Monday, 10 October 2011

Vivekanand Rock Memorial

                                      विवेकानन्द रॉक मेमोरिअल
                                                                 -हरिशंकर राढ़ी

      कन्याकुमारी के मुख्य  भूखण्ड से लगभग पाँच सौ मीटर की दूरी पर सागर में स्थित विवेकानन्द स्मारक यहाँ का एक महत्त्वपूर्ण आकर्षण  है। इस स्मारक पर गए बिना कन्याकुमारी की यात्रा व्यर्थ ही मानी जाएगी। यहाँ पहुँचने के लिए तमिलनाडु राज्य के अधीनस्थ पूम्पूहार शिपिंग  कारपोरेशन फेरी सर्विस (नाव सेवा) चलाता है। सेवा प्रातः शुरू होती  है और इसका अन्तिम चक्कर सायं चार बजे लगता है। इसके बाद चट्टान पर जाने हेतु सेवा बंद हो जाती है, उधर से आने के लिए उपलब्ध रहती है।

        विवकानन्द रॉक मेमोरिअल दरअसल लगभग उस विन्दु के पास स्थित है जहाँ तीनों सागर मिलते हुए दिखाई देते हैं। वैसे यह बंगाल की खाड़ी में मोती के समान उभरी जुड वाँ चट्टानों में से एक पर स्थित छोटा सा स्मारक है जिस पर कभी भारत के आध्यात्मिक, दार्शनिक , बौद्धिक गुरु एवं आदर्श युवा  संत स्वामी विवेकानन्द ने ध्यान साधना की थी। इस चट्टान को स्मारक का स्वरूप सन १९७० में दिया गया। स्मारक का निर्माण निर्देशन  श्री एकनाथ रानाडे ने किया था। विवेकानन्द चट्टान के पास ही दूसरी चट्टान पर तमिल के विख्यात  संत कवि तिरुवल्लुवर की विशाल  मूर्ति है।
विवेकानंद  स्मारक  

   
        फेरी सर्विस से हम लोग भी जल्दी ही विवेकानन्द राकॅ मेमोरिअल पहुँच गए। वहाँ पहुँचना अपने आप में एक आनन्द था। यह स्थल सदा से ही पवित्र रहा है और इस चट्टान को हिन्दू आस्था की केन्द देवी दुर्गा के एक रूप पार्वती का वरदान प्राप्त है। यहाँ विवेकानन्द केन्द्र की ओर से एक सूचना केन्द्र स्थापित है जहाँ इस खण्ड के विषय  में पूरी सूचना उपलब्ध है। 

          विवेकानन्द रॉक मेमोरिअल वस्तुतः भारत की पारम्परिक एवं आधुनिक वास्तुकला का एक उत्कृष्ट  नमूना है। इसे दो खण्डों में बाँटा जा सकता है - श्रीपाद मण्डपम एवं विवेकानन्द मण्डपम। श्रीपाद मण्डपम के विषय  में मान्यता है कि यहाँ देवी पार्वती के पद्मपाद अंकित हैं। ऐसा दिखता भी है। श्रीपाद मण्डपम में चट्टान पर स्वयं उभरे हुए रक्ताभ पैर दृष्टिगोचर होते हैं। कहा जाता है कि इस चट्टान पर देवी पार्वती ने कभी तपस्या की थी। यहाँ की भाषा  में इसे श्रीपादपाराई के नाम से जाना जाता है।
विवेकानंद मंडपम के सामने लेखक 


         दूसरे खण्ड पर विवेकानन्द मण्डपम स्थित है। स्वामी विवेकानन्द ने इस चट्टान पर वर्ष  1892 में दिसम्बर 25,26, एवं 27 को यहाँ ध्यान साधना की थी। यहाँ निर्मित ध्यान मण्डपम में स्वामी विवेकानन्द की एक बड़ी जीवंत मूर्ति स्थापित की गई है। मण्डपम में ऊँ का मधुर नाद होता रहता है। यात्री यहाँ बैठकर कुछ पल ध्यान करते हैं। मण्डपम के पृष्ठ  भाग में उत्तरायण और दक्षिणायन आधार का एक काल  दर्शक   (कैलेण्डर) भी है जो भारत की कालनिर्णय क्षमता का प्रतिबिम्बन करता है।

           विवेकानन्द मण्डपम में पीछे की ओर विवेकानन्द केन्द्र की ओर से संचालित दूकान भी है जिसमें विवेकानन्द से सम्बन्धित अनेक प्रकार के फोटो एवं दुर्लभ पुस्तकें विक्रय हेतु उपलब्ध हैं। पुस्तकें देखकर मेरा मन बहुत ललचाता है और बिना पढ़े रहा नहीं जाता । किताबें पहले से ही इतनी इकट्‌ठी हो चुकी हैं कि नई के लिए जगह नहीं। आखिर जमा करना ही तो सब कुछ नहीं । पढना भी तो चाहिए। मैं पुस्तकों पर दृष्टि  डाल ही रहा था कि एक विक्रेता मुझे रोमेन रोलैण्ड की विश्वप्रसिद्द  पुस्तक 'The Life of Vivekanand and The Universal Gospel'  दिखाने लगा और खरीद लेने के लिए प्रेरित करने लगा। मूलतः जर्मन भाषा  में लिखी यह पुस्तक विवेकानन्द पर लिखित असंख्य   पुस्तकों में अपनी अलग प्रतिष्ठा  रखती है। घूमता -फिरता न जाने कहाँ से बेटा आ गया । तब वह दस वर्ष  का था। पता नहीं उसे क्या आकर्षण  लगा कि इसे खरीदने के लिए जिद करने लगा। सेकेण्डों में ही वह अपनी पॉकेट मनी कुर्बान करने को तैयार होगा। मन तो मेरा भी था ही। पुस्तक ले ली। यह बात अलग है कि मैंने तो समय निकाल कर पढ  लिया पर वे श्रीमान जी जर्मन से अंगरेजी में अनूदित उस पुस्तक की भाषा  को झेल न सके और कभी आगे पढ ने के वादे पर अभी कायम हैं।

