Wednesday, 19 October 2011

Kanya Kumari mein Suryast

                                         कन्याकुमारी में सूर्यास्त
                                                                          -हरिशंकर राढ़ी
दोपहर बाद हमने बाकी बची जगहों को देखने का कार्यक्रम बनाया। कन्याकुमारी स्थल जिस देवी के नाम पर जाना जाता है, उस अधिष्ठात्री  देवी कन्याकुमारी का एक विशाल  मंदिर यहाँ बना हुआ है। स्थल का नाम कन्याकुमारी पड़ने के पीछे एक पौराणिक कथा बताई जाती है। कहा जाता है कि कन्याकुमारी पार्वती का ही एक दूसरा रूप है। किसी जन्म में देवी पार्वती ने एक कन्या के रूप में भगवान शिव को पति के रूप में पाने हेतु घोर तपस्या की थी। उस समय बाणासुर का आतंक चहुँओर फैला हुआ था और वह देवताओं के लिए संकट बना हुआ था। ब्रह्मा से प्राप्त वरदान के कारण वह अजेय था और उसका वध किसी कुँआरी कन्या के ही हाथों हो सकता था। यह भी स्पष्ट  ही था कि उस बलशाली  असुर को आदिशक्ति  देवी पार्वती के अतिरिक्त कोई अन्य कुंवारी कन्या नहीं कर सकती थी। इधर पार्वती के तप से भगवान शिव प्रसन्न हो चुके थे और विवाह में अधिक देर नहीं थी। एतदर्थ नारद मुनि को बहुत चिन्ता हुई और उन्होंने देवी पार्वती से अनुनय विनय करके यह शर्त रखवा ली कि यदि शिव  उनसे विवाह करना चाहते हैं तो सूर्योदय से पूर्व बिना आँख का नारियल, बिना गाँठ का गन्ना और बिना नस का पान लेकर आएं। जब महादेव ये सभी सामग्री लेकर आ रहे थे तभी नारद जी मुर्गे का रूप धारण कर वक्कम पारै नामक जगह पर बाँग लगा दिए और महादेव यह समझकर कि प्रातःकाल हो गया है, लौट गए। इस प्रकार शर्त पूरी न होने के कारण देवी का विवाह न हो सका और वह कुँआरी ही रह गईं। इसी कारण से इस तपःस्थल का नाम कंन्याकुमारी पड  गया । यह बात अलग है कि 
देवी के इस त्याग से कालान्तर में बाणासुर मारा गया और लोककल्याण हुआ।

देवी कन्याकुमारी का मंदिर प्रातः चार बजे से रात्रि में आठ बजे तक खुला रहता है किन्तु यहाँ भी पोंगापंथ हावी है। हम वहाँ दर्शन  के लिए पहुँचे तो पता चला कि दर्शनार्थी  केवल अधोवस्त्र में ही दर्शन  कर सकते हैं। शर्ट, बनियान या कोई भी ऊपरी वस्त्र पहनकर दर्शन  करना वर्जित है। यहीं से मन में एक चिढ़ हो गई और दर्शन करने का इरादा मैंने त्याग दिया। मुझे कभी भी ईश्वरीय  या आध्यात्मिक मामलों में तामझाम या प्रतिबन्ध अच्छा नहीं लगा। यदि ईश्वर का सम्बन्ध मन से है और उसके लिए सबसे बड़ी अनिवार्यता श्रद्धा और समर्पण है तो इन प्रतिबन्धों का क्या औचित्य? मैं मानता हूँ कि शारीरिक शुचिता भी बहुत आवश्यक  है और शारीरिक शुचिता से मानसिक शुचिता भी जुडी  हुई है किन्तु ऐसा भी नहीं कि ईश्वर  के किसी रूप के दर्शन के लिए कुछ लोग शर्तें  लाद दें और आप उन शर्तों  को पूरा न कर सकें तो  दर्शन से ही वंचित हो जाएँ।  दर्शन का मतलब था कि मैं अपने सारे सामान और बटुआ कहीं संभलवाऊँ और फिर अर्द्धनग्न होकर दर्शनार्थ  प्रस्तुत होऊँ। मैंने बाहर से ही उस आदिशक्ति  को नमन किया और अपने रास्ते चल दिया।

                                                                     गांधी स्मारक 


गाँधी स्मारक 

समुद्र के तट पर ही गांधी स्मारक बना हुआ है। इस स्थल पर महात्मा गांधी का अस्थिकलश  रखा गया था। स्मारक की दूसरी बड़ी  विशेषता यह है कि इसकी संरचना ऐसी है कि दो अक्टूबर को सूर्य की पहली किरण इसी पर पड ती है। गांधी जी सभी धर्मों का आदर करते थे, इसी बात को ध्यान में रखकर स्मारक को भी सभी धर्मों के सम्मिलित रूप को लेकर बनाया गया है। इसमें मंदिर, मस्जिद, चर्च और गुरुद्वारे की संरचना का  दर्शन होता है। 

