Tuesday, 31 May 2011

कुछ भी कभी कहीं हल नहीं हुआ

कितनी बार हुई हैं
जाने ये बातें

आने-जाने वाली.
विनिमय के
व्यवहारों में कुछ
खोने-पाने वाली.
फिर भी कुछ भी कभी कहीं हल नहीं हुआ.

जल ज़मीन जंगल
का बटना.
हाथों में
सूरज-मंगल
का अटना.
बांधी जाए
प्यार से जिसमें
सारी दुनिया
ऐसी इक
रस्सी का बटना.

सभी दायरे
तोड़-फोड़ कर
जो सबको छाया दे-
बिन लागत की कोशिश
इक ऐसा छप्पर छाने वाली.
फिर भी कुछ भी कभी कहीं हल नहीं हुआ.

हर संसाधन पर
कुछ
घर हैं काबिज.
बाक़ी आबादी
केवल
संकट से आजिज.
धरती के
हर टुकड़े का सच
वे ही लूट रहे हैं
जिन्हें बनाया हाफ़िज.

है तो हक़ हर हाथ में
लेकिन केवल ठप्पे भर
लोकतंत्र की शर्तें
सबके मन भरमाने वाली.
इसीलिए, कुछ भी कभी कहीं हल नहीं हुआ.

Thursday, 12 May 2011

ek geet


कारवाँ क्या करूँ
(जीवन के तमाम चमकीले रंगों के बीच श्वेत - श्याम  रंग का अपना अलग महत्त्व होता है।  बाहर से रंगहीन दिखने वाली सूरज की किरणों में इन्द्र धनुष  के सातो रंग समाए होते हैं । श्वेत - श्याम  रंग में बना ये क्लॉसिकल चित्र आप भी देखें और सोचें- ) 

अंजुमन स्याह सा, हर चमन आह सा
दर्द की राह सा मैं रहा क्या करूँ ?
दौड़ते - दौड़ते, देखते - देखते
मंजिलें लुट गईं ,कारवाँ क्या करूँ ?
 जिन्दगी -जिन्दगी तू बता क्या करूँ ?

अपनी अर्थी गुजरते रहा देखते
और मैंने ही पहले चढ़ाया सुमन
खुद चिता पर लिटाकर उदासे नयन
रुक गए पाँव लेकर चला जब अगन
पुष्प  क्या हो गए , हाय कैसा नमन -
नागफनियों के नीचे दबा था कफन !
अलविदा कर लिया हर ख़ुशी  का सजन
रो पड़ीं लकड़ियाँ आंसुओं में सघन
और चिता बुझ गई, कैसे होगा दहन ?
देखकर वेदना यह सिसकती चिता
मरमराने लगी प्रस्फुटित ये वचन -
तुम कहाँ योग्य मेरे प्रणय देवता
लौट जाओ नहीं मैं करूँगी वरण,
   
      हम खड़े के खड़े , मूर्तिवत हो जड़े
      दर्द को भेंटते, प्यार को सोचते
      शून्य  को देखते -देखते रह गए
      राख देनी उन्हें थी, खुदा क्या करूँ ?
      मंजिलें लुट गईं, कारवाँ क्या करूँ ?

कल्पना खंडहर में बजी बांसुरी
मन थिरक सा उठा एक क्षण के लिए
अनछुई सी गुदगुदाने लगी
ये चरण चल पड़े उस चरण के लिए
स्वप्न संसार में चार चुम्बन लिए
बन्द आँखें हुईं मधुमिलन के लिए,
इन्द्रधनुषी  उदासी दुल्हन सी सजी
रास्ते में खड़ी थी वरण के लिए
एक सूरज समूचा समर्पित किया
अधखिले चांद की एक किरण के लिए
जिन्दगी जानकी स्वर्णमृग सी छली
सौ दशानन  खड़े अपहरण के लिए
स्नेह- सौन्दर्य की लालसा मर गई
सुख विवश  हो गया वनगमन के लिए,
       
        हम लुटे के लुटे, हर कदम पर पिटे
        कोसते रह गए, नोचते रह गए
        हाँ, इसी हाथ से पंख ऐसे कटे
        फड़फड़ाता रहा, आसमाँ क्या करूँ ?
        मंजिलें लुट गईं, कारवां क्या करूँ ?

