सलाहू आज बेहद नाराज़ है. बेहद यानी बेहद. उसे इस बात पर सख़्त ऐतराज है कि श्रीमान बयानबहादुर साहब ने ओसामा को इज़्ज़त से दफ़नाने की बात क्यों की? बात यहीं तक सीमित नहीं है. उसकी नज़र में हद तो यह है कि उन्होंने ओसामा के नाम के साथ जी भी लगा दिया. ऐसा उन्होंने क्यों किया? यही नहीं सलाहू ने तो श्रीमान बयानबहादुर साहब के ऐतराज पर भी ऐतराज जताया है. अरे वही कि ओसामा को अमेरिका ने समुद्र में क्यों दफ़ना दिया. मैं उसे सुबह से ही समझा-समझा कर परेशान-हलकान हूं कि भाई देखो, हमारा शांति और अहिंसा के पुजारी हैं. और यह पूजा हम कोई अमेरिका की तरह झूठमूठ की नहीं करते, ख़ुद को चढ़ावा चढ़वा लेने वाली. कि बस शांति का नोबेल पुरस्कार ले लिया. गोया शांति और नोबेल दोनों पर एहसान कर दिया. हम शांति की पूजा बाक़ायदा करते हैं, पूरे रस्मो-रिवाज और कर्मकांड के साथ.
अगर किसी को यक़ीन न हो तो और अख़बारों पर भी भरोसा न हो तो सरकार बहादुर के आंकड़े उठाकर देख ले. शांति देवी के नाम पर हर साल हम कम से कम हज़ारों प्राणों का दान करते हैं. वह भी कोई भेंड़-बकरियों की बलि चढ़ाकर नहीं, विधिवत मनुष्यों के प्राणदान करते हैं. हमारे यहां सामान्य पूजा-पाठ में नरबलि भले प्रतिबंधित हो गई हो, पर कश्मीर से आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र से पूर्वोत्तर तक पूरे भारत में शांति देवी के नाम पर हम हज़ारों मानवों की बलि हर साल चढ़ाते हैं. बलि की इस प्रक्रिया में हम कभी कोई भेदभाव नहीं करते हैं. पड़ोसी मुल्कों यानी पाकिस्तान, बांग्लादेश और चीन से ससम्मान आए शांति देवी के दूत जब जैसे और जिनकी चाहें बलि ले सकते हैं. बच्चे-बूढ़े, स्त्री-पुरुष, ग़रीब-अमीर, पुलिसमैन-सैनिक, हिंदू-मुसलमान .... धर्म-वर्ग-आयु किसी भी आधार पर कोई भेदभाव नहीं करते. शांति देवी के दूत जब जैसे चाहें, किसी के प्राण ले सकते हैं.
है किसी में इतना दम जो यह कर सके. उनसे देवी शांति के दूतों का एक हमला नहीं झेला गया. एक बार वे अपनी पूजा लेने क्या आ गए कि तबसे चिल्लाए जा रहे हैं – नाइन इलेवन, नाइन इलेवन. गोया हमला क्या हुआ, उनके देश की घड़ी ही वहीं आकर थम गई! उसके बाद वह एक मिनट भी आगे बढ़ी ही नहीं. एक हमें देखिए, हम इसे हमला नहीं, देवी के दूतों का कृपाप्रसाद मानते हैं. अपनी राजनीतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक राजधानियों पर हुई ऐसी कई घटनाओं को हम उनका कृपा प्रसाद मानते हैं. कश्मीर, पंजाब, असम, झारखंड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश में तो आए दिन हम उन्हें चढ़ावा चढ़ाते रहते हैं, अपनी संसद तक पर हम उन्हें उनकी पसंद के अनुसार बलि पात्र चुनने का मौक़ा देते हैं. कि भाई कहीं से वे किसी तरह असंतुष्ट न रह जाएं. हम अमेरिका की तरह उन्हें रोकने के लिए पासपोर्ट-वीज़ा के नियम त्रासद नहीं बनाते कि बेचारे प्रवेश ही न कर सकें. हम तो ख़ुद उनका आवाहन करते हैं, आवाहयामि-आवाहयामि वाला मंत्र पढ़कर. कभी सद्भावना बस सेवा चलवाते हैं तो कभी समझौता एक्सप्रेस ट्रेन और इससे भी काम नहीं चलता तो पासपोर्ट-वीज़ा की फ़ालतू औपचारिकताएं निबटा कर सिर्फ़ परमिट पर आने-जाने के लिए दरवाज़े खोल देते हैं.
