Saturday, 19 November 2011

ajnat rachnakar visheshank

समकालीन अभिव्यक्ति  का अज्ञात रचनाकार विशेषांक 




समकालीन अभिव्यक्ति के गौरवशाली  दस वर्ष  पूर्ण होने पर

                     एक महत्त्वाकांक्षी योजना

अज्ञात रचनाकार विशेषांक 

    एक दुर्लभ एवं खोजपरक अंक 

                   शीघ्र प्रकाश्य 


अज्ञात रचनाकार के मानदंडः

  • ऐसे रचनाकार जो परिस्थितिवश  प्रकाशन  जगत से दूर रह गए।
  • ऐसे रचनाकार जो कभी-कभी और कम लिखे।
  • ऐसे रचनाकार जो स्वांतःसुखाय लिखते रहे।
  • ऐसे गंभीर पाठक जो स्तरीय लेखन में सक्षम होने के बावजूद नहीं लिखते।
  • ऐसी रचनाओं के लेखक जो अज्ञात ही रह गए, रचनाएं लोकप्रिय हुईं।



रचनाकार कृपया ध्यान दें:


  • रचनाएं सर्वथा अप्रकाशित /दुर्लभ श्रेणी की होनी चाहिए।
  • रचना किसी भी विधा में हो सकती है किंतु विषयवस्तु साहित्यिक/सांस्कृतिक ही होनी चाहिए।
  • दलगत राजनीति और सनसनीखेज मुद्‌दों पर आधारित रचनाएं स्वीकार्य नहीं हैं।
  • रचनाएं मार्च,2012 तक संपादकीय कार्यालय में प्राप्त हो जानी चाहिए।
  • यदि प्रेषित  सामग्री के रचनाकार का नाम अज्ञात है तो प्रस्तोता का नाम दिया जाएगा। ऐसी   स्थिति में कृपया रचनाप्राप्ति का स्रोत भी बताएं।

रचनाएं कैसे भेजें :

  • रचना  साफ कागज पर एक तरफ टंकित या पठनीय ढंग से हस्तलिखित हो।
  • रचना पत्रिका के ईमेल पर भी प्रेषित  की जा सकती है। कृपया यथासंभव कृतिदेव फांट का प्रयोग करें या पी.डी.एफ में भेजें।
  • समकालीन अभिव्यक्ति एक शुद्ध  साहित्यिक और सांस्कृतिक पत्रिका है जिसका संचालन/संपादन पूर्णतया अव्यावसायिक/ अवैतनिक है और साहित्यिक स्वाद की स्वस्थ रचनाएं पाठकों तक पहुंचाना इसका उद्देश्य  है।


रचना निम्नलिखित पते पर भेजें:

संपादक                                              
समकालीन अभिव्यक्ति
फ्लैट नं. 5, तृतीय तल, 984
वार्ड नं -7 , महरौली
नई दिल्ली- 110030
फोन नं. 011 -26645001
email -  samkaleen999@gmail.com


अथवा


हरिशंकर  राढ़ी
सह संपादक (समकालीन अभिव्यक्ति)
फ्लैट नं. 2, अपर ग्राउंड फ्लोर
176, वार्ड नं. 3 ,
महरौली, नई दिल्ली-110030
फोन नं. 011 - 26644751


Wednesday, 19 October 2011

Kanya Kumari mein Suryast

                                         कन्याकुमारी में सूर्यास्त
                                                                          -हरिशंकर राढ़ी
दोपहर बाद हमने बाकी बची जगहों को देखने का कार्यक्रम बनाया। कन्याकुमारी स्थल जिस देवी के नाम पर जाना जाता है, उस अधिष्ठात्री  देवी कन्याकुमारी का एक विशाल  मंदिर यहाँ बना हुआ है। स्थल का नाम कन्याकुमारी पड़ने के पीछे एक पौराणिक कथा बताई जाती है। कहा जाता है कि कन्याकुमारी पार्वती का ही एक दूसरा रूप है। किसी जन्म में देवी पार्वती ने एक कन्या के रूप में भगवान शिव को पति के रूप में पाने हेतु घोर तपस्या की थी। उस समय बाणासुर का आतंक चहुँओर फैला हुआ था और वह देवताओं के लिए संकट बना हुआ था। ब्रह्मा से प्राप्त वरदान के कारण वह अजेय था और उसका वध किसी कुँआरी कन्या के ही हाथों हो सकता था। यह भी स्पष्ट  ही था कि उस बलशाली  असुर को आदिशक्ति  देवी पार्वती के अतिरिक्त कोई अन्य कुंवारी कन्या नहीं कर सकती थी। इधर पार्वती के तप से भगवान शिव प्रसन्न हो चुके थे और विवाह में अधिक देर नहीं थी। एतदर्थ नारद मुनि को बहुत चिन्ता हुई और उन्होंने देवी पार्वती से अनुनय विनय करके यह शर्त रखवा ली कि यदि शिव  उनसे विवाह करना चाहते हैं तो सूर्योदय से पूर्व बिना आँख का नारियल, बिना गाँठ का गन्ना और बिना नस का पान लेकर आएं। जब महादेव ये सभी सामग्री लेकर आ रहे थे तभी नारद जी मुर्गे का रूप धारण कर वक्कम पारै नामक जगह पर बाँग लगा दिए और महादेव यह समझकर कि प्रातःकाल हो गया है, लौट गए। इस प्रकार शर्त पूरी न होने के कारण देवी का विवाह न हो सका और वह कुँआरी ही रह गईं। इसी कारण से इस तपःस्थल का नाम कंन्याकुमारी पड  गया । यह बात अलग है कि 
देवी के इस त्याग से कालान्तर में बाणासुर मारा गया और लोककल्याण हुआ।

देवी कन्याकुमारी का मंदिर प्रातः चार बजे से रात्रि में आठ बजे तक खुला रहता है किन्तु यहाँ भी पोंगापंथ हावी है। हम वहाँ दर्शन  के लिए पहुँचे तो पता चला कि दर्शनार्थी  केवल अधोवस्त्र में ही दर्शन  कर सकते हैं। शर्ट, बनियान या कोई भी ऊपरी वस्त्र पहनकर दर्शन  करना वर्जित है। यहीं से मन में एक चिढ़ हो गई और दर्शन करने का इरादा मैंने त्याग दिया। मुझे कभी भी ईश्वरीय  या आध्यात्मिक मामलों में तामझाम या प्रतिबन्ध अच्छा नहीं लगा। यदि ईश्वर का सम्बन्ध मन से है और उसके लिए सबसे बड़ी अनिवार्यता श्रद्धा और समर्पण है तो इन प्रतिबन्धों का क्या औचित्य? मैं मानता हूँ कि शारीरिक शुचिता भी बहुत आवश्यक  है और शारीरिक शुचिता से मानसिक शुचिता भी जुडी  हुई है किन्तु ऐसा भी नहीं कि ईश्वर  के किसी रूप के दर्शन के लिए कुछ लोग शर्तें  लाद दें और आप उन शर्तों  को पूरा न कर सकें तो  दर्शन से ही वंचित हो जाएँ।  दर्शन का मतलब था कि मैं अपने सारे सामान और बटुआ कहीं संभलवाऊँ और फिर अर्द्धनग्न होकर दर्शनार्थ  प्रस्तुत होऊँ। मैंने बाहर से ही उस आदिशक्ति  को नमन किया और अपने रास्ते चल दिया।

                                                                     गांधी स्मारक 


गाँधी स्मारक 

समुद्र के तट पर ही गांधी स्मारक बना हुआ है। इस स्थल पर महात्मा गांधी का अस्थिकलश  रखा गया था। स्मारक की दूसरी बड़ी  विशेषता यह है कि इसकी संरचना ऐसी है कि दो अक्टूबर को सूर्य की पहली किरण इसी पर पड ती है। गांधी जी सभी धर्मों का आदर करते थे, इसी बात को ध्यान में रखकर स्मारक को भी सभी धर्मों के सम्मिलित रूप को लेकर बनाया गया है। इसमें मंदिर, मस्जिद, चर्च और गुरुद्वारे की संरचना का  दर्शन होता है। 

सूर्यास्त
सूर्यास्त 

  कन्याकुमारी में सूर्योदय की तरह सूर्यास्त देखने का भी एक अलग आकर्षण  है। अरब सागर में डूबते हुए सूर्य को देखने के लिए भारी भीड़ जमा होती है। हालाँकि सूर्यास्त में वह जादुई खिंचाव नहीं है जो सूर्योदय में होता है। सच भी है, आरम्भ में जो ऊर्जा होगी, वह अन्त में कैसे हो सकती है। प्रकाश और अंधकार के आगमन के स्वागत में अन्तर तो होना ही चाहिए। शाम  होते ही सैलानी अपने-अपने कैमरे संभाल सागर तट पर जमा हो जाते हैं और लहरों का खेल देखते हैं। सागर तट पर ही सूर्यास्त देखने के लिए ऊँचा सा सूर्यास्त विन्दु (सनसेट प्वांइट) बना है जिस पर पाँच रुपये का टिकट लेकर जाया जा सकता है। हाँ, यदि बादल न हों तो सूर्यास्त का दृश्य भी अच्छा होता है।
सूर्यास्त 

कन्याकुमारी में कन्याकुमारी मंदिर के पास ही अच्छा सा बाजार है जहाँ दक्षिण भारतीय हस्तकला के सजावटी सामान उचित मूल्य पर मिल जाते हैं। इस बाजार में मध्यवर्गीय आवश्यकता  के सामान खूब बिकते हैं और ग्राहक इन्हें खरीदकर प्रसन्न होते हैं। पत्नी और बच्चे साथ थे इसलिए इस बाजार में भी पूरा समय लगा। समुद्रतटीय क्षेत्र होने के कारण यहाँ शंख , घोंघे, कौडि याँ और उनसे निर्मित सामान बिकते हैं और खरीदने लायक भी होते हैं। उत्तर भारत की अपेक्षा सूखे मेवे भी यहाँ अच्छे प्रकार के और सस्ते मिलते हैं।
हमारे पास अगले दिन दोपहर तक का समय था। अब घूमकर थक लिए थे और सागर तट पर समय बिताने के लिए दिल ललचा रहा था। लहरों की गति देखनी थी और जीवन से उनका सामंजस्य बिठाना था। नाश्ते  के बाद हम सागर तट पर चले गए- ठीक उस विन्दु के पास जिसे संगम कह सकते हैं। बच्चे रेत के घरौंदे बनाते रहे और लहरें मिटाती रहीं। दोनों में कोई भी थकने को तैयार नहीं। तेज हवा रेत पर लिखे अक्षरों को मिटाती रही और मुझे याद आती रहीं एक ग़जल की दो पंक्तियाँ जिसे गुलाम अली ने गाया है। शायर का नाम मुझे याद नहीं आ रहा है। पर बात कुछ ऐसी ही है-
                                                            तेज हवा ने मुझसे पूछा
                                                             रेत पे क्या लिखते रहते हो।
रेत पे क्या लिखते रहते हो 
हाँ, समन्दर के किनारे जीवन की निरन्तरता, विशालता  और अनन्तता के साथ-साथ लघुता का ज्ञान होता रहता है।
शाम  को हमें त्रिवेन्द्रम से राजधानी पकडनी थी। त्रिवेन्द्रम कन्याकुमारी से अस्सी किलोमीटर की दूरी पर है। कन्याकुमारी से रेल एवं बस सेवा उपलब्ध है। अपराह्‌न एक-दो बजे रेल सेवा नहीं है, अतः बस सेवा पकड नी थी। यात्रा में मैं समय के मामले में ज्यादा जोखिम नहीं लेता और कम से कम दो घंटे को अतिरिक्त समय लेकर चलता हूँ। कन्याकुमारी से त्रिवेन्द्रम के बीच की दूरी प्राकृतिक दृश्यों  को निहारने में ही निकल जाती है। हाँ, रास्ते में एक छोटी सी घटना जरूर घटी जिसने मेरे मन पर गहरा असर डाला। मैंने कन्याकुमारी में काफी रात गए युवतियों को निश्चिन्त भाव से अकेले ही बस की प्रतीक्षा करते या घर जाते देखा था और वहाँ की परम्परा पर मुग्ध भी हुआ था। यहाँ भी कुछ ऐसा ही देखा जिससे लगा कि केरल और तमिलनाडु में 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते' संस्कृति गहराई तक गई हुई है। हुआ ऐसा कि बस में ड्राइवर केबिन में सिंगल सीट पर एक सुन्दर युवती बैठी हुई थी और  उसके पीछे दो वाली सीट पर एक युवती और एक अधेड  महिला बैठीं थीं। रास्ते में अधेड  महिला उतर गई और युवती सीट पर अकेली रह गई। सीट के पास ही एक युवक खड़ा था और अब वह युवती के पास बैठ सकता था। परन्तु उसने इस अवसर का लाभ नहीं उठाया। खुद युवती के पास बैठने के बजाए वह सिंगल सीट पर बैठी युवती को बुलाकर दो वाली सीट पर बिठाया और उस सीट पर अकेले ही जाकर बैठ गया। मुझे लगा कि हमें अभी बहुत कुछ सीखना बाकी है।

