Saturday, 26 June 2010

भाषाई आत्मा

--हरिशंकर राढ़ी

भोजपुरी गानों की चर्चा हुई तो मेरी पिछली पोस्ट पर दो टिप्पणियाँ ऐसी आईं कि यह नई पोस्ट डालने के लिए मुझे विवश होना पड़ा।हालांकि इन टिप्पणियों में विरोधात्मक कुछ भी नहीं है किन्तु मुझे लगता है कि इस पर कुछ और लिखा जाना चाहिए। एक टिप्पणी में रंजना जी ने भोजपुरी गीतों में बढती फूहडता पर चिन्तित नजर आती हैं तो दूसरी टिप्पणी में सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी जी मनोज तिवारी मृदुल का नाम न लिए जाने को शायद मेरी भूल मानते हैं किन्तु वे स्वयं ही उस बात पर आ जाते हैं जिसकी वजह से मैंने उनका नाम नहीं लिया ।
इसमें संदेह नहीं कि मनोज तिवारी मृदुल आज भोजपुरी के एक बड़े स्टार हैं। अब बड़े स्टार हैं तो बड़ा कलाकार भी मानना ही पड़ेगा । भोजपुरी का उन्होंने काफी प्रचार-प्रसार किया है। भोजपुरी में पॉप संगीत का प्रथम प्रयोग करने वाले वे संभवतः पहले गायक हैं( बगल वाली जान मारेलीं )और बहुत लोकप्रिय भी हैं। मेरी जानकारी के अनुसार उनकी लोकप्रियता का ग्राफ शारदा सिन्हा और भरत शर्मा से कहीं ऊपर है। पर मैं यह बड़े विश्वाश से कह सकता हूँ कि उनके आज के गीतों में भोजपुरी की आत्मा नहीं बसती। एक समय था जब उनके गीतों में कभी - कभी भोजपुरी माटी की गंध का स्पर्श मिल जाता था।उस समय भी उसमें खांटी आत्मा नहीं होती थी। मुझे याद हैं उनके गीतों के कुछ बोल-हटत नइखे भसुरा ,दुअरिये पे ठाढ बा ; चलल करा ए बबुनी'........ और कुछ पचरे। परन्तु वह खांटीपना कभी भी नहीं दिखा जो भरत शर्मा व्यास, शारदा सिन्हा और मोहम्मद खलील के गीतों में दिखता रहा है ।
दरअसल मनोज तिवारी और अन्य कई गायकों की भाषा तो भोजपुरी अवश्य है किन्तु उनके गीतों और धुनों की आत्मा भोजपुरी नहीं है। केवल भाषा का प्रयोग कर देने से भाषाजन्य वातावरण नहीं बन जाता। वास्तविक वातावरण तो परिवेश से बनता है। फिल्म ''नदिया के पार'' इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। इस फिल्म की भाषा भोजपुरी आधारित मानी जा सकती है किन्तु भोजपुरी कतई नहीं । किन्तु इसकी पटकथा और परिवेश ऐसा है कि प्रायः लोग इसे भोजपुरी फिल्म मान लेते हैं । भाषा के आधार पर यह फिल्म भोजपुरी तो बिल्कुल नहीं है। भोजपुरी गीतों की अपनी भाषा ही नहीं वरन अपना परिवेश , परम्परा और मुखयतया अपनी धुनें भी हैं । सोहर, गारी , नकटा, उठाना , सहाना, कजरी (बनारसी और मिर्जापुरी), पूरबी , छपरहिया, चैता, चैती, फगुआ,झूूमर और इनके कई विकारों से मिलकर भोजपुरी संगीत का संसार बना है। फिल्मी