह!**
खैर, महिला के विभिन्न रूपों के विषय  में सुनकर मैं हंस साहब से सारे मतान्तर और तर्कशास्त्र  भूल गया और ज्ञान प्राप्ति के लिए तत्पर हो गया। मेरी जिज्ञासा से प्रभावित होकर जी०डी० साहब बोले,'' यद्यपि यह सत्य है कि कोई भी कन्या, किशोरी ,  नवयुवती, युवती, पत्नी, प्रौढ़ा या वृद्धा सभी मूल रूप से महिला होती है किन्तु विशेष  लाभ की अनुपस्थिति में ये स्वयं को महिला नहीं मानतीं। वैयाकरणिक नियम अर्थात लिंग का नियम हमेशा  नहीं चलता।
यहाँ एहसास का अन्तर होता है । 'महिला' शब्द में व्याकरणिक लिंग के अलावा कोई  आकर्षण  और अनुभूति नहीं होती है। किसी नवयौवना को अकारण ही महिला कहकर देख लो। भगवान चाहा तो कोमल अंगुलियों की छाप भी पा जाओगे। भाई साहब, कहाँ एक 'लडकी' या 'युवती' का गुदगुदाता सम्बोधन, एक ग्लैमरस फीलिंग, कम उम्र का निहितार्थ और कहाँ 'महिला' का नीरस, निस्तेज, अनाकर्षक , उम्राधिक्य और लिंगबोधक जातिवाचक भाव ! लडकी, किशोरी,  युवती या दुल्हन ऐसे शब्द  हैं जो अपने आप में सुन्दरता , नजाकत, प्रेम, सेक्स जैसे मानवीय सद्‌गुणों से ओत-प्रोतहैं और जीवन के रस हैं। कई लोग तो ऐसे हैं जो इन्हीं शब्दों  के सहारे जीवन बिता देते हैं। दूसरी तरफ आपका 'महिला' है जो शुद्ध  सरकारी कार्य के अलावा और कोई रस ही नहीं देता । यहाँ तक कि वृद्धाएं  माताजी कहलाना पसन्द करती हैं] महिला नहीं!"
"तो फिर वे कौन सी परिस्थितियाँ होती हैं जिनमें कोई भी व्याकरणिक स्त्रीलिंग 'महिला' कहलाना पसन्द करती है?"
"परिस्थितियाँ नहीं, परिस्थिति। केवल एक ही परिस्थिति है- वह है आरक्षण। आरक्षण चाहे कैसा भी हो। बस में , ट्रेन में,  मेट्रो रेल में या टिकट खिड़की हो,  ये उम्र के बन्धन से ऊपर उठकर फटाक महिला हो जाती हैं। आप इनकी आरक्षित सीट पर तीन वर्ष की  कन्या को भी महिला रूप में देख सकते हैं। हाँ, कई बार यह भी देखा जाता है कि जवानी से लबरेज सुन्दरियाँ आराम से महिला बनी बैठी रहती हैं और सत्तर पार की वृद्धाएं बगैर महिलापद पाए हिलते-काँपते पैरों से महिला सीट को ललचाई - धुंधलाई नजरों से देखती रह जाती हैं। इन पर कोई महिला तो क्या, पुरुष  भी कृपा नहीं करता। यहाँ तो 'ग्लैमर लाओ- सीट पाओ, का सिद्धान्त चलता है। 