सूर्यास्त
सूर्यास्त 

  कन्याकुमारी में सूर्योदय की तरह सूर्यास्त देखने का भी एक अलग आकर्षण  है। अरब सागर में डूबते हुए सूर्य को देखने के लिए भारी भीड़ जमा होती है। हालाँकि सूर्यास्त में वह जादुई खिंचाव नहीं है जो सूर्योदय में होता है। सच भी है, आरम्भ में जो ऊर्जा होगी, वह अन्त में कैसे हो सकती है। प्रकाश और अंधकार के आगमन के स्वागत में अन्तर तो होना ही चाहिए। शाम  होते ही सैलानी अपने-अपने कैमरे संभाल सागर तट पर जमा हो जाते हैं और लहरों का खेल देखते हैं। सागर तट पर ही सूर्यास्त देखने के लिए ऊँचा सा सूर्यास्त विन्दु (सनसेट प्वांइट) बना है जिस पर पाँच रुपये का टिकट लेकर जाया जा सकता है। हाँ, यदि बादल न हों तो सूर्यास्त का दृश्य भी अच्छा होता है।
सूर्यास्त 

कन्याकुमारी में कन्याकुमारी मंदिर के पास ही अच्छा सा बाजार है जहाँ दक्षिण भारतीय हस्तकला के सजावटी सामान उचित मूल्य पर मिल जाते हैं। इस बाजार में मध्यवर्गीय आवश्यकता  के सामान खूब बिकते हैं और ग्राहक इन्हें खरीदकर प्रसन्न होते हैं। पत्नी और बच्चे साथ थे इसलिए इस बाजार में भी पूरा समय लगा। समुद्रतटीय क्षेत्र होने के कारण यहाँ शंख , घोंघे, कौडि याँ और उनसे निर्मित सामान बिकते हैं और खरीदने लायक भी होते हैं। उत्तर भारत की अपेक्षा सूखे मेवे भी यहाँ अच्छे प्रकार के और सस्ते मिलते हैं।
हमारे पास अगले दिन दोपहर तक का समय था। अब घूमकर थक लिए थे और सागर तट पर समय बिताने के लिए दिल ललचा रहा था। लहरों की गति देखनी थी और जीवन से उनका सामंजस्य बिठाना था। नाश्ते  के बाद हम सागर तट पर चले गए- ठीक उस विन्दु के पास जिसे संगम कह सकते हैं। बच्चे रेत के घरौंदे बनाते रहे और लहरें मिटाती रहीं। दोनों में कोई भी थकने को तैयार नहीं। तेज हवा रेत पर लिखे अक्षरों को मिटाती रही और मुझे याद आती रहीं एक ग़जल की दो पंक्तियाँ जिसे गुलाम अली ने गाया है। शायर का नाम मुझे याद नहीं आ रहा है। पर बात कुछ ऐसी ही है-
                                                            तेज हवा ने मुझसे पूछा
                                                             रेत पे क्या लिखते रहते हो।
रेत पे क्या लिखते रहते हो 
हाँ, समन्दर के किनारे जीवन की निरन्तरता, विशालता  और अनन्तता के साथ-साथ लघुता का ज्ञान होता रहता है।
शाम  को हमें त्रिवेन्द्रम से राजधानी पकडनी थी। त्रिवेन्द्रम कन्याकुमारी से अस्सी किलोमीटर की दूरी पर है। कन्याकुमारी से रेल एवं बस सेवा उपलब्ध है। अपराह्‌न एक-दो बजे रेल सेवा नहीं है, अतः बस सेवा पकड नी थी। यात्रा में मैं समय के मामले में ज्यादा जोखिम नहीं लेता और कम से कम दो घंटे को अतिरिक्त समय लेकर चलता हूँ। कन्याकुमारी से त्रिवेन्द्रम के बीच की दूरी प्राकृतिक दृश्यों  को निहारने में ही निकल जाती है। हाँ, रास्ते में एक छोटी सी घटना जरूर घटी जिसने मेरे मन पर गहरा असर डाला। मैंने कन्याकुमारी में काफी रात गए युवतियों को निश्चिन्त भाव से अकेले ही बस की प्रतीक्षा करते या घर जाते देखा था और वहाँ की परम्परा पर मुग्ध भी हुआ था। यहाँ भी कुछ ऐसा ही देखा जिससे लगा कि केरल और तमिलनाडु में 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते' संस्कृति गहराई तक गई हुई है। हुआ ऐसा कि बस में ड्राइवर केबिन में सिंगल सीट पर एक सुन्दर युवती बैठी हुई थी और  उसके पीछे दो वाली सीट पर एक युवती और एक अधेड  महिला बैठीं थीं। रास्ते में अधेड  महिला उतर गई और युवती सीट पर अकेली रह गई। सीट के पास ही एक युवक खड़ा था और अब वह युवती के पास बैठ सकता था। परन्तु उसने इस अवसर का लाभ नहीं उठाया। खुद युवती के पास बैठने के बजाए वह सिंगल सीट पर बैठी युवती को बुलाकर दो वाली सीट पर बिठाया और उस सीट पर अकेले ही जाकर बैठ गया। मुझे लगा कि हमें अभी बहुत कुछ सीखना बाकी है।

त्रिवेन्द्रम कब आ गया, हमें मालूम ही नहीं हुआ। उस भूमि को प्रणाम कर हम राजधानी में घुस गए और जल्दी ही देश  एक बड़े शहर की भीड  में धंसकर कहीं गुम हो गए............. 