गीतों, पंजाबी पॉप और डिस्को संगीत को भोजपुरी शब्द दे देने से बनी रचना भोजपुरी नहीं हो जाएगी। आज पंजाबी पॉप संगीत का परिणाम लोगों के सामने है। एक बड़ा तबका जो पंजाबी संस्कृति, पंजाबी साहित्य और पंजाबी लोक संगीत से वाकिफ नहीं है वह वर्तमान पंजाबी पॉप (बदन उघाडू दृश्य ) संगीत को वास्तविक पंजाबी गीत मानने लगा है और पंजाब की माटी के असली गीत कहीं गुम हो गए हैं।
लोकगीतों के साथ एक खास बात यह होती है कि वे लोकसाहित्य के एक महत्त्वपूर्ण अंग होते हैं। उनमें लोकसाहित्यकार अपनी संवेदनशीलता से एक जीवंतता पैदा कर देते हैं और वे क्षेत्र विशेष की जीवन शैली के प्रतिबिम्ब बन जाते हैं । भोजपुरी गीतों मे इस बात को शिद्दत के साथ महसूस किया जा सकता है। मौसम के गीत हों या किसानी के, उनमें भोजपुरी क्षेत्र का सजीव वातावरण मिलता है। मुझे इस इलाके का एक पारंपरिक गीत याद आता है - गवना करवला ये हरि जी, अपने विदेशावां गइला हो छाय । इस गीत को बाद में भरत शर्मा ने अपनी खांटी देशी शैली में बड़ी ठसक से गाया और इसके सारे दर्द को बाहर निकाल दिया। इस गीत में गौने की परम्परा ही नहीं अपितु उस विरह का भी जिक्र है जो इस क्षेत्र में सदियों से पाया जाता रहा है। संयुक्त परिवार की परम्परा में प्रायः कोई एक पुरुष जीविकोपार्जन के लिए कलकत्ता या असम की तरफ चला जाया करता था और उसकी नवोढा विरहाग्नि में तपती रहती थी। यही कारण है कि यहां के गीतों में विरह का बोलबाला पाया जाता रहा है । और तो और यहां इसी के चलते विरहा विधा का अलग से अस्तित्व पाया जाता है। भोजपुरी भाषी इस बात को ठीक से जानते और समझते हैं ।
अपनी इन्हीं मान्यताओं के चलते मैं मनोज तिवारी को ऐसे भोजपुरी गायकों की श्रेणी में नहीं रखता जो भोजपुरी गीतों में वहां की पूरी परम्परा लिए चलते हैं । ये बात अलग है कि भोजपुरी और भाग्य ने उन्हें बहुत कुछ दिया है। इस परिप्रेक्ष्य में भरत शर्मा और शारदा सिन्हा के साथ न्याय नहीं हुआ है।
एक अच्छा गायक अच्छा गीत कार भी हो जाए, यह जरूरी नहीं । अच्छे गायक इस बात को समझते हैं। गुड्डू रंगीला और निरहू के गीत कौन लिखता है यह तो मैं नहीं जानता , पर शारदा सिन्हा के अधिकाँश गीत पारंपरिक है।भोलानाथ गहमरी और तारकेश्वर मिश्र राही के गीत भोजपुरी गंध लिए हुए चलते हैं कई बार दिल को छू जाते हैं । इनके अलावा अनेक अज्ञातनामा कवि और कलाकार भोजपुरी संगीत की उच्चकोटि की सेवा कर रहे हैं ।निरहू करण और रंगीलाकरण हो रहा है परन्तु भोजपुरी की जड़ें बहुत गहरी हैं और मुझे विश्वाश है कि फिर भोजपुरी अपनी आत्मीयता देती रहेगी।

