Sunday, 14 August 2011

अतीत का आध्यात्मिक सफ़र-2 (सोनागिरि)

इष्ट देव सांकृत्यायन




सोनागिरि पहाड़ी पर मंदिरों का विहंगम दृश्य
 
चल पड़े सोनागिरि

मंदिर में दर्शन-पूजन के बाद यह तय नहीं हो पा रहा था कि आगे क्या किया जाए। तेज सिंह इसके निकट के ही कसबे टीकमगढ़ के रहने वाले हैं। उनकी इच्छा थी कि सभी मित्र यहां से दर्शनोपरांत झांसी चलें और ओरछा होते हुए एक रात उनके घर ठहरें। जबकि राढ़ी जी एक बार और मां पीतांबरा का दर्शन करना चाहते थे। मेरा मन था कि आसपास की और जगहें भी घूमी जाएं। क्योंकि मुझे विभिन्न स्रोतों से मिली जानकारी के अनुसार दतिया कसबे में ही दो किले हैं और संग्रहालय है। इसके अलावा यहां से 15 किमी दूर जैन धर्मस्थल सोनागिरि है। 17 किमी दूर उनाव में बालाजी नाम से प्रागैतिहासिक काल का सूर्य मंदिर, करीब इतनी ही दूर गुजर्रा में अशोक का शिलालेख, 10 किमी दूर बडोनी में गुप्तकालीन स्थापत्य के कई अवशेषों के अलावा बौद्ध एवं जैन मंदिर, भंडेर मार्ग पर 5 किमी दूर बॉटैनिकल गार्डन, 4 किमी दूर पंचम कवि की तोरिया में प्राचीन भैरव मंदिर और 8 किमी दूर उडनू की तोरिया में प्राचीन हनुमान मंदिर भी हैं। दतिया कसबे में ही दो मध्यकालीन महल हैं। एक सतखंडा और दूसरा राजगढ़। इनमें राजगढ़ पैलेस में एक संग्रहालय भी है। दतिया से 70 किमी दूर स्यौंधा है। सिंध नदी पर मौजूद वाटरफॉल के अलावा यह कन्हरगढ़ फोर्ट और नंदनंदन मंदिर के लिए भी प्रसिद्ध है। 30 किमी दूर स्थित भंडेर में सोन तलैया, लक्ष्मण मंदिर और पुराना किला दर्शनीय हैं। महाभारत में इस जगह का वर्णन भांडकपुर के नाम से है। मैं दतिया के आसपास की ये सारी जगहें देखना चाहता था। समय कम था तो भी कुछ जगहें तो देखी ही जा सकती थीं। मंदिर में ही खड़े-खड़े देर तक विचार विमर्श होता रहा और आख़्िारकार यह तय पाया गया कि आज की रात दतिया में गुजारी जाए। हम सब तुरंत मंदिर के पीछे मेन रोड पर आ गए। वहीं एक होटल में कमरे बुक कराए और फ्रेश होने चल पड़े। फ्रेश होकर निकले तो मालूम हुआ कि तेज और तोमर जी अपने किसी रिश्तेदार से मिलने कस्बे में चले गए हैं। वे लोग आ जाएं तो हम घूमने निकलें। पर वे लोग आए $करीब दो घंटे इंतज़ार के बाद। फिर का$फी देर विचार विमर्श के बाद तय हुआ कि अब हमें सोनागिरि चलना चाहिए। आख़्िारकार दो सौ रुपये में एक टैंपो तय हुआ और हम सब सोनागिरि निकल पड़े।


दतिया से सोनागिरि के बीच एक नयनिभिराम दृश्य


अलौकिक अनुभूति

क़रीब 5 किमी ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर चलने के बाद ग्वालियर हाइवे मिल गया। हालांकि यह मार्ग भी अभी बन ही रहा था, पर फिर भी शानदार था। दृश्य पूरे रास्ते ऐसे ख़ूबसूरत कि जिधर देखने लगें उधर से आंखें किसी और तर$फ घुमाते न बनें। दूर तक पठार की ऊबड़-खाबड़ ज़मीन पर फैली हरियाली और ऊपर धरती की ओर झुकते बादलों से भरे आसमान में अस्ताचल की ओर बढ़ते सूरज की लालिमा। किसी को भी अभिभूत कर देने के लिए यह सौंदर्य काफ़ी था। थोड़ी देर बाद सड़क छोड़कर हम फिर लिंक रोड पर आ गए थे। हरे-भरे खेतों के बीच कहीं-कहीं बड़े टीलेनुमा ऊंचे पहाड़ दिख जाते थे और वे भी हरियाली से भरे हुए। हर तरफ़ फैला हरियाली का यह साम्राज्य शायद सावन का कुसूर था।
दूर से ही सोनागिरि पहाड़ी पर मंदिरों का समूह दिखा तो हमारे सुखद आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। पहाड़ी पर रंग-बिरंगी हरियाली के बीच श्वेत मंदिरों का समूह देख ऐसा लगा, गोया हम किसी दूसरी ही दुनिया में आ गए हों। साथ के सभी लोग कह उठे कि आज यहां ठहरना वसूल हो गया। मालूम हुआ कि इस पहाड़ी पर कुल 82 मंदिर हैं और नीचे गांव में 26। इस तरह कुल मिलाकर यहां 108 मंदिरों का पूरा समूह है।


