Saturday, 24 March 2012

बुरा न मानो प्लीज़ !



[] व्यंग्य [] राकेश सोहम




मैं प्रतिदिन प्रातः भ्रमण के लिए निकलता हूँ. सुरक्षा की दृष्टि से हाथ में छड़ी लेकर चलता हूँ. रास्ते में मिलाने वाले श्वानों को लतियाता जाता हूँ. वे बेचारे दर्द से रोते बिलखते आवाज़ करते हुए भाग जाते हैं. होली के दिन भी निकला. बीच रास्ते में अचानक एक श्वान मेरे सामने प्रकट हुआ. नतमस्तक होकर उसने पूँछ हिलाते हुए कहा, 'होली है !' मैं चौंक गया ! श्वान मनुष्य की आवाज़ में बोल रहा था ! मैंने छड़ी घुमाते हुए उसे फटकार लगाईं, 'क्यों बे ? आदमी की जुबां बोल रहा है ?' वह डर गया. अतः और जोर से पूंछ हिलाते हुए पुनः बोला, 'बुरा न मानो, होली है.' मैंने बनावती दया दिखाते हुए कहा, 'अब मैं भला तुमसे क्यों बुरा मानने लगा ? जब इस देश में कर्णाधारों से बुरा मानने की हिमाकत न जुटा सका. यद्यपि होली में बुरा न मानने की प्राचीन परम्परा है. मैं ठहरा परम्परावादी. किन्तु सच्चाई ये है कि आज परम्पराएं टूट रही हैं. अच्छे-बुरे सारे परम्परावादियों को एक लाइन से दकियानूसी ठहराया जा रहा है. इसलिए मैं ज़रा दुखी हूँ.'

मुझे दुखी देखकर श्वान मेरे पैरों से लिपटकर प्रेम प्रदर्शित करने की कोशिश करने लगा. मैंने उसे पुनः झिड़का और आगे कहा, 'नेता और अफसर नाकारा हो गए हैं और बारहों महीने भ्रष्टाचार की होली खेल रहे है. वे हमारे साथ कितना भी बुरा करते रहें किन्तु हम बुरा ना मानने को मज़बूर है. वे साड़ी बुराई जनता पर थोपते जा रहे हैं. इधर उनमे कोई सुधार नज़र नहीं आ रहा है. उधर मंहगाई रोजमर्रा के खरचे पर धावा बोल रही है. रसोई गैस और पेट्रोल के दाम बढे हुए ब्लड-प्रेशर की तरह लाइलाज हो गए हैं. आतंकवाद सुप्त-ज्वालामुखी की भाँती दिल दहला रहा है. भ्रष्टाचारियों की अब भी चांदी है. दुन्दे-मवाली आम जीवन में बराबर दखलंदाजी कर रहे हैं. इमानदार इमानदारी की मौत मरा जा रहा है. व्यवस्थाओं को घुन लग गया है एवं विकास के नाम पर लूट मची हुई है. मानसिक कमजोरियों को भुनाने वाले बाबाओं की भरमार है.'

मैं अभी अपनी बात समाप्त भी नहीं कर पाया था कि श्वान बीच में बोला, 'अरे ! आप बिलावाजः दुखी हो रहे है. हमें तो अत्याचार सहने कि आदत पड़ चुकी है.' श्वान कि समझदारी भरी बातें मुझे रास नहीं आईं. अतः पुनः हिकारती प्रश्न किया, क्यों बे ! तू आदमी कि जुबां कब से बोलने लगा ?' श्वान ने मारे डर के अपनी पूंछ दोनों पैरों के बीच छिपाते हुए स्पष्ट किया, ' जब से इंसानों ने इंसानियत छोड़ दी है तब से यह ज़िम्मेदारी जानवरों को लेनी पड़ी है.' और उसने विदा होते-होते दोबारा होली की बधाई दी, ' हेप्पी होली सर !' मैंने प्रत्युत्तर में कहा, 'भौं..भौं..!'

[देश के प्रतिष्ठित दैनिक अखबार के नियमित स्तंभ के लिए होली पर लिखा गया एक व्यंग्य]

1 comment:

  1. Aasaman humse naraz hai,
    Taaronka gussa behisab hai,
    Wo sab humse jalte hai,
    Kyunki chaand se behatar dost humari pass hai.

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