Saturday, 25 September 2010

दुनियादारी का चलचित्र

“तभी विचित्र हुआ. प्राय: सभी युवक एक साथ खड़े हो गए. बात की बात में सबों ने अपनी कमर के नीचे के कपड़े उतार दिए – धोती, पैंट, पाजामा, नीकर तक और एक स्वर में बोल पड़े “वोट? उत ना मिली तोहरा. इहे मिली.....”
चौंकिए नहीं, यह किसी ख़बर की पंक्ति नहीं है. अभी यह एक उपन्यास से लिया गया उद्धरण है. ग्यारह साल पहले यानी सन 1999 में आए भगवती शरण मिश्र के उपन्यास ‘अथ मुख्यमंत्री कथा’ की पृष्ठ संख्या 305 से. बेशक़ अभी कहीं ऐसा हुआ नहीं है, लेकिन अगर भारतीय राजनीति की यही दशा रही, तो जिस दिशा में वह जा रही है, उसका गंतव्य यही है. क्षुद्र स्वार्थों के दलदल से जो शख़्स ज़रा सा भी ऊपर उठ सका है, जो थोड़ा सा भी नीति-अनीति को समझने-मानने वाला है और जिसमें लेशमात्र भी आत्मसम्मान-स्वाभिमान जैसा कुछ शेष है; हर वह भारतीय नागरिक देश के हर नेता के साथ यही व्यवहार करना चाहता है. वैसे भी पिछले लोकसभा चुनावों के दौरान भारतीय लोकतंत्र में नए-पुराने और सिले-फटे हर प्रकार के जूतों ने जो अभूतपूर्व भूमिका निभाई है, उसका संकेत यही है. हमारी राजनीति अगर तरक़्क़ी की प्रक्रिया में बैलट से चलकर बुलट और फिर ईवीएम में गड़बड़ी तक आ पहुंची है तो जनता भी उलटे स्वस्तिक के मुहर से लेकर जूते तक तो आ ही गई है और अगर ईश्वर की ऐसी ही कृपा बनी रही तो इसमें कोई दो राय नहीं है कि जल्दी ही भगवती शरण जी का ऊपर वर्णित स्वप्न साकार भी हो जाएगा.
यह दशा केवल राजनीति की ही हो, ऐसा नहीं है. सच तो यह है कि व्यवस्था के हर अंग का हाल यही है. जिनमें से तीन अंगों के साथ तो यह उपन्यास एक साथ डील करता ही है. ये अंग हैं- उच्च शिक्षा तंत्र यानी विश्वविद्यालयीय बुद्धिजीवी, नौकरशाही और राजनीति. इस पूरी महाकथा में निजी, पारिवारिक, सामाजिक और व्यावसायिक संबंधों से लेकर कामकाज की दुनिया तक एक राजनीतिज्ञ की पैंतरेबाजी जिस तरह उजागर हुई है, नौकरशाहों और बुद्धिजीवियों की आत्महीनता भी उतने ही साफ़ तौर पर उभरकर सामने आई है.
कहानी की शुरुआत विश्वविद्यालय में प्राकृत विभाग के अध्यक्ष प्रो. शर्मा के घर से होती है. कोशिशों के मामले में उनका जवाब नहीं है. आईएएस और पीसीएस के लिए जितनी कोशिशें वह कर सकते थे, उन्होंने सब कर के देख ली थीं. कुछ नहीं हो सका तो सबॉर्डिनेट लेवेल की परीक्षाएं देने लगे और उसमें भी जैसे-तैसे एक सप्लाई इंस्पेक़्टरी उनके हिस्से आई. दुर्भाग्य कि यह भी अंतिम तौर पर हाथ लगते-लगते रह गई. बेचारे मेडिकल परीक्षण में विफल हो गए. वरना वह सेकंड क्लास की डिग्री पर बड़े जुगाड़ से मिली विश्वविद्यालय की अस्थाई प्राध्यापकी छोड़कर सल्लाई इंस्पेक्टर बनना ही पसंद करते थे और इसकी वजह सिर्फ़ नौकरी का स्थायित्व नहीं था, बल्कि वह ऊपरी आमदनी थी जिसके चलते बहुतेरे प्रोफेसर चमचागिरी के लिए सहर्ष तैयार होते हैं. बहरहाल जब तय ही हो गया कि उन्हें सरकारी तंत्र में अगले दरवाजे से घुसने का कोई मौक़ा नहीं मिल सकता है, तो शर्मा जी ने प्रोफेसरी में मन लगाना शुरू कर दिया. इसकी शुरुआत कुछ इस तरह हुई कि उनके विभागाध्यक्ष किसी कार्यक्रम में हिस्सेदारी के लिए बाहर गए और मौक़ा मुफ़ीद देखकर उन्होंने इसी बीच अपने विभाग में एक आयोजन कर डाला. इस आयोजन में उन्होंने शहर के एक प्रभावशाली नेता जी को बुलाया और उनका यथासंभव भरपूर प्रशस्तिगान किया. इसके बाद नेताजी से उनके जो संबंध बने उसके चलते नेताजी के साथ-साथ उनके करियर का ग्राफ़ भी बड़ी तेजी से ऊपर चढ़ता चला गया.
