Saturday, 29 May 2010

यात्रा क्षेपक

--हरिशंकर राढ़ी
मैं अपनी यात्रा जारी रखता किन्तु न जाने इस बार मेरा सोचा ठीक से चल नहीं रहा है। व्यवधान हैं कि चिपक कर बैठ गए हैं। खैर, मैं कोडाईकैनाल से मदुराई पहुँचूँ और आगे की यात्रा का अनुभव आपसे बांटूं , इस बीच में एक क्षेपक और जुड़ जाता है। इस क्षेपक का अनुभव और अनुभूतियां मुझे उस लम्बी यात्रा को रोककर बीच में ही एक और प्रसंग डालने पर बाध्य कर रही हैं। ऐसा कुछ खास भी नहीं हुआ है। बात इतनी सी है कि इस बार भी गर्मियों में गाँव जाना ही था। दिल्ली से पूर्वी उत्तर प्रदेश की यात्रा , ट्रेन की भीड -भाड , मारा-मारी , भागमभाग और उबालती गर्मी भी इस वार्षिक यात्रा को रोक नहीं पाते। आरक्षण लेने में थोड़ी सी देर हो गर्ई।हालांकि इसे देर मानना ठीक नहीं होगा। अभी भी निश्चित यात्रा तिथि में ढाई माह से ज्यादा का समय था। पता नहीं रेल मंत्रालय को ऐसा क्यों लगता है कि लोग अपने जीवन की सारी यात्राओं की समय सारणी बनाकर बैठे हैं और अग्रिम आरक्षण की समय सीमा तीन माह कर देना लोगों के हित में रहेगा! शायद पूर्व रेलमंत्री श्री लालू प्रसाद यादव का तथाकथित कुशल प्रबंधन यही हो। तीन माह पहले ही ही जनता के पैसे (बिना ब्याज) रेलविभाग में जमा ! यह बात उस समय मुझे ज्यादा अखरी थी जब सितम्बर में होने वाली दक्षिण भारत की यात्रा हेतु जुलाई के प्रारम्भ में ही बाईस हजार रुपये का टिकट लेकर बैठना पड़ा । तीन माह पूर्व जमा पैसों से रेलवे को ब्याज के रूप में कितना फायदा होता होगा, यह तो रेल विभाग ही बता सकता है। दूसरी बात यह कि इस बीच कितने लोगों का कार्यक्रम रद्द होता होगा और आरक्षण के निरस्तीकरण से कितनी आय होती होगी ( और यात्री का कितना नुकसान होता होगा !) यह भी विभाग ही जाने ! पर, बात यही कि दुनिया में हम आए हैं तो जीना ही पड़ेगा ।
खैर, यात्रा तो करनी ही थी। अपने गृह जनपद आजमगढ़ की रेल गाड़ी भर चुकी थी । बहुत दिनों से सोच रहा था कि काशी विश्वनाथ के दर्च्चन कर लूँ तो अच्छा रहे। बहुत पहले , शायद १९८८ के अन्त में दर्शन किया था । बनारस भी थोडा घूम लूँगा। पिछले वर्ष भी बनारस होकर ही गया था परन्तु घर पहुँचने की जल्दी थी। इण्टरनेट पर सर्च किया तो पता लगा कि वाराणसी गरीबरथ में वांछित तिथि को आरक्षण उपलब्ध था। निःसन्देह यह एक अच्छी गाड़ी है और इसमें यात्रा करना सुखद होता है।
यात्रा का निश्चित दिन आ गया । अब रेल विभाग की एक और योजना की बानगी देखिए। नई दिल्ली और पुरानी दिल्ली स्टेशन से भीड़ कम करने के लिए दिल्ली से बाहर टर्मिनस बनाए जा रहे हैं। आनन्द विहार , सराय रोहिल्ला, कैण्ट आदि ऐसे ही कुछ स्टेशन हैं जहाँ अभी दो तीन साल पहले तक दो चार रेलगाडि याँ भी नहीं रुकती थीं वही अब टर्मिनस बन रहे हैं और वह भी गरीब रथ जैसी प्रतिष्ठित गाडि यों के लिए। यहाँ एक बात समझ नहीं आती कि नीति निर्धारकों को बहुत महीन बातें तो दिख जाती हैं किन्तु मोटी- मोटी बातें क्यों नहीं? दो- चार गाडि यों को मुखय दिल्ली से बाहर