Tuesday, 10 May 2011

वर्चस्‍वकारी तबका नहीं चाहता है कि हाशिये के लोग मुख्‍यधारा में शामिल हों

9 मई को वर्धा के महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में हुए इस आयोजन की रिपोर्ट अमित विश्वास ने ईमेल के ज़रिये भेजी है. बिलकुल वही रपट बिना किसी संपादन के आप तक पहुंचा रहा हूं.

महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय,

वर्धा में ''हाशिये का समाज'' विषय पर आयोजित परिसंवाद में बतौर मुख्‍य

वक्‍ता के रूप में सुप्रसिद्ध आदिवासी साहित्‍यकार व राजस्‍थान के

आई.जी.ऑफ पुलिस पद पर कार्यरत हरिराम मीणा ने कहा कि समाज का

वर्चस्‍वकारी तबका नहीं चाहता है कि हाशिये के लोग मुख्‍यधारा में शामिल

हों।

फादर कामिल बुल्‍के अंतरराष्‍ट्रीय छात्रावास में आयोजित समारोह की

अध्‍यक्षता विवि के राइटर-इन-रेजीडेंस सुप्रसिद्ध साहित्‍यकार से.रा.

यात्री ने की। इस अवसर पर विवि के राइटर-इन-रेजीडेंस कवि आलोक धन्‍वा,

स्‍त्री अध्‍ययन के विभागाध्‍यक्ष डॉ.शंभु गुप्‍त मंचस्‍थ थे। हरिराम

मीणा ने विमर्श को आगे बढाते हुए कहा कि स्‍त्री, दलित, आदिवासी, अति

पिछड़ा वर्ग, ये 85प्र‍तिशत समाज हाशिये पर हैं, इसी पर प्रजातांत्रिक

प्रणाली टिकी हुई है। दिन-रात मेहनत करने पर भी इन चार वर्गों को मूलभूत

सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं। समाज की वर्चस्‍ववादी शक्तियां इनके

व्‍यक्तित्‍व विकास में रोड़े अटकाती हैं।

समाज के प्रभुवर्ग द्वारा हाशिये वर्ग का किस प्रकार से शोषण किया जा रहा

है, का जिक्र करते हुए उन्‍होंने कहा कि आदि मानव व श्रमसाध्‍य मानव को

धकेल कर हाशिये पर किया गया है। ये दलित, दमित, शोषित हैं। दलित, अछूत

वर्ग यह एक समाजशास्‍त्री अवधारणा है, समाज के स्‍तर पर इनका दमन किया

गया है। राजशक्ति के तौर पर भी इनका दमन किया गया है। अर्थशास्‍त्री

दृष्टिकोण से इनके श्रम का शोषण किया जाता रहा है। आज 85 प्रतिशत तबके के

श्रम को मान्‍यता नहीं देना एक वर्चस्‍व बनाए रखने की साजिश है। आखिर कौन

नहीं चाहेगा कि उनका विकास हो, पर विकास किसके लिए हो रहा है, यह एक बड़ा

सवाल है। बांध बनाते वक्‍त जिन्‍हें विस्‍था‍पित किया जाता है, उनके घरों

में बिजली नहीं दी जाती है अपितु बिजली शहरों में भेजी जाती है। झाबुआ

जिले में इंदिरा आवास योजना के तहत मकान बनवा कर दिया गया पर आदिवासियों

ने उन्‍हें तोड़ दिया क्‍योंकि वे यह मानकर चलते हैं कि मकान के बहाने

कहीं उनके जमीन को सरकार हड़प न लें। जंगल में ही रखकर आदिवासी संस्‍कृति

को सुरक्षित रखनेवाले लोगों से य‍ह अवश्‍य पूछा जाना चाहिए कि आपका समाज

चांद पर जाएगा और मूल समाज को जंगलों में ही छोड़ दिया जाएगा? क्‍या

उन्‍हें सिर्फ 26 जनवरी के झांकियों के लिए इस्‍तेमाल किया जाता रहेगा ?

