Tuesday, 24 April 2012

बाइट, प्लीज ( उपन्यास, भाग-4)


(जस्टिस काटजू को समर्पित, जो पत्रकारिता में व्याप्त अव्यवस्था पर लगातार चीख रहे हैं...)
8.
राष्ट्रीय स्तर पर संचालित ज्यादातर इलेक्ट्रानिक मीडिया कारपोरेट कल्चर में ढली हुई थी, सकेंद्रित पूंजी व्यवस्थित तरीके से इनके नसों में प्रवाहित हो रही थी। इस पूंजी के अनुकूल व्यवहार करने वाले मीडियार्मियों के हाथ में आभासी तौर पर इलेक्ट्रानिक मीडिया की लगाम थी, लेकिन हकीकत में ये लोग खुद अदृश्य इशारों पर थिरकते हुये उनके ज्ञात अज्ञात हितों को साधकर अपने व्यक्तित्व को उड़ान देते हुये उन सहूलियतों को हासिल करने की कोशिश कर रहे थे जिनसे जिंदगी आसान बनती है। राष्ट्रीय इलेक्ट्रानिक मीडिया में लगी पूंजी का माई-बाप सीधे तौर पर दिखाई नही देता था, क्योंकि सबकुछ कारपोरटे के सांचे में ढला हुआ था। अपनी हैसियत से आगे निकलकर कुछ पत्रकारों ने शेयर होल्डर के रूप में मालिकान का दर्जा तो हासिल कर लिया था, लेकिन कारपोरेट के स्थापित रास्तों से इतर जाने की कुव्वत उनमें भी नहीं थी। उत्पादों की तमाम कड़ियां एक- दूसरे से बुरी तरह से गुथकर छद्म रूप में राष्ट्रीय इलेक्ट्रानिक मीडिया में ऊपर के ओहदे पर बैठे लोगों को नियंत्रित और निर्देशित कर रही थी। संसद में तोलमोल करके भारत को नवउदारवाद के रास्ते पर बहुत पहले ही ढकेल दिया गया था और राष्ट्रीय मीडिया को कारपोरेट की निगरानी में नव उदारवाद के रास्ते में आने वाली अड़चनों को दूर करने के काम में झोंक दिया गया था। 
राष्ट्रीय मीडिया से इतर देश के अन्य सूबों में ज्यादातर इलेक्ट्रानिक मीडिया संगठित कारपोरेट पूंजी से मुक्त थी। नव उदारवाद की गंगोत्री से निकले अमीरजादे और नये तौर तरीकों में ढले पुराने सामंतों ने इसकी लगाम थाम ली थी। कई तरह के धंधों से स्थानीय स्तर पर बटोरी गई पूंजी का इस्तेमाल ये लोग मीडिया में करते हुये न सिर्फ अपने धंधों को सुरक्षित करने की कोशिश कर रहे थे, बल्कि स्थानीय स्तर पर अपने रसूख में इजाफा भी कर रहे थे। पारंपरिक सामंती पृष्ठभूमि से उठकर मीडिया के धंधे में हाथ डालने वाला सामंतो और अर्द्ध सामंतों का यह कौम अपने साथ पारंपरिक रीति-रिवाजों को कायम किये हुये था। टूटे-फूटे तौर पर कारपोरेट के स्थापित मानकों को अपनाते हुये ये लोग सामंती मनोवृति के वाहक थे। गालिब एक ढूंढो हजार मिलेंगे की तर्ज पर बड़ी संख्या में अधकचरे पत्रकार ऐसे सामंतो को सजदा करने के लिए हर वक्त तैयार रहते थे। सामंतों का यही कौम स्थानीय स्तर पर मीडिया कर्मियों का माई-बाप बना हुआ था। अपने स्थापित धंधों को ओट देने के लिए अब रत्नेश्रर सिंह भी बिहार में मीडियाकर्मियों के माई-बाप की भूमिका में आ रहे थे।                   
सूरज ढलने के करीब दो घंटे बाद चमचमाती हुई लाल और सफेद रंग के पजरो कार में रत्नेश्वर सिंह का आगमन हुआ। एक रईस की सारी अदा उनमें थी। सलीके से सजे बाल, करीने से कटी मूंछे, चमकते काले जूतों के साथ सफेद रंग की कमीज और और सफेद रंग का ही  हाफ शर्ट, कलाई पर चमकती टायटन की घड़ी, सोने की अंगूठियों में ग्रहों और नक्षत्रों को नियंत्रति करने के लिए जड़े हुये बेशकीमती पत्थरों से सजी उंगलियां और साथ में खुश्बूदार परफ्यूम की धमक, सबकुछ एक उम्दा रईस का अहसास करता था।  