त्रिवेन्द्रम कब आ गया, हमें मालूम ही नहीं हुआ। उस भूमि को प्रणाम कर हम राजधानी में घुस गए और जल्दी ही देश  एक बड़े शहर की भीड  में धंसकर कहीं गुम हो गए............. 

Monday, 10 October 2011

Vivekanand Rock Memorial

                                      विवेकानन्द रॉक मेमोरिअल
                                                                 -हरिशंकर राढ़ी

      कन्याकुमारी के मुख्य  भूखण्ड से लगभग पाँच सौ मीटर की दूरी पर सागर में स्थित विवेकानन्द स्मारक यहाँ का एक महत्त्वपूर्ण आकर्षण  है। इस स्मारक पर गए बिना कन्याकुमारी की यात्रा व्यर्थ ही मानी जाएगी। यहाँ पहुँचने के लिए तमिलनाडु राज्य के अधीनस्थ पूम्पूहार शिपिंग  कारपोरेशन फेरी सर्विस (नाव सेवा) चलाता है। सेवा प्रातः शुरू होती  है और इसका अन्तिम चक्कर सायं चार बजे लगता है। इसके बाद चट्टान पर जाने हेतु सेवा बंद हो जाती है, उधर से आने के लिए उपलब्ध रहती है।

        विवकानन्द रॉक मेमोरिअल दरअसल लगभग उस विन्दु के पास स्थित है जहाँ तीनों सागर मिलते हुए दिखाई देते हैं। वैसे यह बंगाल की खाड़ी में मोती के समान उभरी जुड वाँ चट्टानों में से एक पर स्थित छोटा सा स्मारक है जिस पर कभी भारत के आध्यात्मिक, दार्शनिक , बौद्धिक गुरु एवं आदर्श युवा  संत स्वामी विवेकानन्द ने ध्यान साधना की थी। इस चट्टान को स्मारक का स्वरूप सन १९७० में दिया गया। स्मारक का निर्माण निर्देशन  श्री एकनाथ रानाडे ने किया था। विवेकानन्द चट्टान के पास ही दूसरी चट्टान पर तमिल के विख्यात  संत कवि तिरुवल्लुवर की विशाल  मूर्ति है।
विवेकानंद  स्मारक  

   
        फेरी सर्विस से हम लोग भी जल्दी ही विवेकानन्द राकॅ मेमोरिअल पहुँच गए। वहाँ पहुँचना अपने आप में एक आनन्द था। यह स्थल सदा से ही पवित्र रहा है और इस चट्टान को हिन्दू आस्था की केन्द देवी दुर्गा के एक रूप पार्वती का वरदान प्राप्त है। यहाँ विवेकानन्द केन्द्र की ओर से एक सूचना केन्द्र स्थापित है जहाँ इस खण्ड के विषय  में पूरी सूचना उपलब्ध है। 

          विवेकानन्द रॉक मेमोरिअल वस्तुतः भारत की पारम्परिक एवं आधुनिक वास्तुकला का एक उत्कृष्ट  नमूना है। इसे दो खण्डों में बाँटा जा सकता है - श्रीपाद मण्डपम एवं विवेकानन्द मण्डपम। श्रीपाद मण्डपम के विषय  में मान्यता है कि यहाँ देवी पार्वती के पद्मपाद अंकित हैं। ऐसा दिखता भी है। श्रीपाद मण्डपम में चट्टान पर स्वयं उभरे हुए रक्ताभ पैर दृष्टिगोचर होते हैं। कहा जाता है कि इस चट्टान पर देवी पार्वती ने कभी तपस्या की थी। यहाँ की भाषा  में इसे श्रीपादपाराई के नाम से जाना जाता है।
विवेकानंद मंडपम के सामने लेखक 


         दूसरे खण्ड पर विवेकानन्द मण्डपम स्थित है। स्वामी विवेकानन्द ने इस चट्टान पर वर्ष  1892 में दिसम्बर 25,26, एवं 27 को यहाँ ध्यान साधना की थी। यहाँ निर्मित ध्यान मण्डपम में स्वामी विवेकानन्द की एक बड़ी जीवंत मूर्ति स्थापित की गई है। मण्डपम में ऊँ का मधुर नाद होता रहता है। यात्री यहाँ बैठकर कुछ पल ध्यान करते हैं। मण्डपम के पृष्ठ  भाग में उत्तरायण और दक्षिणायन आधार का एक काल  दर्शक   (कैलेण्डर) भी है जो भारत की कालनिर्णय क्षमता का प्रतिबिम्बन करता है।

           विवेकानन्द मण्डपम में पीछे की ओर विवेकानन्द केन्द्र की ओर से संचालित दूकान भी है जिसमें विवेकानन्द से सम्बन्धित अनेक प्रकार के फोटो एवं दुर्लभ पुस्तकें विक्रय हेतु उपलब्ध हैं। पुस्तकें देखकर मेरा मन बहुत ललचाता है और बिना पढ़े रहा नहीं जाता । किताबें पहले से ही इतनी इकट्‌ठी हो चुकी हैं कि नई के लिए जगह नहीं। आखिर जमा करना ही तो सब कुछ नहीं । पढना भी तो चाहिए। मैं पुस्तकों पर दृष्टि  डाल ही रहा था कि एक विक्रेता मुझे रोमेन रोलैण्ड की विश्वप्रसिद्द  पुस्तक 'The Life of Vivekanand and The Universal Gospel'  दिखाने लगा और खरीद लेने के लिए प्रेरित करने लगा। मूलतः जर्मन भाषा  में लिखी यह पुस्तक विवेकानन्द पर लिखित असंख्य   पुस्तकों में अपनी अलग प्रतिष्ठा  रखती है। घूमता -फिरता न जाने कहाँ से बेटा आ गया । तब वह दस वर्ष  का था। पता नहीं उसे क्या आकर्षण  लगा कि इसे खरीदने के लिए जिद करने लगा। सेकेण्डों में ही वह अपनी पॉकेट मनी कुर्बान करने को तैयार होगा। मन तो मेरा भी था ही। पुस्तक ले ली। यह बात अलग है कि मैंने तो समय निकाल कर पढ  लिया पर वे श्रीमान जी जर्मन से अंगरेजी में अनूदित उस पुस्तक की भाषा  को झेल न सके और कभी आगे पढ ने के वादे पर अभी कायम हैं।

तिरुवल्लुवर की विशाल मूर्ति
         इस चट्टान पर देर तक घूम-फिर लेने के बाद इसकी जुड़वाँ चट्टान पर चलने का क्रम आया। यह दूसरी चट्टान तमिल संत कवि तिरुवल्लुवर को समर्पित है और यह विवेकानन्द मेमोरिअल से स्टोन्स थ्रो की दूरी पर ही कही जाएगी- बमुश्किल  बीस मीटर पर। नाव पर सवार हुए और पहुँच गए इस लघु प्रस्तरखण्ड पर निर्मित विशालकाय स्मारक पर । यहाँ प्रसिद्ध तमिल कवि तिरुवल्लुवर की 133 फीट ऊँची मूर्ति है। इस महान कवि का जन्म ईसा पूर्व सन्‌ 31 में हुआ था। यह एशिया  की सबसे बड़ी  मूर्तियों में एक है और इसका निर्माण कार्य 1 जनवरी, 2000 को सम्पन्न हुआ था। चेन्नई के प्रसिद्ध शिल्पी  डॉ.वी गणपति स्थपति ने अपने साथ ५०० कुशल  शिल्पियों  को लेकर इस कार्य को पूरा किया था।


      मूर्ति की स्थापना 95 फीट ऊँचे चबूतरे पर हुई है और इसका आधार 38 फीट है जो 'तिरुक्कुरुल' के कुल अध्यायों का प्रतिनिधित्व करता है। मूर्ति के आधार के पास अर्थ मण्डपम बना हुआ है जिस पर दस हाथियों का अंकन हुआ है। ये दस हाथी दस दिशाओं  के प्रतीक हैं। पूरी संरचना ग्रेनाइट पत्थरों की है और आश्चर्य  की बात यह है कि इसके निर्माण में कहीं इस्पात का प्रयोग नहीं किया गया है। यह भी अद्‌भुत शिल्प  का ही नमूना है कि लगभग 7000 टन भार बिना किसी सहारे के टिका हुआ है। 

        2004 की सुनामी में लहरें इतनी ऊँची उठी थीं कि मूर्ति का कंधा डूब गया। जो कन्याकुमारी नहीं गए हैं वे तिरुवल्लुवर की मूर्ति के चित्र को देखकर सुनामी की भयंकरता का अनुमान लगा सकते हैं।


       इन चट्टानों पर खड़े होकर सागर की लहरों को टकराते देखना एक जीवन दर्शन सा लगता है। चारो ओर अतल सागर और बीच में बुल्ले की तरह दो चट्टानें। तीन सागरों का मिलन! यहाँ से पानी के रंग के आधार पर बंगाल की खाड़ी, हिन्द महासागर और अरब सागर को पहचाना जा सकता है। दूर- दूर घूमती नौकाएं और अन्ततः अनन्त जल राशि। आप सीधा जाएं तो दक्षिणी ध्रुव पहुँच जाएंगे । विश्व  का एकमात्र देश हिन्दुस्तान जिसके नाम पर एक महासागर भी है
तिरुवल्लुवर खंड से सागर का दृश्य और बच्चे : छाया- राढ़ी

          देखते- सोचते कहीं दूर तक चला गया मैं - न जाने क्या-क्या! भाव आते - जाते रहे। कन्याकुमारी के रॉक मेमोरिअल पर तमिल महाकवि तिरुवल्लुवर के स्मारक पर खड़ा  मैं देख रहा हूँ तीन सागरों की मिली-जुली लहरें थोड़ी सी बची हुई चट्टान पर लगातार टक्कर मार रही हैं। पता नहीं क्या द्वेष  है या संघर्ष  या फिर प्यार! ये रुक नहीं रही हैं और चट्टानें अडिग सी खड़ी झेले जा रही हैं इनका वार। काई लग चुकी है, घिस चुकी हैं पर हिलती नहीं, हटती नहीं। लहरें भी टकराकर फेन उगलने लग जाती हैं, धराशायी हो जाती हैं पर इन्हें भी रुकना नहीं; बस चलते जाना है और शायद  यही संघर्ष  है।

     डायरी में ये पंक्तियाँ लिखी है, तारीख है २८ सितम्बर और समय अपराह्‌न के १२.10। बस अब वापस भूखण्ड पर आने ही वाले हैं........ 

