Tuesday, 23 October 2012

हर बात में कहते हैं वो मुझसे कि तुम्हे क्या ?


माली चमन को लूट के खाए तो तुम्हे क्या ?



सुनवाई हुई पूरी सज़ा बरकरार है -

फांसी पे न हम उसको चढ़ाएं तो तुम्हे क्या?



ज़म्हूरियत में चुनना सिर्फ सबका फ़र्ज़ है -

रहज़न उम्मीदवार है तो इससे तुम्हे क्या ?



दर दर पे सिर झुकाके है सेवा का व्रत लिया-

फिर पांच साल हाथ न आयें तो तुम्हे क्या ?



मेरे ही बुजुर्गों ने बसाई थीं बस्तियाँ -

मैं आग अगर उनको लगाऊं तो तुम्हे क्या ?



इस देश का पैसा तो विदेशों में जमा है -

इस देश में वापस नहीं लाएं तो तुम्हे क्या ?



यह माना पातिव्रत्य तेरा संस्कार है -

तेरा पति मेरे साथ सो जाए तो तुम्हे क्या ?



मेरा वज़ीरेआज़म तो ईमानदार है-

आरोपों की न जांच कराए तो तुम्हे क्या ?



विनय ओझा 'स्नेहिल'

3 comments:

  1. तुम्हारे घर में तुम्हारी ही कमाई का
    कुछ से कुछ हुआ जाए, तुम्हें क्या?

    ReplyDelete
  2. मेरा बेटा कलावती खोर है ,

    कहीं और भी जाए तो तुम्हें क्या

    तुम तो प्रजा हो ,

    हमारी रजा हो .

    ReplyDelete
  3. व्‍यवस्‍था के अघोषित नापाक मंसूबों से रूबरू कराती काव्‍यपंक्तियां दिल को छूने वाली हैं

    ReplyDelete

सुस्वागतम!!