तिरुवल्लुवर की विशाल मूर्ति
         इस चट्टान पर देर तक घूम-फिर लेने के बाद इसकी जुड़वाँ चट्टान पर चलने का क्रम आया। यह दूसरी चट्टान तमिल संत कवि तिरुवल्लुवर को समर्पित है और यह विवेकानन्द मेमोरिअल से स्टोन्स थ्रो की दूरी पर ही कही जाएगी- बमुश्किल  बीस मीटर पर। नाव पर सवार हुए और पहुँच गए इस लघु प्रस्तरखण्ड पर निर्मित विशालकाय स्मारक पर । यहाँ प्रसिद्ध तमिल कवि तिरुवल्लुवर की 133 फीट ऊँची मूर्ति है। इस महान कवि का जन्म ईसा पूर्व सन्‌ 31 में हुआ था। यह एशिया  की सबसे बड़ी  मूर्तियों में एक है और इसका निर्माण कार्य 1 जनवरी, 2000 को सम्पन्न हुआ था। चेन्नई के प्रसिद्ध शिल्पी  डॉ.वी गणपति स्थपति ने अपने साथ ५०० कुशल  शिल्पियों  को लेकर इस कार्य को पूरा किया था।


      मूर्ति की स्थापना 95 फीट ऊँचे चबूतरे पर हुई है और इसका आधार 38 फीट है जो 'तिरुक्कुरुल' के कुल अध्यायों का प्रतिनिधित्व करता है। मूर्ति के आधार के पास अर्थ मण्डपम बना हुआ है जिस पर दस हाथियों का अंकन हुआ है। ये दस हाथी दस दिशाओं  के प्रतीक हैं। पूरी संरचना ग्रेनाइट पत्थरों की है और आश्चर्य  की बात यह है कि इसके निर्माण में कहीं इस्पात का प्रयोग नहीं किया गया है। यह भी अद्‌भुत शिल्प  का ही नमूना है कि लगभग 7000 टन भार बिना किसी सहारे के टिका हुआ है। 

        2004 की सुनामी में लहरें इतनी ऊँची उठी थीं कि मूर्ति का कंधा डूब गया। जो कन्याकुमारी नहीं गए हैं वे तिरुवल्लुवर की मूर्ति के चित्र को देखकर सुनामी की भयंकरता का अनुमान लगा सकते हैं।


       इन चट्टानों पर खड़े होकर सागर की लहरों को टकराते देखना एक जीवन दर्शन सा लगता है। चारो ओर अतल सागर और बीच में बुल्ले की तरह दो चट्टानें। तीन सागरों का मिलन! यहाँ से पानी के रंग के आधार पर बंगाल की खाड़ी, हिन्द महासागर और अरब सागर को पहचाना जा सकता है। दूर- दूर घूमती नौकाएं और अन्ततः अनन्त जल राशि। आप सीधा जाएं तो दक्षिणी ध्रुव पहुँच जाएंगे । विश्व  का एकमात्र देश हिन्दुस्तान जिसके नाम पर एक महासागर भी है
तिरुवल्लुवर खंड से सागर का दृश्य और बच्चे : छाया- राढ़ी

          देखते- सोचते कहीं दूर तक चला गया मैं - न जाने क्या-क्या! भाव आते - जाते रहे। कन्याकुमारी के रॉक मेमोरिअल पर तमिल महाकवि तिरुवल्लुवर के स्मारक पर खड़ा  मैं देख रहा हूँ तीन सागरों की मिली-जुली लहरें थोड़ी सी बची हुई चट्टान पर लगातार टक्कर मार रही हैं। पता नहीं क्या द्वेष  है या संघर्ष  या फिर प्यार! ये रुक नहीं रही हैं और चट्टानें अडिग सी खड़ी झेले जा रही हैं इनका वार। काई लग चुकी है, घिस चुकी हैं पर हिलती नहीं, हटती नहीं। लहरें भी टकराकर फेन उगलने लग जाती हैं, धराशायी हो जाती हैं पर इन्हें भी रुकना नहीं; बस चलते जाना है और शायद  यही संघर्ष  है।

     डायरी में ये पंक्तियाँ लिखी है, तारीख है २८ सितम्बर और समय अपराह्‌न के १२.10। बस अब वापस भूखण्ड पर आने ही वाले हैं........ 

4 comments:

  1. १९९८ को हम गये थे तब तिरुवल्लूवर की यह मूर्ति नहीं थी।

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  2. इस विशाल मूर्ती से किनारे का नजारा बडा शानदार व साथ-साथ कई मंजिल जाने के बाद आता है ये जगह जहाँ खडे होकर समुन्द्र की तेज हवा का मजा लिया जाता है, ऐसा लगता है कि जैसे उड जायेंगे, 12 दिसम्बर 2008 को हम भी यहाँ पर थे।

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  3. Humne dekhi hai aur apne daanton tale ungliyan dabai hain...

    Neeraj

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  4. हमें भी यहाँ जल्दी ही जाना है।

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