Friday, 4 June 2010

ओकरे किरुआ परी

-- हरि शंकर राढ़ी
उस समय लगभग साढ़े बारह बज रहे थे। धूप अपने पूरे यौवन पर थी। गर्मी से बुरा हाल था लेकिन इस सांस्कृतिक नगरी में बिजली गुल थी । भूख लगी हुई थी और हम खाना खाने एक होटल में गए। उसका इनवर्टर फेल हो चुका था और जेनेरेटर था नहीं । गर्मी से बैठा नहीं जा रहा था और हम अपनी भूख लेकर वापस आ गए। चारो तरफ जेनेरेटर दनदना रहे थे। रिक्शे पर बैठे और हम कैण्ट की तरफ चल दिए और उसी के साथ मेरे विचारों की श्रृंखला भी।
पूरे यूपी में बिजली का बुरा हाल है और हम कहते हैं कि बड़ा विकास हुआ है। अब तो विकास दिखता नहीं , दिखाया जाता है। विकास के आंकड़ों से विकास सिद्ध किया जाता है।विकास हुआ कितना है यह तो भुक्तभोगी ही जानता है। मुझे याद है, मेरे गांव का विद्युतीकरण वर्ष १९८८ में हुआ था और वह भी व्यक्तिगत प्रयासों से ।उस दौरान बीस से बाइस घंटे बिजली रहा करती थी। न्यूनतम १८ घंटे तो रहती ही थी और कभी-कभी तो २४ घंटे भी मिल जाती थी । सरकार कह सकती है कि तब आबादी कम थी । तर्क ढॅँूढ लेना कोई बहुत मुश्किल कार्य नहीं होता ।आबादी बढ ी है पर बिजली की खपत व्यक्तिगत रूप में कम ,पारिवारिक रूप में ज्यादा होती है। आज यूपी में बिजली का आपूर्ति आधिकारिक तौर पर छः घंटे है और कट पिट कर यह तीन - चार घंटे बैठती है । अर्थात आपूर्ति एक तिहाई हो चुकी है जबकि आबादी तो तीन गुना नहीं बढ़ी है । कीमतें तो करीब पंद्रह गुना बढ चुकी हैं। मुझे यह भी ठीक से याद है कि तब घरेलू उपभोग की बिजली पांच सौ वाट लोड तक सत्रह रुपये प्रति माह के दर से थी।इतना विकास हुआ तो उत्पादन क्यों नहीं बढ ा ?
प्रश्न इच्छा शक्ति और जनकल्याण की भावना का है। नब्बे के दशक से क्षेत्रीय राजनीति का बोलबाला हो गया। छोटी- छोटी राजनैतिक पार्टियाँ अस्तित्व में आईं और विकास की जगह जातिवाद का पत्ता खूब चला। आजादी के चालीस साल बाद जब शिक्षा का इतना विकास हो चुका था, जातिवाद केवल शीर्षक बन कर रह चुका था , तब इस प्रकार का जाति आधारित ध्रुवीकरण एक आश्चर्य जनक घटना थी। आखिर वह कैसी शिक्षा थी जो हमें पुनः उसी जातिवादी खोह की ओर वापस लेकर चल पड़ी ?जिनकी न कोई राजनीतिक पृष्ठ भूमि थी और न आदर्श सोच और न एक बेहतर भविष्य का सपना , ऐसे लोग सत्ता में आ गए और आते गए। जब बिना किसी विकास के ही जबानी खर्च पर वोट मिलता रहे तो नाहक परेच्चान होने की क्या जरूरत ? अब अगर आपने जाति पर खुच्च होकर सरकारें बनाईं हैं तो इसी पर खुश रहिए, बिजली का क्या करेंगे ? अन्ततः खुश ही तो होना था!