पहले तो उनकी नियुक्ति की प्रकृति स्थायी हुई, फिर अपने कई वरिष्ठों की वरीयता को ठेंगा दिखाते हुए वे विभागाध्यक्ष भी बन गए. कापियों की जांच, सेमिनारों-गोष्ठियों में हिस्सेदारी से लेकर जो-जो तरीक़े हो सकते हैं, हर तरह से उन्होंने धन भरपूर बटोरा. इस बीच बच्चों को पूरी तरह सेटल कर दिया. शहर के पॉश इलाके में बड़ा बंग्ला बनवा लिया और जो भी सुख-सुविधाएं हो सकती हैं, सभी जुटा लीं. यह अलग बात है कि तरक्की की इस पूरी प्रक्रिया में घर में बैठे रहते हुए भी हर स्तर पर उनसे कदमताल करने वाली श्रीमती शर्मा फिर भी प्रसन्न नहीं हो सकीं. क्योंकि पैसा तो मिल गया, पर स्टेटस नहीं मिल सका. अब उनकी चाहत बस ये है कि प्राकृत के विभागाध्यक्ष जी किसी तरह कुलपति बन जाएं. संयोग ही है कि इधर नेताजी भी विधायक होते हुए मंत्री बन चुके हैं और उन्हें शिक्षा विभाग मिल चुका है और उधर कुलपति की कुर्सी भी ख़ाली होने की ओर बढ़ चुकी है. पर मुश्किल यह है कि शर्मा जी इसके लिए तैयार नहीं हैं. वजह यह कि उन्हें यह आत्मविश्वास नहीं है कि वे यह पद संभाल सकेंगे. प्रशासन वगैरह अगर किसी तरह चल भी जाए, तो उन गोष्ठियों-सेमिनारों-आयोजनों का बेचारे क्या करते जहां उन्हें कुलपति होने के नाते जाना पड़ता? आख़िर वहां बोलते क्या और कैसे, किताबों से तो उनका हमेशा छत्तीस का आंकड़ा रहा. पर श्रीमती शर्मा ने कोई कच्ची गोटियां नहीं खेली थीं और न उनके अभिन्न बन चुके मित्र नेताजी ने ही. आख़िरकार इसका भी हल निकाल ही लिया गया.
शर्मा जी को थोड़े दिनों के लिए दिल्ली भेज दिया गया और इधर उनके ड्राइंग रूम को हाथी दांतों से सजा दिया गया. ये हाथीदांत क्या हैं और आजकल किस तरह जगह-जगह दिखते रहते हैं, उच्चतम पदों पर नियुक्तियों की प्रक्रिया में किस तरह संविधान की आत्मा को सिपुर्दे-ख़ाक कर पूरी तरह राजनीतिक दादागिरी चलाई जाती है और कैसे कई सुपात्रों की योग्यता-पात्रता को धता बताकर बौद्धिक रूप से निहायत बौने आदमी को कुलपति जैसे गरिमामय पद पर सवार कर दिया जाता है... यह सब इस उपन्यास को पढ़कर ही जाना जा सकता है.
आज की दुनियादारी का अत्यंत सूक्ष्म चित्रण और विश्लेषण यह उपन्यास करता है. राजनीतिक उठापटक की कहानी भी साथ-साथ चलती है. एक राजनेता कुर्सी के लिए क्या-क्या जोड़-तोड़ करता है और कितने समझौते करता है, अपने निजी लाभ के लिए जाति-धर्म के नाम पर किस तरह समाज को बांटता है... ये सभी बातें परत-दर-परत खुलती चलती हैं. नौकरशाही की निरीहता और उसकी लोलुपता व आत्महीनता, बुद्धिजीवियों का चारित्रिक पतन और छद्म तथा राजनीतिक उठापटक-खींचतान और तिकड़मबाजी.... ये सभी चीज़ें इसमें अच्छी तरह उजागर हुई हैं. हालांकि अपात्रता के बावजूद महत्वाकांक्षा इस अन्धी दौड़ में जी-जान से शामिल लोगों की आत्मा किस तरह उन्हें धिक्कारती है, इसका निदर्शन प्रो. शर्मा के अंतर्द्वन्द्व से किया जा सकता है.
मुश्किल यह है कि उपन्यास का आकार बहुत बड़ा हो गया है, कुल 352 पृष्ठ. खलता यह है कि इसका सिर्फ़ लेखन ही किया गया लगता है, संपादन शायद नहीं हुआ है. कहीं-कहीं तो कथाक्रम के तथ्यों में भी ग़लती हो गई है. नरेशन कई जगह इतने बड़े हो गए हैं कि उबाऊ लगने लगे हैं. कहीं-कहीं कथोपकथन भी बहुत ज़्यादा खिंच गया है और उसकी कोई तार्किक वजह भी नज़र नहीं आती है. मुख्यमंत्री ने अपने फ़ायदे के लिए जातीय घृणा के बीज जिस तरह बोये हैं, उससे कथाकार की अपनी जातीय चेतना भी बहुत प्रखर हो गई लगती है. शायद इसीलिए कुछ जगहों पर ब्राह्मणवाद की वकालत हदें पार करती लगती है. भाषा भी कहीं-कहीं अधिक ही क्लिष्ट और कृत्रिम हो गई है. इन ख़ामियों के बावजूद एक बार उठा लेने के बाद यह उपन्यास छोड़ पाने का साहस पाठक को नहीं हो सकता. क्योंकि पात्रों और व्यवस्था की गति के प्रति उसकी उत्सुकता लगातार बढ़ती जाती है. कहानीपन बनाए रखना भगवतीशरण जी की बड़ी ख़ूबी है. इसमें कोई दो राय नहीं है कि अगर ये ख़ामियां इस उपन्यास में न होतीं और नरेशन में व्यंग्य का पुट वह लगातार बनाए रख पाते तो यह विश्वविद्यालयी राजनीति और राजनीतिक अखाड़ेबाजी का ‘राग दरबारी’ साबित होता.