विकास बनाम आदिवासी संस्‍कृति का रक्षण करना है तो इन्‍हें परिधि से

केंद्र में लाना होगा, उन्‍हें विश्‍वास में लेना होगा। नक्‍सलवाद/माओवाद

पर चर्चा करते हुए उन्‍होंने बताया कि आखिर बेकसूर आदिवासियों को क्‍यों

मारा जा रहा है। आदिवासियों को मारनेवाले तथाकथित सभ्‍य समाज के लोगों को

पहले यह साबित करना होगा कि ये मनुष्‍य नहीं है। शोषणकारी सत्तासीन वर्ग

उन्‍हें दैत्‍य, दानव, असुर, राक्षस करार देते हुए पहले सिद्धांत गढता है

फिर उन्‍हें आतंकवादी करार कर उन्‍हें मारने का लाइसेंस हासिल कर लेता

है।

भूमंडलीकरण पर प्रकाश डालते हुए हरिराम मीणा ने कहा कि वैश्‍वीकरण,

उदारीकरण, निजीकरण का नारा आज कौन दे रहा है \ अमेरिका लादेन को पकड़ने

के लिए एयरस्‍पेस नियम का उलंघन करता है तो कोई बात नहीं, यही कोई और देश

करेगा तो यह एक बहुत बड़ी घटना के रूप में पेश किया जाएगा। वैश्‍वीकरण के

संदर्भ में चालाक, चतुर, टेक्‍नोक्रेट जानते हैं कि कैसे आम इंसान को

उपभोक्‍ता समाज तब्‍दील किया जा सकता है। पूंजी, बाजार और विज्ञापन इसके

वाहक हैं और इसका नायक अमेरिका है। आज मल्‍टीनेशनल्‍स के आधिपत्‍य में

हाशिये और भी शोषित होते जा रहे हैं। एक जिम्‍मेदार नागरिक के रूप में

स्‍त्री, दलित, दमित, शोषित की पहचान करनी पड़ेगी। आदिवासियों, दलित,

अतिपिछड़े वर्ग को अपने अधिकारों के लिए एकजुट होना पडे़गा तभी ये सब

मुख्‍यधारा में आ सकेंगे वर्ना प्रभु वर्ग हाशिये से भी धकेलते रहेगा।

अध्‍यक्षीय वक्‍तव्‍य में से.रा.यात्री ने कहा कि हमें आखिरी पायदान के

व्‍यक्ति को पहले पायदान पर लाने की प्रयास करने की जरूरत है।

प्रस्‍ताविक वक्‍तव्‍य में डॉ.शंभु गुप्‍त ने हाशिये के समाज को

मुख्‍यधारा में लाने के लिए विविध प्रसंगों पर प्रकाश डाला। इस अवसर पर

डॉ.सुनील कुमार 'सुमन', राकेश मिश्र, अखिलेश दीक्षित, शिवप्रिय समेत कई

प्राध्‍यापकों-शोधार्थियों आदि ने भी चर्चा में भाग लेकर बहस को

विचारोत्‍तेजक बनाया।

Saturday, 7 May 2011

एक साहब बयानबहादुर और एक सपोर्टबहादुर

हाल ही में ओसामा जी की नृशंस हत्या के बाद अमेरिका ने दुनिया के सबसे शांतिप्रिय देश पाकिस्तान को धमकी दी कि ज़रूरत पड़ी तो वह पर फिर से ऐसी ही कार्रवाई कर सकता है. इसके बाद तो क्या कहने! कितना भी शांतिप्रिय हो, लेकिन कोई धमकी देगा तो कोई भी क्या करेगा. बहादुरी के मामले में पाकिस्तान का तो वैसे भी कोई जवाब नहीं रहा है. इतिहास गवाह है कि आमने-सामने की लड़ाई में वह कभी किसी से जीता नहीं है और छिपकर हमला