खैर, कैण्ट आया और खाना खाकर आराम करने लग गए। इस बीच मैंने प्रो० बंशी धर त्रिपाठी जी को फोन कर लिया। प्रो० त्रिपाठी जी कशी विद्यापीठ मे समाज शास्त्र के प्राध्यापक थे और अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं।
कई वर्ष पहले समकालीन अभिव्यक्ति में प्रकाशनार्थ उनके कई लेख प्राप्त हुए थे। व्यक्तिगत रूप से मुझे उनक ेलेख बहुत पसन्द आए थे और हमने उन्हें यथासमय प्रकाशित भी किया था। इसके बाद गोस्वामी तुलसी दास की जन्मभूमि से संबंधित उनका एक शोध परक लेख साहित्य अमृत में प्रकाशित हुआ था और उस पर मैंने कुछ और तर्क देते हुए समर्थन किया था तो उन्होंने स्वयं फोन करके लम्बी बातचीत की थी। तबसे देर सबेर बातों का सिलसिला जारी था। उन्हें फोन करके जब मैंने ये बताया कि मैं वाराणसी में ही हूँ तो वे बड े प्रसन्न हुए। बोले- अवस्था मेरी ऐसी नहीं है कि मैं मिलने आ सकूँ, यदि आप आ जाएं तो बड ा ही अच्छा हो। मैंने भी हाँ भर दी । विद्वानों का आशीर्वाद मिले कहाँ ?

प्रो० त्रिपाठी जी करौंदी में रहते हैं। यह तो मुझे मालूम था पर वाराणसी के भूगोल से मैं इतना वाकिफ भी नहीं हूँ। शाम का समय तय था । परिवार को छोड़कर मैं उनसे मिलने चल पड़ा । कैण्ट से लंका और वहां से करौंदी। घर आसानी से मिल गया । बड़ा सा गेट सामान्यतया भिड़ाया हुआ था। वे बरामदे में ही बैठे थे, मैंने उन्हें पहचान लिया । फोटो कई जगह देखा था और खुद अपनी पत्रिका में भी छापा था। पर त्रिपाठी जी मुझे नहीं पहचान सके । जब मैंने परिचय दिया तो वे बड़े अचम्भित हुए और प्रसन्न भी । उनकी कल्पना थी कि मैं कोई उम्रदराज साठ से ऊपर का व्यक्ति होऊँगा क्योंकि समकालीन अभिव्यक्ति का सह संपादक हूँ और काफी दिनों से उनके सम्पर्क में हूँ।
प्रो० त्रिपाठी की विद्वता से प्रभावित हुए बिना शायद ही कोई रह पाए। वे समाज शास्त्र के प्रोफेसर रहे किन्तु मुझे कई बार भ्रम सा हुआ कि ये संस्कृत के प्रोफेसर होंगे । आपने हिन्दी, अंगरेजी और संस्कृत तीनों ही भाषाओँ में उच्च कोटि का लेखन किया है। भारत में साधुओं के जीवन पर उन्होंने गहन शोध किया है और उनकी पुस्तक साधूज ऑफ़ इंडिया पूरे विश्व में काफी सराही गई है। इसके अलावा उन्होंने अत्यन्त स्तरीय और उपयोगी ग्रन्थों का सृजन किया है। चारो धाम यात्रा का बड ा ही सजीव वर्णन उन्होंने किया हैं। गीता के पूरे सात सौ श्लोक उन्हें कण्ठस्थ हैं। सरलता तो उनकी श्लाघनीय है। विद्वता और सरलता का ऐसा संयोग विरले ही मिलता है। मुझे क्षण भर बाद ही ऐसा लगने लगा जैसे मैं इनसे कई बार मिल चुका हूँ और जैसे अपने घर में हूँ। स्वागत और स्नेह की तो बात ही मत पूछिए ! अपनी कई पुस्तकें उन्होंने मुझे उपहार स्वरूप दीं और विभिन्न विषयों पर काफी ज्ञानवर्धक बहस भी की। मुझे लगा कि जितना सम्मान इस मनीषी को मिलना चाहिए , उससे बहुत कम मिला । वस्तुतः साहित्य लेखन में आजकल इतनी भीड हो गई है और उत्पाद इतना बढ गया है कि उसमें स्तरीय साहित्य और साहित्यकार डूब सा गया है।