धकिया देने से दिल्ली जंक्शन की भीड कम नहीं होने वाली। अभी जो भी एक्सप्रेस और सुपरफास्ट ( तथाकथित ) गाडि याँ दिल्ली आती हैं उनमें से दिल्ली के उपनगरीय और इन नवान्वेषित टर्मिनसों पर क्षण भर के लिए भी नहीं ठहरतीं। पूरब से आने वाली गाडि याँ , जो प्रायः कई-कई घंटे लेट होती हैं, दादरी , मारीपत और वैर स्टेशन पर दो-दो घंटे सिगनल के लिए खड़ी रहती हैं , वे ही गाजियाबाद जैसे महत्त्वपूर्ण ठहराव पर दो मिनट के लिए नहीं रुकतीं ! बहुत से यात्री गाजियाबाद, साहिबाबाद और पूर्वी दिल्ली के होते हैं और वे अपना माल- असबाब लेकर टकटकी लगाए रहते हैं कि काश जरा से रुके और हम उतर लें। दिल्ली तक जाना और आना, ऑटो का किराया और झिकझिक या बस की धक्का-मुक्की से बच जाएं । पर नहीं , यहाँ जैसे रेल विभाग को याद आ जाता है कि यह गाड़ी तो एक्सप्रेस या सुपरफास्ट है! इसे तो रोका ही नहीं जा सकता !
बड़ी छोटी सी और सीधी सी बात है कि यदि पूरब से आने वाली गाडि यों गाजियाबाद, आनन्दविहार, विवेक विहार, शाहदरा ; दक्षिण की गाडि यों को फरीदाबाद, बदरपुर , तुगलकाबाद या गुड गाँव एवं पालम जैसे स्टेशन पर क्षणिक ठहराव दे दिया जाए तो यात्रियों को भी सुविधा हो और अनावश्यक भीड से बचाव भी हो जाए।
अब अपनी गरीब रथ भी सरकार की इस योजना की शिकार है। गाड़ी शाम को लगभग छः बजे छूटती है, वही अपने आनन्द विहार से जो कहने को तो दिल्ली में है पर इसके बाद दिल्ली नहीं है। अपने मेहरौली से पूरे तीस किलोमीटर की दूरी पर! नाचीज यूँ भी कोई वीआईपी नहीं और न ही वीआईपीपने का कोई मानसिक रोग पालता। अतः ढाई बजे की धूप में निकलने की ठान लेता है। क्या पता अपनी दिल्ली के ट्रैफिक का ? कोई रिस्क नहीं लेना . अब इसमें कुछ खास नहीं, ऑटो वाला सारे नियमों की धज्जियाँ उडाता तीस किमी बस सवा घंटे में पहुँचा देता है।
अगले दिन समयपूर्व ही वाराणसी पहुँच जाता हूँ। वाराणसी कैण्ट स्टेशन पर बाहर प्रांगण में श्रीमती जी एवं बच्चों को छोड़कर होटल की तलाश में निकल जाता हूँ। ज्यादा दूर नहीं, सड क के उस पार ही कई होटल, लॉज और गेस्ट हाउस है। आते- जाते देख रखा है और अभी भी दिख रहे हैं। मुझे इन्हीं में कोई ले लेना है। रात भर की बात है। थोडा साफ-दाफ हो, हवा पानी हो । बिजली भी होनी चाहिए। गर्मी सहन नहीं होती। स्टेशन के गेस्ट हाउस महंगे होते हैं , यह मुझे पता है पर इनमें एक सुविधा है कि पहुचँने में आसानी होती है। अगली सुबह बस पकड नी है और बस स्टेशन पास में है। किसी लेखक- कवि मित्र को बुलाना है मिलने के लिए तो भी आसान। वैसे बनारस में कुछ रिश्तेदार भी हैं। उनके यहाँ भी जा सकता हूँ! पर हिसाब लगाता हूँ तो होटल में ही फायदा और आजादी है और मेरे जैसे घुमक्कड को आजादी जरूर चाहिए। सड क पार एक गेस्ट हाउस मिल जाता है- चार सौ रुपये में और परिवार सहित मैं जम जाता हूँ।
आज की यात्रा यहीं तक । कुछ बोरिंग थी , तथ्यात्मक थी । आगे बनारस के रंग में डूबता हूँ ; पर उसका विवरण दूसरी किश्त में , अन्यथा आप भी बोर हो जाएंगे ।

