Wednesday, 19 October 2011

Kanya Kumari mein Suryast

                                         कन्याकुमारी में सूर्यास्त
                                                                          -हरिशंकर राढ़ी
दोपहर बाद हमने बाकी बची जगहों को देखने का कार्यक्रम बनाया। कन्याकुमारी स्थल जिस देवी के नाम पर जाना जाता है, उस अधिष्ठात्री  देवी कन्याकुमारी का एक विशाल  मंदिर यहाँ बना हुआ है। स्थल का नाम कन्याकुमारी पड़ने के पीछे एक पौराणिक कथा बताई जाती है। कहा जाता है कि कन्याकुमारी पार्वती का ही एक दूसरा रूप है। किसी जन्म में देवी पार्वती ने एक कन्या के रूप में भगवान शिव को पति के रूप में पाने हेतु घोर तपस्या की थी। उस समय बाणासुर का आतंक चहुँओर फैला हुआ था और वह देवताओं के लिए संकट बना हुआ था। ब्रह्मा से प्राप्त वरदान के कारण वह अजेय था और उसका वध किसी कुँआरी कन्या के ही हाथों हो सकता था। यह भी स्पष्ट  ही था कि उस बलशाली  असुर को आदिशक्ति  देवी पार्वती के अतिरिक्त कोई अन्य कुंवारी कन्या नहीं कर सकती थी। इधर पार्वती के तप से भगवान शिव प्रसन्न हो चुके थे और विवाह में अधिक देर नहीं थी। एतदर्थ नारद मुनि को बहुत चिन्ता हुई और उन्होंने देवी पार्वती से अनुनय विनय करके यह शर्त रखवा ली कि यदि शिव  उनसे विवाह करना चाहते हैं तो सूर्योदय से पूर्व बिना आँख का नारियल, बिना गाँठ का गन्ना और बिना नस का पान लेकर आएं। जब महादेव ये सभी सामग्री लेकर आ रहे थे तभी नारद जी मुर्गे का रूप धारण कर वक्कम पारै नामक जगह पर बाँग लगा दिए और महादेव यह समझकर कि प्रातःकाल हो गया है, लौट गए। इस प्रकार शर्त पूरी न होने के कारण देवी का विवाह न हो सका और वह कुँआरी ही रह गईं। इसी कारण से इस तपःस्थल का नाम कंन्याकुमारी पड  गया । यह बात अलग है कि 
देवी के इस त्याग से कालान्तर में बाणासुर मारा गया और लोककल्याण हुआ।

देवी कन्याकुमारी का मंदिर प्रातः चार बजे से रात्रि में आठ बजे तक खुला रहता है किन्तु यहाँ भी पोंगापंथ हावी है। हम वहाँ दर्शन  के लिए पहुँचे तो पता चला कि दर्शनार्थी  केवल अधोवस्त्र में ही दर्शन  कर सकते हैं। शर्ट, बनियान या कोई भी ऊपरी वस्त्र पहनकर दर्शन  करना वर्जित है। यहीं से मन में एक चिढ़ हो गई और दर्शन करने का इरादा मैंने त्याग दिया। मुझे कभी भी ईश्वरीय  या आध्यात्मिक मामलों में तामझाम या प्रतिबन्ध अच्छा नहीं लगा। यदि ईश्वर का सम्बन्ध मन से है और उसके लिए सबसे बड़ी अनिवार्यता श्रद्धा और समर्पण है तो इन प्रतिबन्धों का क्या औचित्य? मैं मानता हूँ कि शारीरिक शुचिता भी बहुत आवश्यक  है और शारीरिक शुचिता से मानसिक शुचिता भी जुडी  हुई है किन्तु ऐसा भी नहीं कि ईश्वर  के किसी रूप के दर्शन के लिए कुछ लोग शर्तें  लाद दें और आप उन शर्तों  को पूरा न कर सकें तो  दर्शन से ही वंचित हो जाएँ।  दर्शन का मतलब था कि मैं अपने सारे सामान और बटुआ कहीं संभलवाऊँ और फिर अर्द्धनग्न होकर दर्शनार्थ  प्रस्तुत होऊँ। मैंने बाहर से ही उस आदिशक्ति  को नमन किया और अपने रास्ते चल दिया।

                                                                     गांधी स्मारक 


गाँधी स्मारक 

समुद्र के तट पर ही गांधी स्मारक बना हुआ है। इस स्थल पर महात्मा गांधी का अस्थिकलश  रखा गया था। स्मारक की दूसरी बड़ी  विशेषता यह है कि इसकी संरचना ऐसी है कि दो अक्टूबर को सूर्य की पहली किरण इसी पर पड ती है। गांधी जी सभी धर्मों का आदर करते थे, इसी बात को ध्यान में रखकर स्मारक को भी सभी धर्मों के सम्मिलित रूप को लेकर बनाया गया है। इसमें मंदिर, मस्जिद, चर्च और गुरुद्वारे की संरचना का  दर्शन होता है। 

सूर्यास्त
सूर्यास्त 

  कन्याकुमारी में सूर्योदय की तरह सूर्यास्त देखने का भी एक अलग आकर्षण  है। अरब सागर में डूबते हुए सूर्य को देखने के लिए भारी भीड़ जमा होती है। हालाँकि सूर्यास्त में वह जादुई खिंचाव नहीं है जो सूर्योदय में होता है। सच भी है, आरम्भ में जो ऊर्जा होगी, वह अन्त में कैसे हो सकती है। प्रकाश और अंधकार के आगमन के स्वागत में अन्तर तो होना ही चाहिए। शाम  होते ही सैलानी अपने-अपने कैमरे संभाल सागर तट पर जमा हो जाते हैं और लहरों का खेल देखते हैं। सागर तट पर ही सूर्यास्त देखने के लिए ऊँचा सा सूर्यास्त विन्दु (सनसेट प्वांइट) बना है जिस पर पाँच रुपये का टिकट लेकर जाया जा सकता है। हाँ, यदि बादल न हों तो सूर्यास्त का दृश्य भी अच्छा होता है।
सूर्यास्त 