माहुल वीर और रंजन के साथ मिलकर नरेंद्र श्रीवास्तव ने आगे बढ़कर जोरदार तरीके से उनका इस्तकबाल किया। दफ्तर के अंदर जगह कम होने की वजह से गेट-टुगेदर की सारी व्यवस्था गार्डेन में ही की गई थी। गार्डेन में लगी कुर्सियों पर सभी लोग बैठ गये।
मीडियाकर्मियों की खुद की पहचान तेजी गुम होती जा रही है, अब पत्रकार अपने नाम के बजाये संस्थान के नाम से जाने जाते हैं। अपनी ब्रांडिंग करते हुये मीडिया संस्थाओं ने पत्रकारों के नामों को पीछे धकेल दिया है। एक-एक करके सभी लोगों ने अपना परिचय देना शुरु किया, आमतौर पर लोग अपना नाम व उस स्थान का जिक्र कर रहे थे जहां के वे रहने वाले थे। साथ ही उन मीडिया हाउसों की भी जानकारी दे रहे थे जहां वे काम कर चुके थे या अभी काम कर रहे थे। 
परिचय का दौर खत्म होने के बाद रत्नेश्वर सिंह ने सीधे तौर पर सभी लोगों से मुखातिब होते हुये कहा,-
उम्मीद है कि आप सभी लोग मन लगा कर काम करेंगे, पैसों की चिंता आप बिल्कुल न करें। सब को समय पर पैसे मिलेगा और जो बेहतर काम करेंगे उन्हें पुरस्कार भी मिलेगा। किसी तरह की परेशानी आपको नहीं होने दी जाएगी। आप सिर्फ काम पर ध्यान दिजीये, तीन साल तक तो कुछ सोचना ही नहीं है। इस बीच किसी तरह की कोई भी समस्या हो तो आप सीधे मुझसे बात कर सकते हैं।
रत्नेश्वर सिंह की बातें सुनकर वह मौजूद तमाम लोगों को यह यकीन हो चला था कि उनकी गठरी में पैसे हैं और वह इस चैनल को बेहतर तरीके से चला पाएंगे। क्षेत्रीय मीडिया में लंबे समय चैनल बदलने के बाद मालिकान को देखने और उनसे बात करते ही वे लोग समझ जाते थे कि वह कितनी दूरी तय करने वाला घोड़ा है।
जिलों से आने वाले रंगरुटों का जोश खासतौर पर कुछ और बढ़ गया था, वैसे मन के किसी कोने में शंका भी हो रहा था।  एक जिले के प्रतिनिधि ने रत्नेश्रर सिंह से कहा-
शुरु-शुरु में तो सबकुछ ठीक चलता है, लेकिन बाद में प्रोब्ल्म होने लगता है। बातें छुपाई जाई हैं। हमलोग चाहेंगे अच्छा या बुरा कुछ भी हो, हमें कभी अंधकार में न रखा जाये। जहां तक खबरों का संबंध है मैं यकीन दिलाता हूं कि मेरे जिले से एक भी खबर नहीं छूटेगी, अन्य चैनलों के मुकाबले हम हमेशा आगे रहेंगे।
उस प्रतिनिधि की इस बात पर तालियों की एक जोरदार गड़गड़हट गूंज उठी। वहां मौजूद सभी लोगों के दिलों में उत्साह की एक लहर दौड़ रही थी। इस उत्साह में इजाफा करते हुये नरेंद्र श्रीवास्तव ने खबर न्यूज डाट काम को लांच करने की घोषणा की। खबर न्यूज डाट को चलाने की जिम्मेदारी सुयश मिश्रा को सौंपी गई थी। सुयश मिश्रा कोलकाता के उसी अखबार से आया था जिस अखबार के मुज्जफरपुर संस्कर में नरेंद्र श्रीवास्तव संपादक रह चुके थे।
