Saturday, 5 February 2011

matri smriti


                                                             मातृ स्मृति
और अब पहली पुण्यतिथि भी आ गई.....। जैसे विश्वास  करना मुश्किल  हो। पूरे वर्श में शायद  कोई ही दिन रहा हो जब उनकी याद दस्तक देकर, कुरेद कर और निर्बल महसूस कराकर न गई हो। सच तो यह है कि मैं उनकी यादों से भागना भी नहीं चाहता। मुझे भी एक सुकून सा मिलता है यादों में डूबकर। कभी- कभी तो लगता है कि उन यादों के अलावा कोई अन्य शरण  स्थल ही नहीं है। जैसे दर्द ही अब दवा हो। मैं नहीं जानता कि उम्र के पाँचवें दशक  में भी माँ के बिना अनाथ की स्थिति में आ जाना, बेहद अकेला महसूस करना मुझे अच्छा क्यों लगता है ?

जैसे - जैसे फरवरी माह की ४/५   की वह रात नजदीक आती जा रही है, माँ का देहत्याग और तीव्रता से याद आने लगा है। सब कुछ किसी फिल्म की रील की तरह आँखों के सामने घूमता जा रहा है। मुझे यह भी नहीं लगता कि यह कोई सांसारिक मोहपाश  है क्योंकि इस पूरे वर्ष  में मैंने यह महसूस किया कि माँ का अस्तित्व और सम्बन्ध सांसारिकता से ऊपर है। मैं तो इस सम्बन्ध को आध्यात्मिक मानने लगा हूँ। ना जाने वह कौन सा बन्धन है जो बरबस अपनी ओर खींच लेता है।


माँ हृदय रोग से पीड़ित थीं। दूसरा दौरा दिसम्बर 2009 में पड़ा  था। प्रबल आघात था। वे गाँव में थीं। इलाज बड़े कुशल  डॉक्टर के यहां चल रहा था। डॉक्टर ने दिलासा दिया कि बिलकुल ठीक हो जाएंगी, और ठीक भी होने लगीं। मैंने गाँव जाने का कार्यक्रम रद्द कर दिया, सोचा आराम से छुट्टियों में जाऊँगा । अब तो ठीक हो ही रही हैं। उनके पास जाकर लम्बे समय तक रहूँ तो अच्छा होगा क्योंकि वे खुद यही चाहती हैं। फोन पर लम्बी-लम्बी बातें हो ही जाती थीं। हाँ, मैंने पत्नी और बेटे को दस-बारह दिन के लिए उनके पास भेज दिया था। यह सोचकर कि उनकी  अतिरिक्त सेवा भी इस समय हो जाएगी  और वे अपने पोते को देखकर खुश  भी जाएंगी।

जनवरी में वे स्वस्थ हो गई थीं। प्रसन्न रहना उनका स्वभाव था। खतरा पूरी तरह टल गया था। डॉक्टर ने दवाइयाँ भी कम कर दी थीं। पहली फरवरी की सुबह अचानक कुछ तकलीफ हुई। बडे़ भाई साहब ने डॉक्टर को दिखाया तो सबसे बड़ी निराशा  हाथ लगी । उनके हृदय के एक धमनी अवरुद्ध हो चुकी थी और आगे (यदि शरीर  साथ दे, उम्र शेष  हो तो) एंजोग्राफी का सहारा था। मुझे रात में फोन मिला। अगले दिन कुछ आवश्यक  व्यवस्था किया, आरक्षण लिया और तीन को ट्रेन पकड़ ली। यहां पत्नी को ताकीद कर गया कि मुझे समय ज्यादा लग सकता है। मुझे अघटित का आभास हो गया था, पर मैं ऊपर से मजबूत दिखने की कोशिश  कर रहा था।

लेट-लतीफ घर पहुँचा तो देखा कि वे उसी खाट पर पड़ी हुई थीं; मुझे देखकर चेहरे पर प्रसन्नता आई किन्तु आज वह ओज और तेज चेहरे पर नहीं था जो प्रायः हुआ करता था। उन्हें यह बताया नहीं गया था कि उनकी बीमारी अब खतरनाक हो चुकी है, हालाँकि उन्हें अपनी स्थिति का आभास हो गया था और कुछ शंका  भी होने लगी थी कुछ छिपाया जा रहा है। संभवतः अपनी दुर्बलता से ज्यादा वे इस बात से भी परेशां  थीं कि अब हम लोग उनके लिए परेशान  हो रहे थे। डॉक्टर ने ज्यादा बोलने से मना किया था अतः मैं चाहकर भी ज्यादा बात नहीं कर पा रहा था। बहुत कुछ कहने को शेष  था और बहुत कुछ सुनने को, पर कहूँ कैसे ? ऐसा लगता था कि जो भी समय बचा था उसे मैं जी भरकर महसूस कर लेना चाहता था। इस भावना को मन में बार-बार भर रहा था कि माँ अभी जिन्दा हैं और मैं भी अभी माँ वाला हूँ। न जाने यह साथ कब तक पा सकूँगा !

