Wednesday, 24 March 2010

जिंदगी पा गया

रतन

तुझे पाके मैं हर खुशी पा गया
ज्यों सौ साल की जिंदगी पा गया

बहारों के सपने भी आने लगे
खिजां दूर पलकों से जाने लगे
तू है साथ हर सादगी पा गया
ज्यों सौ साल की जिंदगी पा गया

हुए साथ भंवरे भी गाने लगे
थे वीराने जो मुस्कुराने लगे
था सूना जो दिल आशिकी पा गया
ज्यों सौ साल की जिंदगी पा गया

हुए साथ तुम आई रानाइयां
अब बजने लगीं देखो शहनाइयां
जो तुम आए तो रोशनी पा गया
ज्यों सौ साल की जिंदगी पा गया

जमीं आसमां देखो मिलने लगे
मोहब्बत के जब फूल खिलने लगे
था मुरझाया गुलशन कली पा गया
ज्यों सौ साल की जिंदगी पा गया

Saturday, 13 March 2010

अहसास

रतन
क्या यही अहसास है?
आप थे जब तक साथ मेरे
एक संबल था और बल था
और था मां का भी आंचल आपसे
हमने पाई तमाम खुशियां
साथ इस अहसास के
कि पापा हैं साथ हमारे
एक इस अहसास से
दमदार हो जाते थे हम
सारी मुश्किल पल में आसान
होती थीं यह जानकर
कि हैं पापा साथ मेरे
क्या यही अहसास है?
तुम नहीं हो तो मुझे भी
घर की चिंता है नहीं
ख्वाब जितने गांव के थे
वे सभी गुम हो गए
खो गया हूं नितांत अपने आप में
फिर भी जाने बात क्या है आप में
भूलकर भी याद अक्सर आते हो
जब कभी मैं मुश्किलों में
खुद को पाता हूं घिरा
याद करके तुमको हल मिल जाता है
रूह को भी शांति मिल जाती है
मैं तुम्हारे साथ खुद को पाता हूं
क्या यही अहसास है?
दूर होकर आपसे है कुछ कमाया
खूब शोहरत पाई है
काश, आप भी इसे महसूस करते
दोगुनी होती खुशी
आपको अहसास होता और मुझे भी
पर आप हो क्षितिज के उस पार
मैं इस पार अधर में भी
मिलना होगा बाद मुद्दत
एक दिन और एक पल
शायद हो भी नहीं
फिर भी
है यही उम्मीद जाने क्यों मुझे
क्या यही अहसास है?

Wednesday, 10 March 2010

चाहिए एक ख्वाब

रतन
चाहिए एक ख्वाब
हसीन हो जो
सकून दे वो
झरनों सी झर-झर
बारिश सी झम-झम
कलियों की चटकन
पायल की छम-छम
झांझर की झन-झन
कंगन की खन-खन
हवाओं की सर-सर
फिजाओं की रौनक
हो जिसमें
चाहिए एक ख्वाब
बसे गुंजन में
रहे तन-मन में
नाचे आंगन में
महके उपवन में
सुरमई शाम में
हर एक काम में
पीपल की छांव में
सपनों के गांव में
जो ले जाए नित मुझको
चाहिए एक ख्वाब

Tuesday, 9 March 2010

विश्व महिला दिवस का अवशेष !


कल था
महिला दिवस पर
अखबारों में
विशेष,
दिवस गया
आज फिर
महिला
रह गयी
शेष !

आज से
उस कल तक
अखबारों में
बिखरेगी -
महिला, महिला
और महिला ।

महिला का शोषण,
महिला का कुपोषण ।

महिला पर अत्याचार,
महिला का बलात्कार ।

महिला का आकर्षण,
महिला का चीरहरण ।

महिला का दमन,
महिला का दहन ।

चटखारों में होगी
व्यथा,
बस और केवल बस
निर्बला होने की
कथा !!!
[] राकेश 'सोहम'