Wednesday, 5 October 2011

Kanyakumari Mein

                                        कन्या कुमारी में सूर्योदय 
                                                                              
                                                                                     -हरिशंकर राढ़ी
       
            होटल की बॉलकनी में बैठा रात देर तक शहर  का दृश्य  देखने का आनन्द लेता रहा था। बॉलकनी के ठीक सामने लोकल बस स्टैण्ड था और मैं यह देखकर आश्चर्यमिश्रित सुख लेता रहा कि रात के ग्यारह बजे भी युवतियाँ निश्चिन्त  भाव से अपने गन्तव्य के लिए साधन का इन्तजार कर रही हैं। उनके चेहरे पर न कोई भय न घबराहट! निःसन्देह यह केवल प्रशासन  का परिणाम नहीं होगा। प्रशासन  तो कमोबेश  हर जगह ही है। हम तो देश  की राजधानी दिल्ली में रहते हैं जहाँ समूचे देश  को चलाने के लिए नियम-कानून बनते हैं। बनाने वाले भी यहीं रहते हैं और उनका पालन कराने वाले भी । किन्तु, जब तक पालन करने वाले नहीं होंगे, पालन कराने वाले चाहकर भी कुछ विशेष  नहीं कर सकते हैं। केरल में इसका उल्टा है। कानून बनाने वाले और उनका पालन कराने वाले हों या न, पालन करने वाले खूब हैं। कोई राह चलती युवती को आँख उठाकर देखने वाला ही नहीं है। शायद  पढे़-लिखे होने का असर हो। साक्षरता में केरल अग्रणी तो है ही। पर अगले क्षण मेरे मन ने यह तर्क मानने से मना कर दिया। हम दिल्ली वाले क्या कम पढ़े - लिखे हैं। साक्षरता में इधर के शहर  भले ही पीछे हों परन्तु उच्च शिक्षा  में तो कतई नहीं। फिर भी देखिए, अगर आप अखबार के ऐसे अंक की तलाश  में लग जाएं जिसमें बलात्कार, छेड -छाड  या महिलाओं से दुर्व्यवहार की कोई खबर न हो तो शायद  आपको निराशा  ही हाथ लगेगी। दक्षिण में (विशेषतः केरल में) मुझे ऐसे कई उदाहरण मिले जिससे मैं प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाया और एक बार यह विचार पुनः पुष्ट हुआ  कि शिक्षा  से कहीं बहुत ऊपर संस्कार और स्वस्थ परम्पराएँ होती हैं। संस्कार और परम्पराएं हमें विरासत में उसी प्रकार मिलती हैं जैसे वायु और जल जबकि शिक्षा उस प्रकार मिलती है जैसे उद्यम से अन्न और धन। जहाँ यह बात मन के केन्द्र में बैठी है कि महिलाएं आदरणीय हैं, समाज और परिवार की इज्जत हैं, वहाँ इस प्रकार का दृश्य होना स्वाभाविक ही है। अब यदि कोई किसी सुन्दर युवती को एक बार मुड़कर देख लेता है या कई बार भी देख लेता है; उसके सौन्दर्य का निरापद नैत्रिक पान कर लेता है तो इस पर भी ज्यादा हायतौबा नहीं मचनी चाहिए। हम प्रकृति का अपमान करने के लिए स्वतंत्र नहीं हैं, यह हमें याद रखना चाहिए।  सौन्दर्य से बच पाना या फिर उसकी उपेक्षा करना भी स्वाभाविक नहीं है और यह सौन्दर्यबोध का प्रतीक भी है। कितना अच्छा हो कि सुख एक मर्यादा के भीतर ही लिए जाएं!


कन्या कुमारी का बाज़ार 
         
        रात में देर से सोया था- इस विश्वास  के साथ कि अलार्म बजेगा और सागर में सूर्योदय अवश्य  देखूँगा। किन्तु मुझे लगता है कि सारी की सारी योजना धरी रह जाती अगर श्रीमती जी की नींद आदतन समय पूर्व नहीं खुल जाती। स्थिति को भाँपने की उनकी क्षमता बड़ी  तीव्र है और मैं कई बार अपने खयालों में डूबा जरूरी चीजें भी भूल जाता हूँ । अलार्म बजा या नहीं, यह मैं नहीं जानता किन्तु उन्होंने सूर्योदय से काफी पहले ही मुझे जगाना शुरू  कर दिया। दरअसल नींद खुलते ही स्थानीय हलचल से उन्हें पता लग गया था कि लोग-बाग कहीं जाने की जल्दी में हैं और होटल के अन्य लोग भी छत पर जा रहे हैं। सो मामले की तस्दीक कर मुझे जगाना लाजिमी समझा। एक लेखक के दुर्गुणों से उन्होंने अच्छा सामंजस्य बिठा लिया है।

सूर्यादय का एक बिम्ब 
           वास्तव में ऐसा लग रहा था कि पूरा कन्या कुमारी छतों पर आ गया है। कभी मेरे मन में यह भ्रम था कि सूर्योदय देखने के लिए कोई स्थल होगा और सारे सैलानी वहीं जाते होंगे। यहाँ तो सबकी निगाहें और कैमरे बंगाल की खाड़ी के आसमान में छायी लालिमा की तरफ लगे थे। भागकर  नीचे से  मैं भी अपना कैमरा लाया और प्राप्त अवसर के स्वागत के लिए तैयार हो गया। सागर की सतह एकदम रक्ताभ हो रही थी और महसूस हो रहा था कि मैं पहली बार सचमुच उषारानी  को देख रहा हूँ- कितनी सुन्दर , कितनी कोमल और कितनी भावुक । ऐसे जैसे कोई नवपरिणीता अपने अप्रतिम सुन्दर मुख पर पड़े झीने से आँचल को सरकाए जा रही हो। पहली बार अपने प्रकृति का कवि न होने का मलाल हुआ। सुमित्रानन्दन पन्त से लेकर विलियम वर्ड्‌सवर्थ तक नजर गई, कालिदास भी याद आए किन्तु संतोष  नहीं हुआ । कोई ना कोई कमी तो वहाँ भी है और इस उषा  का चित्र खींचने में उनसे भी भूल हुई है। हाँ, बात महाकवि माघ पर आकर जरूर ठहरती है। इस फन में उनका कोई मुकाबिला नहीं है। जो देखा , उसे उससे भी सुन्दर लिखा। शायद माघ ही ऐसे कवि हैं जिन्होंने अपने प्रकृति वर्णन से प्रकृति की सुन्दरता को मात दे दी है। उनके प्रातः वर्णन में एक और अमूल्य हीरा जुड  जाता अगर वे इस उषा और सूर्योदय को देखते!

         उस सघन मोहक लालिमा के घेरे में सागर की अतल गहराई से बाल अरुण का शनैः शनैः उदित होना अपने आप में एक सुख था। जैसे कोई सुन्दरी अपने सिर पर स्वर्ण कलश  लिए किसी पनघट पर जा रही हो या यह स्वर्णकलश  ही किसी सुन्दरी का मुखमंडल हो और वह धीर-धीर अपने घूँघट को उठा रही हो- संकोच भी हो, उत्कंठा भी हो और अपने प्रियतम को देखने की अकुलाहट भी ; और हाँ, अपने अनिन्द्य मुख को दिखाकर थोड़ी प्रशंसा  पाने का लोभ भी। यहाँ बस देखना ही देखना था। देखना  अपने आप में एक सुख था और इस सुख ले लेना भी एक सफलता!
सूर्योदय का दूसरा बिम्ब 

       इस दिन सूर्योदय देख लेना हमारे लिए सफलता ही हुई । यद्यपि कन्याकुमारी में एक सुबह और मिलती पर वह मिलकर भी नहीं मिली। वहाँ यदि आप सूर्योदय देखने से वंचित रह गए तो उस सुबह को सुबह मानना ही ठीक नहीं होगा। दरअसल वहाँ कब बादल हो जाए और सूर्योदय का दृश्य केवल बादल ही देख सकें, यह निश्चित नहीं है। हमारे साथ अगली सुबह ऐसा ही हुआ और बादलों ने पूरे सौन्दर्य पर पानी फेर दिया।

इस दिन हमारी योजना में पहला कार्यक्रम विवेकानन्द स्मारक  (इसे रॉक मेमोरियल भी कहते हैं) देखने का था जो कि यहाँ का  सबसे महत्त्वपूर्ण स्थल है।  

Sunday, 2 October 2011

Kanyakumari Ke Liye

                                               कन्या कुमारी की ओर
                                                                                
                                                                                  -हरिशंकर  राढ़ी

       योजनानुसार हमलोग प्रातः छः बजे तक रामेश्वरम बस स्टेशन  पहुँच चुके थे। वहाँ मालूम किया तो कन्याकुमारी के लिए सात बजे बस नियत  थी और वहीं खड़ी थी। बुकिंग खिडकी पर एक सभ्य तमिल उपस्थित था और हमारे साथ बहुत मैत्रीपूर्ण ढंग से बात कर रहा था। उसके अनुसार बस समयानुसार खुल जाएगी और यथासमय कन्याकुमारी पहुँचा देगी। यूँ तो बस बाहर से पुरानी ही लग रही थी परन्तु अन्दर से ठीक-ठाक थी। विशेष  बात यह थी कि यह बस दो गुणा दो थी और पुशबैक  थी, फिर भी प्रति व्यक्ति किराया एक सौ पचास रुपए मात्र! मैंने पहले भी कहा है कि तमिलनाडु सरकार की बसों में किराया काफी कम है। रामेश्वरम से कन्याकुमारी की कुल दूरी तीन सौ किलोमीटर है और यात्रा में लगभग आठ -नौ घंटे लग जाते हैं। कुल मिलाकर मामला बहुत अच्छा था। चाय वगैरह पी रहे थे तब तक एक दूसरी बस आ गई जिसके बोर्ड पर हमारे लिए पठनीय केवल अंगरेजी में  एक शब्द लिखा था - कन्याकुमारी। मित्र महोदय ने तुरन्त उस बस को पकडा  और ड्राइवर - कंडक्टर से मालूम किया तो पता चला कि वह बस तुरन्त ही कन्याकुमारी जा रही थी। हालाँकि साढ़े  छः बज चुके थे और अपनी बस सात बजे की थी ही। जल्दी-जल्दी सामान उठाकर बस में रखा गया। अन्दर जाने पर मुझे दो बातें मालूम हुई- एक तो यह कि बस तीन गुणा दो थी, सीटें  सामान्य थीं। किराया उसका भी डेढ  सौ ही! क्यों भाई? कोई ना कोई रहस्य तो जरूर है । और रहस्य यह था कि वह बस मदुराई होकर जा रही थी।
      