करने का कोई मौक़ा उसने छोड़ा नहीं है. आप जानते ही हैं कि सामने आ जाए तो चूहे से आंख मिलाना वे अपनी तहजीब के ख़िलाफ़ समझते हैं और दूर निकल गए शेर पर तो पीछे से ऐसे गुर्राते हैं कि जर्मन शेफर्ड भी शर्मा जाए. तो अब जब अमेरिका उनके मिलिटरी बेस के दायरे में ही ओसामा जी की ज़िंदगी और विश्व समुदाय में उनकी इज़्ज़त की ऐसी-तैसी करके निकल गया तो वो गुर्राए हैं. यह संयोग ही है कि ओबेडिएंसी में टॉप भारत की आर्मी के प्रमुख ने भी ऐन मौक़े पर एक सही, लेकिन मार्मिक बयान दे दिया. वह भी बिना अपने हाइनेस से पूछे और इस बात का भी ज़िक्र किए बग़ैर कि ‘अगर उनकी इजाज़त हो तो’. यह जानते हुए भी कि उनकी इजाज़त के बग़ैर वे कुछ नहीं कर सकते और हाइनेस सिवा सैनिकों की बेकीमती गर्दनें कटाने के उन्हें किसी और बात की इजाज़त नहीं दे सकते. आख़िर हमें घाटी से लेकर पूर्वोत्तर तक पूरे भारत में शांति और दुनिया भर में अपनी शांतिप्रियता की यह छवि बनाए रखनी है भाई! इतनी आसान बात थोड़े ही है.

ख़ैर, हमारे बयानबहादुर तो अपना बयान दे ही चुके. अब उन्होंने अपने बयान बहादुर को काम पर लगाया है. ओसामा जी की नृशंस हत्या के बाद घंटों चली बैठक के कई घंटे बाद तक उनके आका लोगों की तरफ़ से कोई बयान नहीं आ पाया था. ऐसे क्रूशियल मौक़े पर जिन बयानबहादुर को वहां बयान देने के महान काम पर लगाया गया था, अब उन्हीं का नया बयान आया है. यह बयान थोड़ा अमेरिका और ज़्यादा भारत के मुतल्लिक है. उन्होंने अमेरिका की कार्रवाई को तो अहम कामयाबी बताया है, लेकिन साथ ही यह भी कहा है कि अगर किसी दूसरे देश ने ऐसी ज़ुर्रत की तो यह उसकी बड़ी भूल होगी.

क्या बताएं हमें तो अपने उनके बयानबहादुर साहब की बात सुनकर वह वाक़या याद आ गया, जब ट्रेन में सफ़र कर रहे एक सज्जन के बर्थ पर कोई दूसरे सज्जन आ कर बैठ गए. पहले ने दूसरे सज्जन को हटने के लिए कहा तो उन्होंने झापड़ मार दिया. पहले को ग़ुस्सा आ गया. उन्होंने कहा कि ठीक है, हमको मारा तो मारा, हमारी बीवी को मार के दिखाओ तो जानें! फिर क्या था, उन्होंने बीवी को भी मार दिया. उसके बाद उन्होंने कहा कि बीवी को मारा तो मारा, बेटे को मार के दिखाओ तो जानें! फिर क्या था, दूसरे सज्जन ने बेटे को भी मार दिया. बात जमी नहीं, उन्होंने फिर कहा, बेटे को मारा तो मारा, अब बेटी को मार के दिखाओ तो जानें. आख़िरकार दूसरे सज्जन ने बेटी को भी मारने के बाद पूछा, ‘अब बताओ.’ दूसरे सज्जन ने पूरी सज्जनता के साथ कहा, ‘जी अब कुछ नहीं, अब कोई ये कहने लायक तो नहीं रहेगा कि तुम मार खाया.’