Monday, 10 October 2011

Vivekanand Rock Memorial

                                      विवेकानन्द रॉक मेमोरिअल
                                                                 -हरिशंकर राढ़ी

      कन्याकुमारी के मुख्य  भूखण्ड से लगभग पाँच सौ मीटर की दूरी पर सागर में स्थित विवेकानन्द स्मारक यहाँ का एक महत्त्वपूर्ण आकर्षण  है। इस स्मारक पर गए बिना कन्याकुमारी की यात्रा व्यर्थ ही मानी जाएगी। यहाँ पहुँचने के लिए तमिलनाडु राज्य के अधीनस्थ पूम्पूहार शिपिंग  कारपोरेशन फेरी सर्विस (नाव सेवा) चलाता है। सेवा प्रातः शुरू होती  है और इसका अन्तिम चक्कर सायं चार बजे लगता है। इसके बाद चट्टान पर जाने हेतु सेवा बंद हो जाती है, उधर से आने के लिए उपलब्ध रहती है।

        विवकानन्द रॉक मेमोरिअल दरअसल लगभग उस विन्दु के पास स्थित है जहाँ तीनों सागर मिलते हुए दिखाई देते हैं। वैसे यह बंगाल की खाड़ी में मोती के समान उभरी जुड वाँ चट्टानों में से एक पर स्थित छोटा सा स्मारक है जिस पर कभी भारत के आध्यात्मिक, दार्शनिक , बौद्धिक गुरु एवं आदर्श युवा  संत स्वामी विवेकानन्द ने ध्यान साधना की थी। इस चट्टान को स्मारक का स्वरूप सन १९७० में दिया गया। स्मारक का निर्माण निर्देशन  श्री एकनाथ रानाडे ने किया था। विवेकानन्द चट्टान के पास ही दूसरी चट्टान पर तमिल के विख्यात  संत कवि तिरुवल्लुवर की विशाल  मूर्ति है।
विवेकानंद  स्मारक  

   
        फेरी सर्विस से हम लोग भी जल्दी ही विवेकानन्द राकॅ मेमोरिअल पहुँच गए। वहाँ पहुँचना अपने आप में एक आनन्द था। यह स्थल सदा से ही पवित्र रहा है और इस चट्टान को हिन्दू आस्था की केन्द देवी दुर्गा के एक रूप पार्वती का वरदान प्राप्त है। यहाँ विवेकानन्द केन्द्र की ओर से एक सूचना केन्द्र स्थापित है जहाँ इस खण्ड के विषय  में पूरी सूचना उपलब्ध है। 

          विवेकानन्द रॉक मेमोरिअल वस्तुतः भारत की पारम्परिक एवं आधुनिक वास्तुकला का एक उत्कृष्ट  नमूना है। इसे दो खण्डों में बाँटा जा सकता है - श्रीपाद मण्डपम एवं विवेकानन्द मण्डपम। श्रीपाद मण्डपम के विषय  में मान्यता है कि यहाँ देवी पार्वती के पद्मपाद अंकित हैं। ऐसा दिखता भी है। श्रीपाद मण्डपम में चट्टान पर स्वयं उभरे हुए रक्ताभ पैर दृष्टिगोचर होते हैं। कहा जाता है कि इस चट्टान पर देवी पार्वती ने कभी तपस्या की थी। यहाँ की भाषा  में इसे श्रीपादपाराई के नाम से जाना जाता है।
विवेकानंद मंडपम के सामने लेखक 


         दूसरे खण्ड पर विवेकानन्द मण्डपम स्थित है। स्वामी विवेकानन्द ने इस चट्टान पर वर्ष  1892 में दिसम्बर 25,26, एवं 27 को यहाँ ध्यान साधना की थी। यहाँ निर्मित ध्यान मण्डपम में स्वामी विवेकानन्द की एक बड़ी जीवंत मूर्ति स्थापित की गई है। मण्डपम में ऊँ का मधुर नाद होता रहता है। यात्री यहाँ बैठकर कुछ पल ध्यान करते हैं। मण्डपम के पृष्ठ  भाग में उत्तरायण और दक्षिणायन आधार का एक काल  दर्शक   (कैलेण्डर) भी है जो भारत की कालनिर्णय क्षमता का प्रतिबिम्बन करता है।