बड़े गुणग्राही और विनम्र। गोस्वामी तुलसी दास की भाषा में कहें तो उनका हृदय उस सागर के समान है जो चन्द्रमा को पूर्ण देखकर अपनी गरिमा छोड कर उसकी तरफ मिलने चल देता है।
घंटे भर बाद किसी तरह विदा लेकर कैण्ट की तरफ भागा और जाम से जूझते हुए किसी तरह पहुंच भी गया। वहाँ पत्नी और बच्चे संकटमोचन और मानस मंदिर के लिए तैयार बैठे थे। इसमें ऐसा कुछ नहीं जिसका वर्णन करना आवश्यक हो सिवा इसके कि यह वही संकटमोचन मंदिर है जहां भयंकर विस्फोट हुआ था और अब वहां सुरक्षा के नाम पर खानापूर्ति के सिवा कुछ नहीं बचा है।
अगली सुबह जल्दी ही तैयार होकर बस अड्‌डे पहुँच गए और थोड ी जद्दोजहद के बाद बस मिल भी गई और फिर चल भी पड़ी । शहर से बाहर निकलते और टिकट की औपचारिकता पूरी होते ही ड्राइवर महोदय ने भोजपुरी गानों की कैसेट ठोंक दी । आप बड े ही शौक़ीन मिजाज शख्स थे क्योंकि यह बस पूर्णतया सरकारी यानी यूपी रोडवेज की थी और ऐसी बसों में गाने की व्यवस्था आश्चर्य ही होती है।
भोजपुरी गानों का अपना अलग ही रस होता है । धीरे- धीरे माहौल बनने लगा और फिर साहब ने भरत शर्मा व्यास का कैसेट लगा दिया । भोजपुरी में गायकों की एक लम्बी परम्परा रही है। आकाश वाणी के जमाने में मोहम्मद खलील का - कवने खोंतवा में लुकइलू अहि रे बालम चिरई ( गीत शायद भोलानाथ गहमरी का है),चांद वारसी का - नरई ताल कै चीकन मटिया जहां बसै ...... और बुल्लू यादव का - नैनों में पृथ्वीराज बस गए ॥ आदि गीत दिलो दिमाग पर छाए रहते। पॉप संगीत की ऐसी गंदी सेना भोजपुरी गीतों पर आक्रमण कर चुकी है कि अब भोजपुरी सुनने लायक ही नहीं बच पा रही। पूरी की पूरी सेना निरहुआ ब्रांड बनती जा रही है और एक वर्ग विशेष इसके पीछे दीवाना बनता जा रहा है।
इस पूरे संक्रमण में अभी दो कलाकार बचे हुए हैं जो भोजपुरी का सोंधापन और मर्यादा लिए हुए चल रहे हैं । इनमें एक तो हैं भोजपुरी की स्वरकोकिला शारदा सिन्हा और दूसरे हैं भरत शर्मा व्यास। तुलनात्मक रूप से इनका उत्पादन कम है , जैसा कि हर अच्छी चीज में होता है । भरत शर्मा के गीत में भोजपुरी का ठसका , लय ताल और पूरी सम्प्रेश्नियता है। ऐसी खाँटी भोजपुरी गाते हैं जो तीन चार दशक पहले की शुद्ध गंवईं होती थी। अब एक गीत आता है जिसे समझने में तो शुरुआत में मुझे भी दिक्कत होती है। गीत का मुखड़ा है- जे हमरे लागत अटैं जरी , ओकरे किरुआ परी। मेरे दोनों बच्चे इतनी खाँटी भोजपुरी नहीं समझते। एक तो वैसे भी बनारस और आजमगढ की भोजपुरी इस भोजपुरी से भिन्न है और उस पर इतनी शुद्ध ! किरुआ परी का अर्थ पत्नी जैसे