इसे कहते हैं शांति का असली पुजारी! इतनी बड़ी संख्या में तो भेड़-बकरियों की बलि नहीं चढ़ाते होंगे, जितने हम मानव चढ़ा देते हैं. एक वे हैं कि एक मामूली से हमले के बाद सात समुंदर पार करके अफ़गानिस्तान तक चले आए. बदला लेने. यह भी नहीं सोचा कि बदला महान पाप है. जिस तरह क्रोध से क्रोध कभी शांत नहीं हो सकता, वैसे ही हत्या से हत्या भी कभी शांत नहीं हो सकती. इतनी आसान सी बात उनकी समझ में नहीं आई. एक हमें देखिए, हम घृणा पाप से करते हैं, पापी से नहीं. जिन्हें वे पापी समझते हैं, उन्हें हम शांतिदूत मानकर अपने घर में बैठाकर चिकन टिक्का खिलाते हैं. सुप्रीम कोर्ट भले उन्हें सज़ा-ए-मौत सुना दे, पर हमारा ऐसी ग़लती कभी नहीं करते. और कोर्ट की क्या मज़ाल कि वह इसे अपनी अवमानना मान ले! अरे भाई, शांति और अहिंसा के पुजारी देश हैं हम, भला हमें ऐसा करना चाहिए? फांसी-वांसी बर्बर देशों के विधान हैं. भला किसी सभ्य देश में कभी फांसी दी जाती है! सभ्य देश तो उन्हें कहते हैं जो बिना किसी बम-बंदूक के भी गैस रिसा कर हज़ारों लोगों की जान ले लेने वालों और उनकी अगली पीढ़ियों तक को अपंग बना देने वालों को भी चोरी-छिपा उड़वा कर सात समंदर पार उनके घर पहुंचवा देते हैं. है किसी में जिगरा? लेकिन सलाहू मेरी बात मान नहीं रहा है. वह इसे श्रीमान बयानबहादुर साहब और उनकी महान पार्टी की वोटबटोरी नीति से जोड़कर देख रहा है. उसे लगता है कि श्रीमान बयानबहादुर साहब का यह बयान सिर्फ़ भारत के मुसलमानों की सहानुभूति बटोरने के लिए आया है. इसका मतलब यह है कि वह भारत के हर मुसलमान को ओसामा का समर्थक मानते हैं. वरना कोई वजह नहीं है कि ओसामा के नाम के साथ जी लगाते. उसने मुझे अपने दाहिने हाथ की तर्जनी उंगली दिखाते हुए कहा, ‘और पंडित यह समझ लो कि भारत के मुसलमान की इससे बड़ी बेइज़्ज़ती कुछ और नहीं हो सकती. जितनी बेइज़्ज़ती इस्लाम की ओसामा ने की, उतनी ही बेइज़्जती ये जनाब भारतीय मुसलमान की कर रहे हैं.’
मेरी समझ में नहीं आ रहा कि वह श्रीमान बयानबहादुर साहब के बयान को हिंदू-मुसलमान से जोड़कर क्यों देख रहा है. अरे भाई, वह तो घोषित सेकुलर हैं और उनकी पार्टी भी. उनको हिंदू-मुसलमान से क्या लेना-देना! पर सलाहू है कि मान ही नहीं रहा. अमेरिका की तरह एक बार जिस बात पर अड़ गया, अब अड़ा पड़ा है उसी पर. अमेरिका कहीं का.