           विवेकानन्द मण्डपम में पीछे की ओर विवेकानन्द केन्द्र की ओर से संचालित दूकान भी है जिसमें विवेकानन्द से सम्बन्धित अनेक प्रकार के फोटो एवं दुर्लभ पुस्तकें विक्रय हेतु उपलब्ध हैं। पुस्तकें देखकर मेरा मन बहुत ललचाता है और बिना पढ़े रहा नहीं जाता । किताबें पहले से ही इतनी इकट्‌ठी हो चुकी हैं कि नई के लिए जगह नहीं। आखिर जमा करना ही तो सब कुछ नहीं । पढना भी तो चाहिए। मैं पुस्तकों पर दृष्टि  डाल ही रहा था कि एक विक्रेता मुझे रोमेन रोलैण्ड की विश्वप्रसिद्द  पुस्तक 'The Life of Vivekanand and The Universal Gospel'  दिखाने लगा और खरीद लेने के लिए प्रेरित करने लगा। मूलतः जर्मन भाषा  में लिखी यह पुस्तक विवेकानन्द पर लिखित असंख्य   पुस्तकों में अपनी अलग प्रतिष्ठा  रखती है। घूमता -फिरता न जाने कहाँ से बेटा आ गया । तब वह दस वर्ष  का था। पता नहीं उसे क्या आकर्षण  लगा कि इसे खरीदने के लिए जिद करने लगा। सेकेण्डों में ही वह अपनी पॉकेट मनी कुर्बान करने को तैयार होगा। मन तो मेरा भी था ही। पुस्तक ले ली। यह बात अलग है कि मैंने तो समय निकाल कर पढ  लिया पर वे श्रीमान जी जर्मन से अंगरेजी में अनूदित उस पुस्तक की भाषा  को झेल न सके और कभी आगे पढ ने के वादे पर अभी कायम हैं।

तिरुवल्लुवर की विशाल मूर्ति
         इस चट्टान पर देर तक घूम-फिर लेने के बाद इसकी जुड़वाँ चट्टान पर चलने का क्रम आया। यह दूसरी चट्टान तमिल संत कवि तिरुवल्लुवर को समर्पित है और यह विवेकानन्द मेमोरिअल से स्टोन्स थ्रो की दूरी पर ही कही जाएगी- बमुश्किल  बीस मीटर पर। नाव पर सवार हुए और पहुँच गए इस लघु प्रस्तरखण्ड पर निर्मित विशालकाय स्मारक पर । यहाँ प्रसिद्ध तमिल कवि तिरुवल्लुवर की 133 फीट ऊँची मूर्ति है। इस महान कवि का जन्म ईसा पूर्व सन्‌ 31 में हुआ था। यह एशिया  की सबसे बड़ी  मूर्तियों में एक है और इसका निर्माण कार्य 1 जनवरी, 2000 को सम्पन्न हुआ था। चेन्नई के प्रसिद्ध शिल्पी  डॉ.वी गणपति स्थपति ने अपने साथ ५०० कुशल  शिल्पियों  को लेकर इस कार्य को पूरा किया था।


      मूर्ति की स्थापना 95 फीट ऊँचे चबूतरे पर हुई है और इसका आधार 38 फीट है जो 'तिरुक्कुरुल' के कुल अध्यायों का प्रतिनिधित्व करता है। मूर्ति के आधार के पास अर्थ मण्डपम बना हुआ है जिस पर दस हाथियों का अंकन हुआ है। ये दस हाथी दस दिशाओं  के प्रतीक हैं। पूरी संरचना ग्रेनाइट पत्थरों की है और आश्चर्य  की बात यह है कि इसके निर्माण में कहीं इस्पात का प्रयोग नहीं किया गया है। यह भी अद्‌भुत शिल्प  का ही नमूना है कि लगभग 7000 टन भार बिना किसी सहारे के टिका हुआ है। 

        2004 की सुनामी में लहरें इतनी ऊँची उठी थीं कि मूर्ति का कंधा डूब गया। जो कन्याकुमारी नहीं गए हैं वे तिरुवल्लुवर की मूर्ति के चित्र को देखकर सुनामी की भयंकरता का अनुमान लगा सकते हैं।


       इन चट्टानों पर खड़े होकर सागर की लहरों को टकराते देखना एक जीवन दर्शन सा लगता है। चारो ओर अतल सागर और बीच में बुल्ले की तरह दो चट्टानें। तीन सागरों का मिलन! यहाँ से पानी के रंग के आधार पर बंगाल की खाड़ी, हिन्द महासागर और अरब सागर को पहचाना जा सकता है। दूर- दूर घूमती नौकाएं और अन्ततः अनन्त जल राशि। आप सीधा जाएं तो दक्षिणी ध्रुव पहुँच जाएंगे । विश्व  का एकमात्र देश हिन्दुस्तान जिसके नाम पर एक महासागर भी है
तिरुवल्लुवर खंड से सागर का दृश्य और बच्चे : छाया- राढ़ी