तैसे बच्चों को समझाती है और सभी खूब हंसते हैं । थोड ी हँसी तो मुझे भी आती है पर मैं स्वर और बोल के दर्द में डूब जाता हूँ। जिनके समझ में भोजपुरी नहीं आती उनके लिए बोल के अर्थ बताता चलूँ। शायद कोई विरहिणी है जो दर्द से टूट चुकी है और अपना बुरा करने वालों को हृदय से श्राप देती है कि जो मेरी जड खोद रहा है उसे कीड े पडें गे। मुझे लगा कि यह दर्द की इन्तहा है और क्षरण के इस युग में इतना शुद्ध दर्द भी नहीं मिलता । कहाँ गए वे विरह के दिन और वे विरहिणियां या विरही जिनके दम पर पद्मावत या फिर मेघदूत जैसी रचनाएं हमें मिलीं। एक युग था जब पूरे भोजपुरी भाषा क्षेत्र के नायक बंगाल और आसाम में नौकरी के लिए जाया करते और नायिकाएं पूरी की पूरी रात विरह में तड पते हुए निका ल दिया करती । कहां बंगाल और कमरू कमच्छा ( कामरूप और कामाखया , असम ) का काला जादू उनके पतियों को भरमा लिया करता था। पूरा जीवन विरह शैया पर ही कट जाता था और भोजपुरी कवियों को विप्रलंभ श्रृंगार से सजाने का मौका मिला करता था। सच तो यह था कि इस क्षे त्र की नायिकाओं का जीवन प्यार की अनुभूति में ही व्यतीत हो जाता था और शायद यही प्यार आजीवन ईंधन का काम करता था । मुझे वे पंक्तियां बहुत ही सटीक लगती हैं-
विरह प्रेम की जागृति गति है और सुसुप्ति मिलन है,
मिलन प्रेम की अन्तिम गति है और विरह जीवन है।

Tuesday, 1 June 2010

काशी में एक दिन

---हरिशंकर राढ़ी
गेस्ट हाउस में नहा - धोकर लगभग ११ बजे हम काशी विश्वनाथ जी के दर्शन के लिए चल पड़े। काशी में रिक्शे अभी बहुत चलते हैं, भले ही स्वचालित वाहनों की संखया असीमित होती जा रही हो। रिक्शे की सवारी का अपना अलग आनन्द और महत्त्व है। इधर रिक्शा चला और उधर विचारों की श्रृंखला शुरू हो गई।
काशी यानी वाराणसी अर्थात बाबा विश्वनाथ की नगरी। उत्तर भारत की सांस्कृतिक राजधानी। एक ऐसा विलक्षण शहर जहाँ लोग जीने ही नहीं मरने भी आते हैं। मेरी दृष्टि में यह विश्व का ऐसा इकलौता शहर होगा जहाँ पर मरने का इतना महत्त्व है। इस शहर का इतिहास उतना ही पुराना है जितनी कि भारतीय संस्कृति। कितना पीछे जाएं ? सतयुग तक का प्रमाण तो हरिश्चंद की कथाओं में ही मिल जाता है। पौराणिक मान्यताओं पर विश्वास करें तो भोले नाथ की नगरी स्वयं भोलेनाथ ने ही बसाई थी। या तो वे कैलाश पर रहते या फिर काशी में । एक मित्र के मजाक को लें तो यह बाबा भोलेनाथ की शीतकालीन राजधानी थी क्योंकि शीतकाल में तो कैलाश पर रहने लायक ही नहीं होता।