Wednesday, 12 May 2010

कोडाईकैनाल में

--हरिशंकर राढ़ी
हमारी बस अपनी तीव्र गति से प्रकृति का स्पर्श करती हुई कोडाईकैनाल की तरफ बढ़ी जा रही थी।पर्वतमाला हमारे साथ-साथ चल रही थी और हम उत्सुक थे कि हम इनके अन्दर प्रवेश करें। इसी पर्वतपाद प्रदेश में बस चालक ने एक रेस्तरां पर बस रोकी और उस खुले से रेस्तरां में हम भूख या स्वाद से ज्यादा उस उन्मुक्त से वातावरण का स्वाद लेने के लिए कुछ खाया पीया। यहाँ से हम पहाडियों की गोद में समाने लगे। बलखाती सर्पाकार सडक पर बस हिचकोले लेने लगी और फिर पूरी बस बच्चों की मौजमस्ती से गूँजने लगी। उनके लिए यह प्रायः नया अनुभव था, ऊपर से वे एक समूह में थे । सडक का रोमांच मेरे लिए तो कुछ खास नहीं था क्योंकि मैं जम्मू , समूचे गढवाल क्षेत्र से लेकर काठमांडू तक हिमालय की यात्रा कर चुका हूँ। हिमालय की उच्चता के सम्मुख यह यात्रा कुछ भी नहीं थी परन्तु आकर्द्गाण यहां भी कम नहीं था । सितम्बर का अन्त था, दक्षिण भारत में गर्मी यूँही कम नहीं थी पर यहां की बात ही कुछ और थी । ठण्डी-ठण्डी हवा ने जैसे द्रारीर के साथ मन आत्मा को भी शीतल कर दिया हो!
यह पर्वतीय यात्रा लगभग दो घण्टे की होती है। बस टूअरिस्ट थी, अतः तेज चलना स्वाभाविक ही था। रास्ते में मनमोहक हरियाली का साम्राज्य चहुंओर। इतने में हम एक अत्यन्त विशाल निर्झर के सामने खड़ी थी । सिल्वर कास्केड नामक इस जलप्रपात को देखते ही बनता था और यह विचार मन में बार- बार आता था कि निश्चित ही प्रकृति से बड़ा कलाकार और वास्तुकार कोई भी नहीं है। यहाँ फोटो- सोटो की रस्म निभाकर हम आगे के लिए रवाना हुए और कुछ अनावच्च्यक सी भी चीजों ( जो हमारे बस पैकेज में शामिल थीं, टूअर ऑपरेटर ऐसे कई मामूली स्थलों को जो रास्ते में पड ते हैं और जिनपर उनका कोई विशेष खर्च नहीं आता और दर्शनीय स्थलों की सूची लम्बी हो जाती है,बस ) को देखते हुए हम कोडाईकैनाल पहुँच गए।
वाकई कोडाईकैनाल एक अत्यन्त खूबसूरत जगह है और इसकी पृद्गठभूमि उस लहरदार पर्वतीय संकरे राजमार्ग ने ही तैयार कर दी थी। हम वहां की प्राकृतिक सुन्दरता बस निहारे जा रहे थे। अन्य पर्वतीय शहरों की भांति यह शहर भी कहीं सघन तो कहीं विरल बसा हुआ है। सबसे पहले हमें बस वाला रॉक पिलर ले गया। यहां दो ऊँची चट्टानें खम्भों की भांति एक साथ खड़ी हैं, ऐसा लगता है कि किसी अच्छे कारीगर ने बिल्कुल साहुल की सीध लेकर बनाया हो। अभी हम पहुंचे ही थे और एक झलक मिली ही थी कि अचानक घना कोहरा छा गया और रॉक पिलर कोहरे की चादर ओढ कर छिप से गए।एकाएक इतना घना कोहरा देखने का अपना ही रोमांच था। हमें ख़ुशी इस बात की भी थी कि हम इतने भाग्यशाली अवश्य थे कि थोडा पहले पहुंच गए अन्यथा मन में एक कसक रह ही जाती! हालांकि, रॉक पिलर में इतना कुछ दर्शनीय नहीं है, बस एक उत्कंठा वाली बात है।