          देखते- सोचते कहीं दूर तक चला गया मैं - न जाने क्या-क्या! भाव आते - जाते रहे। कन्याकुमारी के रॉक मेमोरिअल पर तमिल महाकवि तिरुवल्लुवर के स्मारक पर खड़ा  मैं देख रहा हूँ तीन सागरों की मिली-जुली लहरें थोड़ी सी बची हुई चट्टान पर लगातार टक्कर मार रही हैं। पता नहीं क्या द्वेष  है या संघर्ष  या फिर प्यार! ये रुक नहीं रही हैं और चट्टानें अडिग सी खड़ी झेले जा रही हैं इनका वार। काई लग चुकी है, घिस चुकी हैं पर हिलती नहीं, हटती नहीं। लहरें भी टकराकर फेन उगलने लग जाती हैं, धराशायी हो जाती हैं पर इन्हें भी रुकना नहीं; बस चलते जाना है और शायद  यही संघर्ष  है।

     डायरी में ये पंक्तियाँ लिखी है, तारीख है २८ सितम्बर और समय अपराह्‌न के १२.10। बस अब वापस भूखण्ड पर आने ही वाले हैं........ 

Wednesday, 5 October 2011

Kanyakumari Mein

                                        कन्या कुमारी में सूर्योदय 
                                                                              
                                                                                     -हरिशंकर राढ़ी
       
            होटल की बॉलकनी में बैठा रात देर तक शहर  का दृश्य  देखने का आनन्द लेता रहा था। बॉलकनी के ठीक सामने लोकल बस स्टैण्ड था और मैं यह देखकर आश्चर्यमिश्रित सुख लेता रहा कि रात के ग्यारह बजे भी युवतियाँ निश्चिन्त  भाव से अपने गन्तव्य के लिए साधन का इन्तजार कर रही हैं। उनके चेहरे पर न कोई भय न घबराहट! निःसन्देह यह केवल प्रशासन  का परिणाम नहीं होगा। प्रशासन  तो कमोबेश  हर जगह ही है। हम तो देश  की राजधानी दिल्ली में रहते हैं जहाँ समूचे देश  को चलाने के लिए नियम-कानून बनते हैं। बनाने वाले भी यहीं रहते हैं और उनका पालन कराने वाले भी । किन्तु, जब तक पालन करने वाले नहीं होंगे, पालन कराने वाले चाहकर भी कुछ विशेष  नहीं कर सकते हैं। केरल में इसका उल्टा है। कानून बनाने वाले और उनका पालन कराने वाले हों या न, पालन करने वाले खूब हैं। कोई राह चलती युवती को आँख उठाकर देखने वाला ही नहीं है। शायद  पढे़-लिखे होने का असर हो। साक्षरता में केरल अग्रणी तो है ही। पर अगले क्षण मेरे मन ने यह तर्क मानने से मना कर दिया। हम दिल्ली वाले क्या कम पढ़े - लिखे हैं। साक्षरता में इधर के शहर  भले ही पीछे हों परन्तु उच्च शिक्षा  में तो कतई नहीं। फिर भी देखिए, अगर आप अखबार के ऐसे अंक की तलाश  में लग जाएं जिसमें बलात्कार, छेड -छाड  या महिलाओं से दुर्व्यवहार की कोई खबर न हो तो शायद  आपको निराशा  ही हाथ लगेगी। दक्षिण में (विशेषतः केरल में) मुझे ऐसे कई उदाहरण मिले जिससे मैं प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाया और एक बार यह विचार पुनः पुष्ट हुआ  कि शिक्षा  से कहीं बहुत ऊपर संस्कार और स्वस्थ परम्पराएँ होती हैं। संस्कार और परम्पराएं हमें विरासत में उसी प्रकार मिलती हैं जैसे वायु और जल जबकि शिक्षा उस प्रकार मिलती है जैसे उद्यम से अन्न और धन। जहाँ यह बात मन के केन्द्र में बैठी है कि महिलाएं आदरणीय हैं, समाज और परिवार की इज्जत हैं, वहाँ इस प्रकार का दृश्य होना स्वाभाविक ही है। अब यदि कोई किसी सुन्दर युवती को एक बार मुड़कर देख लेता है या कई बार भी देख लेता है; उसके सौन्दर्य का निरापद नैत्रिक पान कर लेता है तो इस पर भी ज्यादा हायतौबा नहीं मचनी चाहिए। हम प्रकृति का अपमान करने के लिए स्वतंत्र नहीं हैं, यह हमें याद रखना चाहिए।  सौन्दर्य से बच पाना या फिर उसकी उपेक्षा करना भी स्वाभाविक नहीं है और यह सौन्दर्यबोध का प्रतीक भी है। कितना अच्छा हो कि सुख एक मर्यादा के भीतर ही लिए जाएं!