मुझे तो लगता है कि इन बयानबहादुर साहब का इरादा भी कुछ-कुछ ऐसा ही हो. क्योंकि उनके अपने ही पाले हुए ओसामा जी जैसे कई शांतिदूत अब उनके काबू से बाहर हो गए हैं. क्या पता उन्होंने जो बात कही हो, वो उन्हीं के लिए कही हो. कई बार आदमी कहता कुछ और है, लेकिन उसका असल आशय कुछ और होता है. मसलन – कमज़ोर आदमी को जब किसी से मदद मांगनी होती है तो कहता है, ‘प्लीज़ मेरी मदद करें’. बहादुर लोग इसे तहजीब के ख़िलाफ़ मानते हैं. वे यही बात इस तरह कहते हैं, ‘है कोई माई का लाल जो मेरे साथ दो क़दम चलकर दिखाए.’ क्या पता कि उनका मामला भी कुछ ऐसा ही हो.

वैसे भी उनके लिए यह एक मुश्किल दौर है. वैसे वीरोचित शब्दों का प्रयोग करें तो शायद कहना पड़े कि दौर-ए-फ़ख़्र है. बिरादरी के नाम पर जो लोग हर साल इन्हें ईदी भेजा करते थे, उन्होंने अब ग़ुलाम कश्मीर के पीएम साहब को नत्थी वीजा जारी करना शुरू कर दिया है. पता नहीं इसका क्या मतलब होता है. हो न हो, उनकी समझ में आ गया हो कि अब ये दुनिया भर की नज़र में शांति के सबसे बड़े दूत हो गए हैं तो इनसे नत्थी टाइप संबंध रखना ही ज़्यादा मुनासिब है. पर भाई उनकी हिम्मत की दाद तो देनी पड़ेगी. क्या पता, इस हिम्मत के मूल में हमारे उत्तर वाले पड़ोसी का सपोर्ट हो. इस दौर में एक उन्होंने ही तो इनका साथ दिया. अरे वही जिनकी मिसाल शांति और भरोसे के मामले में दुनिया भर में दी जाती है और जिनके बनाए इलेक्ट्रॉनिक आइटम उनके कूटनीतिक वादों-संकल्पों से कई गुना ज़्यादा टिकाऊ समझे जाते हैं.

बहरहाल, हमारे पश्चिम वाले पड़ोसी मुल्क और उनके बयानबहादुर को हमारे उत्तर उत्तर वाले पड़ोसी मुल्क और उनकी सपोर्ट बहादुरी पर पूरा भरोसा है. हम तो उनकी सपोर्टबहादुरी का नमूना अब से कोई 49 साल पहले देख चुके हैं, पर चूंकि वे हमारे और उनके यानी दोनों के साझा पड़ोसी हैं, लिहाजा उन्हें भी देखना चाहिए. हालांकि उनके लिए अभी उनकी सपोर्टबहादुरी का नमूना देखना बाक़ी ही है. आजकल वे दोनों जन अपनी-अपनी नमूनेबाजी की ओर बड़ी तेज़ी से बढ़ रहे हैं और ठीक ही है, दोनों एक-दूसरे की सपोर्ट और बयान या कहें सपोर्ट के बदले अपोर्ट बहादुरी के नमूने जितनी जल्दी देख लें, उतना ही बेहतर रहेगा. जबसे सपोर्टबहादुर ने बयानबहादुर को सपोर्ट करना शुरू किया है, तभी से बयानबहादुर ने सपोर्टबहादुर को अपने यहां से शांतिदूतों का एक्सपोर्ट भी शुरू कर दिया है. ठीक ही है भाई, सपोर्ट के बदले एक्सपोर्ट तो होना ही चाहिए और आप देख ही रहे हैं, सपोर्टबहादुर के कुछ प्रांतों में ओलंपिक से ठीक पहले कितनी ज़बर्दस्त पटाखेबाजी हुई थी. माना जाता है कि यह बयानबहादुर के शांतिदूतों का ही पुण्यप्रताप था. आने वाले दिनों में यह सिलसिला और बढ़ेगा, बढ़ता ही जाएगा. हमें क्या? भाई हमारे तो दोनों पड़ोसी हैं. अपने दोनों पड़ोसियों के प्रति हमारी तो शुभकामनाएं ही हैं.