नरेंद्र श्रीवास्तव के कहने पर  सुयश मिश्रा खबर न्यूज चैनल में आने के लिए तैयार हो गया था। यहां पर उसे न्यूज एडिटर का पद दिया गया था,  फिलहाल चैनल शुरु नहीं हुआ था, जिसकी वजह से उसे खबर न्यूज डाट काम की जिम्मेदारी दे दी गई थी। सुयश मिश्रा ने अपना लैपटाप खोलकर रत्नेश्वर सिंह के सामने रख दिया। सुयश मिश्रा के कहने पर रत्नेश्वर सिंह ने कुछ आइकान पर क्लिक किया और फिर जैसे ही खबर न्यूज डाट काम का पेज खुला, एक बार फिर तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा गार्डेन गूंज उठा। इस मौके पर वृद्ध मकान मालिक भी मौजूद था। रत्ननेश्वर सिंह ने वहां मौजूद लोगों से रू ब रू होने के लिए आमंत्रित किया। वहां व्याप्त उत्साह को देखकर वह भी उत्साहित था। लोगों को संबोधित करते हुये उसने कहा, आप सभी पढ़े लिखे लोग हैं। पत्रकारों के कौम पर समाज की बहुत बड़ी जिम्मेदारी होती है। सरकार और जनता के बीच में आप पुल का काम करते हैं। आप सभी लोगों के लिए मैं अपनी शुभकामनाएं देता हूं। इस मकान में काम करते हुये आपको मेरी ओर से कोई समस्या नहीं आएगी।
मकान मालिक के संबोधन के बाद रत्नेश्वर सिंह ने सभी लोगों को खाने पर आमंत्रित किया। मकान के दूसरे हिस्से में बने रास्ते पर खाने का काउंटर सज चुका था। लोग बारी-बारी से लाइन में लग कर अपना प्लेट भरकर साइड हो रहे थे।
अपना प्लेट भरने के दौरान नीलेश की आंखों में पांच साल पहले का 15 अगस्त का दिन घूम रहा था। एक राष्ट्रीय अखबार द्वारा लांच किये जा रहे एक चैनल के कार्यक्रम में उस दिन वह मौजूद था। इस मौके पर अखबार के सभी बड़े और छोटे ओहदेदार मौजूद थे। इस मौके पर चैनल हेड का ओहदा संभालने वाले अविजीत साही ने अपने खास अंदाज में कहा था, इलेक्ट्रानिक मीडिया में काम करने वाले लोगों की समझ अखबारों में काम करने वाले लोगों की समझ से कम होती है। इलेक्ट्रानिक मीडिया में शोर अधिक है, जबकि प्रिंट मीडिया में लोग गंभीरता से काम करते हैं। ऐसे में प्रिंट मीडिया के लोगों के सामने मेरा कुछ भी बोलना उचित नहीं होगा। इलेक्ट्रानिक मीडिया में तो बस भेड़ों की भीड़ होती है। रिपोटरों का सारा समय बाइट के लिए मारा मारी करने में ही निकल जाता है। मैं पूरी कोशिश करूंगा कि जिस तरह से यह अखबार नंबर वन है, उसी तरह से इस अखबार से जुड़ा चैनल भी नंबर वन बने। अविजित साही के इस कथन के आधार पर नीलेश वहां मौजूद लोगों की मानसिकता को समझने की कोशिश कर रहा था। क्या वाकई में इन लोगों में बिहार की मीडिया को एक नई दिशा देने की कुव्वत है, यहां पर कितने लोग हैं जिन्होंने प्रिंट मीडिया में कलम घिसा हो ? हालांकि वहां मौजूद लोगों के उत्साह को देखकर उसे लग रहा था जो कुछ भी हो रहा है बेहतर ही हो रहा है। मीडिया में लोगों को तरासने का काम तो निरंतर चलने वाली एक प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया से गुजर कर इनमें से कुछ बेहतर पत्रकार जरूर निकलेंगे।     
खाने के बाद एक दूसरे से विदा लेते हुये लोगों की आंखों में आत्मविश्वास के साथ कुछ कर गुजरने की चमक स्पष्ट रूप से देखी जा सकती थी।
9.                    