कन्या कुमारी का बाज़ार 
         
        रात में देर से सोया था- इस विश्वास  के साथ कि अलार्म बजेगा और सागर में सूर्योदय अवश्य  देखूँगा। किन्तु मुझे लगता है कि सारी की सारी योजना धरी रह जाती अगर श्रीमती जी की नींद आदतन समय पूर्व नहीं खुल जाती। स्थिति को भाँपने की उनकी क्षमता बड़ी  तीव्र है और मैं कई बार अपने खयालों में डूबा जरूरी चीजें भी भूल जाता हूँ । अलार्म बजा या नहीं, यह मैं नहीं जानता किन्तु उन्होंने सूर्योदय से काफी पहले ही मुझे जगाना शुरू  कर दिया। दरअसल नींद खुलते ही स्थानीय हलचल से उन्हें पता लग गया था कि लोग-बाग कहीं जाने की जल्दी में हैं और होटल के अन्य लोग भी छत पर जा रहे हैं। सो मामले की तस्दीक कर मुझे जगाना लाजिमी समझा। एक लेखक के दुर्गुणों से उन्होंने अच्छा सामंजस्य बिठा लिया है।

सूर्यादय का एक बिम्ब 
           वास्तव में ऐसा लग रहा था कि पूरा कन्या कुमारी छतों पर आ गया है। कभी मेरे मन में यह भ्रम था कि सूर्योदय देखने के लिए कोई स्थल होगा और सारे सैलानी वहीं जाते होंगे। यहाँ तो सबकी निगाहें और कैमरे बंगाल की खाड़ी के आसमान में छायी लालिमा की तरफ लगे थे। भागकर  नीचे से  मैं भी अपना कैमरा लाया और प्राप्त अवसर के स्वागत के लिए तैयार हो गया। सागर की सतह एकदम रक्ताभ हो रही थी और महसूस हो रहा था कि मैं पहली बार सचमुच उषारानी  को देख रहा हूँ- कितनी सुन्दर , कितनी कोमल और कितनी भावुक । ऐसे जैसे कोई नवपरिणीता अपने अप्रतिम सुन्दर मुख पर पड़े झीने से आँचल को सरकाए जा रही हो। पहली बार अपने प्रकृति का कवि न होने का मलाल हुआ। सुमित्रानन्दन पन्त से लेकर विलियम वर्ड्‌सवर्थ तक नजर गई, कालिदास भी याद आए किन्तु संतोष  नहीं हुआ । कोई ना कोई कमी तो वहाँ भी है और इस उषा  का चित्र खींचने में उनसे भी भूल हुई है। हाँ, बात महाकवि माघ पर आकर जरूर ठहरती है। इस फन में उनका कोई मुकाबिला नहीं है। जो देखा , उसे उससे भी सुन्दर लिखा। शायद माघ ही ऐसे कवि हैं जिन्होंने अपने प्रकृति वर्णन से प्रकृति की सुन्दरता को मात दे दी है। उनके प्रातः वर्णन में एक और अमूल्य हीरा जुड  जाता अगर वे इस उषा और सूर्योदय को देखते!

         उस सघन मोहक लालिमा के घेरे में सागर की अतल गहराई से बाल अरुण का शनैः शनैः उदित होना अपने आप में एक सुख था। जैसे कोई सुन्दरी अपने सिर पर स्वर्ण कलश  लिए किसी पनघट पर जा रही हो या यह स्वर्णकलश  ही किसी सुन्दरी का मुखमंडल हो और वह धीर-धीर अपने घूँघट को उठा रही हो- संकोच भी हो, उत्कंठा भी हो और अपने प्रियतम को देखने की अकुलाहट भी ; और हाँ, अपने अनिन्द्य मुख को दिखाकर थोड़ी प्रशंसा  पाने का लोभ भी। यहाँ बस देखना ही देखना था। देखना  अपने आप में एक सुख था और इस सुख ले लेना भी एक सफलता!
सूर्योदय का दूसरा बिम्ब 

       इस दिन सूर्योदय देख लेना हमारे लिए सफलता ही हुई । यद्यपि कन्याकुमारी में एक सुबह और मिलती पर वह मिलकर भी नहीं मिली। वहाँ यदि आप सूर्योदय देखने से वंचित रह गए तो उस सुबह को सुबह मानना ही ठीक नहीं होगा। दरअसल वहाँ कब बादल हो जाए और सूर्योदय का दृश्य केवल बादल ही देख सकें, यह निश्चित नहीं है। हमारे साथ अगली सुबह ऐसा ही हुआ और बादलों ने पूरे सौन्दर्य पर पानी फेर दिया।

इस दिन हमारी योजना में पहला कार्यक्रम विवेकानन्द स्मारक  (इसे रॉक मेमोरियल भी कहते हैं) देखने का था जो कि यहाँ का  सबसे महत्त्वपूर्ण स्थल है।  