       दरअसल रामेश्वरम  से कन्याकुमारी के दो रास्ते हैं। एक रास्ता बंगाल की खाड़ी के समानान्तर जाता है- वाया तूतीकोरिन। यह रास्ता लगभग तीन सौ किमी (तीन सौ बीस) और पूर्वी तमिलनाडु की सैर कराता है। दूसरा रास्ता मदुराई होकर जाता है और यह काफी प्रचलित और व्यस्त है। यहाँ से मदुराई 170 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है और राष्ट्रीय  राजमार्ग संखया 49 पर चलना पड ता है। मदुराई से कन्याकुमारी 250 किमी है। राष्ट्रीय  राजमार्ग संख्या  7 (जो वाराणसी से कन्याकुमारी तक जाता है और देद्गा सबसे लम्बा राजमार्ग है) मदुराई और कन्याकुमारी को जोडता है। अब मेरे समझ में आ गया कि दोनों बसों की सुविधाओं में अन्तर के बावजूद किराया बराबर क्यों है। वाया मदुराई 100 किमी की यात्रा अधिक करनी पडती है, यद्यपि यात्रावधि बराबर ही है।  मेरा मन पहले से ही था कि पूर्वी घाट होकर ही चलना है और उधर के भूगोल की जानकारी जरूरी है। मैंने निर्णय लिया कि हम वाया तूतीकोरिन वाली बस से ही चलेंगे- इतनी दूर आना-जाना बार - बार नहीं होता। सामान उतारा गया और पहली वाली बस में सवार हो गए।  
           
      यात्रा का पहला ही रोमांचक आनन्द इंदिरा गांधी सेतु से गुजरते ही मिलने लगा। यह राजमार्ग 49 पर बना है रामेश्वरम द्वीप को भारत के मुखय भूभाग से जोडता है। यह पुल काफी लंबा है और रेल के अद्वितीय पंबन पुल के समानान्तर है। अथाह समुद्र के ऊपर तैरता यह पुल अत्यन्त ही मनोहारी दृश्य  उपस्थित करता है। एक बार तो मुझे ऐसा लगा मानो हम त्रेतायुग में निर्मित सेतुबंध के नवीन संस्करण से होकर गुजर रहे हों। बस की तीव्र गति के आगे पुल की लंबाई ज्यादा नहीं ठहर सकी और हम सेतुसागर का आनन्द देर तक नहीं ले सके पर जो ले लिया वह कम नहीं था।

नमक के टिब्बे 

     आगे रामनाथपुरम नामक शहर  आता है जो कि जिला मुखयालय भी है। यहीं से कुछ दूर चलकर हमारी बस  मदुराई वाला रास्ता छोड कर बाएं मुड  गई । जैसे - जैसे आगे बढ ती गई, पूर्वी घाट का वास्तविक दृश्य  जो कभी भूगोल की किताबों में पढ़ा  या पढाया था, साक्षात होने लगे और समुद्रतटीय इलाका आकर्षित  करने लगा। अक्टूबर के महीने की सुबह के लगभग नौ बजे रहे होंगे किन्तु ऐसा लग रहा था कि मई या जून की सुबह हो।
नमक बटोरने की प्रक्रिया 
     गाँव और शहर  काफी दूरी पर बसे हुए लगते हैं। देखकर यूँ लगता है कि प्रकृति बिलकुल फुरसत में बैठी आराम कर रही हो।  लगभग बारह बजे बस ने  समुद्र के समानान्तर सीधी सडक पकड़ ली । जगह - जगह सफेद चमकते हुए टिब्बे दिखने लगे l बच्चे जो अब तक थक कर शांत  हो चुके थे, टिब्बे देखकर  पुनः जागृत हो गए और पूछने लगे कि यह क्या है? क्या इस रंग का भी पहाड  होता है? टिब्बों की चमक रेगिस्तान की रेत की तरह आँखों को चुंधिया रही  थी । दरअसल ये नमक के टिब्बे थे। इस क्षेत्र में खाड़ी के जल से नमक बनाने का कार्य होता है। यह बिना साफ किया गया नमक होता है। किसी समय यही नमक बाजार में बिकने के लिए आ जाता था। अभी पंद्रह -बीस साल पहले तक मैंने अपने गाँव में लोगों को यही नमक जो छोटे-छोटे ढेलों के रूप में होता था, बाजार से लाकर खाते देखा था। अभी भी गाँव जाता हूँ तो देखता हूँ कि वहाँ के बाजार में यह नमक बिकता है और कुछ लोग खरीद कर लाते हैं। चिकित्सकों के अनुसार उन्हें अपने स्वास्थ्य (?) की चिन्ता ही नहीं है। अब इन्हें कौन समझाए कि स्वास्थ्य की चिन्ता वह करता है जिसका पेट भरा हो और पेट उसका भरता है जिसकी जेब भरी हो। बड़ी - बड़ी क्यारियों में समन्दर का पानी भरा हुआ था, जैसे धान की क्यारियों में भरा जाता है। हवा चल रही थी और तीन-चार इंच गहरे पानी में भी लहरें मचल रही थीं।  यही पानी सूख जाएगा तो नमक इकट्‌ठा कर लिया जाएगा और ऊँचे- ऊँचे टिब्बे बना दिए जाएंगे।
नमक की क्यारियां 
       एक लम्बी यात्रा के बाद हम लगभग चार बजे कन्याकुमारी के नजदीक पहुँचने  लगे। यहाँ हरियाली का साम्राज्य स्थापित था। नारियल के बगीचे हमारी आँखों में जैसे बस चुके थे और जैसे हमें आदत सी हो चली थी इन्हें देखने की।यहाँ प्रकृति समृद्ध है, इसलिए क्षेत्र समृद्ध होगा ही। यहाँ पहली बार हमने पवनचक्की (विण्डमिल) देखी। ऊँचे-ऊँचे खम्भों पर बड़ी - बड़ी पंखुडियाँ अपनी मस्ती में पवन का साथ पा डोले जा रही थीं मानो कोई प्रेमिका अपने प्रियतम से मिलने का उत्सव मना रही हो। 


कन्याकुमारी एक प्रसिद्ध पर्यटक स्थल है और पर्यटन ही यहाँ का मुख्य  व्यवसाय है, इसलिए यहाँ होटलों की भरमार है। अक्टूबर यहाँ यात्रा का सीजन है, हालाँकि प्रमुख  सीजन दिसम्बर को माना जा सकता है। सन 2009 में यहाँ हमें रु.500 में तीन बिस्तर वाला एक बड़ा कमरा मिल गया था। कमरे में सुविधाएँ भी ठीक थीं। यहाँ स्वामी विवेकानन्द का एक आश्रम है जिसमें ठहरने की सुविधा अच्छी है किन्तु इसकी दूरी कन्याकुमारी के मुख्य  बिन्दु से लगभग दो किमी होगी। इस आश्रम में कमरों की बुकिंग ऑन लाइन होती है। आप कन्याकुमारी जाएँ तो ठहरने के लिए अन्तिम प्वाइंट के आसपास के किसी होटल को वरीयता दें। दूसरी यह बात ध्यान में जरूर रखें कि होटल की तीन- चार मंजिल से कम ऊँचा न हो। इसका सबसे बड़ा  लाभ यह होगा कि आप को अपने होटल की छत से सूर्योदय दर्शन  का अकथनीय सुख मिलेगा। यदि कन्याकुमारी में आप सूर्योदय नहीं देख पाए तो आप की यात्रा अधिकांशत: निरर्थक गई।
 आज बस की यात्रा ने हमें थका दिया था। थोड़ी  देर आराम किया और भोजन के लिए निकल गए। वह भी अच्छा ही रहा। अन्ततः सूर्योदय के लिए मोबाइल में सचेतक लगाकर सो गए। अगले अंक में सूर्योदय का दृश्य  आपके सामने होगा.......



Saturday, 17 September 2011

रामेश्वरम में

हरिशंकर राढ़ी
दोपहर बाद का समय हमने घूमने के लिए सुरक्षित रखा था और समयानुसार ऑटोरिक्शा  से भ्रमण शुरू  भी कर दिया। पिछले वृत्तांत में गंधमादन तक का वर्णन मैंने कर भी दिया था। गंधमादन के बाद रामेश्वरम द्वीप पर जो कुछ खास दर्शनीय  है उसमें लक्ष्मण तीर्थ और सीताकुंड प्रमुख हैं। सौन्दर्य या भव्यता की दृष्टि  से इसमें कुछ खास नहीं है। इनका पौराणिक महत्त्व अवश्य  है । कहा जाता है कि रावण का वध करने के पश्चात्  जब श्रीराम अयोध्या वापस लौट रहे थे तो उन्होंने सीता जी को रामेश्वर  ज्योतिर्लिंग के दर्शन  के लिए, सेतु को दिखाने के लिए और अपने आराध्य भगवान शिव  के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए पुष्पक  विमान को इस द्वीप पर उतारा था और भगवान शिव की पूजा की थी। यहाँ पर श्रीराम,सीताजी और लक्ष्मणजी ने पूजा के लिए विशेष  कुंड बनाए और उसके जल से अभिषेक  किया । इन्हीं कुंडों का नाम रामतीर्थ, सीताकुंड और लक्ष्मण तीर्थ है । हाँ,  यहाँ सफाई  और व्यवस्था नहीं मिलती और यह देखकर दुख अवश्य  होता है।

स्थानीय दर्शनों  में हनुमान मंदिर में (जो कि बहुत प्रसिद्ध और विशाल  नहीं है) तैरते पत्थरों के दर्शन करना जरूर अच्छा लगता है। पत्थर का पानी पर तैरना एक लगभग असंभव सी घटना मानी जाती है और इसे कुछ लोग ईश्वरीय  चमत्कार मानते हैं तो कुछ गल्प के अलावा कुछ नहीं। इसे सामान्यतः वैज्ञानिक तौर पर भी नकार दिया जाता है किन्तु यह सच है कि पत्थर पानी में तैरते हैं। इसे आप अपनी आँखों से देख सकते हैं, छू सकते हैं और दिल करे तो खरीदकार ला भी सकते हैं। यह वास्तव में पत्थर ही होते हैं जो दुर्लभ श्रेणी के होते हैं।