"देखिए, महिला और युवती का अर्थभेद और तत्सम्बन्धी ग्लैमर तो स्वीकार्य हो सकता है और होना भी चाहिए। जिस कन्यावर्ग से लेकर सामान्य वृद्धावर्ग के भरोसे अरबों-खरबों का सौन्दर्य बाजार चल रहा है, जिस ईश्वर प्रदत्त सौन्दर्य और लावण्य के कारण किसी को भी असामान्य सम्मान और अलिखित आरक्षण मिल सकता है उसे एक शब्द  'महिला' के चलते क्यों डुबाया जाए ? परन्तु सीट आरक्षण की थ्योरी मेरे समझ से  ईर्ष्या  और अफवाह के अलावा कुछ नहीं है। एक छोटे से सीट आरक्षण के लिए महिलाओं के प्रति आपका यह रवैय्या अत्यन्त नकारात्मक है। यहाँ तो आरक्षण के लिए लोग अपना जाति-धर्म तक बदलने को तैयार है,  जो लोग अपनी जाति का नाम नहीं लेना चाहते वे भी लाभ के लिए इसका लिखित प्रमाण पत्र साथ लेकर चलते हैं। यहाँ तक कि धनाधिक्य और बलाधिक्य के कारण जो लोग अपनी जाति पूरी तरह से भूल चुके हैं वे भी अपने आरक्षण के चक्कर में अपनी ही जाति के मरणासन्न प्राणियों पर दया करके अपनी जाति का दावा नहीं छोड़ते ! यह यात्रा तो पीढी  दर पीढ़ी  चली आ रही है! ऐसी स्थिति में व्याकरणिक स्त्रीलिंग की कोई भी सदस्या एक छोटी सी यात्रा में एक सीट पाने के लिए महिला बन जाती है और बिना देश -समाज का सत्यानाश किये  वाहन से उतरकर खुशबू  बिखेरती अपने गन्तव्य चली जाती है तो कौन सा पहाड  टूट पड ता है? जिस सदन  में उसे आरक्षण चाहिए, वहाँ तो बेचारी पा ही नहीं रही है और आप उसके आरक्षण का रोना रो रहे हैं । आप रखिए अपनी सलाह अपने पास, नहीं लिखना मुझे महिला विशेषांक  पर वक्रोक्ति।" 
    और अपने व्यंग्यकार होने का मोह छोड  मैं अपने घर बैरंग सा वापस आ गया।









Saturday, 14 January 2012

mahila banaam mahila visheshank

व्यंग्य

                                     व्यंग्य बनाम महिला विशेषांक 
                                                                            -हरिशंकर  राढ़ी

        उस दिन संपादक जी पधारे तो प्रकाश्य  महिला  विशेषांक  हेतु उपलब्ध सामग्री पर व्यापक चर्चा हुई। यहाँ तक तो गनीमत थी किन्तु चर्चा के उपसंहार रूप में उनका आदेशात्मक  आग्रह हुआ,''इस बार तुम्हारी वक्रोक्ति महिला  विशेषांक  या महिलाओं पर केन्द्रित होनी चाहिए , इस बात को ध्यान में रखकर ही कुछ लिखना ।''

मुझे काटो तो खून नहीं। मुझे संदेह हुआ- कहीं संपादक का दिमाग तो कुछ खिसक नहीं गया है। इनके मन में कब क्या आ जाएगा , भगवान भी नहीं जान सकता। हठात्‌ पूछ ही बैठा,'' व्यंग्य पर व्यंग्य लिखना ? ये कैसे सम्भव है ? कभी भी और कहीं भी आपने ऐसा व्यंग्य पढ़ा है क्या ? इससे अच्छा तो आप सीधे यही कह देते कि फांसी पर चढ  जाओ। सीधी सी बात कि आप वक्रोक्ति स्तंभ या तो बंद करना चाहते हैं या मुझसे छीनना चाहते हैं। जब मुझसे पूर्ववर्ती नेमी -टेमी और विशिष्ट  व्यंग्यकार इस समस्या पर लिखने की हिम्मत नहीं जुटा सके तो मेरी क्या औकात है? महोदय, जब हरिशंकर  परसाई जैसे व्यंग्य सेनापति इस मुद्‌दे पर चुप्पी साध गए तो -हरिशंकर  राढ़ी किस खेत की मूली हैं? नाम का एक हिस्सा मात्र एक समान होने से मुझे आपने  -हरिशंकर  परसाई समझ लिया क्या ? राम नाम रख लेने से हर कोई राम हो जाता है ? भइया, गधे का नाम घोड़ा  रख देने से वह घोड़ा  थोडे  ही हो जाता है !''
       मगर संपादक जी एक सधे हुए अफसर की भांति टस से मस नहीं हुए। बिलकुल संवैधानिक स्वर में शब्द  बाहर आए- यह आपकी समस्या है, आप जानें परन्तु वक्रोक्ति जाएगी इस बार तो महिला या महिला विशेषांक  पर ही जाएगी। और इस अंदाज में उठ गए जैसे कोई फिल्मी न्यायाधीश  इस टिप्पणी के साथ उठ रहा हो कि 'द कोर्ट इज एडजर्न्ड '।
      और कोई होता तो मैं न जाने क्या - क्या कहता । मगर मैं जानता था कि सामने वाला व्यक्ति कोई सामान्य जन नहीं, संपादक है। किसी को बनाना और किसी को मिटा देना इनके बाएं हाथ का खेल है या इनकी हॉबी भी आप कह सकते हैं। एक लेखक किसी संपादक की अवज्ञा करे तो इसे जल में रहकर मगर से बैर करना कहते हैं। कौन साहित्यकार बनेगा , कौन नहीं बनेगा , यह निर्णय और निर्धारण संपादक के ही हाथ है। आप यों भी कह सकते हैं कि साहित्यकारों की भर्ती इसी वर्ग के जिम्मे है। संपादक यानी साहित्यकारों का संघ लोक सेवा आयोग ! कौन क्वालिफाई करेगा, क्या मेरिट जाएगी, किसे आरक्षण मिलेगा और किसे नियुक्ति मिलेगी, यह सब इनके विवेकाधीन (?) है। इतिहास साक्षी है कि इन्होंने तो मुंशी  प्रेमचन्द और 'निराला' जैसे लोगों की रचनाएं वापस कर दीं और साहित्यकार होने का प्रमाणपत्र नहीं दिया। यह बात अलग है कि वे बिना संपादकीय सहमति के साहित्यकार बन गए।  इनका महत्त्व अब तो राजनेता भी समझने लगे हैं। जहां सरकार गांधी दर्शन  और योग दर्शन  के पुरोधाओं को अनशन  तक नहीं करने दे रही है, बल भर जुतिया -लतिया रही है वहीं सरकारी मुखिया चुनिंदा संपादकों की आवभगत के लिए विशेष  व्यवस्था में संलग्न है । फिर वही बात कि तब मेरी क्या औकात ?