यहाँ-वहाँ घूम-फिरकर हमारी बस कोडाई झील के पास एक भोजनालय के सामने आकर खड ी हो गई।उस बस का यह सेट भोजनालय रहा होगा, इनको यहां से ग्राहक लाने के नाम पर अच्छा कमीच्चन मिल जाता है। खैर , यहां हमने भोजन किया और बस वाले के अनुसार हमारे लिए उसकी सेवा समाप्त थी क्योंकि हमारी बुकिंग केवल एक साइड की थी। वैसे ये टूअर ऑपरेटर बिलकुल एक जैसे होते हैं,चाहे उत्तर भारत हो या दक्षिण! पैसे के चक्कर में किसी को भी बेवकूफ बनाने में इन्हें कोई परहेज नहीं! हमारे ऑपरेटर ने मदुराई से चलते समय ही कह दिया था कि कोडाईकैनाल में मौसम खराब है और किसी भी होटल में कमरा खाली नहीं है (जिससे कि घबराकर ये वापसी की भी बुकिंग करा लें और उसकी आठ सीटें जो खाली जाने वाली हैं , भर जाएँ। यात्री का अपना टूर भले ही सत्यानाश हो जाए, उनका क्या? और यह बात हम समझ चुके थे।)। यही नाटक यहां बस के ड्राइवर और कन्डक्टर ने किया । उनका कहना था कि यहां कोई कमरा खाली नहीं है। किसी बड़े अर्थात महंगे होटल में शायद मिल जाए तो मिल जाए! बहरहाल, हजार पन्द्रह सौ के नीचे तो कोई मतलब नहीं ! मेरे मित्र को गुस्सा कुछ ज्यादा ही आ जाता है क्योंकि गलत बात बर्दाश्त कर पाना उनके वश का नहीं ।। बड़ी जोर की फटकार उन्होंने लगाई। वे कहां गए, ये तो हम नहीं जानते परन्तु इसके बाद हम अपने दम पर होटल ढूंढने निकल दिए और जल्दी ही पास में एक होटल मिल भी गया जो हमारी व्यय सीमा के अन्दर था। हमने सामान रखा और कोडाईकैनाल झील देखने निकल पड़े ।
कोडाईकैनाल का मुखय आकर्षण यहाँ की कोडाई झील है। द्राहर के लगभग बीच में स्थित यह झील किसी सितारे के आकार की है और अत्यन्त विशाल है। इसी झील के नाम पर ही इस पर्वतीय स्थल का नाम कोडाईकैनाल पड़ा हुआ है। वैसे इस द्राहर के नामकरण के बारे में और भी बातें है।तमिल भाषा में को- डाई का अर्थ होता है ग्रीष्म और कैनाल का अर्थ होता है देखना । एक अन्य उच्चारण अन्तर के अनुसार कोडाई कैनाल का अर्थ होता है जंगल का उपहार। कोडाईकैनाल झील के विषय में बड़ी ईमानदारी से कुछ कहा जाए तो वह यह होगा कि यह झील वाकई में बहुत सुन्दर है। इसके आगे बस कविताएं ही लिखी जा सकती हैं।
इस झील में नौका विहार करने का अपना एक अलग आनन्द है । पदचालित से लेकर नाविक चालित छोटी नौकाएं किराए पर उपलब्ध हैं और इसका संचालन तमिलनाडु पर्यटन विभाग करता है। हमने मशविरा किया और नाविक चालित नौका किराए पर ली, इसलिए कि साथ में बच्चे थे । स्वयंचालित नौका में क्या शैतानी कर दें कौन जानता है? यह नौकाविहार अपने आप में एक सुखद एहसास था। लम्बी-चौड़ी झील में रंग-विरंगी नौकाएं तैर रही थीं । झील लगभग अस्सी फीट गहरी है (यह नौका चालक की सूचना के अनुसार है) और कहीं ना कहीं इससे थोडा डर भी लग रहा था।
झील के आसपास छोटी -छोटी दूकानें बहुत सुन्दर लगती हैं। तरह - तरह के अल्पाहार यात्रियों को अपनी ओर आकर्षित करते रहते हैं ।यहां घुड़सवारी का शौक भी फरमाया जा सकता है। यहाँ घूमते-घामते शाम हो गई थी और हम अब वापस आ गए। कुछ देर शहर घूमकर , आवश्यक और अनावश्यक जानकारी लेकर अपने होटल आ गए। सितम्बर के महीने में सर्दी का एहसास बहुत ही सुहावना लग रहा था और हम इसका आनन्द किसी भी कीमत पर छोडना नहीं चाहते थे।