वस्तुतः तैरते हुए पत्थर भी प्रकृति के चमत्कारों में एक हैं। इनका पानी पर तैरना पता नहीं श्रीराम के स्पर्श  की कृपा पर आधारित था या नहीं किन्तु इसे प्रकृति का स्पर्श  जरूर मिला है। भूविज्ञान के अनुसार पत्थर का तैरना कोई चमत्कार या  ईश्वरीय शक्ति  नहीं है। हर प्रकार का पत्थर तैर नहीं सकता है। दक्षिण भारत पृथ्वी के सबसे पुराने भागों में है। वर्तमान हिमालय के अस्तित्व में आने से पूर्व एशिया , योरोप और आस्ट्रेलिया तक का अंश  एक ही खंड था। जहाँ आज हिमालय है वहाँ पहले टेथीस नामक एक छिछला सागर था। इस सागर के उत्तर में अंगारा लैण्ड नामक भूखंड था और दक्षिण में गोंडवाना लैण्ड। टेक्टॉनिक प्लेटों के खिसकने से कालान्तर में टेथीस सागर की जगह हिमालय का निर्माण हो गया। भारत का दक्षिणी भाग गोंडवाना लैण्ड का प्रमुख हिस्सा है जो मुख्यतः ज्वालामुखी से निर्मित आग्नेय शैलों  से निर्मित है। चूंकि आग्नेय शैलें  प्रायः ज्वालामुखी से निकले लावा के ठण्डे हो जाने से बनती हैं, इनमें कहीं -कहीं छिद्र रह जाते हैं जिनमें हवा भर जाती है। यही हवा जब अधिक हो जाती है तो पत्थर पानी में तैरने लग जाता है और आर्किमिडीज का सिद्धान्त यहाँ पूर्णतया लागू होता है। यह बात अलग है कि आग्नेय शैलों के अन्तर्गत आने वाला पूरा पत्थर परिवार तैर नहीं सकता, इसमें भी एक विशेष कोटि होती है जिसे हम झाँवाँ पत्थर कह सकते हैं।
हमारा रामेश्वरम भ्रमण लगभग तीन घंटे में पूरा हो गया था। उसी होटल पर हम आ चुके थे। शाम  के पांच बज रहे होंगे। अब आगे क्या किया जाए? अभी कुछ और महत्त्वपूर्ण स्थल रह गए थे । उनमें से एक था -  धनुषकोडि या धनुषकोटि। इस स्थल के विशय में हमने सुन रखा था और जाने की प्रबल इच्छा भी थी। ऑटो वाले से बात की गई तो पता लगा कि इस समय जाना असंभव था। यह वहाँ से लौटने का समय है और रात्रि में वहाँ जाना न तो लाभकर है और न ही अनुमोदित ही। यहाँ भी हमें अभी कुछ खरीदारी करनी थी, शंकराचार्य  मठ में जाना था और थोड़ा समन्दर किनारे घूमना भी था। वस्तुतः अब जो सबसे ज्यादा उत्कंठा हमारे मन में शेष  थी वह थी सेतु के दर्शन करना जो किधनुषकोडि में ही मिल सकता था। सच तो यह है कि सेतु का अब कोई अस्तित्व बचा ही नहीं है और धनुषकोडि में भी इसके दर्शन नहीं हो सकते। यह तो अब सागर में समाहित हो चुका है, धनुषकोडि तो वह स्थान है जहाँ से इस सेतु का प्रारम्भ होता था।


गंध मादन पर्वत पर 

धनुषकोडि ; धनुषकोडि या धनुषकोटि पम्बन से दक्षिण-पूर्व में लगभग 8 किमी की दूरी पर स्थित है। यहाँ पर विभीषण  का मंदिर हुआ करता था। कहा जाता है कि रावण दमन के बाद वापसी में विभीषण के कहने से श्रीराम ने इस पुल का सिरा अपनी धनुष से तोड़ दिया था। ‘कोडि’ का अर्थ तमिल भाषा  में अन्त या सिरा होता है। यह भी विश्वास है कि रामेश्वरम और काशी की यात्रा सेतु में स्नान किए बिना पूरी नहीं होती। धनुषकोडि को महोदधि (बंगाल की खाड़ी ) और रत्नाकर (हिन्द महासागर ) का मिलन स्थल भी कहा जाता है, हालाँकि आज का भूगोल इस बात को प्रमाणित नहीं करता । धनुषकोडि श्रीलंका के बीच में विश्व  की  सबसे छोटी सीमा का निर्माण भी करता है जो मात्र पचास गज की लंबाई की है। स्वामी विवेकानन्द ने भी 1893 के विश्व  धर्मसम्मेलन मे विजय पताका फहराने के बाद श्रीलंका के रास्ते इसी भूखंड पर भारत की धरती पर अपना पैर रखा था। 
धनुषकोडि अब एक ध्वन्शावशेष  बनकर रह गया है। 22 दिसम्बर 1964 की मध्यरात्रि में एक भयंकर समुद्री तूफान ने धनुषकोडि का गौरवशाली  अतीत और वैभवशाली वर्तमान को पूरी तरह निगल लिया था। इस भीषण  तूफान में लगभग 1800 जानें गईं थी और पूरा द्वीप शमशान  बनकर रह गया। यहाँ क्या कुछ नहीं था। इसका अपना एक रेलवे स्टेशन  था और एक पैसेन्जर ट्रेन (पम्बन-धनुषकोडि पैसेन्जर, ट्रेन नम्बर - 653/654) चक्कर लगाया करती थी। दैवी आपदा की उस रात भी वह पम्बन से 110 यात्रियों और 5 कर्मचारियों को लेकर चली थी। अपने लक्ष्य अर्थात धनुषकोडि रेलवे स्टेशन से कुछ कदम पहले ही तूफान ने उसे धर दबोचा और सभी 115 प्राणी आपदा की भेंट चढ़ गए। अब यह एक खंडहर मात्र रह गया है और सरकार ने इसे प्रेतनगर ( Ghost  Town ) घोषित  कर रखा है। यहाँ एक शहीद  स्मारक भी बनाया गया है। यहाँ छोटी नाव या पैदल भी पहुँचा जा सकता है । रेत पर चलने वाली जीपें और लारियाँ भी उपलब्ध हैं।

शंकराचार्य मठ :
रामनाथ मंदिर के मुख्य अर्थात पूर्वी गोपुरम के सामने जहाँ सागर में स्नान की रस्म शुरू करते हैं, वहीं शंकराचार्य का मठ भी स्थापित है। एक बार मुझे यह भ्रम हुआ कि यह आदि शंकराचार्य  द्वारा स्थापित चारो मठों में से एक होगा क्योंकि उन्होंने चार मठ चारो धाम में स्थापित किए थे और रामेश्वरम चार धामों में एक है। बाद में ध्यान आया कि उनके द्वारा स्थापित मठ चार धामों में नहीं अपितु चार दिशाओं  में थे। जहाँ उत्तर, पूरब और पश्चिम  के मठ धामों में स्थित हैं वहीं दक्षिण में स्थित शृंगेरी मठ तो कांची में है। अतः रामेश्वर  में स्थित शंकराचार्य  मठ महत्त्वपूर्ण तो है किन्तु प्रमुख चार मठों  में नहीं है। फिर भी मठ को देखने की इच्छा कम नहीं हुई थी। वहाँ पहुँचे तो अच्छी खासी भीड़ दिखी। कोई विशेष प्रयोजन मालूम हो रहा था। भाषा की समस्या तो थी ही । चाहा कि कुछ जानकारी लूँ, पर किससे लूँ? प्रश्न  का कोई समाधान नहीं दिख रहा था। सामान्य बातें या पता तक तो कोई विशेष परेशानी  नहीं थी। परन्तु यहाँ प्रश्न लेखकीय कीडे़ का था। जिज्ञासा का समाधान तो चाहिए ही था, यात्रा की समाप्ति के बाद वृत्तान्त भी तो लिखना था! ना हिन्दी ना अंगरेजी। संस्कृत में अपना  बहुत प्रवाह तो नहीं है किन्तु कामचलाऊ शक्ति जरूर है। पंडित जी से बात करूँ पर वहाँ भी असमर्थता ही थी। सोच -विचार कर ही रहा था कि एक सज्जन शारीरिक  भाषा से मुझे पढ़े - लिखे या अफसर से दिख गए। उनसे बात की तो बोले कि हिन्दी तो नहीं, अंगरेजी में वे बात कर सकते हैं। बातचीत में पता चला कि वे मदुराई के रहने वाले हैं और वहीं किसी सरकारी सेवा में हैं। नाम तो मैं उनका भूल गया, पर उनकी बातें, उनका ज्ञान और सज्जनता मुझे याद है। लम्बी बातचीत में उन्होंने जो कुछ बताया, उसमें मुझे एक बात बड़ी आश्चर्यजनक  लगी। वहाँ अश्विन  मास में एक विशिष्ट  उत्सव होता है जिसमें लोग अंगारों पर नाचते हैं और किसी का पैर नहीं जलता। उनका दावा था कि आप यह उत्सव स्वयं देख सकते हैं। हम भी वहाँआश्विन  मास में( नौरात्रों में) गए थे। परन्तु यह उत्सव पूर्णिमा के आस- पास  होता है। मुझे इस बात की सत्यता पर अभी भी पूरा विश्वास नहीं होता कि जुलूस बनाकर लोग आग पर नाचेंगे और पैर नहीं जलेंगे परन्तु किसी की धार्मिक आस्था को चुनौती देना भी कोई आसान कार्य नहीं है।
दिन डूबने को आ रहा था। मठ से निकलकर हम सागर किनारे की ओर चल पडे़। हवा की शीतलता  का कोई जवाब नहीं था। सागर किनारे जो दृश्य  सामान्यतः मिलता है - लोगों की भीड़, खोमचे वालों का जमावड़ा और बेतरतीब आते-जाते लोग, यहाँ भी था। यहाँ एक बार पुनः जिस चीज ने भगाने की ठानी वह थी यहाँ की गंदगी और बदबू!  रामेश्वरम  के लोगों का प्रमुख व्यवसाय है मछली पकड़ना और बेचना। अब मछलियों के पकड़ने के बाद उनकी प्रॉसेसिंग और भंडारण के कारण बदबू निकलना तो सामान्य बात है (बेट द्वारिका यात्रा में मैंने यही पाया था), किन्तु तट पर फैली गंदगी, गोबर और मल से भी कम वितृष्णा  नहीं पैदा हो रही थी। आवारा पशुओं  के झुंड के झुंड अपनी गतिविधियों में व्यस्त और मस्त थे। कुल मिलाकर सागर किनारे दिल ये पुकारे वाली बात बनी नहीं। हाँ, थोड़ा बहुत इलाका जरूर ऐसा था जहाँ बैठा जा सकता था। अंधेरा घिरने लगा था। कुछ स्थानीय लोगों ने बताया कि इस दिशा  में लंका है और थोड़ी देर बाद श्रीलंका की बिजुलबत्तियाँ दिखाई देंगी। आखिर कुल दूरी यहाँ से तीस किमी ही तो है। 

पम्बन रेलवे पुल
- यह रेलवे पुल रामेश्वरम द्वीप को भारत के मुख्य भाग से जोड़ता है . यह इंजीनियरिंग का बेजोड़ नमूना है और इसकी विशेषता यह है कि जब बड़ी जहाजों को निकलना होता है तो रेल की पटरियों को उठा दिया जाता है और निकल जाता है. पुनः पटरी को नीचे कर दिया जाता है रेलगाड़ियाँ गुजरने लगती हैं .

क्या खरीदें -  रामेश्वरम  जाएं तो सामुद्रिक जीवों से निर्मित सामान अवश्य खरीदें। शंख , घोंघे और सीप के कवच  ( sea shell )  के सामान बहुत ही सुन्दर और सस्ते मिलते हैं। इनसे आप घर को सजा सकते हैं और  रामेश्वरम  यात्रा की स्मृति के तौर पर संजो भी सकते हैं। उपहार के लिए भी ये बहुत ही उत्तम होते हैं। साथ में परिवार था, अतः सामान खरीदने का चांस बनता ही था। एकाध अपने लिए और कुछ फरमाइशकर्ताओं के लिए खरीदा। वामावर्ती शंख तो मिलती ही है, दक्षिणावर्ती शंख के तमाम रूप उपलब्ध हैं। मैं तो उनकी उत्पत्ति और प्रकृति और कारीगरों की कारीगरी पर मुग्ध होता रहा जबकि पत्नी और बेटी गृहसज्जा के सामानों की खरीदारी में व्यस्त रहीं। बेटे को गाड़ी टाइप का कोई खिलौना मिल गया था। कभी उसमें व्यस्त हो जाता तो कभी जाँच आयोग के सक्रिय सदस्य की तरह अनेक प्रश्न लेकर आ जाता और मेरी सोच का दम तब तक घोंटता रहता जबतक उसे अपने प्रश्न का संतोषजनक उत्तर नहीं मिल जाता। 
 रामेश्वरम  में हमारा ठहराव एक दिन का ही था। रात हो चली थी। दोपहर वाले ढाबे पर ही हमने उत्तर भारतीय भोजन किया  और इस निर्णय के साथ सो गए कि प्रातः जल्दी उठकर कन्याकुमारी वाली बस पकड़नी है। काश  ! एक दिन और होता हमारे पास  रामेश्वरम  में ठहरने के लिए! बस मन ही मन यह प्रार्थना गूंजती रही -
                              श्रीताम्रपर्णी जलराशियोगे 
                                       निबद्ध्यम सेतुम निशि विल्व्पत्रै .
                             श्रीरामचन्द्रेण समर्चितमतम
                                        रामेश्वराख्यं सततं नमामि . 

