Friday, 12 August 2011

अतीत का आध्यात्मिक सफ़र

इष्ट देव सांकृत्यायन
हम दतिया पहुंचे तो दिन के करीब सवा बज चुके थे। ट्रेन बिलकुल सही समय से थी, लेकिन भूख से हालत खराब होने लगी थी। चूंकि सुबह पांच बजे ही घर से निकले थे। चाय के अलावा और कुछ भी नहीं ले सके थे। ट्रेन में भी सिर्फ एक कप चाय ही पी। उतर कर चारों तरफ नज़र दौड़ाई तो लंबे प्लैटफॉर्म वाले इस छोटे स्टेशन पर सिर्फ़ ताज एक्सप्रेस से उतरा समूह ही दिख रहा था। जहां हम उतरे उस प्लैटफॉर्म के बिलकुल बगल में ही टैंपुओं का झुंड खड़ा था। इनमें प्राय: सभी पीतांबरा पीठ की ओर ही जा रहे थे। तेज सिंह ने एक टैंपू ख़ाली देखकर उससे पूछा तो मालूम हुआ कि सि$र्फ पांच सवारियां लेकर नहीं जाएगा। पूरे 11 होंगे तब चलेगा। तय हुआ कि कोई दूसरी देखेंगे। पर जब तक दूसरी देखते वह भर कर चल चुका था। अब उस पर भी हमें इधर-उधर लटक कर ही जाना पड़ता। बाद में जितने टैंपुओं की ओर हम लपके सब फटाफट भरते और निकलते गए। क़रीब बीस मिनट इंतज़ार के बाद आख़िर एक टैंपू मिला और लगभग आधे घंटे में हम पीतांबरा पीठ पहुंच गए।

दतिया का महल


वैसे स्टेशन से पीठ की दूरी कोई ज्य़ादा नहीं, केवल तीन किलोमीटर है। यह रास्ते की हालत और कस्बे में ट्रैफिक की तरतीब का कमाल था जो आधे घंटे में यह दूरी तय करके भी हम टैंपू वाले को धन्यवाद दे रहे थे। टैंपू ने हमें मंदिर के प्रवेशद्वार पर ही छोड़ा था, लिहाजा तय पाया गया कि दर्शन कर लें, इसके बाद ही कुछ और किया जाएगा। फटाफट प्रसाद लिए, स्टैंड पर जूते जमा कराए और अंदर चल पड़े। दोपहर का वक्त होने के कारण भीड़ नहीं थी। मां का दरबार खुला था और हमें दिव्य दर्शन भी बड़ी आसानी तथा पूरे इत्मीनान के साथ हो गया। अद्भुत अनुभूति हो रही थी।
वल्गा से बगला
इस पीठ की चर्चा पहली बार मैंने $करीब डेढ़ दशक पहले सुनी थी। गोरखपुर में उन दिनों आकाशवाणी के अधीक्षण अभियंता थे डॉ. शिवमंदिर प्रधान। उनके ससुर इस मंदिर के संस्थापक स्वामी जी के शिष्य थे। डॉ. उदयभानु मिश्र और अशोक पाण्डेय ने मुझे इस पीठ और बगलामुखी माता के बारे में का$फी कुछ बताया था। हालांकि जो कुछ मैंने समझा था उससे मेरे मन में माता के प्रति आस्था कम और भय ज्य़ादा उत्पन्न हुआ था। इसकी वजह मेरी अपनी अपरिपक्वता थी। बाद में मालूम हुआ कि 'बगला' का अर्थ 'बगुला' नहीं, बल्कि यह संस्कृत शब्द 'वल्गा' का अपभ्रंश है, जिसका अर्थ 'दुलहन' होता है। उन्हें यह नाम उनके अलौकिक सौंदर्य और स्तंभन शक्ति के कारण दिया गया। पीतवसना होने के कारण इन्हें पीतांबरा भी कहा जाता है।

स्थानीय लोकविश्वास है कि दस महाविद्याओं में आठवीं मां बगलामुखी की यहां स्थापित प्रतिमा स्वयंभू है। पौराणिक कथा है कि सतयुग में आए एक भीषण तू$फान से जब समस्त जगत का विनाश होने लगा तो भगवान विष्णु ने तप करके महात्रिपुरसुंदरी को प्रसन्न किया। तब सौराष्टï्र क्षेत्र (गुजरात का एक क्षेत्र) की हरिद्रा झील में जलक्रीड़ा करती महापीत देवी के हृदय से दिव्य तेज निकला। उस तेज के चारों दिशाओं में फैलने से तू$फान का अंत हो गया। इस तरह तांत्रिक इन्हें स्तंभन की देवी मानते हैं और गृहस्थों के लिए यह समस्त प्रकार के संशयों का शमन करने वाली हैं। मंदिर में स्थापित प्रतिमा का ही सौंदर्य ऐसा अनन्य है कि जो देखे, बस देखता रह जाए।
अनुशासन हर तरफमुख्य मंदिर के भवन में ही एक लंबा बरामदा है, जहां कई साधक बैठे जप-अनुष्ठान में लगे हुए थे। सामने हरिद्रा सरोवर है। बगल में मौजूद एक और भवन के बाहरी हिस्से में ही भगवान परशुराम, हनुमान जी, कालभैरव तथा कुछ अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं प्रतिष्ठित हैं। इस मंदिर के अंदर जाते ही सबसे पहले पुस्तकों की एक दुकान और फिर शिवालय है। यहां मैंने पहला ऐसा शिवालय देखा, जहां शिव पंचायतन में स्थापित श्रीगणेश, मां पार्वती, भगवान कार्तिकेय एवं नंदीश्वर सभी छोटे-छोटे मंदिरनुमा खांचों में प्रतिष्ठित हैं। अकेले शिवलिंग ही हैं, जो यहां भी हमेशा की तरह अनिकेत हैं। वस्तुत: यह तंत्र मार्ग का षडाम्नाय शिवालय है, जो बहुत कम ही जगहों पर है। इस भवन के पीछे एक छोटे भवन में सातवीं महाविद्या मां धूमावती का मंदिर है। यहां इनका दर्शन सौभाग्यवती स्त्रियों के लिए निषिद्ध है। महाविद्या धूमावती की प्रतिमा की प्रतिष्ठा महाराज जी ने यहां भारत-चीन युद्ध के बाद कराई थी। असल में उस समय स्वामी जी के नेतृत्व में यहां राष्ट्ररक्षा अनुष्ठान यज्ञ किया गया था।