पर ये साथ ज्यादा देर शायद  मिलना ही नहीं था। कुछ ही देर बाद बेचैनी बढ़ी तो पड़ोस के डॉक्टर को बुलाकर इमरजेंसी का इंजेकशन लगवाया गया, परन्तु कोई फायदा नहीं। उन्होंने कहा कि अब मुझे ले चलो कहीं। गाड़ी बुलाई गई और घंटे भर में पुनः उसी डॉक्टर के पास। मामला गंभीर हो चुका था। ऑक्सीजन लगा दिया गयी  । ब्लडप्रेशर  कम होने लगा। डॉक्टर ने हाथ खड़े कर दिए -आपका भाग्य जाने, कहीं और ले जा सकते हैं। हमें मालूम था कि रात हो गई है और यहां इससे अच्छा डॉक्टर तो है नहीं। बीएचयू या पीजीआई ले जाने के लिए भी समय षायद ही रहा हो। पौने बारह बजे उनकी आँखें खुली थीं । अपना परिवार छोड़ने का गहरा मलाल आँखों से बाहर आ रहा था। 

और वे छोड़ गईं। ऐसा ही प्रायः होता है- सबके साथ होता है। माँ को लोग बाद में समझ पाते हैं। पूरी तरह तो नहीं, पर मैंने समझा था। लगभग बीस वर्ष  की उम्र के बाद मैं अक्सर बाहर ही रहा। कभी पढ़ाई के लिए तो कभी नौकरी के लिए। जब भी घर से जाता, उनका अस्तित्व सामने होता। आँसू, आशीर्वाद , सीख, चिन्ता, वात्सल्य, हिम्मत और न जाने क्या-क्या लिए ! उस वियोग ने मुझे बहुत कुछ सिखा दिया था। जब भी समय का तमाचा मुँह पर पड़ता, उनके हाथ सहलाने के लिए आगे आ जाते। जब भी किसी छोटे बच्चे को माँ की गोद में छिपते देखता तो  मन ललचा जाता। जाते - जाते भी, अस्सी पार की उमर में भी वे एक मजबूत सहारा थीं -बिलकुल एक अडिग चट्टान की तरह।

सन तीस के आसपास का जन्म था उनका। जब पुरुषों  में साक्षरता का ग्राफ कहीं दिखता नहीं था, उस जमाने में वे स्कूल जाती थीं और हिन्दी गणित का अच्छा ज्ञान रखती थीं। अपने संघर्षमय  जीवन को उन्होंने क्या- क्या दिशा  दी, कम से कम गाँव और आस पास तो एक मिसाल ही दी जाती है। साहस , सोच और सत्य का अद्भुत समन्वय था उनमें।

मुझे ऐसा कभी नहीं लगा कि उनका अभाव इतना खलेगा। असलियत तो यह थी कि बीस वर्षों  से अलग रहकर मुझे यह लगने लगा था कि उनका गोलोगवासी होना मुझे ज्यादा नहीं खलेगा ! मैं साथ रहता ही कहाँ हूँ ? गर्मियों में एक डेढ़ माह जाकर रह आता था। जब अकेला रहता था और भी कई चक्कर लग जाया करते थे। इधर वे कई साल से सर्दियों में दिल्ली आ जाया करती थीं - बस एक दो माह के लिए क्योंकि गाँव में रहना उनके लिए आवश्यक  सा हो गया था। फोन पर लम्बी बातें हो जाया करती थीं। नब्बे के दशक  के अन्त तक उनके भरे पूरे पत्र बिना अन्तराल के आया करते थे और मैं खूब पढ़ा करता था। हर विषय  की विस्तृत जानकारी हुआ करती थी। भौतिक दूरी फिर भी बनी ही रहती थी। अतः यह सोचकर शायद  एक संतोष  सा होता था कि उनके स्थायी विछोह का दर्द मुझे नहीं उठाना पड़ेगा क्योंकि मुझे आदत पड़ गई है। पर, यह एक कोरा भ्रम निकला। उनके होने का एहसास ही बहुत था और शायद  कोई काल्पनिक दुख भी उनके रहते नहीं फटक सकता था। यही कारण रहा होगा कि मुझे लगा कि यह सम्बन्ध ज्ञानक्षेत्र से बाहर का होता है। 

माँ किसी एक की नहीं होती। वह तो सार्वभौमिक और सार्वदेशिक  होती है। सार्वकालिक तो होती ही है। जब जाती है तो एक बड़ा शून्य  छोड़कर जाती है। ऐसा नहीं कि मैंने गीता नहीं पढ़ा  है और आत्मा की अजरता - अमरता का उपदेश  नहीं सुना है। पर मां इन सबसे ऊपर होती है। उसके सामने गीता का ज्ञान कहीं नहीं ठहरता। आत्मा की अमरता का ज्ञान तो शरीरी  सम्बन्धों के लिए होता है - आत्मा के सम्बन्धों के लिए नहीं। कर्तव्य तो चलते रहते हैं, चलते रहेंगे पर उनमें रस की अनुभूति आत्मीयता से ही होती है। भोजन और पथ्य में अन्तर होता है और भोजन में प्यार के स्वाद की बात मां के बिना कहाँ ? कभी एक गजल लिखी थी जो अधूरी ही रह गई, उसका एक शे’र था -
माँ ने कुछ प्यार से बनाया है
बुलाने देखो हिचकियाँ  आईं।
उस आत्मा को देहतत्व छोड़े पूरे एक साल कुछ ही मिनटों में होने वाले हैं। मैं चाहता हूँ कि समय का चक्र एक बार उलटा घूम जाए। एक साल के लिए ही। पर मेरे चाहने से क्या होता है ? मेरी पूँजी तो स्मृतियाँ ही हैं। हाँ, मेरी वय के जिन मित्रों के भाग्य में अभी मातृसुख है, उन्हें मेरी शुभ कामनाएं। एक सीख भरी चाह भी कि वे ऐसे क्षणों को ठीक से जी लें, फिर ऐसी माँ कहाँ मिलेगी.......... 



3 comments:

  1. माता-पिता का बिछड़ना सदैव सालता रहेगा.स्मृतियाँ ही अब शेष हैं,उनके दिखाए गये रास्तो पर चलना ही सच्ची श्रद्धान्जलि होगी.

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  2. माँ की स्मृतियों की आर्द्रता में हम भी नम हैं।

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  3. मां-बाप की कमी को कोई पूरा नहीं कर सकता..

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