Tuesday, 6 September 2011

Beyond popular outrage

मैं मानता हूं कि टीम अन्ना ने भ्रष्टाचार रोकने के लिए एक सार्थक शुरुआत की है. मैं अन्ना के मुद्दे और आंदोलन दोनों के पक्ष में रहा हूं और आगे भी रहूंगा. मेरे कुछ मित्र इस विषय पर ज़रा हटकर सोचते हैं. एक आदर्श लोकतंत्र की यह शर्त है कि वहां जितना महत्व समर्थन के लिए है, विरोध के प्रति उतना ही सम्मान होना चाहिए. हमारे विरुद्ध सोचने वालों के भी अपने तर्क हैं और अपनी चिंताएं हैं. वरिष्ठ पत्रकार विशाल दुग्गल इस मुद्दे और आंदोलन के विरुद्ध तो नहीं हैं, लेकिन अलग ढंग से सोचते हैं. अब जब इस पर हल्ले का माहौल बीत चुका है, मेरा मानना है कि अगर हम वाक़ई भ्रष्टाचार मिटाना चाहते हैं तो इन मुद्दों पर भी सोचा जाना चाहिए. श्री दुग्गल का पूरा लेख आपके विचार के लिए:
इष्ट देव सांकृत्यायन

Corruption today has seeped into the vitals of India’s body politic, acquiring frighteningly menacing proportions to the extent that any fresh disclosure of a scam has ceased to shock the people any more. What has accentuated the citizens’ growing disenchantment with the system is the connivance of top functionaries -- holding high offices -- in perpetuating the uninterrupted saga of institutional turpitude. The prevailing mood in the nation is an agonising quest to find ways and means to somehow stem the rot, which is threatening to undermine India’s rising political, economic stature and clout in the world.

 Pertinently, the relentless anti-corruption movement launched by Anna Hazare-led civil society to set up Jan Lokpal has captured the popular imagination. The campaign has struck a sympathetic chord, as manifested in the protagonists of the anti-graft brigade finding positive, even larger-than life, projection in the media.  However, the moot point here is that the whole issue of the scourge of corruption requires a dispassionate analysis and a vibrant public discourse.  For, corruption is a too complex and serious issue to be resolved through an outright emotional reaction,  as it runs the danger of  the root cause getting drowned in the cacophony of mass protests being graphically captured on multiple media platforms.

Hazare's protest assumes significance in the wake of  the deluge of corruption cases in the recent times, exposing the cracks in the political and administrative edifice of the country. With fires of corruption cauldron extending beyond the likes of Suresh  Kalmadi and company  to singe the intensely articulated image of a ‘suave, urbane and progressively-minded’ Delhi Chief Minister, while not even leaving the office of the Prime Minister beyond reproach, have brought into focus the open and shameless plunder of the national exchequer. 

 Also when the DMK leader and the former tainted telecom minister A Raja defended his allocations of 2G licenses  by stating that the telecom policy was pursued by his ministry while constantly updating and apprising the Finance Ministry and PMO, the highest office of the land couldn't escape criticism. Clearly, the current UPA dispensation cannot wash its hands off the scams  rocking its regime by unfailing regularity, by simply finding scapegoats.

While the nation is aghast at the sheer magnitude of corrupt practices afflicting the government and political machinery, there is also something that goes to redeem the pervasive darkness.  As a matter of fact, the instances of the misdeeds committed by the high and the mighty have been brought to light and then pursued with uncompromising pace by few other institutions of the same mode of democracy, which has been exploited by sections of bureaucracy and political class.

 The government's own auditor, the Comptroller and Auditor General of India (CAG), has been performing its constitutional duty with aplomb in bringing to light the grave lapses and transgressions in matters of governance, be it the taint of venality surrounding the Commonwealth Games or the controversial allocations of 2G spectrum. Then, the judiciary too has severely dealt with all the high profile corruption cases brought to its cognizance.

Not surprisingly, we find  the major protagonists of the fraudulence tales scripted in the recent past, cooling their heels in jails, far removed from the cosy ambience of their lives, hitherto submerged in depths of sickening luxury. All this cleansing, though limited and yet to reach a sense of finality, can be expedited further by setting up the institution of Lokpal to mitigate, if not remove, the institutional flaws that have come to afflict the country today.

Of course, there is a crying  need and  justification for having a really strong and effective Lokpal. At the same time, we should not be oblivious to the fact that the so-called functioning anarchy that India is being projected to be, is not void of positive features like the Right to Information Act and robust institutions like CAG, Election Commission, CVC, and on top of  it the courts, which have been functioning in a no-nonsense manner, preventing the country’s slide into the recesses of a failed state.

Sadly, anyone with a different view on Hazare-led anti-corruption drive runs the danger of  being misconstrued as a PR person of the establishment. However, my submission is to have a Lokpal which functions within the country's democratic political culture and strengthens and co-operates with the other aforesaid untainted institutions in waging a relentless war against corruption. 

It needs to be debated whether it will further serve the cause of fair play and justice, if we set up a Jan Lokpal over and above other anti-corruption institutions. Notably, a provision in the draft of Jan Lokpal bill requires that the CVC and the CBI's anti-corruption unit be scrapped and merged into the Jan Lokpal, which will combine the roles of investigator, judge and prosecutor.

The projected Jan Lokpal, if  and when it comes into existence, would be the most powerful institution in India, having under its purview even the conduct of the Prime Minister and the Chief Justice of India. Will it be feasible, nay desirable, to entrust the Jan Lokpal with this humongous task, even before the proposed system of supreme ombudsman has run some course to become a tried and tested institution?

The Indian media, in its propensity to create a spectacle, has seized upon the opportunity of applauding Hazare’s anti-graft campaign.  Through extensive print and audio-visual coverage, it has been relentlessly capturing the audience’s euphoria of participating in a ‘revolutionary struggle for true freedom, post-independence.  Tragically, instead of  acting as a platform for a serious, rational and substantive public discourse on  the scourge  of corruption, including a debate on the potentially authoritarian text  of the Jan Lokpal draft and the inflexible posturing of Team Anna on  it, the media has chosen to float along the current of emotional upsurge against corruption.

Faith is far too precious an emotion to be reposed in pontiffs of morality and integrity, occupying exalted planks but we the  people have always allowed ourselves to be swayed by gurus, godmen and avowed champions of public good, purportedly on a mission to cleanse society of decadence and evil.  Though it would be unfair to draw comparisons, the raging controversies surrounding Swami Ramdev - as evident by his political ambitions, investigations into the working of his trusts, coupled with the dubious background of his crony Acharya  Balkrishnan -- have contributed towards diminishing his hallowed stature.

One shudders to think about the tragedy when people discover that some of the crusaders against felony may themselves not be above board.  Before the masses take to a blind following, it will be a good idea to pause and analyse whether it is all worth it; whether their present day idols are anywhere near attaining the self-effacing heights of Mahatma Gandhi, Lal Bahadur Shastri, or Jai Prakash Narayan.

The groundswell of nationwide support to Anna Hazare’s crusade reaffirms the power of people’s will in bringing about a revolution. But there also exist  apprehensions with regard to the uphill task of  sustaining this revolution. For, it would require extraordinary skills, expertise and unalloyed integrity to manage the institution of a supreme ombudsman vested with absolute powers, chartering its own course, independent of the constitutional mechanism.

Monday, 22 August 2011

Samarthan ka Sailaab



समर्थन का सैलाब 
                   -हरिशंकर राढ़ी

अनुमान था कि होगा ऐसा ही।  देशवासियों को एक इंजन मिल गया है और वे अब किसी भी ब्रेक से रुकने वाले नहीं। आज तो जैसे दिल्ली के सारे रास्ते रामलीला मैदान की ओर जाने के लिए ही हों , जैसे दिल्ली मेट्रो केवल अन्ना समर्थकों के लिए ही चल रही हो और हर व्यक्ति के पास जैसे एक ही काम हो- रामलीला मैदान पहुँचना और अन्ना के बहाने अपनी खुद की लड़ाई को लड़ना । साकेत मेट्रो स्टेशन  पर जो ट्रेन बिलकुल खाली आई थी वह एम्स जाते-जाते भर गई और सिर्फ भ्रष्टाचार  विरोधी बैनरों और नारों से। नई दिल्ली स्टेशन से बाहर निकलता हुआ हुजूम आज परसों की तुलना में कई गुना बड़ा था। सामान्य प्रवेश द्वार पर ही हजारों  की भीड़ केवल प्रवेश की प्रतीक्षा में पंक्तिबद्ध थी। किसी भी चेहरे पर कोई शिकन  नहीं, कोई शिकायत  नहीं।
ऐसा शांतिपूर्ण प्रदर्शन  मैंने तो अब तक नहीं देखा था। सच तो यह है कि प्रदर्शनों  से अपना कुछ विशेष  लेना -देना नहीं। राजनैतिक पार्टियों का प्रदर्शन  भंड़ैती से ज्यादा कुछ होता नहीं, मंहगाई  और बिजली पानी के लिए होने वाले प्रदर्शन  जमूरे के खेल से बेहतर नहीं और तथाकथित सामाजिक आन्दोलन भी रस्म अदायगी के अतिरिक्त किसी काम के नहीं। लोग अनशन  भी करते हैं पर सिर्फ और सिर्फ अपने लिए। अब स्वार्थ में डूबे एकदम से निजी काम के लिए परमार्थ वाले समर्थन कहाँ से और क्यों मिले? अगर ऐसे प्रदर्शनों  से दूर रहा जाए तो बुरा ही क्या ? आज पहली बार लगा है कि कोई निःस्वार्थ भाव से देशरक्षा के लिए प्राणोत्सर्ग के लिए तत्पर है तो लोगों में चेतना जागना स्वभाविक और अपरिहार्य भी है। 