उपन्यास : अथ मुख्यमंत्री कथा
लेखक : भगवतीशरण मिश्र
प्रकाशक : राजपाल एंड संज़, कश्मीरी गेट, दिल्ली मूल्य : 250 रुपये

Sunday, 19 September 2010

सच यही है...

सय्याद के पंजों में चमन देख रहे हैं,
बन्दर के करों में भी अगन देख रहे हैं....
(प्रो.सारस्वत मोहन मनीषी)

Tuesday, 14 September 2010

सच-सच बताना किस किस ने मनाई आज हिंदी की बरसी...?

बरसी नहीं तो और क्या....जो भाषा मेरी मां की भाषा है, जिस भाषा में मैंने पहला बोल बोला, जिसमें मैंने मां कहना सीखा, जिसमें मैंने पिता जी कहना सीखा, जिसकी गोद में बड़ा हुआ, जिस बोल से मैंने अपने भाई बहनों से लड़ना-झगड़ना-प्यार करना सीखा, जिस भाषा में मेरी मां ने मुझे डांटा, दुलार किया, जिस भाषा में मैंने जीना सीखा आज अगर उसके लिए उसका दिवस मानना पड़े तो उसे बरसी नहीं तो और क्या कहूं........

Saturday, 11 September 2010

तीसरा आदमी

इष्ट देव सांकृत्यायन

आज ही ख़बर देखी ‘हर तीसरा भारतीय भ्रष्ट’. केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त, भगवान जाने यह क्या होता है. इस खबर के पहले तक तो मुझे पता भी नहीं था. क्योंकि देश में न तो मैंने कोई सतर्कता होते देखी और न सतर्कता के चलते कोई दुर्घटना या भ्रष्टाचार रुकते देखा. जहां जो होना होता है, वह हो ही जाता है. अगर कुछ नहीं होता तो यह या करना चाहने वाली की हुनर या फिर उसकी इच्छाशक्ति में कमी की वजह से होता है. हम शुरू से मानते आ रहे हैं कि जो हो जाता है वह ईश्वर की इच्छा से होता है और जो नहीं होता है, वह इसीलिए नहीं होता क्योंकि ईश्वर की इच्छा नहीं होती. हम शुरू से मानते हैं कि ईश्वर की मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता. इसीलिए हम यह भी मानते आए हैं कि सरकारी दफ्तर में बाबू या साहब अगर आपसे रिश्वत ले लें तो वह भगवान मर्जी है. लेकर काम कर दें तो वह भी भगवान की मर्जी और लेकर भी न करें तो वह भी भगवान की मर्जी. भगवान ने किसी सरकारी दफ्तर में बाबू, साहब या चपरासी बनाया हो और घूस न ले, ऐसी कोताही तो वह किसी क़ीमत पर बर्दाश्त नहीं कर सकते. इसीलिए ऐसे लोगों को सरकारी दफ्तरों से जल्दी ही एग्ज़िट का गेट दिखा दिया जाता है और अगर उन्हें रह भी जाने दिया गया तो बेचारे विषुवत रेखा के वासी की तरह नित हांफ-हांफ कर जीने के लिए मजबूर होते हैं.