खबर न्यूज के दफ्तर में गेट-टुगेदर पार्टी को हुये दस दिन से ऊपर हो गये थे। अब तक नीलेश को दफ्तर की ओर से न तो नियुक्ति पत्र ही मिला था और न ही कोई फोन आया था। इस बीच सुकेश से फोन पर कई बार बात हो चुकी थी। सुकेश ने उसे बताया था कि जिस राष्ट्रीय चैनल के साथ खबर न्यूज का टाईअप हो रहा था वह टूट गया है। अब एक नये चैनल वाक्स इंडिया का लाइसेंस पर नये सिरे से इसे लाने की कवायद हो रही है। अब चैनल का नाम कंट्री लाइव होगा, खबर न्यूज नहीं। इसका हेड क्वार्टर रांची में होगा, पटना में सिर्फ ब्यूरो आफिस ही रहेगा। यही वजह है कि हमलोगों को अभी तक नियुक्ति पत्र नहीं मिला है, हालांकि जिलों से रिपोटरों को नियुक्त कर लिया गया। ये सारा डेवलपमेंट माहुल वीर के दिल्ली जाने के बाद हुआ है। चैनल के सभी दिग्गज अभी दिल्ली में ही हैं। दो दिन बाद सब रांची पहुचेंगे। पिछले कुछ दिनों से कंट्री लाइव का दो ओबी पटना की सड़कों पर घूम रहा है। माहुल वीर से लगातार संपर्क बना हुआ है। आगे जैसा वह कहेंगे वैसा किया जाएगा। यदि वाक्स इंडिया के साथ बात बन गई तो यह चैनल जल्द लांच हो जाएगा।
वाक्स इंडिया टीवी का आगाज दिल्ली में शानदार तरीके से हुआ था। इन्फ्रास्ट्रक्चर के लेवल पर कई बड़े मीडिया हाउसों का यह कान काट रहा था। देश में पत्रकारिता जगत के कई बड़े नाम तेजी से इससे जुड़े थे। कई बड़े पत्रकारों ने ज्वाइन कर लिया था और कई ज्वाइन करने की कतार में थे। शुरुआती दौर में ही ऊंचे ओहदों पर उठा पटक शुरु हो गई थी। एक राष्ट्रीय अखबार के संपादक ने पहले चैनल हेड के तौर पर इसे ज्वाइन किया और फिर कुछ दिन के बाद ही संस्थान से बाहर हो गये। इसे लेकर परस्पर विरोधी खबरें उड़ती रही। एक ओर यह प्रचारित हो रहा था कि वह वाक्स न्यूज टीवी के लिए सफेद हाथी साबित हो रहे थे, खुद तो मोटी सैलरी ले ही रहे थे साथ में अपने लोगों की ताबड़तोड़ भरती करवा कर उन्हें भी मोटी सैलरी दिलवा रहे थे। दूसरी ओर यह कहा जा रहा था कि मालिकानों के अत्यधिक हस्तक्षेप की वजह से वह इस संस्थान में अपने आप को सहज महसूस नहीं कर रहे थे। मामला चाहे जो हो, एक बार इस हाउस में लोगों के आने-जाने का सिलसिला जारी हुआ तो बस चलता ही रहा। साल भर के अंदर ही यह चैनल तेजी से ढलान की ओर बढ़ता चला गया। स्थिति इतनी खराब हो गई कि यहां काम करने वाले लोगों को तीन-तीन महीने तक का वेतन बकाया रहने लगा। इस बीच इस चैनल पर अधिकार को लेकर भी इसके पार्टनरों में मतभेद शुरु हो गया और मामला कोर्ट तक पहुंच गया। इधर चैनल के कर्मचारी आलिशान दफ्तर के अंदर नारेबाजी करते रहे, उधर चैनल पर मालिकाना हक को लेकर पार्टनरों के वकील कोर्ट में जिरह करते रहे। अंतत:  चैनल में ताला लटक गया।