Sunday, 2 October 2011

Kanyakumari Ke Liye

                                               कन्या कुमारी की ओर
                                                                                
                                                                                  -हरिशंकर  राढ़ी

       योजनानुसार हमलोग प्रातः छः बजे तक रामेश्वरम बस स्टेशन  पहुँच चुके थे। वहाँ मालूम किया तो कन्याकुमारी के लिए सात बजे बस नियत  थी और वहीं खड़ी थी। बुकिंग खिडकी पर एक सभ्य तमिल उपस्थित था और हमारे साथ बहुत मैत्रीपूर्ण ढंग से बात कर रहा था। उसके अनुसार बस समयानुसार खुल जाएगी और यथासमय कन्याकुमारी पहुँचा देगी। यूँ तो बस बाहर से पुरानी ही लग रही थी परन्तु अन्दर से ठीक-ठाक थी। विशेष  बात यह थी कि यह बस दो गुणा दो थी और पुशबैक  थी, फिर भी प्रति व्यक्ति किराया एक सौ पचास रुपए मात्र! मैंने पहले भी कहा है कि तमिलनाडु सरकार की बसों में किराया काफी कम है। रामेश्वरम से कन्याकुमारी की कुल दूरी तीन सौ किलोमीटर है और यात्रा में लगभग आठ -नौ घंटे लग जाते हैं। कुल मिलाकर मामला बहुत अच्छा था। चाय वगैरह पी रहे थे तब तक एक दूसरी बस आ गई जिसके बोर्ड पर हमारे लिए पठनीय केवल अंगरेजी में  एक शब्द लिखा था - कन्याकुमारी। मित्र महोदय ने तुरन्त उस बस को पकडा  और ड्राइवर - कंडक्टर से मालूम किया तो पता चला कि वह बस तुरन्त ही कन्याकुमारी जा रही थी। हालाँकि साढ़े  छः बज चुके थे और अपनी बस सात बजे की थी ही। जल्दी-जल्दी सामान उठाकर बस में रखा गया। अन्दर जाने पर मुझे दो बातें मालूम हुई- एक तो यह कि बस तीन गुणा दो थी, सीटें  सामान्य थीं। किराया उसका भी डेढ  सौ ही! क्यों भाई? कोई ना कोई रहस्य तो जरूर है । और रहस्य यह था कि वह बस मदुराई होकर जा रही थी।
      
       दरअसल रामेश्वरम  से कन्याकुमारी के दो रास्ते हैं। एक रास्ता बंगाल की खाड़ी के समानान्तर जाता है- वाया तूतीकोरिन। यह रास्ता लगभग तीन सौ किमी (तीन सौ बीस) और पूर्वी तमिलनाडु की सैर कराता है। दूसरा रास्ता मदुराई होकर जाता है और यह काफी प्रचलित और व्यस्त है। यहाँ से मदुराई 170 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है और राष्ट्रीय  राजमार्ग संखया 49 पर चलना पड ता है। मदुराई से कन्याकुमारी 250 किमी है। राष्ट्रीय  राजमार्ग संख्या  7 (जो वाराणसी से कन्याकुमारी तक जाता है और देद्गा सबसे लम्बा राजमार्ग है) मदुराई और कन्याकुमारी को जोडता है। अब मेरे समझ में आ गया कि दोनों बसों की सुविधाओं में अन्तर के बावजूद किराया बराबर क्यों है। वाया मदुराई 100 किमी की यात्रा अधिक करनी पडती है, यद्यपि यात्रावधि बराबर ही है।  मेरा मन पहले से ही था कि पूर्वी घाट होकर ही चलना है और उधर के भूगोल की जानकारी जरूरी है। मैंने निर्णय लिया कि हम वाया तूतीकोरिन वाली बस से ही चलेंगे- इतनी दूर आना-जाना बार - बार नहीं होता। सामान उतारा गया और पहली वाली बस में सवार हो गए।  
           
      यात्रा का पहला ही रोमांचक आनन्द इंदिरा गांधी सेतु से गुजरते ही मिलने लगा। यह राजमार्ग 49 पर बना है रामेश्वरम द्वीप को भारत के मुखय भूभाग से जोडता है। यह पुल काफी लंबा है और रेल के अद्वितीय पंबन पुल के समानान्तर है। अथाह समुद्र के ऊपर तैरता यह पुल अत्यन्त ही मनोहारी दृश्य  उपस्थित करता है। एक बार तो मुझे ऐसा लगा मानो हम त्रेतायुग में निर्मित सेतुबंध के नवीन संस्करण से होकर गुजर रहे हों। बस की तीव्र गति के आगे पुल की लंबाई ज्यादा नहीं ठहर सकी और हम सेतुसागर का आनन्द देर तक नहीं ले सके पर जो ले लिया वह कम नहीं था।