श्री नंदीश्वर द्वीप के समक्ष एन प्रकाश, तेज सिंह और अजय तोमर. पीछे हरिशंकर राढ़ी
  यह जैन धर्म की दिगम्बर शाखा के लोगों के बीच अत्यंत पवित्र धर्मस्थल के रूप में मान्य है। यहां मुख्य मंदिर में भगवान चंद्रप्रभु की 11 फुट ऊंची प्रतिमा प्रतिष्ठित है। भगवान शीतलनाथ और पाश्र्वनाथ की प्रतिमाएं भी यहां प्रतिष्ठित हैं। श्रमणाचल पर्वत पर स्थित इस स्थान से ही राजा नंगानंग कुमार ने मोक्ष प्राप्त किया था। इनके अलावा नंग, अनंग, चिंतागति, पूरनचंद, अशोकसेन, श्रीदत्त तथा कई अन्य संतों को यहीं से मोक्ष की उपलब्धि हुई। $करीब 132 एकड़ क्षेत्रफल में फैली दो पहाडिय़ों वाले इस क्षेत्र को लघु सम्मेद शिखर भी कहते हैं। यहीं बीच में एक नंदीश्वर द्वीप नामक मंदिर भी है, इसमें कई जैन मुनियों की प्रतिमाएं स्थापित हैं। इन पहाडिय़ों पर हम $करीब दो घंटे तक घूमते रहे। आते-जाते श्रद्धालुओं के बीच नीरवता तोडऩे के लिए यहां सि$र्फ मयूरों तथा कुछ अन्य पक्षियों का कलरव था। इन पहाडिय़ों पर मोर जिस स्वच्छंदता के साथ विचरण कर रहे थे, वह उनकी निर्भयता की कहानी कह रहा था। सुंदरता के साथ शांति का जैसा मेल यहां है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। इहलोक में ही अलौकिक अनुभूति देते इस दिव्य वातावरण को छोड़ कर आने का मन तो नहीं था, पर हमें वापस होटल पहुंचना भी था। क्योंकि अगले दिन बिलकुल सुबह ही ओरछा के लिए निकलना था।




आप चाहें तो इसे दतिया की नाइटलाइफ कह सकते हैं

एक बार फिर दर्शन

रात में क़रीब साढ़े सात बजे हम दतिया पहुंच गए थे। लौटते समय जिस रास्ते से टैक्सी वाले हमें ले आए, वह रास्ता शहर के भीतर से होते हुए आता था। गलियों में व्यस्त यहां के जनजीवन का नज़ारा लेते हम होटल पहुंचे। कई जगह निर्माण चल रहे थे और शायद इसीलिए जि़ंदगी का$फी अस्त-व्यस्त दिखाई दे रही थी। होटल से तुरंत हम फिर पीतांबरा मंदिर निकल गए। रात की मुख्य आरती 8 बजे शुरू होती है। उसमें शामिल होने के बाद काफी देर तक मंदिर परिसर में ही घूमते रहे। इस समय भीड़ बहुत बढ़ गई थी। मंदिर से लौटते समय तय किया गया कि खाना बाहर ही खाएंगे। हालांकि बाहर भोजन बढिय़ा मिला नहीं। बहरहाल, रात दस बजे तक होटल लौट कर हम सो गए।

सुबह उठते ही मैं सबसे पहले कैमरा होटल की छत पर गया। पीछे राजगढ़ किले का दृश्य था और आगे दूर तक फैला पूरे शहर का विहंगम नज़ारा। इसे कैमरे में $कैद कर मैं नीचे उतरा और तैयारी में जुट गया। साढ़े सात बजे तक दतिया शहर छोड़ कर झांसी के रास्ते पर थे। झांसी पहुंच कर तेज सिंह ने न तो ख़ुद कुछ खाया और न हमें खाने दिया। उनका इरादा यह था कि सबसे पहले ओरछा में रामराजा के दर्शन करेंगे। इसके बाद ही कुछ खाएंगे। ख़्ौर, ओरछा के लिए झांसी बस स्टैंड से ही टैक्सी मिल गई।

जारी..........

4 comments:

  1. दिखाते रहिए, बताते रहिए, पूरा लुत्फ़ आ रहा है. यात्रा का।

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  2. पुरानी यादें जगा दीं आपने।

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  3. जानकारी से भरी सचित्र पोस्ट.आभार.

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