सारा कुछ पूर्णतया नियोजित और अनुशासित  है। इस तरह के आन्दोलन का परिणाम क्या होगा, यह तो अभी समय बताएगा पर ऐसे आन्दोलन होने चाहिए। जिस तरह से लोकतंत्र से  लोक गायब हो चुका है और उसका एकमात्र उपयोग मतपेटियाँ भरना रह गया है, यह किसी भी सत्ता को मदहोश  कर देने के लिए पर्याप्त है। अपनी उपस्थिति स्वयं दर्ज करानी पड़ती है और लोकतंत्र के लोक को अब जाकर महसूस हुआ है कि अपनी उपस्थिति दर्ज करा ही देनी चाहिए। 
ऐसे प्रदर्शनों के अपने मनोरंजक पक्ष भी हुआ करते हैं। भारतीय मस्तिष्क  की उर्वरता को कोई जवाब तो है ही नहीं, यह आपको मानना पड़ेगा । पहले तो विरोध नहीं, और जब विरोध तो ऐसे -ऐसे तरीके कि विस्मित और स्मित हुए बिना तो आप रह ही नहीं सकते। सरकारी तंत्र के एक से एक कार्टून और एक से एक नारे! अविश्वसनीय  !! कुछ तो अश्लीलता  की सीमा तक भी पहुँचने की कोशिश  करते हुए तो कुछ जैसे दार्शनिक  गंभीरता लिए हुए। 
हर तरह की व्यवस्था के लिए लोग न जाने कहाँ से आ गये हैं। बाहर से भोजन के पैकेट निवेदन करके दिए जा रहे हैं। अंदर भी कुछ कम नहीं। अनेक निजी और संगठनों के लंगर लगातार - चावल-दाल, छोले, राजमा , पूड़ी- सब्जी ही नहीं, जूस तक का भी इंतजाम बिलकुल सेवाभाव से। 

शायद  यही अपने देश की सांस्कृतिक और सह अस्तित्व की विशेषता  है। अपने - अपने हिस्से का प्यार बाँटे बिना लोग रह नहीं पाते। जैसे कहीं से लोगों को पता चल गया हो कि कोई यज्ञ हो रहा है और अपने हिस्से की समिधा डाले बिना जीवन सफल ही नहीं होगा। है तो यह एक यज्ञ ही । परन्तु वापस  आते - आते एक प्रश्न  ने कुरेदना शुरू  ही कर दिया । अन्ना का यह आंदोलन तो सफल होगा ही, सम्भवतः राजनैतिक , प्रशासनिक और सार्वजनिक जीवन से भ्रष्टाचार का एक बड़ा भाग समाप्त भी हो जाए, किन्तु क्या हम अपने निजी जीवन में भी  भ्रष्टाचार  से मुक्त हो पाएंगे? क्या ऐसा भी दिन आएगा जब तंत्र के साथ लोक भी अपने कर्तव्य की परिभाषा  और मर्यादा समझेगा?
खैर, अभी तो अन्ना जी और उनके आन्दोलन में भाग लेने वाले असंख्य जन को सफलता की शुभकामनाएँ !
अब कुछ झलकियाँ भी जो रविवार के दिन देखी गईं-

अन्ना जी मंच पर : भजन गाते कलाकार 
भ्रष्टाचार के विरुद्ध छोटों की बड़ी जंग 



इस ज़ज्बे को देखिए
भ्रष्टाचार के विरुद्ध हनुमानजी और उनकी सेना 












बिन बुलाए हम भी आए :देश हमारा भी तो है 
हम भी हैं जोश में : देश के लिए 


Saturday, 20 August 2011

Azadi ki doosari ladaaie

आज़ादी की दूसरी लड़ाई 
  ---हरिशंकर राढ़ी
नई दिल्ली मेट्रो स्टेशन से बाहर निकलते ही एक आदमी ने पूछा-‘‘ भाई साहब, ये रामलीला मैदान किधर है ?’’ मन में कुछ प्रसन्नता सी हुई और उसे रास्ता बताया- ‘‘ बस इधर सामने से निकल जाइए, ये रहा रामलीला मैदान! वैसे आज तो सभी रास्ते रामलीला मैदान ही जा रहे हैं। किसी भी हुजूम को पकड़ लीजिए, रामलीला मैदान पहुँच जाएंगे। इतने दिनों बाद पहली बार तो असली रामलीला हो रही है वहाँ ! वरना रावणलीला से किसे फुरसत मिलती है यहाँ ? वैसे मैं भी वहीं चल रहा हूँ, अगर डर न लग रहा हो तो मेरे साथ चले चलिए। ’’श्रीमान जी मुस्कराए- ‘‘ डर से बचने के लिए ही तो यहाँ आया हूँ। अगर आज भी हम डर गए तो डर से फिर कभी बच नहीं पाएंगे। जहाँ देश  इतने संकट से गुजर रहा हो, वहाँ भी डरने के लिए  बचता क्या है? और डर तो नहीं रहा है एक सत्तर पार का बुजुर्ग जिसका अपना कोई रक्तसंबन्धी ही नहीं है, जो पूरे देश को अपना संबन्धी समझ बैठा है तो मैं क्यों डरूँ?’’

गेट से बाहर निकलकर कमला मार्किट वाली सड़क पर पहुँचा तो जुलूस ही जुलूस । मै भी एक अनजाने जुलूस का हिस्सा बन गया । शायद  पहली बार भीड़तंत्र अच्छा लग रहा था। हर वर्ग, हर उम्र और हर प्रकार के व्यक्ति एक साथ। नारों की आवाज के नीचे ट्रैफिक के शोर  का कोई पता ही नहीं। अगले चौराहे पर पुलिस की बैरीकेडिंग और साथ -साथ स्वयंसेवकों के पानी और खाद्य सामग्री से भरे छोटे ट्रक आगन्तुकों का स्वागत कर रहे थे। हल्की - हल्की बारिश  हो रही थी और प्रवेश  द्वार पर पानी भरा हुआ था-बेहद डबरीला । लेकिन जैसे आज किसी को अपने फैशन  की जैसे चिन्ता ही नहीं। गौरांगी आधुनिकाएं भी इस डबरीले पानी का जैसे उपहास उडा रहीं थीं । उन्हें न तो अपने प्यारे पैरों के गन्दे हो जाने की चिन्ता थी और न ही कीमती सैंडिलों के खराब हो जाने की। आज तो बिलकुल बराबर का साथ था उनका भी । अपनी सुरीली आवाज में नारे और लगा रही थीं। 

पुलिस बल तो भारी संख्या में तैनात था ही। पर यह पुलिस जैसे कुछ अलग सी लग रही थी - बिलकुल शांत  और सहयोगी। न तो कोई अपशब्द और न चेहरे पर धौंस की कोई अभिव्यक्ति । यह कहीं से नहीं लगता था कि अभी चार दिन पहले इसी पुलिस ने इसी अन्ना को बिला वजह गिरफ्तार किया होगा। वह शक्ति  तो कोई और ही रही होगी जिसने इस शक्ति को संचालित किया होगा वरना ऐसा कौन होगा इस देश में जिसे आजादी के बाद भ्रष्टाचार  ने न रुलाया होगा। रही सही कसर जनता के नारे पूरी कर रहे थे- ‘‘ये अन्दर की बात है, पुलिस हमारे साथ है। वर्दी छोड़ के आएंगे , अन्ना - अन्ना चिल्लाएंगे ।’’ सघन जाँच के बाद अन्दर जाने दिया जा रहा था। अच्छा लगा और आज किसी को कोई शिकायत  नहीं थी। आदमी खुश  हो तो क्या - क्या सह लेता है! पर अब शायद भ्रष्टाचार न सहे!

लगभग ढाई बज रहे थे और अन्ना जी मंच पर विराज रहे थे। इन्द्रदेव पता नहीं खुश थे या नाराज क्योंकि सामान्य बारिश हो रही थी । रामलीला मैदान पहले की बारिश से गीला हो चुका था पर पब्लिक को कोई फरक ही नहीं पड़ रहा था। मेरे एक मित्र कहते थे कि हिन्दुस्तान की पब्लिक को फरक बहुत देर से पड़ता है। पर एक बार जब पड़ जाता है तो वह मानती नहीं । पहले शिकार  होती है फिर शिकार करती है। यहाँ के धर्म की यह विशेषता  है। यह बचने का उपाय तबतक नहीं ढूँढ़ती जब तक पानी नाक से ऊपर नहीं आने लगता । इसकी दूसरी विशेषता  यह है कि यह भारतीय रेल के डिब्बे की तरह। पूरी तरह टिकाऊ और मजबूत लेकिन इंजन की तलाश  में है। एक बार एक इंजन लग जाए, कैसा भी, तो यह कितना भी बोझ खींच ले जाए। उनकी बात आज मुझे सही लग रही थी। उसे एक इंजन मिल गया था और अब वह इस इंजन के पीछे-पीछे कहीं तक और कोई भी वजन लेकर जाने को बेताब है।

हुजूम ही हुजूम और नारे ही नारे। मैं कोई रिपोर्ट नहीं कर रहा हूँ। यह तो सभी ने मीडिया की कृपा से प्रतिक्षण देखा ही है। मैं तो इस देश की जनता की देर आयद, दुरुस्त आयद की भावना को पढ़ने की कोशिश  कर रहा हूँ। लोग तो ऐसे भी थे जिन्हें यह नहीं मालूम कि ये जनलोकपाल क्या होता है और कानून बनाता कौन है। हाँ, इस व्यवस्था और मंहगाई से परेशान  थे और ये सोचकर आए थे कि कोई अच्छा काम हो रहा है और इसमें शरीक  होना कोई पुण्य है। भजन पर लोग नाच रहे थे और सुर मिला रहे थे - ये सुर संगीत के नहीं बल्कि समर्थन के थे। हाँ, अपना निराला हिन्दुस्तान वहाँ अपने व्यंग्यात्मक रूप में भी जिन्दा था - भीड़ में जहाँ मैं खड़ा था , वहीं किसी सज्जन का बटुआ अपने किसी हिन्दुस्तानी कलाकार भाई ने मार लिया था। 

चाहता था कि अन्ना को पास जाकर देखूँ। नजदीक जाना प्रतिबंधित था। एक गोल सा घेरा बनाया गया था। मंच के आगे मीडिया वालों का घेरा दिखा तो लगा कि प्रेस वालों के लिए कोई रास्ता तो जरूर है । सैकड़ों फोटोग्राफर और संवाददाता इधर- उधर आना- जाना मचाए हुए थे। परिचय पत्र दिखाने पर प्रेस दीर्घा में  प्रवेश मिल गया । न जाने कितने समारोहों में आना -जाना हुआ है इस आधार पर किन्तु आज जैसे पहली बार लगा कि यह परिचय पत्र सही जगह काम आया है और बहुत प्यारा है।

शाम  के लगभग चार बजे तक रामलीला मैदान आधा भर चुका था। उमड़े हुए संख्या बल को देखकर लग रहा जैसे मुझे भी आजादी की लड़ाई देखने का एक मौका मिल गया हो। अन्ना जी के पास तक पहुँच नहीं सका नहीं तो कहता कि आज सचमुच में भावनात्मक और संकलनात्मक रूप में एक सौ पचीस करोड़ माइनस पाँच सौ तैंतालीस (जो चयनित होने के बाद माननीय हो गए हैं ) तो आपके ही साथ हैं । ( फोटो भी थे पर मोबाइल धोखा दे गया और यहाँ प्रस्तुत नहीं कर पा रहा हूँ।)

Tuesday, 16 August 2011

अतीत का आध्यात्मिक सफ़र-3 (ओरछा)