अगली सुबह हमारा कार्यक्रम कोकर्स वाक घूमने का था । कोकर्स वाक कोई एक किलोमीटर लम्बा एक पथ है जो कोडाईकैनाल के दक्षिणी छोर पर स्थित है और बस स्टैंड से लगभग आधा किमी की दूरी पर है।इस पथ का निर्माण ले० कोकर्स ने सन्‌१८७२ में किया था। यह भ्रमण पथ सेंट पीटर्स चर्च से वैन एलन हॉस्पीटल तक फैला है। यहां से पामबन नदी की घाटी से लेकर मदुराई तक का दृश्य देखा जा सकता है बच्चर्ते दिन साफ हो! इस मामले में हम लगभग भाग्यशाली थे। लगभग आधा कोकर्स वाक घूम लेने तक मौसम साफ था, घाटियों का सौन्दर्य हमने खूब देखा और फिर देखते ही देखते कोहरे की चादर ने फिर पूरे कोडाईकैनाल को अपने अन्दर समा लिया।
कोडाईकैनाल में घूमने के लिए बहुत कुछ है, मसलन- ब्रायण्ट वानस्पतिक उद्यान, बीअर शोला फॉल्स, ग्रीन व्यू वैली,डॉल्फिन्स नोज। यहां कुरिन्जी मुरुगन मंदिर अत्यन्त प्रसिद्ध है किन्तु समयाभाव में हम वहां नहीं पहुँच पाए। इसकी दूरी मंदिर से लगभग चार किमी है । यहां का मुखय आकर्षण हर बारह साल बाद खिलने वाला कुरिन्जी का फूल है। हर बारहवें वर्ष जब यह फूल खिलता है तो यहां का पर्यटन भी खिल उठता है।
कोडाईकैनाल प्राकृतिक रूप से समृद्ध है और प्राकृतिक उत्पाद भी यहां खूब बिकते है। शुद्ध शहद , मेवे, जड़ी-बूटियां, फल (जिसमें से कई उत्तर भारत में नहीं मिलते )और शक्तिवर्धक औषधियां प्रचुरता में उपलब्ध हैं। मेरा विश्वास है कि अभी भी यहां के उत्पादों में शुद्धता का प्रतिशत अधिक है। सबसे अधिक मशहूर यहां के हस्त निर्मित चॉकलेट हैं जो लगभग दो सौ से दो सौ पचास रुपये प्रति किलो की दर से मिलतें हैं। इनकी पैकिंग ये इस प्रकार कर देते हैं कि ये कई दिन तक खराब नहीं होते। ऐसे कई सामान हमने भी पैक कराया और यहां दिल्ली में काफी दिनों तक उसका प्रयोग किया।
दोपहर से हमें मदुराई के लिए निकलना था। अगली सुबह तक रामेश्वरम पहुँच जाना हमारा लक्ष्य था। एक ख़ुशी और एक दर्द लिए हम कोडाईकैनाल बस स्टैण्ड के लिए पैदल ही चल पड़े । बस पकड़ी और वापसी की राह पर! अभी कोडाईकैनाल छूटा ही था कि झमाझम बारिश होने लगी। अब यह सफर और भी सुन्दर एवं सुखद हो गया, शायद वर्णनातीत भी।
मैंने महसूस किया कि यहाँ की सुन्दरता में एक अध्यात्म है- एक प्राकृतिक अध्यात्म। आत्मा को , मन को और शारीर को एक दुर्लभ शांति मिलती है। बारिश होती रही , यात्रा चलती रही। इस बार मेरा मन छोटी- छोटी बातों का उल्लेख करने का नहीं हुआ। ऐसी बातें तो होती ही रहती हैं। अभी तो यहां से वापसी भी ठीक से नहीं हुई थी और मन दुबारा आने के विषय में सोचने लगा था। प्रकृति का ऐसा रूप देखकर प्रसिद्ध अंगरेजी कवि विलियम वर्ड्‌सवर्थ की पंक्तियां याद आने लगी थीं-
One impulse from a vernal wood
Can teach you more of man
Of moral evil and of good
Than all the sages can.