बहरहाल, आज ही मालूम हुआ कि मेरे भारत महान में सतर्कता चाहे हो या न हो, लेकिन केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त का पद है. पता नहीं क्यों, मुझे ऐसा लग रहा है कि यह पद भी सरकारी है और सरकार में भी यह कोई बड़ा पद है. कुछ-कुछ वैसे ही जैसे टीएन शेषन के ज़माने में चुनाव आयुक्त का पद हो गया था. यह अलग बात है कि उनके पहले तक आम भारतीय को इस पद के बारे में कुछ मालूम ही नहीं था. यह अच्छी बात रही कि बाद में भी कुछ लोगों ने इस पद के बड़े होने की लाज रखाने की कोशिश की. सतर्कता आयुक्त जैसे पद के बारे में आज मुझे मालूम भी हुआ तो ऐसे वक़्त पर जबकि बेचारे वे वाले आयुक्त जी सेवा से निवृत्त हो गए, जिन्होने अभी यह बयान दिया है. उन्होंने कहा है कि हर तीसरा भारतीय भ्रष्ट है और बाक़ी जो बचे हैं वे भी भ्रष्ट बनने की कगार पर खड़े हैं.
जब से मैंने यह पढ़ा है, मैं लगातार एक ही बात सोच रहा हूं. वह यह कि यह तीसरा भारतीय कौन है. क़रीब दो दशक पहले तक तो भारत को तीसरी दुनिया का देश माना जाता था, अब पता नहीं यह कौन सी दुनिया में चला गया है. अगर बात दुनिया के लेवल पर की जाए तब तो शायद पूरा देश ही भ्रष्ट निकले. लेकिन नहीं, उन्होंने भारतीय की बात की है, यानी मामला अंतरराष्ट्रीय नहीं, अंतर्राष्ट्रीय है. अब चूंकि मामला देश के भीतर का है तो इसके लिए इंटरपोल की मदद लेने की ज़रूरत भी नहीं है. अपने स्तर पर ही पूरी छानबीन करनी होगी और छानबीन करके यह तय करना होगा कि आख़िर वह तीसरा आदमी है कौन. वैसे इस तीसरे आदमी की खोज भारत में बहुत पहले से चली आ रही है. कुछ साल पहले अपने देश में हिन्दी के एक कवि हुए धूमिल. वह इस तीसरे आदमी को लेकर बहुत परेशान हुए. उन्होंने कहीं लिखा है, “एक आदमी/ रोटी बेलता है/ एक आदमी रोटी खाता है/ एक तीसरा आदमी भी है/ जो न रोटी बेलता है ,न रोटी खाता है।/ वह सिर्फ़ रोटी से खेलता है /
मै पूछता हूँ -/ यह तीसरा आदमी कौन है ?/ मेरे देश की संसद मौन है ।” दुर्भाग्य की बात यह है कि बेचारे धूमिल जी सिर्फ़ पूछते ही रह गए और पूछते ही पूछते दुनिया से चले भी गए, पर बता नहीं पाए. बताने का काम उन्होंने संसद पर छोड़ दिया और संसद इस मसले पर मौन रह गई.
मैं सोच रहा था कि मैं भी यह सवाल संसद से ही पूछ कर देखूं, पर तब तक सलाहू ने एक ज़्यादा टेढ़ा सवाल पूछ कर मामला बिगाड़ दिया. उसका कहना है, “तुम क्या सोचते हो, तुम्हारे जैसे सिरफिरों के ऐरे-गैरे सवालों के जवाब देने के लिए संसद चल रही है? तुम्हें क्या लगता है, संसद मुफ़्त में चलती है? संसद का एक मिनट का रनिंग कॉस्ट ही करोड़ों रुपये आता है और मंदी के नाते के नाते यह दौर-ए-कॉस्ट कटिंग चल रहा है. इस दौर में उन्हीं सवालों के जवाब दिए जाते हैं जिनसे संसद यानी उसके सदस्यों के पास पैसे आते हैं. वे सवाल उठाने ही नहीं जा सकते, जिनके पीछे लक्ष्मी जी की कृपा का न हो. बताओ तुम कितना पैसा ख़र्च कर सकते हो, इस सवाल का जवाब पाने के लिए?”