नमक के टिब्बे 

     आगे रामनाथपुरम नामक शहर  आता है जो कि जिला मुखयालय भी है। यहीं से कुछ दूर चलकर हमारी बस  मदुराई वाला रास्ता छोड कर बाएं मुड  गई । जैसे - जैसे आगे बढ ती गई, पूर्वी घाट का वास्तविक दृश्य  जो कभी भूगोल की किताबों में पढ़ा  या पढाया था, साक्षात होने लगे और समुद्रतटीय इलाका आकर्षित  करने लगा। अक्टूबर के महीने की सुबह के लगभग नौ बजे रहे होंगे किन्तु ऐसा लग रहा था कि मई या जून की सुबह हो।
नमक बटोरने की प्रक्रिया 
     गाँव और शहर  काफी दूरी पर बसे हुए लगते हैं। देखकर यूँ लगता है कि प्रकृति बिलकुल फुरसत में बैठी आराम कर रही हो।  लगभग बारह बजे बस ने  समुद्र के समानान्तर सीधी सडक पकड़ ली । जगह - जगह सफेद चमकते हुए टिब्बे दिखने लगे l बच्चे जो अब तक थक कर शांत  हो चुके थे, टिब्बे देखकर  पुनः जागृत हो गए और पूछने लगे कि यह क्या है? क्या इस रंग का भी पहाड  होता है? टिब्बों की चमक रेगिस्तान की रेत की तरह आँखों को चुंधिया रही  थी । दरअसल ये नमक के टिब्बे थे। इस क्षेत्र में खाड़ी के जल से नमक बनाने का कार्य होता है। यह बिना साफ किया गया नमक होता है। किसी समय यही नमक बाजार में बिकने के लिए आ जाता था। अभी पंद्रह -बीस साल पहले तक मैंने अपने गाँव में लोगों को यही नमक जो छोटे-छोटे ढेलों के रूप में होता था, बाजार से लाकर खाते देखा था। अभी भी गाँव जाता हूँ तो देखता हूँ कि वहाँ के बाजार में यह नमक बिकता है और कुछ लोग खरीद कर लाते हैं। चिकित्सकों के अनुसार उन्हें अपने स्वास्थ्य (?) की चिन्ता ही नहीं है। अब इन्हें कौन समझाए कि स्वास्थ्य की चिन्ता वह करता है जिसका पेट भरा हो और पेट उसका भरता है जिसकी जेब भरी हो। बड़ी - बड़ी क्यारियों में समन्दर का पानी भरा हुआ था, जैसे धान की क्यारियों में भरा जाता है। हवा चल रही थी और तीन-चार इंच गहरे पानी में भी लहरें मचल रही थीं।  यही पानी सूख जाएगा तो नमक इकट्‌ठा कर लिया जाएगा और ऊँचे- ऊँचे टिब्बे बना दिए जाएंगे।
नमक की क्यारियां 
       एक लम्बी यात्रा के बाद हम लगभग चार बजे कन्याकुमारी के नजदीक पहुँचने  लगे। यहाँ हरियाली का साम्राज्य स्थापित था। नारियल के बगीचे हमारी आँखों में जैसे बस चुके थे और जैसे हमें आदत सी हो चली थी इन्हें देखने की।यहाँ प्रकृति समृद्ध है, इसलिए क्षेत्र समृद्ध होगा ही। यहाँ पहली बार हमने पवनचक्की (विण्डमिल) देखी। ऊँचे-ऊँचे खम्भों पर बड़ी - बड़ी पंखुडियाँ अपनी मस्ती में पवन का साथ पा डोले जा रही थीं मानो कोई प्रेमिका अपने प्रियतम से मिलने का उत्सव मना रही हो। 


कन्याकुमारी एक प्रसिद्ध पर्यटक स्थल है और पर्यटन ही यहाँ का मुख्य  व्यवसाय है, इसलिए यहाँ होटलों की भरमार है। अक्टूबर यहाँ यात्रा का सीजन है, हालाँकि प्रमुख  सीजन दिसम्बर को माना जा सकता है। सन 2009 में यहाँ हमें रु.500 में तीन बिस्तर वाला एक बड़ा कमरा मिल गया था। कमरे में सुविधाएँ भी ठीक थीं। यहाँ स्वामी विवेकानन्द का एक आश्रम है जिसमें ठहरने की सुविधा अच्छी है किन्तु इसकी दूरी कन्याकुमारी के मुख्य  बिन्दु से लगभग दो किमी होगी। इस आश्रम में कमरों की बुकिंग ऑन लाइन होती है। आप कन्याकुमारी जाएँ तो ठहरने के लिए अन्तिम प्वाइंट के आसपास के किसी होटल को वरीयता दें। दूसरी यह बात ध्यान में जरूर रखें कि होटल की तीन- चार मंजिल से कम ऊँचा न हो। इसका सबसे बड़ा  लाभ यह होगा कि आप को अपने होटल की छत से सूर्योदय दर्शन  का अकथनीय सुख मिलेगा। यदि कन्याकुमारी में आप सूर्योदय नहीं देख पाए तो आप की यात्रा अधिकांशत: निरर्थक गई।
 आज बस की यात्रा ने हमें थका दिया था। थोड़ी  देर आराम किया और भोजन के लिए निकल गए। वह भी अच्छा ही रहा। अन्ततः सूर्योदय के लिए मोबाइल में सचेतक लगाकर सो गए। अगले अंक में सूर्योदय का दृश्य  आपके सामने होगा.......