दतिया कसबे का एक विगंगम दृश्य

बाईं तरफ एक अन्य भवन में प्रतिष्ठित हनुमान जी की प्रतिमा का दर्शन दूर से तो सभी लोग कर सकते हैं, लेकिन निकट केवल वही जा सकते हैं जिन्होंने धोती धारण की हुई हो। यह नियम बगलामुखी माता के मंदिर भवन में प्रवेश के लिए भी है। पैंट, पजामा या सलवार-कुर्ता आदि पहने होने पर सि$र्फ बाहर से ही दर्शन किया जा सकता है। भवन के अंदर सि$र्फ वही लोग प्रवेश कर सकते हैं, जिन्होंने धोती या साड़ी पहनी हो। कैमरा आदि लेकर अंदर जाना सख्त मना है। मंदिर में अनुशासन का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि न तो यहां कहीं गंदगी दिखती है और न हर जगह चढ़ावा चढ़ाया जा सकता है। तंत्रपीठ होने के कारण अनुशासन बहुत कड़ा है। पूजा-पाठ के नाम पर ठगी करने वालों का यहां कोई नामो-निशान भी नहीं है।


संस्कृत और संगीत की परंपरा
मुख्य मंदिर के सामने हरिद्रा सरोवर है और पीछे मंदिर कार्यालय एवं कुछ अन्य भवन। इन भवनों में ही संस्कृत ग्रंथालय है और पाठशाला भी। मालूम हुआ कि पीठ संस्थापक स्वामी जी महाराज संस्कृत भाषा-साहित्य तथा शास्त्रीय संगीत के अनन्य प्रेमी थे। हालांकि स्वामी जी की पृष्ठभूमि के बारे में यहां किसी को कोई जानकारी नहीं है। लोग केवल इतना जानते हैं कि सन 1920 में उन्होंने देवी की प्रेरणा से ही यहां इस आश्रम की स्थापना की थी। फिर उनकी देखरेख में ही यहां सारा विकास हुआ। शास्त्रीय संगीत की कई बड़ी हस्तियां स्वामी जी के ही कारण यहां आ चुकी हैं और इनमें कई उनके शिष्य भी हैं।
मां बगलामुखी के दर्शन की वर्षों से लंबित मेरी अभिलाषा आनन-फानन ही पूरी हुई। हुआ कि मंगल की शाम हरिशंकर राढ़ी से फोन पर बात हुई। उन्होंने कहा, 'हम लोग दतिया और ओरछा जा रहे हैं। अगर आप भी चलते तो मज़ा आ जाता।' पहले तो मुझे संशय हुआ, पर जब पता चला कि केवल दो दिन में सारी जगहें घूम कर लौटा जा सकता है और ख़र्च भी कुछ ख़ास नहीं है तो अगले दिन सबका रिज़र्वेशन मैंने ख़ुद ही करवा दिया। राढ़ी के साथ मैं, तेज सिंह, अजय तोमर और एन. प्रकाश भी।  

ज़ारी........

7 comments:

  1. बहुत सुन्दर. कैसी विडम्बना है, दतिया के पास ४/५ वर्ष बिताने के बाद भी हम यहाँ नहीं जा पाए. अभिलाषा पूरी हुई. आभार.

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  2. दतिया में पीताम्बरा माता के यहाँ कई बार जाना हुआ है।

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  3. आपके वर्णन से यात्रा की पूरी रील आँखों के सामने आद्योपांत घूम गई , बिलकुल फिल्मी फ्लैशबैक की तरह। टेंपुओं का झुंड, ताज एक्सप्रेस के यात्रियों की भीड़, पीताम्बरा शक्तिपीठ का दर्शन और साथ-साथ रास्ते का हँसी - मजाक और ठट्ठे। उस यात्रा के एक साल पूरे हो गए, पिछले स्वतंत्रता दिवस को हम दतिया और ओरछा में थे। आपका वर्णन और स्मृतियों का नवीनीकरण आनन्ददायक रहा।

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  4. बढ़िया वृत्तांत...
    सादर...

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  5. अब तो यहाँ भी जा कर देखते है।

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