Sunday, 9 May 2010

हैप्पी मदर्स दे के अवसर पर !

आज के आधुनिक परिवेश में माँ की स्थिति को उकेरती मेरी पसंद की स्वरचित कविता

मैं और वो ?

मुझे एसी में
नींद आती है ,
उसके पास टेबल फेन है
जो आवाज़ करता है ।

मैं ऊंचे दाम के
जूते पहनता हूँ ,
उसके पास
बरसाती चप्पल है ।

मैं हँसता हूँ
वो रो देती है,
मैं रोता हूँ
वो फूट पड़ती है !

मैं, मैं हूँ
वो मेरी माँ है ।

[] राकेश 'सोहम'

Friday, 7 May 2010

कार्टूनिस्ट त्रयम्बक शर्मा : एक मुलाक़ात







वर्ष २००८ में नेशनल लेवल पर पांडिचेरी में 'टेन आउटस्टेंडिंग यंग इंडियन अवार्ड' से अम्मानित प्रसिद्द कार्टूनिस्ट त्रयम्बक शर्मा विगत दिनों जबलपुर आये । वे शहर में भारतीय सुरक्षा संस्थान कि उत्पादन इकाई द्वारा आयोजित कार्टून प्रदर्शनी में हिस्सा लेने आये थे ।

मैं उनसे दोपहर 1.30 मिला । वे स्थानीय पत्रकारों से घिरे बैठे थे । मुझे देखकर ख़ुशी से चहक उठे - 'राकेश जी !' मित्रवत लगभग गले मिलने की मुद्रा में हाथ मिलाया और धीरे से कान में फुफुसाए - मित्र ! सुबह से इन्होने घेर रखा है । ' मैंने अपनी विधा में कहा - आप चीज़ ही ऐसी हैं । वे ज़ोर से हंस पड़े - लो एक और आ गए आपके शहर के व्यंग्यकार ।