Friday, 6 May 2011

अमेरिका कहीं का!

सलाहू आज बेहद नाराज़ है. बेहद यानी बेहद. उसे इस बात पर सख़्त ऐतराज है कि श्रीमान बयानबहादुर साहब ने ओसामा को इज़्ज़त से दफ़नाने की बात क्यों की? बात यहीं तक सीमित नहीं है. उसकी नज़र में हद तो यह है कि उन्होंने ओसामा के नाम के साथ जी भी लगा दिया. ऐसा उन्होंने क्यों किया? यही नहीं सलाहू ने तो श्रीमान बयानबहादुर साहब के ऐतराज पर भी ऐतराज जताया है. अरे वही कि ओसामा को अमेरिका ने समुद्र में क्यों दफ़ना दिया. मैं उसे सुबह से ही समझा-समझा कर परेशान-हलकान हूं कि भाई देखो, हमारा शांति और अहिंसा के पुजारी हैं. और यह पूजा हम कोई अमेरिका की तरह झूठमूठ की नहीं करते, ख़ुद को चढ़ावा चढ़वा लेने वाली. कि बस शांति का नोबेल पुरस्कार ले लिया. गोया शांति और नोबेल दोनों पर एहसान कर दिया. हम शांति की पूजा बाक़ायदा करते हैं, पूरे रस्मो-रिवाज और कर्मकांड के साथ.

अगर किसी को यक़ीन न हो तो और अख़बारों पर भी भरोसा न हो तो सरकार बहादुर के आंकड़े उठाकर देख ले. शांति देवी के नाम पर हर साल हम कम से कम हज़ारों प्राणों का दान करते हैं. वह भी कोई भेंड़-बकरियों की बलि चढ़ाकर नहीं, विधिवत मनुष्यों के प्राणदान करते हैं. हमारे यहां सामान्य पूजा-पाठ में नरबलि भले प्रतिबंधित हो गई हो, पर कश्मीर से आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र से पूर्वोत्तर तक पूरे भारत में शांति देवी के नाम पर हम हज़ारों मानवों की बलि हर साल चढ़ाते हैं. बलि की इस प्रक्रिया में हम कभी कोई भेदभाव नहीं करते हैं. पड़ोसी मुल्कों यानी पाकिस्तान, बांग्लादेश और चीन से ससम्मान आए शांति देवी के दूत जब जैसे और जिनकी चाहें बलि ले सकते हैं. बच्चे-बूढ़े, स्त्री-पुरुष, ग़रीब-अमीर, पुलिसमैन-सैनिक, हिंदू-मुसलमान .... धर्म-वर्ग-आयु किसी भी आधार पर कोई भेदभाव नहीं करते. शांति देवी के दूत जब जैसे चाहें, किसी के प्राण ले सकते हैं.

है किसी में इतना दम जो यह कर सके. उनसे देवी शांति के दूतों का एक हमला नहीं झेला गया. एक बार वे अपनी पूजा लेने क्या आ गए कि तबसे चिल्लाए जा रहे हैं – नाइन इलेवन, नाइन इलेवन. गोया हमला क्या हुआ, उनके देश की घड़ी ही वहीं आकर थम गई! उसके बाद वह एक मिनट भी आगे बढ़ी ही नहीं. एक हमें देखिए, हम इसे हमला नहीं, देवी के दूतों का कृपाप्रसाद मानते हैं. अपनी राजनीतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक राजधानियों पर हुई ऐसी कई घटनाओं को हम उनका कृपा प्रसाद मानते हैं. कश्मीर, पंजाब, असम, झारखंड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश में तो आए दिन हम उन्हें चढ़ावा चढ़ाते रहते हैं, अपनी संसद तक पर हम उन्हें उनकी पसंद के अनुसार बलि पात्र चुनने का मौक़ा देते हैं. कि भाई कहीं से वे किसी तरह असंतुष्ट न रह जाएं. हम अमेरिका की तरह उन्हें रोकने के लिए पासपोर्ट-वीज़ा के नियम त्रासद नहीं बनाते कि बेचारे प्रवेश ही न कर सकें. हम तो ख़ुद उनका आवाहन करते हैं, आवाहयामि-आवाहयामि वाला मंत्र पढ़कर. कभी सद्भावना बस सेवा चलवाते हैं तो कभी समझौता एक्सप्रेस ट्रेन और इससे भी काम नहीं चलता तो पासपोर्ट-वीज़ा की फ़ालतू औपचारिकताएं निबटा कर सिर्फ़ परमिट पर आने-जाने के लिए दरवाज़े खोल देते हैं.