आप तो जानते ही हैं, अपन राम के पास अपनी दाल-रोटी चलाने के लिए भी क़ायदे का जुगाड़ नहीं है. फिर भला सवाल उठाने के लिए करोड़ों का जुगाड़ कहां से होता. लिहाजा तय किया कि ख़ुद ही तय करते हैं. इस दिशा में सोचना शुरू किया तो मालूम हुआ कि देश के पहले आदमी तो महामहिम हैं और पहली स्त्री महामहिमा. इस अनुसार देखें तो दूसरा आदमी ज़ाहिर है, उप महामहिम ही हुए और दूसरी स्त्री उप महामहिमा. अब तीसरा आदमी होने के लिए बचता कौन है, सिवा माननीय और उनकी टीम के? लेकिन धर्मसंकट यह है कि अगर माननीय और उनकी टीम को तीसरा आदमी मान लिया जाए तो 10 जनपथ को फिर क्या माना जाए? आख़िर इस देश में कौन सा पत्ता हिलेगा और कौन खड़केगा, इस गुलिस्तां की किस शाख पे कौन बैठेगा .... आदि-आदि, सब तो वहीं से तय होता है! देखिए, मैं समझ गया हूं कि इस मसले को सुलझाना मेरे बस की बात नहीं है और लोकतंत्र के तीसरे पाये के पास मैं इसे लेकर जाना नहीं चाहता. उसका हाल आप हमसे बेहतर जानते हैं. और हे जनता जनार्दन, भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में चूंकि आप ही संप्रभु हैं, लिहाजा यह सवाल मैं आप ही के ज़िम्मे छोड़ता हूं. अगर बन पड़े तो जवाब दें, अन्यथा टिप्पणी रूपी लौटती डाक से रुपया-दो रुपया-पांच रुपया-दस रुपया..... जो बन पड़े, चन्दे के तौर पर भेज दें. ताकि मैं यह सवाल मैं संसद में उठवा सकूं. वैसे भी वहां जिन सवालों उठवाने के लिए जो पैसे दिए जाते हैं, वे आप ही की जेब से निकाले जाते हैं. यक़ीन मानिए, अगर इस सवाल का ठीक-ठीक जवाब मिल गया तो आपके बच्चे सुखी रहेंगे. भगवान आपको बहुत बरक्कत देगा.

Friday, 10 September 2010

मैंने भगवा ओढ़ लिया है और मैं आतंकी हूँ…!!!

