Sunday, 23 January 2011

सूरज हो मुकाबिल तो शरारा नहीं टिकता ।
दिन में कोई आकाश में तारा नहीं दिखता ॥

मुश्किल में बदल जाते हैं हर नाते और रिश्ते-
रोने को भी काँधे का सहारा नहीं दिखता ।

ईमान की कीमत न चुका पाओगे मेरे-
वरना सर-ए-बाज़ार यहाँ क्या नहीं बिकता ।

सरकारें बदल बदल के यह देख लिया है-
हालात बदल पाने का चारा नहीं दिखता ।

संसद पे जमा रक्खा है बगुलों ने यूँ कब्ज़ा-
हंसो का सियासत मे गुज़ारा नहीं दिखता ।

- विनय ओझा स्नेहिल

5 comments:

  1. आक्रोशपूर्ण अभिव्यक्ति।

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  2. अब तो आक्रोश की जरूरत पड़ने लगी है. सुन्दर अभिव्यक्ति.

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  3. संसद पे जमा रक्खा है बगुलों ने यूँ कब्ज़ा-
    हंसो का सियासत मे गुज़ारा नहीं दिखता ..
    vaah kya baat khee hai.

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  4. संसद पे जमा रक्खा है बगुलों ने यूँ कब्ज़ा-
    हंसो का सियासत मे गुज़ारा नहीं दिखता ..

    KYA BAAT...KYA BAAT....KYA BAAT

    PRANAM

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