कन्याकुमारी में कन्याकुमारी मंदिर के पास ही अच्छा सा बाजार है जहाँ दक्षिण भारतीय हस्तकला के सजावटी सामान उचित मूल्य पर मिल जाते हैं। इस बाजार में मध्यवर्गीय आवश्यकता  के सामान खूब बिकते हैं और ग्राहक इन्हें खरीदकर प्रसन्न होते हैं। पत्नी और बच्चे साथ थे इसलिए इस बाजार में भी पूरा समय लगा। समुद्रतटीय क्षेत्र होने के कारण यहाँ शंख , घोंघे, कौडि याँ और उनसे निर्मित सामान बिकते हैं और खरीदने लायक भी होते हैं। उत्तर भारत की अपेक्षा सूखे मेवे भी यहाँ अच्छे प्रकार के और सस्ते मिलते हैं।
हमारे पास अगले दिन दोपहर तक का समय था। अब घूमकर थक लिए थे और सागर तट पर समय बिताने के लिए दिल ललचा रहा था। लहरों की गति देखनी थी और जीवन से उनका सामंजस्य बिठाना था। नाश्ते  के बाद हम सागर तट पर चले गए- ठीक उस विन्दु के पास जिसे संगम कह सकते हैं। बच्चे रेत के घरौंदे बनाते रहे और लहरें मिटाती रहीं। दोनों में कोई भी थकने को तैयार नहीं। तेज हवा रेत पर लिखे अक्षरों को मिटाती रही और मुझे याद आती रहीं एक ग़जल की दो पंक्तियाँ जिसे गुलाम अली ने गाया है। शायर का नाम मुझे याद नहीं आ रहा है। पर बात कुछ ऐसी ही है-
                                                            तेज हवा ने मुझसे पूछा
                                                             रेत पे क्या लिखते रहते हो।
रेत पे क्या लिखते रहते हो 
हाँ, समन्दर के किनारे जीवन की निरन्तरता, विशालता  और अनन्तता के साथ-साथ लघुता का ज्ञान होता रहता है।
शाम  को हमें त्रिवेन्द्रम से राजधानी पकडनी थी। त्रिवेन्द्रम कन्याकुमारी से अस्सी किलोमीटर की दूरी पर है। कन्याकुमारी से रेल एवं बस सेवा उपलब्ध है। अपराह्‌न एक-दो बजे रेल सेवा नहीं है, अतः बस सेवा पकड नी थी। यात्रा में मैं समय के मामले में ज्यादा जोखिम नहीं लेता और कम से कम दो घंटे को अतिरिक्त समय लेकर चलता हूँ। कन्याकुमारी से त्रिवेन्द्रम के बीच की दूरी प्राकृतिक दृश्यों  को निहारने में ही निकल जाती है। हाँ, रास्ते में एक छोटी सी घटना जरूर घटी जिसने मेरे मन पर गहरा असर डाला। मैंने कन्याकुमारी में काफी रात गए युवतियों को निश्चिन्त भाव से अकेले ही बस की प्रतीक्षा करते या घर जाते देखा था और वहाँ की परम्परा पर मुग्ध भी हुआ था। यहाँ भी कुछ ऐसा ही देखा जिससे लगा कि केरल और तमिलनाडु में 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते' संस्कृति गहराई तक गई हुई है। हुआ ऐसा कि बस में ड्राइवर केबिन में सिंगल सीट पर एक सुन्दर युवती बैठी हुई थी और  उसके पीछे दो वाली सीट पर एक युवती और एक अधेड  महिला बैठीं थीं। रास्ते में अधेड  महिला उतर गई और युवती सीट पर अकेली रह गई। सीट के पास ही एक युवक खड़ा था और अब वह युवती के पास बैठ सकता था। परन्तु उसने इस अवसर का लाभ नहीं उठाया। खुद युवती के पास बैठने के बजाए वह सिंगल सीट पर बैठी युवती को बुलाकर दो वाली सीट पर बिठाया और उस सीट पर अकेले ही जाकर बैठ गया। मुझे लगा कि हमें अभी बहुत कुछ सीखना बाकी है।

त्रिवेन्द्रम कब आ गया, हमें मालूम ही नहीं हुआ। उस भूमि को प्रणाम कर हम राजधानी में घुस गए और जल्दी ही देश  एक बड़े शहर की भीड  में धंसकर कहीं गुम हो गए............. 

7 comments:

  1. घुमाते रहो हम भी आपके साथ-साथ ही घूमे जा रहे है।

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  2. बहुत सुन्दर वर्णन, रेत पर लिखे को लहरों का खतरा सदा ही रहा है।

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  3. बहुत विस्‍तृत एवं रोचक विवरण .. अच्‍छी जानकारी मिली !!

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  4. wah.aapne to kanyakumari ka jese ankhon dekha haal samjha diya.sath hi katha bhi suna di.

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  5. दीपावली पर आपको और परिवार को सस्नेह हार्दिक मंगल कामनाएं !
    सादर !

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  6. आपके सफल ब्लॉग के लिए साधुवाद!
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