इसे कहते हैं शांति का असली पुजारी! इतनी बड़ी संख्या में तो भेड़-बकरियों की बलि नहीं चढ़ाते होंगे, जितने हम मानव चढ़ा देते हैं. एक वे हैं कि एक मामूली से हमले के बाद सात समुंदर पार करके अफ़गानिस्तान तक चले आए. बदला लेने. यह भी नहीं सोचा कि बदला महान पाप है. जिस तरह क्रोध से क्रोध कभी शांत नहीं हो सकता, वैसे ही हत्या से हत्या भी कभी शांत नहीं हो सकती. इतनी आसान सी बात उनकी समझ में नहीं आई. एक हमें देखिए, हम घृणा पाप से करते हैं, पापी से नहीं. जिन्हें वे पापी समझते हैं, उन्हें हम शांतिदूत मानकर अपने घर में बैठाकर चिकन टिक्का खिलाते हैं. सुप्रीम कोर्ट भले उन्हें सज़ा-ए-मौत सुना दे, पर हमारा ऐसी ग़लती कभी नहीं करते. और कोर्ट की क्या मज़ाल कि वह इसे अपनी अवमानना मान ले! अरे भाई, शांति और अहिंसा के पुजारी देश हैं हम, भला हमें ऐसा करना चाहिए? फांसी-वांसी बर्बर देशों के विधान हैं. भला किसी सभ्य देश में कभी फांसी दी जाती है! सभ्य देश तो उन्हें कहते हैं जो बिना किसी बम-बंदूक के भी गैस रिसा कर हज़ारों लोगों की जान ले लेने वालों और उनकी अगली पीढ़ियों तक को अपंग बना देने वालों को भी चोरी-छिपा उड़वा कर सात समंदर पार उनके घर पहुंचवा देते हैं. है किसी में जिगरा? लेकिन सलाहू मेरी बात मान नहीं रहा है. वह इसे श्रीमान बयानबहादुर साहब और उनकी महान पार्टी की वोटबटोरी नीति से जोड़कर देख रहा है. उसे लगता है कि श्रीमान बयानबहादुर साहब का यह बयान सिर्फ़ भारत के मुसलमानों की सहानुभूति बटोरने के लिए आया है. इसका मतलब यह है कि वह भारत के हर मुसलमान को ओसामा का समर्थक मानते हैं. वरना कोई वजह नहीं है कि ओसामा के नाम के साथ जी लगाते. उसने मुझे अपने दाहिने हाथ की तर्जनी उंगली दिखाते हुए कहा, ‘और पंडित यह समझ लो कि भारत के मुसलमान की इससे बड़ी बेइज़्ज़ती कुछ और नहीं हो सकती. जितनी बेइज़्ज़ती इस्लाम की ओसामा ने की, उतनी ही बेइज़्जती ये जनाब भारतीय मुसलमान की कर रहे हैं.’

मेरी समझ में नहीं आ रहा कि वह श्रीमान बयानबहादुर साहब के बयान को हिंदू-मुसलमान से जोड़कर क्यों देख रहा है. अरे भाई, वह तो घोषित सेकुलर हैं और उनकी पार्टी भी. उनको हिंदू-मुसलमान से क्या लेना-देना! पर सलाहू है कि मान ही नहीं रहा. अमेरिका की तरह एक बार जिस बात पर अड़ गया, अब अड़ा पड़ा है उसी पर. अमेरिका कहीं का.