अपने संबंधों का पेशवराना इस्तेमाल करते हुये माहुल वीर  इस चैनल पर मालिकाना दावेदारी करने वाले एक पार्टनर से साल में एक मुश्त रकम की एवज में लाइसेंस हासिल करने में कामयाब हो गया  और इसके साथ ही अस्तित्व में आने से पहले ही खबर न्यूज चैनल का गर्भपात हो गया। खबर न्यूज को फ्रेन्चाइची के आधार पर लाने की तैयारी थी। नरेंद्र श्रीवास्त की अगुवाई में दिल्ली स्थित महावीर टीवी के साथ मोटी रकम का लेन-देन भी हो गया था, लेकिन माहुल वीर अंत समय में रत्नेश्वर सिंह को यह समझाने में सफल हो गया कि महावीर चैनल के साथ तालमेल उनके लिए घाटे का सौदा साबित होने वाला है।
वाक्स न्यूज चैनल के साथ सांठ-गांठ के बाद कंट्री लाइव का प्रादुभाव हुआ। आधे-अधूरे मन से नरेंद्र श्रीवास्तव ने भी इस पर अपनी सहमति दे दी। खबर न्यूज चैनल का लोगो कंट्री लाइव में तब्दील हो गया और माहुल वीर का कद मालिकान रत्नेश्वर सिंह की नजर में कुछ और ऊँचा हो गया।
इस नये एग्रीमेंट में माहुल वीर के साथ रंजन ने भी महत्वपर्ण भूमिका निभाई थी, रत्नेश्वर सिंह की नजर में उसका ग्राफ भी तेजी से बढ़ रहा था, जो माहुल वीर को खटक रहा था।  
माहुल वीर ने नरेंद्र श्रीवास्तव के साथ शराबखोरी करते हुये उन्हें अहसासा कराया कि संस्थान को एक ऐसे व्यक्ति की जरूरत है जिसकी बिहार के प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में गहरी पैठ हो और महेश सिंह का नाम बिहार के ब्यूरो प्रमुख के रूप में सुझाया। उस रात साथ नरेंद्र श्रीवास्तव के लिए शराब बहाने में महेश सिंह ने भी कोई कोताही नहीं बरती। चूंकि महेश सिंह उसी अखबार के पटना संस्करण में क्राइम रिपोटर था, जिस अखबार के मुजफ्फरपुर संस्करण में नरेंद्र श्रीवास्तव स्थानीय संपादक के पद पर रह चुके थे इसलिये महेश सिंह का रास्ता आसानी से साफ हो गया। एक साथ मिलकर की गई शराबखोरी कारगर साबित हुई।
इसके अलावा महेश सिंह के मामले में जातीय फैक्टर भी काम कर रहा था। नरेंद्र श्रीवास्तव और माहुल वीर रत्नेश्वर सिंह को यह संदेश देना चाहते थे कि ब्यूरो हेड के प्रमुख पद पर एक राजपूत व्यक्ति को बैठाया जा रहा है, जिसकी चौतरफा पकड़ है और जो संस्थान के हितों का बेहतर ख्याल रखेगा। इस तरह रत्नेश्वर सिंह के जातीय भावना को तुष्ट करने की नीति भी अंदरखाते काम कर रही थी।   