और वे फिर कुछ ठन्डे वगैरह का आर्डर देकर इंटरव्यू देने में व्यस्त हो गए । इसी साक्षात्कार से लिए गए कुछ अंश दे रहा हूँ ताकि हमारा इयत्ता परिवार सीसे कार्टूनिस्ट से परिचित हो सके । समस्त चित्र स्थानीय अखबारों से साभार हैं ।

श्री त्रियंबक शर्मा जी एक अखबार में मार्केटिंग executive थे । लेकिन चीजों, ख़बरों और परिस्थितियों पर कटाक्ष करने की आदत ने उन्हें कार्टून बनाने के लिए प्रेरित किया । उनका कहना है कला एक ऐसी विधा है जो इश्वर प्रदत्त होती है । जो निरंतर अभ्यास से निखरती जाती है । उन्होंने कार्टून बनाने के लिए कोई शिक्षा दीक्षा नहीं ली । उन्होंने 1991 में पहली बार एक अखबार के लिए कार्टून बनाने के शुरुआत की थी ।

उन्होंने मेरी तरफ इशारा करते हुए पत्रकारों को कहा - एक व्यंग्यकार अपने शब्दों के माध्यम से कटाक्ष करता है उसी प्रकार एक कार्टूनिस्ट आड़ी-टेढ़ी रेखाओं से कार्टून बनाकर यह काम करता है । ये जब दोनों मिल जाते हैं तो कटाक्ष और भी पैना हो जाता है ।

कार्टून के क्षेत्र में युवा कार्टूनिस्टों को प्लेटफोर्म देने के लिए उन्होंने दिसंबर 1996 से रायपुर में एक अभिनव शुरुआत की । 'कार्टून वाच ' नामक एक मासिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया । वे इसके प्रधान सम्पादक हैं। श्री शर्मा ने कार्टूनिस्टों को प्रोत्साहित करने के लिए पत्रिका 'कार्टून वाच' के माध्यम से 2003 में देश के जाने - माने और वरिष्ठ कार्टूनिस्टों के लिए 'लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड' भी शुरू किया । जिसमें अब तक आर के लक्ष्मण, सुधीर तेलंग, आबिद सुरती, प्राण, राजेन्द्र धोरबकर, एच एम् सूदन, सुरेश साबन्त और श्याम जगोतो जैसे जाने-माने कार्टूनिस्टों को सम्मानित किया जा चुका है । श्री शर्मा कहते हैं कि कार्टून के क्षेत्र में यह एक अनूठा प्रयास है ।

उनके कार्टूनों को न केवल भारत के कई स्थानों पर प्रदर्शित किया जा चुका है बल्कि विदेश में भी दो बार उनके कार्टूनों कि प्रदर्शनी लगाईं जा चुकी है । आज उनके पास अति प्राचीन कार्टून्स की मूल प्रतियां उपलब्ध हैं। लन्दन में बने भव्य कार्टून म्यूजियम से प्रभावित होकर और कालातीत हो चुके कार्टूनों को हमेशा जीवित रखने के लिए एक कार्टून म्यूजियम वे बनाना चाहते हैं जिसके प्रयास भी लगभग शुरू हो चुके हैं ।
जब वे अखबारों के लिए कुछ कार्टून बना रहे तब उन्होंने मेरी एक ताज़ी व्यंग्य शृंखला की पांडुलिपि पर सस्नेह कार्टून खींच दिया । फिर मैं विदा हुआ .

कार्टून वाच का सम्पादकीय पता है : Jr. MIG-162, Sec-3, Pt.D.D. U Nagar, Raipur. Email : cartoonwatch@gmail.com. सदस्यता शुल्क वार्षिक - 100/- आजीवन - 2000/-।

[] राकेश 'सोहम'