बनारस एक स्थान नहीं, एक संस्कृति का नाम है- ज्ञान की संस्कृति, अध्यात्म की संस्कृति, सभ्यता की संस्कृति, संगीत की संस्कृति, मस्त मौलेपन की संस्कृति और भांग की संस्कृति। सब कुछ एक साथ। आदि शंकराचार्य को शास्त्रार्थ करना है तो काशी आते हैं, मंडन मिश्र की काशी और उनकी पत्नी से विवश होते हैं कि परकाया प्रवेश से काम शास्त्र तक की शिक्षा लेनी पड ती है। तथागत को भी काशी आना पड ता है और अशोक महान को बौद्ध धर्म का प्रचार यहीं से शुरू करना पड ता है। सारनाथ यहीं बनता है। गोस्वामी जी अपना अजर- अमर रामचरित मानस यहीं पूरा करते हैं ।कबीर का लहरतारा, रामानन्द का योग, उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचन्द की लमही और जय शंकर प्रसाद की कामायनी, सब कुछ तो यहीं काशी में ही है।
अभी प्रसिद्ध अंगरेजी कवि वाल्काट को पढ़ रहा था , उसमें भी बनारस का संदर्भ है। बनारस तो हिन्दू परिवारों की नाम सूची में सम्मिलित रहा है। कितने लोग बनारसी दास की संज्ञा से विभूषित हुए और बनारसी दास चतुर्वेदी को तो हिन्दी साहित्य में कौन नहीं जानता ?बनारस में रहने वाले कई लोगों का तो उपनाम ही बनारसी बाबू हुआ करता था।
यही वह काशी है। साधु- सन्यासी यहां- वहां घूम रहे हैं। राँड -साँड - सन्यासी , इनसे बचे तो सेवै काशी । हमारा रिक्शा इस बीच जाम-जूम से निकलता हुआ विश्वनाथ जी पहुँच जाता है। अभी रिक्शे से ठीक से उतर भी नहीं पाया हूँ और एक एजेण्ट साथ लग जाता है। अपने आप बोले जा रहा है- बाबूजी, साढ़े ११ बज गए हैं और बारह बजे मंदिर बन्द हो जाएगा। लाइन बहुत लम्बी है। आपको बिना लाइन के दर्शन करा दूँगा। जो मर्जी दे दीजिएगा। मैं कुछ भी उत्तर नहीं देता हूँ। मुझे यह भी पता नहीं कि मंदिर कब बन्द होता है! पता नहीं यह पंडा जी सच बोल रहा है या नहीं! साथ में पत्नी और बच्चे हैं , उसे मालूम है कि ऐसी स्थिति में लोग कष्ट नहीं उठा सकते। धूप भी बहुत तेज है । मैं कुछ नहीं बोलता हूँ और वह जानता है कि मौनम स्वीकार लक्षणम्‌।अब वह आगे- आगे हो लेता है और मैं सपरिवार पीछे-पीछे। पतली गली का रास्ता लेता है और मैं समझ जाता हूँ कि यह पीछे की तरफ से ले जाएगा। इसी बीच उसका चेला आ जाता है और वह हमारी बागडोर उसके हाथ में सौंपकर शायद और किसी भक्त की तलाश में निकल जाता है और चेले से कह जाता है कि बाबूजी को ठीक से दर्शन करा देना और जो दें , ले लेना ठकठेना मत करना ।
प्रसाद की एक दूकान पर वह रुकता है । उसकी सेट दूकान होगी । वहां जूते - चप्पल उतारते हैं और हस्त प्रक्षालन करते हैं । दूकान पर मोबाइल वगैरह के लिए लॉकर भी है पर हमने अपना सारा मोबाइल कमरे पर ही छोड़ दिया था। दूकानदार प्रसाद की कई टोकरियाँ जल्दी- जल्दी बनाता है किन्तु मैं भी सतर्क हूँ। एक की कीमत सौ रुपए! मैं एक ही लेता हूँ , परिवार तो एक ही है। वे जिद करते हैं किन्तु मैं भी टस से मस नहीं होता हूँ।