इष्ट देव सांकृत्यायन

 
रानी महल के झरोखे से चतुर्भुज मंदिर का दर्शन

व्यवस्था और अव्यवस्था
कालिदास का मेघदूत हम पर मेहरबान था। पूरे रास्ते मूसलाधार बारिश का मज़ा लेते दिन के साढ़े दस बजे हम ओरछा पहुंच गए थे। पर्यटन स्थल होने के नाते यह एक व्यवस्थित कस्बा है। टैक्सी स्टैंड के पास ही बाहर से आने वाले निजी वाहनों के लिए भी अलग से व्यवस्थित पार्किंग है। सड़क के दाईं ओर मंदिरों का समूह है और बाईं ओर महलों व अन्य पुरातात्विक भवनों का। मध्यकालीन स्थापत्य कला के जैसे नमूने यहां चारों तरफ़ बिखरे पड़े हैं, कहीं और मिलना मुश्किल है। सबसे पहले हम रामराजा मंदिर के दर्शन के लिए ही गए। एक बड़े परिसर में मौजूद यह मंदिर का$फी बड़ा और अत्यंत व्यवस्थित है। अनुशासन इस मंदिर का भी प्रशंसनीय है। कैमरा और मोबाइल लेकर जाना यहां भी मना है। दर्शन के बाद हम बाहर निकले और बगल में ही मौजूद एक और स्थापत्य के बारे में मालूम किया तो पता चला कि यह चतुर्भुज मंदिर है। तय हुआ कि इसका भी दर्शन करते ही चलें। यह वास्तव में पुरातत्व महत्व का भव्य मंदिर है। मंदिर के चारों तर$फ सुंदर झरोखे बने हैं और दीवारों पर आले व दीपदान। छत में जैसी नक्काशी की हुई है, वह आज के हिसाब से भी बेजोड़ है। यह अलग बात है कि रखरखाव इसका बेहद कमज़ोर है। इन दोनों मंदिरों के पीछे थोड़ी दूरी पर लक्ष्मीनारायण मंदिर दिखाई देता है। आसपास कुछ और मंदिर भी हैं। हमने यहां भी दर्शन किया।

चतुर्भुज मंदिर के बाईं तरफ़ है श्री रामराजा मंदिर

नीचे उतरे तो रामराजा मंदिर के दूसरे बाजू में हरदौल जी का बैठका दिखा। वर्गाकार घेरे में बना यह बैठका इस रियासत की समृद्धि की कहानी कहता सा लगता है। आंगन के बीच में एक शिवालय भी है। सावन का महीना होने के कारण यहां स्थानीय लोगों की का$फी भीड़ थी। इस पूरे क्षेत्र में अच्छा-ख़ासा बाज़ार भी है। यह सब देखते-सुनते हमें का$फी देर बीत गई। बाहर निकले तो 12 बज चुके थे। भोजन अनिवार्य हो गया था, लिहाजा रामराजा मंदिर के सामने ही एक ढाबे में भोजन किया।

जहांगीर महल

स्थापत्य के अनूठे नमूने
मंदिरों के ठीक सामने ही सड़क पार कर राजमहल थे। भोजन के बाद हम उधर निकल पड़े। मालूम हुआ कि यहां प्रति व्यक्ति दस रुपये का टिकट लगता है। कई विदेशी सैलानी भी वहां घूम रहे थे। इस किले के भीतर दो मंदिर हैं, एक संग्रहालय और एक तोपखाना भी। पीछे कई और छोटे-बड़े निर्माण हैं। अनुमान है कि ये बैरक, अधिकारियों के आवास या कार्यालय रहे होंगे। मुख्य महलों को छोड़कर बा$की सब ढह से गए हैं। सबसे पहले हम रानी महल देखने गए। मुख्यत: मध्यकालीन स्थापत्य वाले इस महल की सज्जा में प्राचीन कलाओं का प्रभाव भी सा$फ देखा जा सकता है।

जहांगीर महल के आंगन में बना हम्माम

इस महल में वैसे तो कई जगहों से चतुर्भुज मंदिर की स्पष्टï झलक मिल सकती है, पर एक ख़्ाास झरोखा ऐसा भी है जहां से चतुर्भुज मंदिर और रामराजा मंदिर दोनों के दर्शन किए जा सकते हैं। कहा जाता है कि इसी जगह से रानी स्वयं दोनों मंदिरों के दर्शन करती थीं। यह अलग बात है कि अब उस झरोखे वाली जगह पर भी कूड़े का ढेर लगा हुआ है। यह राजा मधुकर शाह की महारानी का आवास था, जो भगवान राम की अनन्य भक्त थीं और यहां स्थापित भगवान राम का मंदिर उनका ही बनवाया हुआ है। महल का आंगन भी बहुत बड़ा और भव्य है। बीचोबीच एक बड़ा सा चबूतरा बना हुआ है। ऐसा प्रतीत होता है कि यहां रानी का दरबार लगता रहा होगा। जबकि राजमंदिर का निर्माण स्वयं राजा मधुकर शाह ने अपने शासनकाल 1554 से 1591 के बीच करवाया था।

इसके पीछे जहांगीर महल है। इसका निर्माण 17वीं शताब्दी में मु$गल सम्राट जहांगीर के सम्मान में राजा बीर सिंह देव ने करवाया था। वर्गाकार विन्यास में बने इस महल के चारों कोनों पर बुर्ज बने हैं। जालियों के नीचे हाथियों और पक्षियों के अलंकरण बने हैं। ऊपर छोटे-छोटे कई गुंबदों की शृंखला बनी है और बीच में कुछ बड़े गुंबद भी हैं। हिंदू और मु$गल दोनों स्थापत्य कलाओं का असर इस पर सा$फ देखा जा सकता है और यही इसकी विशिष्टïता है। भीतर के कुछ कमरों में अभी भी सुंदर चित्रकारी देखी जा सकती है। कुल 136 कक्षों वाले इस महल के बीचोबीच एक बड़े से हौजनुमा निर्माण है। इसके चारों कोनों पर चार छोटे-छोटे कुएं जैसी अष्टकोणीय आकृतियां हैं। हालांकि इनकी गहराई बहुत मामूली है। अंदाजा है कि इसका निर्माण हम्माम के तौर पर कराया गया होगा।

जहांगीर महल से पीछे दिख रही बेतवा की ख़ूबसूरत घाटी

महल की छत से पीछे देखने पर पीछे मीलों तक फैली बेतवा नदी की घाटी दिखाई देती है। दूर तक फैली इस नीरव हरियाली के बीच कई छोटे-बड़े निर्माण और कुछ निर्माणों के ध्वंसावशेष भी थे। ध्यान से देखने पर बेतवा की निर्मल जलधारा भी क्षीण सी दिखाई दे रही थी। भीतर गाइड किसी विदेशी पर्यटक जोड़े को टूटी-फूटी अंग्रेजी में बता रहा था, 'पुराने ज़माने महल के नीचे से एक सुरंग बनी थी, जो बेतवा के पार जाकर निकलती थी।' आगे उसने बताया कि इस महल का निर्माण 22 साल में हुआ था और जहांगीर इसमें टिके सि$र्फ एक रात थे। राढ़ी जी गाइड के ज्ञान से ज्य़ादा उसके आत्मविश्वास पर दंग हो रहे थे।

ख़ैर, सच जो हो, पर 'ओरछा' का शाब्दिक अर्थ तो छिपी हुई जगह ही है। इसका इतिहास भी अद्भुत है। इसकी स्थापना टीकमगढ़ के बुंदेल राजा रुद्र प्रताप सिंह ने 1501 में की थी, पर असमय कालकवलित हो जाने के कारण वे निर्माण पूरा होते नहीं देख सके। एक गाय को बचाने के प्रयास में वे शेर के पंजों के शिकार हो गए थे। बाद में राजा बीर सिंह देव ने अपने 22 वर्षों के शासन काल में यहां के अधिकतर मनोरम निर्माण कराए। उन्होंने पूरे बुंदेल क्षेत्र में 52 किले बनवाए थे। दतिया का किला भी उनका ही बनवाया हुआ है। बाद में 17वीं शताब्दी के शुरुआती दौर में ही ओरछा के राजा मु$गल साम्राज्य से विद्रोह किया। फिर शाहजहां ने आक्रमण करके इस पर $कब्ज़ा कर लिया, जो 1635 से 1641 तक बना रहा। बाद में ओरछा राज्य को अपनी राजधानी टीकमगढ़ में करनी पड़ी।

सभ्रूभंगं मुखमिव पयो...

महलों के बहाने कुछ देर तक अतीत में जीकर हम उबरे तो सीधे बेतवा की ओर चल पड़े। मुश्किल से 10 मिनट की पैदल यात्रा के बाद हम नदी के तट पर थे। महल की छत से दिखने वाली घाटी से भी कहीं ज्य़ादा सुंदर यह नदी है। नदी की अभी शांत दिख रही जलधारा के बीच-बीच में खड़े लाल पत्थर के टीलेनुमा द्वीप अपने शौर्य की कथा कह रहे थे या बेतवा के वेग से पराजय की दास्तान सुना रहे थे, यह तय कर पाना मुश्किल हो रहा था। यूं मुझे नाव चलाने का कोई अनुभव नहीं है, लेकिन इस पर नाव चलाना आसान काम नहीं होगा। पानी के तल के नीचे कहां पत्थर के टीलों में फंस जाए, कहा नहीं जा सकता। मैंने मैत्रेयी पुष्पा के उपन्यास 'बेतवा बहती रहीÓ का जिक्र किया तो राढ़ी जी कालिदास के मेघदूत को याद करने लगे-

तेषां दिक्षु प्रथित विदिशा लक्षणां राजधानीं


गत्वा सद्य: फलमविकलं कामुकत्वस्य लब्धा।


तीरोपांत स्तनित सुभगं पास्यसि स्वादु यस्मात्


सभ्रूभंगं मुखमिव पयो वेत्रवत्याश्चलोर्मि।।

कालिदास का प्रवासी यक्ष अपने संदेशवाहक मित्र मेघ को रास्ते की जानकारी देते हुए कहता है- हे मित्र! जब तू इस दशार्ण देश की राजधानी विदिशा में पहुंचेगा, तो तुझे वहां विलास की सब सामग्री मिल जाएगी। जब तू वहां सुहानी और मनभावनी नाचती हुई लहरों वाली वेत्रवती के तट पर गर्जन करके उसका मीठा जल पीएगा, तब तुझे ऐसा लगेगा कि मानो तू किसी कटीली भौहों वाली कामिनी के ओठों का रस पी रहा है।

बेतवा के घाट पर

बेतवा का ही पुराना नाम है 'वेत्रवतीÓ और संस्कृत में 'वेत्रÓ का अर्थ बेंत है। कालिदास का यह वर्णन किसी हद तक आज भी सही लगता है। प्रदूषण का दानव अभी बेतवा पर वैसा $कब्ज़ा नहीं जमा सका है, जैसा उसने अपने किनारे महानगर बसा चुकी नदियों पर जमा लिया है। इसके सौंदर्य की प्रशंसा बाणभट्टï ने भी कादंबरी में की है। वैसे वराह पुराण में इसी वेत्रवती को वरुण की पत्नी और राक्षस वेत्रासुर की मां बताया गया है। शायद इसीलिए इसमें दैवी और दानवीय दोनों शक्तियां समाहित हैं। गंगा, यमुना, मंदाकिनी आदि पवित्र नदियों की तरह बेतवा के तट पर भी रोज़ शाम को आरती होती है। लेकिन बेतवा की आरती में हिस्सेदारी हमारी नियति में नहीं था। क्योंकि हमें झांसी से ताज एक्सप्रेस पकडऩी थी, जो तीन बजे छूट जाती थी। मौसम पहले ही ख़्ाराब था। बूंदाबांदी अभी भी जारी थी। समय ज्य़ादा लग सकता था। लिहाजा डेढ़ बजते हमने ओरछा और बेतवा के सौंदर्य के प्रति अपना मोह बटोरा और चल पड़े वापसी के लिए टैक्सी की तलाश में।
                                                                      -- इति--