       ऐसी दुखःद स्थिति में मुझे बालसखा घसीटादास की याद आना परम स्वाभाविक है। संपादक तो वे भी हैं किन्तु एक व्यावसायिक पत्रिका के । पत्रकारिता और लेखन के सारे टोटके आपने सिद्ध कर रखे हैं। यह आप जी०डी० 'हंस' साहब की मुझ पर कृपा भी मान सकते हैं कि वे मुझे अपना समझते हैं और बिना किसी संपादकीय तामझाम के अंदरूनी भेद भी बता देते हैं। शुरुआत  में तो उन्होंने कहा कि व्यंजन, कढ़ाई - बुनाई , फैशन , हेअर स्टाइल, पैरों की देखभाल, त्वचा की देखभाल, पति या प्रेमी को कैसे रिझाएं, सेफ सेक्स, प्रेग्नेन्सी और राशिफल  वगैरह पर कुछ भी लिख दो; हो गया महिला विशेषांक। पर जब बड़े  चिढ़े  और दुखी मन से मैंने उन्हें समझाया कि हम लोग कोई महिला पत्रिका नहीं बल्कि साहित्यिक पत्रिका का नारी विशेषांक निकाल रहे हैं तब उन्हें स्थिति की गंभीरता का एहसास  हुआ । बोले- ''हाँ, समस्या तो गंभीर है । आखिर आप भी समय के प्रवाह में बहकर महिला विशेषांक तक आ ही गए ! विनाशकाले  विपरीत बुद्धिः! महिला या महिला विशेषांक पर वक्रोक्ति लिखना और किसी माफिया को चुनौती देना एक ही बात है। फिर भी ऐसा नहीं है कि रास्ता निकल नहीं सकता । आखिर लोग-बाग ऐसे विषयों  पर लिखकर वाहवाही लूट ही रहे हैं।''
मुझे लगा कि घसीटा दास लेखन और व्यंग्य लेखन के अन्तर को समझ ही नहीं रहे हैं। मैंने कहा - ''भाई घसीटा जी , यहाँ प्रश्न  लेखन का नहीं अपितु व्यंग्य लेखन का है। वरना इनकी वकालत कर - करके कितने लोग समाजसेवक और एन०जी० ओ० अध्यक्ष तक हो गए हैं। मलाई काट रहे हैं और दोनों प्रकार से जीवन सफल बना रहे हैं। मेरी समस्या यह है कि मुझे इस मुद्‌दे पर वक्रोक्ति स्तम्भ के लिए लिखना है। व्यंग्य तो सदैव विसंगतियों एवं विडम्बनाओं पर लिखा जाता है, मन-वचन और कर्म में आए अन्तर पर लिखा जाता है, पाखंड और चतुराई पर लिखा जाता है। इस मुद्‌दे पर मैं क्या लिखूँ ?''