हमें पिछले दरवाजे से प्रवेश मिलता है । पुलिस है सुरक्षा जांच भी है पर शायद दिखावा ही है। अन्दर वह हमें एक अन्य पंडितजी को सुपुर्द कर देता है । वे हमें मुख्य गर्भगृह के सामने बिना रोक-टोक ले जाता है। मेरा गोत्र पूछता है और पूजा करवाता है। मंत्र बुलवाता है और मेरा शुद्ध उच्चारण सुनकर कुछ सहम सा जाता है। खैर पूजा के बाद वह हमें मंदिर में प्रवेश करा देता है बिना पंक्ति के ही । पुलिस का एक सिपाही द्वार पर खड़ा है जो हमें रोकता ही नहीं । प्रवेश करने में मुझे संकोच होता है क्योंकि मैं पंक्ति में नहीं था। मैं पंडित जी की तरफ मुड कर देखता हूँ तो वह कहता है जाइए जाइए, दर्शन करिए। सिपाही हमें अन्दर की तरफ धक्का देता है और हम लोग ज्योतिर्लिग के सामने । दर्शन , प्रसाद और फिर बाहर। किसका कितना हिस्सा है यह मुझे नहीं मालूम।
फिर पंडा मंदिर का इतिहास बताता है। सवा मन सोने का कलश , मंदिर ध्वंश और ज्ञानवापी मस्जिद का वृत्तांत। मुझे मालूम है किन्तु बच्चों को नहीं । ज्यादा बोलता देखकर मैं उसे बताता हूँ कि मै रामेश्वरम तक सात ज्योतिर्लिंगों की और अन्य बहुत से तीर्थस्थलों की यात्रा कर चुका हूँ तो उसका स्वर बदल जाता है । यहां वहां पूजा करवा कर वह हमें मुक्त करता है किन्तु समुचित दक्षिणा के बाद । चलिए दर्शन तो यथासमय हो गया । शुल्क के बिना तो शायद कुछ भी संभव नहीं । बाहर निकलते ही दर्शन एजेण्ट साथ लग लेता है और पचपन रुपये देकर उससे पिंड छुड़ाता हूँ।
मैं बच्चों को बताता हूँ मंदिर के पास ही गंगा जी भी हैं और बच्चे कैसे कि जिद न पकड़ें ? रास्ता मुझे भी भूल रहा है। पिछली बार विश्वनाथ जी का दर्शन लगभग बीस साल पहले किया था। तबसे बनारस आना जाना कई बार हुआ पर दर्शन नहीं। अभी पिछले साल ही तीन बार गया। एक पुलिस वाले से गंगा का रास्ता हिन्दी में पूछता हूँ और वह बड़ी प्रसन्नतापूर्वक भोजपुरी में रास्ता बताता है। मैं उसे धन्यवाद देता हूँ तो वह मेरा मुँह ताकता है। अभी शायद यहां इतनी औपचारिकता नहीं पहुँची है हालांकि काशी तो सभ्यता की नगरी है।
यहां दशाश्वमेध घाट है । यह समय अच्छा नहीं है, दोपहर है । काशी की तो सुबह मशहूर है । पर गंगा की दुर्दशा देखी नहीं जा रही है । सिकुड कर पतली सी , गरीबी की मार झेलती या किसी असाध्य रोग से पीडि त । विश्वास नहीं हो रहा कि यह वही पतित पावनी गंगा है जो स्वर्ग से उतरी थी। जो पानी अमृत था वह अब प्रदूषण से काला हो गया है। कुछ नावें है जो यात्रियों को उसपार ले जाने का आमंत्रण दे रही हैं। इसी गंगा ने काशी को तीन तरफ वेष्टित किया हुआ है और यहां की गंगा को ही देखकर भगवान भोलेनाथ काशी में डेरा डाला था। यही वह दशाश्वमेध घाट है जहाँ ब्रह्मा ने दस अश्वमेध यज्ञ किया था और जिस घाट पर नहा लेने मात्र अश्वमेध यज्ञ का पुण्य मिलता है। पर हमारा विकास हो गया है और हम गंगा को इस लायक छोड़ें कि वह नहाने तो क्या देखने योग्य तो बचे ! मैं लौट तो रहा था पर पैर नहीं उठ रहे थे।