Tuesday, 31 May 2011

कुछ भी कभी कहीं हल नहीं हुआ

कितनी बार हुई हैं
जाने ये बातें

आने-जाने वाली.
विनिमय के
व्यवहारों में कुछ
खोने-पाने वाली.
फिर भी कुछ भी कभी कहीं हल नहीं हुआ.

जल ज़मीन जंगल
का बटना.
हाथों में
सूरज-मंगल
का अटना.
बांधी जाए
प्यार से जिसमें
सारी दुनिया
ऐसी इक
रस्सी का बटना.

सभी दायरे
तोड़-फोड़ कर
जो सबको छाया दे-
बिन लागत की कोशिश
इक ऐसा छप्पर छाने वाली.
फिर भी कुछ भी कभी कहीं हल नहीं हुआ.

हर संसाधन पर
कुछ
घर हैं काबिज.
बाक़ी आबादी
केवल
संकट से आजिज.
धरती के
हर टुकड़े का सच
वे ही लूट रहे हैं
जिन्हें बनाया हाफ़िज.

है तो हक़ हर हाथ में
लेकिन केवल ठप्पे भर
लोकतंत्र की शर्तें
सबके मन भरमाने वाली.
इसीलिए, कुछ भी कभी कहीं हल नहीं हुआ.

9 comments:

  1. सभी कुछ हल ही हो जाएगा तो दुनिया के जीने खाने का मकसद ही ख़त्म नहीं हो जाएगा ?
    कविता प्यारी है !

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  2. यहां तो कुछ और ही चलता है, लोग दूसरों को लूटने की कोशिश में लगे रहते हैं..

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  3. शायद कभी हल होगा भी नहीं...उताम रचना.

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  4. सबके मन का करने के प्रयास में किसी के मन का नहीं होता है।

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  5. ग़म की अँधेरी रात में दिल को ना बेकरार कर
    सुबह जरूर आएगी सुबह का इंतज़ार कर



    नीरज

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  6. है तो हक़ हर हाथ में
    लेकिन केवल ठप्पे भर
    लोकतंत्र की शर्तें
    सबके मन भरमाने वाली.
    इसीलिए, कुछ भी कभी कहीं हल नहीं हुआ.

    सच है..... इतना ही तो हक़ है.....

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  7. बाबा रामदेव और अन्ना की कोशिश का साथ दें। शायद कुछ हला-भला हो जाय। :)

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  8. निराशा में डूबे अंतर्मन की व्यथा को बहुत प्रभावपूर्ण अभिव्यक्ति दी है आपने....
    मन को छूती , उद्वेलित करती बहुत ही सुन्दर रचना...

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