          'तब तो कोई समस्या ही नहीं है। इससे अच्छा विषय  और कहाँ मिलेगा व्यंग्य के लिए?' शायद  यही मंतव्य रहा होगा घसीटा दास की उस कुटिल चितवन का जिसे उन्होंने अपने मुखारविन्द से व्यक्त करना उचित नहीं समझा होगा।
       थोड़ी देर निविड  अन्धकार और सन्नाटे जैसी स्थिति बनी रही। जी०डी० 'हंस' साहब ने एक अर्थवान खंखार मारी और बोले- ''महिलाओं पर लिख तो सकते हो बशर्ते  सत्य हरिश्चंद  बनने की कोशिश  न करो। अन्य मुद्‌दों की भांति इस पर भी जो मन में आया लिखते गए तो परेशानी  होनी ही है। अगर अनुभव की बात मानी तो फंसना होगा, अनुभूति के धरातल पर रहे तो बाजी तुम्हारे ही हाथ रहेगी। साँप भी मर जाएगा और लाठी भी साबुत रहेगी। दरअसल इस वर्ग के परिप्रेक्ष्य में अनुभूतियों तक ही सीमित रहना ज्यादा मजेदार होता है।''
       मुझे सत्य हरिश्चंद  वाला कटाक्ष थोड़ा  चुभा तो जरूर पर मन मोटा करके बोला,'' झूठ किसी तरह लिख भी दूँ पर आपने कभी झूठ और व्यंग्य में कोई सामंजस्य देखा  है क्या ? इतना तो आप भी जानते ही होंगे कि झूठ के ऊपर लिखा गया सत्य ही व्यंग्य होता है। व्यंग्यकार को तो मजबूरन सत्य का आश्रय लेना पड ता है। अन्यथा उसे क्या शौक  लगा है कि जिस नेता-अभिनेता, अफसर और धनसर की विरुदावली गा-गाकर लोग लोक-परलोक सुधार रहे हैं, उसी की निन्दा कर वह अपनी कब्र खोदे ? बेचारा जिन्दगी भर व्यंग्य की कलम घिसता रह जाता है और मोहल्ला पुरस्कार भी नहीं पाता। दूसरी तरफ दो-दो शब्दों  की लाइन या सोलह-सत्रह अक्षरों की कविता लिखने वाले अकादमी पुरस्कारों के दावेदार बन जाते हैं। देखा है आपने आज तक किसी व्यंग्यकार को नोबल पुरस्कार पाते हुए ? भाई साहब, बात को समझिए। मुझे व्यंग्य लिखना है, विरुदावली नहीं कि अनुप्रास अलंकार से काम चल जाएगा।''

        ''तो आप एक काम करो - भाभी जी यानी अपनी पत्नी पर लिख डालो। एक तीर से दो शिकार । अपनी पत्नी को भी आसानी से निपटा लोगे और महिलाओं से भी खुन्नस निकल जाएगी।''
    ''मगर वह व्यंग्य समझती तो नहीं। उस पर लिख कर ही क्या करूँगा?''मैंने शंका  प्रकट की।
     ''अजीब बात है भाई ! आप क्या सोचते हैं कि जिनपर आप व्यंग्य लिखते हैं वे सभी समझ जाते हैं? अभी आपने कुत्तों पर लिखा था, उसे कितने कुत्तों ने समझा ?''
    ''मुझे लगता है कि जिन कुत्तों के लिए मैंने लिखा था, वे समझ ही गए होंगे।''
     ''कदापि नहीं। अगर आपका व्यंग्य कुत्ते समझ जाते तो कुत्तागीरी छोड़ चुके होते अब तक !आपको प्रैक्टिकल नॉलेज बिलकुल है ही नहीं। दारू तक छूट जाती है परन्तु दुनिया के किसी देश  में कुत्तागीरी और नेतागीरी नहीं छूटती ! परसाई से लेकर आजतक की आपकी बिरादरी नेताओं, पुलिस, पाखंडियों और न जाने किस-किसके खिलाफ मोर्चा लेने का दंभ पालती रही, किसी पर कोई असर पड़ा  क्या ? मेरी मानो, पत्नी पर लिख डालो। व्यंग्य भी हो जाएगा और संपादक से भी जान बचेगी। वैसे भी आप भाभी जी के भरोसे व्यंग्यकार हो सके हैं। एहसान तो मानना ही चाहिए।''
 शेष अगली किश्त में ...........