सामूहिक शराबखोरी के दौरान ही नरेंद्र श्रीवास्तव ने रंजन को ब्यूरो प्रमुख के रूप में महेश सिंह का लेटर तैयार करवाने का हुक्म दिया। इस आदेश से रंजन थोड़ी देर के लिए हक्का-बक्का रह गया, क्योंकि अब तक के परिदृश्य में रंजन और सुयश मिश्रा ही कंट्री लाइव न्यूज चैनल को बिहार से लीड  कर रहे थे। ब्यूरो प्रमुख के रूप में महेश सिंह की इंट्री इन दोनों के लिए परेशानी खड़ी करने वाली थी। ब्यूरो प्रमुख के रूप में एक नये पद का सृजन करके स्पष्टतौर पर इनके अधिकारों में कटौती तो हो ही रही थी, संस्थान के अंदर शक्ति के एक नये केंद्र का भी गठन किया जा रहा था। बिहार के तमाम स्टाफों में महेश सिंह की सैलरी सबसे अधिक रखी गयी। रंजन और सुयश मिश्रा की पूरी कोशिश यही थी कि किसी भी कीमत पर महेश सिंह की इंट्री रुक जाये। इसके लिए उन्होंने हर संभव उपाय किया, यहां तक कि लेटर निकलवाने में देर करते रहे। नरेंद्र श्रीवास्तव ने जब बार-बार रंजन से लेटर निकालने को कहा तो अंत में लेटर पर बिहार ब्यूरो प्रमुख की जगह पटना ब्यूरो हेड लिखकर लेटर निकाल दिया।              
इधर खबर न्यूज से कंट्री लाइव बनने की प्रक्रिया में रत्नेश्वर सिंह अच्छी खासी राशि पुराने एग्रीमेंटे में फंस गई। चूंकि चैनल को बिहार इलेक्शन 2010 के पहले लांच करने की जल्दी थी और महावीर चैनल ने यह वादा किया था कि उसके इक्यूपमेंट का इस्तेमाल कंट्री लाइव कर सकता है और समय के साथ बाकी बचे पैसों को वह वापस कर देगा इसलिये रत्नेश्वर सिंह भी नये एग्रीमेंट के पक्ष में खड़े थे।
बहरहाल, शुरुआती दौर में तमाम उठा पटक के बीच नीलेश और सुकेश को कंट्री लाइव में जगह नहीं मिली और दोनों इस बात को लेकर चिंचित थे।
कंट्री लाइव में महेश सिंह की इंट्री के कुछ दिन बाद रंजन ने  सुकेश को फोन किया और कहा कि हो सके तो एक बार रांची जाकर माहुल वीर से मिल ले। चूंकि पटना में अब कोई जगह नहीं है और अब हेड आफिस रांची में ही बनने वाला है। ऐसे में बेहतर होगा कि वह रांची जाकर माहुल से बात करके रांची में ही ज्वाइन कर ले। बाद में पटना में उसका आसानी से तबादला हो जाएगा। कमोबेश यही बात उसने नीलेश को भी कहा। सुकेश और नीलेश ने आपस में बात करने के बाद फैसला किया कि जितना जल्दी हो सके दोनों को रांची निकल जाना चाहिये। लेकिन रांची निकलने से पहले माहुल वीर से बात करना जरूरी था। जब सुकेश ने माहुल वीर को फोन लगाया तो उधर से भी रांची आने के लिए हरी झंडी मिल गई। फिर दोनों एक साथ रांची निकलने की तैयारी करने लगे।
जारी.....
                                                                   

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