भगवा वो जो मेरे रोम रोम में बसा है… भगवा वो जो वीरता का प्रतीक है… भगवा वो जो अग्नि का प्रतीक है… भगवा वो जो तेज का प्रतीक है… भगवा वो जो साधू संतों का प्रतीक है …भगवा वो जो शौर्य का प्रतीक है…भगवा वो जो ओज का प्रतीक है… भगवा वो जो सूर्य का प्रतीक है …भगवा वो जो त्याग का प्रतीक है… भगवा वो जो उगते सूरज का प्रतीक है…भगवा वो जो शान का प्रतीक है…भगवा जो मेरा बसंती चोला है…भगवा वो जिसके लिए शहीदों ने अपना सर्वस्व न्यौछावर किया…भगवा वो जो मेरे तिरंगे में समाया है…भगवा कुछ खास लोगों की ना तो बपौती है और ना ही चिदम्बरम सरीखे लोगों की बेवकूफी …मेरा भगवा राम वाला है …मेरा भगवा कृष्ण वाला है…मेरा भगवा राणा प्रताप वाला है…मेरा भगवा शिवा वाला है…मेरा भगवा दयानंदी है…मेरा भगवा विवेकानान्दी है …मेरा भगवा किसी का विरोधी नहीं है…मेरा भगवा तो जग का भगवा है…जो हर कण में समाया है…मेरा भगवा तो मीरा वाला भगवा है…मेरा भगवा तो आन-बान-शान का रखवाला है…मेरा भगवा मेरी अस्मिता का रक्षक है…मेरा भगवा मेरा स्वाभिमान है…मेरा भगवा मेरी मां बहन की लाज है…मेरा भगवा संस्कृति है, परंपरा है, धरोहर है…मेरा भगवा मेरा हवन है …मेरा भगवा मेरी दीपशिखा है…मेरी हर सांस भगवा है,… मेरी सोच भगवा है… मेरा तन-मन सब भगवा है…मेरी आत्मा भी भगवा है…मेरा भगवा भगवा है…लहू वाला लाल नहीं…और फिर भी कहते हो कि भगवा आतंकी है…तो हाँ लो मैंने भगवा ओढ़ लिया है और मैं आतंकी हूँ…!!!

कलियां भी आने दो

रतन

कांटे हैं दामन में मेरे
कुछ कलियां भी आने दो
मुझसे ऐसी रंजिश क्यों है
रंगरलियां भी आने दो

सूखे पेड़ मुझे क्यों देते
जिनसे कोई आस नहीं
कम दो पर हरियाला पत्ता
और डलियां भी आने दो

तेरी खातिर भटका हूं मैं
अब तक संगी राहों पर
जीवन के कुछ ही पल तुम
अपनी गलियां भी आने दो

Friday, 3 September 2010

तस्वीर मेरी देखना

रतन

एक दिन होगा बुलंद
तकदीर मेरी देखना
सारे जग में फैलेगी
तासीर मेरी देखना

किस तरह मैंने किया है
दम निकलते वक्त याद
थी जो हाथों में पड़ी
जंजीर मेरी देखना

तुम न मानो मेरा तन-मन
धन तुम्हारे नाम है
छोड़ कर हूं जा रहा
जागीर मेरी देखना

इस जहां में तो नहीं
पर उस जगह मिल जाएंगे
जो बुना है ख्वाब की
ताबीर मेरी देखना

आज मुझसे दूर हो
इक वक्त आएगा रतन
जब गुजर जाएंगे हम
तस्वीर मेरी देखना

Wednesday, 1 September 2010

बिछाए बैठे हैं

रतन
आएंगे वो जिस रस्ते से
पलक बिछाए बैठे हैं
मैं क्या तकता राह, शजर भी
फूल खिलाए बैठे हैं

मुद्दत हो गई मिलकर बिछड़े
माजी को करता हूं याद
दिल के ख़ाली पन्नों पर
तस्वीर लगाए बैठे हैं

मौला मेरे भगवन मेरे
दिलबर तुम दिलदार भी तुम
इक दिन मिलना होगा यह
उम्मीद लगाए बैठे हैं

बारिश आई बूंदें लाई
आया यादों का मौसम
देखो फिर बरसा सावन
हम झूला लगाए बैठे हैं

जब वो सपनों में आते हैं
आकर बहुत सताते हैं
है यह भी मंजूर हमें
क्यों दर्द चुराए बैठे हैं

मिल नहीं सकता उनसे मैं अब
पर क्यों ऐसा लगता है
कल ही अपनी बात हुई है
दिल उलझाए बैठे हैं