Monday, 8 March 2010

मीनाक्षी के बाद

मीनाक्षी के बाद
मंदिर से निकलते-निकलते अंधेरा हो चुका था । विद्युत प्रकाश में नहाया हुआ मीनाक्षी सुन्दरेश्वर मंदिर प्रांगण के बाहर से और भी मनमोहक लग रहा था। फिर भी हम अब बाहर की दुनिया में वापस आ चुके थे। अर्थ-व्यवहार एवं दुकानदारी के चिर परिचित क्रियाकलाप ज्यों के त्यों चल रहे थे। एक बात बताना तब मैं भूल गया था और शायद अच्छा ही हुआ था। मंदिर के प्रवेशद्वार पर ही मदुराई की मशहूर सिल्क साड़ियों की अनेक दूकानें है। ये दूकानदार मंदिर में प्रवेश से पूर्व जूता-चप्पल रखने की सुविधा मुफ्त उपलब्ध कराते हैं। मुझे उनकी इस सहृदयता पर संदेह हुआ था और मैंने इसका कारण जानना चाहा तो बड़ी मुश्किल से बताया गया कि आप वापसी में उनकी दूकान पर साड़ियाँ देख सकते है। अब जाकर इस सुविधा का अर्थ समझ में आया और तसल्ली हुई। लौटे तो साड़ियाँ देखनी ही पड़ीं।
पर मैं यह जरूर कहना चाहूँगा कि मदुराई की सिल्क साड़ियाँ वास्तव में बहुत अच्छी होती हैं। इनमें श्रम, कलाकारी एवं गुणवत्ता का अद्भुत समन्वय होता है और दिल्ली की तुलना में इनकी कीमत भी काफी तार्किक होती है। मदुराई की याद के रूप में मैंने भी धर्मपत्नी के लिए उनकी पसन्द की साड़ी खरीदी और फिर से मदुराई की गलियों का आनन्द लेने लगे।
दक्षिण भारत , खासकर मदुराई और आसपास के इलाकों में चाय बनाने का एक अलग अंदाज है। उनके इस खास अंदाज की वजह से हमारी चाय पीने की आदत कुछ और ही बढ़ गई थी। वहां के चाय बनाने वाले दूध में चाय के सत्त को इतना ऊपर से डालते और फेंटते हैं कि देखते ही बनता है। बिल्कुल कड़क चाय बनती है और गजब का ही स्वाद आता है। ऐसी बहुत सी चाय हमने पी और चाय बनते देखने का आनन्द लिया।
रात का भोजन हमने एक दक्षिण भारतीय रेस्तराँ में लेने का निर्णय किया। तमाम दक्षिण भारतीय व्यंजनों का बड़े प्लेट में केले के गोल-गोल कटे पत्तों पर परोसा जा रहा था। वहां केले के पत्ते पर भोजन परोसने का तात्पर्य शुद्धता ही नहीं अपितु सम्मान देना भी होता है। हमारे समूह में अधिकांशतः बच्चों ने दक्षिण भारतीय व्यंजनो का जमकर आनन्द लिया।
अगले दिन हमें कोडाईकैनाल जाना था। इण्टरनेट एवं कुछ अन्य माध्यमों से मैंने कामचलाऊ जानकारी इकठ्ठा कर ली थी। दूरी ज्यादा नहीं है। लगभग एक सौ बीस किलोमीटर है और मदुराई के बस स्टैंड से तमिलनाडु राज्य परिवहन की बसें जाती रहती हैं । मित्र ने कहा कि कुछ और जानकारी ले लेते हैं और परिवार हम निकट स्थित होटल में छोड़कर जानकारी लेने निकल पड़े। इधर-उधर घूमते-घामते एक ट्रवेल एजेण्ट से हम टकरा ही गए। बड़े सम्मान से वह हमें अपने आफिस ले गया और बताया कि उसकी पर्यटक बसें सुबह आठ बजे तक कोडाईकैनाल के लिए निकलती हैं और सभी दर्शनीय स्थलों का भ्रमण कराकर सायं आठ बजे तक वापस मदुराई छोड़ देती हैं। मैं कभी भी इन व्यवसाइयों की मंशा पर भरोसा नहीं कर सका हूँ। ये कौन सी गोली दे रहे हैं और कितना झूठ बोल रहे हैं ये भगवान भी नहीं जान सकता ! खैर , हमें तुरन्त वापस नहीं लौटना था। कम से कम एक रात वहां रहना था। ये क्या कि पैसे भी खर्च करिए, भागकर जाइए भी और कुछ ठीक से देख भी न पाइए। गोया कबड्डी पढ़ाने गए हों! उसके नियमानुसार आने जाने और साइट सीइंग का किराया २५०/- प्रति सीट था और केवल जाने एवं कुछ स्थलों को देखकर उतर जाने का किराया १५०/-। मैंने अंदाज लगाया था कि मदुराई से कोडाईकैनाल का राज्य परिवहन की बस का किराया दूरी के हिसाब से लगभग 70रु तो होगा ही । एजेण्ट ने 80रु बताया था। इस प्रकार इसकी बस में जाने से कोई विशेष नुकसान नहीं और वह भी हमें होटल से उठाएगा। पर ये तो बाद में पता चला कि तमिलनाडु परिवहन की सामान्य बसों का किराया बेहद कम है- केवल 28 पैसे प्रति किलोमीटर और इस प्रकार मदुराई से कोडाईकैनाल का किराया 40रु प्रति व्यक्ति है।
अगली सुबह थोड़ी बहुत किचकिच के बाद बस वाले ने हमारी यात्रा शुरू करवा दी । मदुराई एक बड़ा शहर है, इसका बोध हमें बस वाले ने जगह- जगह से सवारियां उठाने के क्रम में करा दिया । मदुराई से बाहर निकलते ही राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 7 (वाराणसी से कन्याकुमारी, जो भारत का सबसे लम्बा राजमार्ग है ) पर प्रकृति की हरीतिमा ने हमारा मन मोहना शुरू कर दिया । कुछ दूर और चलकर जब बस ने मुख्य मार्ग को छोड़ कोडाईकैनाल की तरफ पतली सड़क पर मोड़ लिया तो मानो प्रकृति अपने सुन्दरतम रूप में आ गई!नारियल के हरे-भरे बाग, सरसराती हवा और हल्की- हल्की फुहार ने जैसे जीवन का वास्तविक सन्देश दे दिया । एक से एक रूप, अनूठा सौन्दर्य और खो जाने की ललक ने जैसे किसी स्वाप्न लोक में पहँुचा दिया। मन संगीतमय होने लगा और बरबस ही कुछ पंक्तियाँ उभरने लगीं । मैंने डायरी ली और उस यथार्थ सौन्दर्य को शब्द बद्ध करने लगा । आज वह पृष्ठ मेरे सामने है-
लम्बी चिकनी
सलोनी
सड़क पर भागते हम ,
दोनों तरफ फैले
नारियल के ये हरे-हरे पेड़
दोनों तरफ उठी हुई पहाड़ियाँ
आकार में जैसे
किसी सलोनी नवयुवती के
उन्नत उरोज,
बस देखते ही रह जाते हैं
हम ही नहीं
जैसे ये नारियल के पेड़ भी
निहार रहे हों
उसका यौवन
आँखें फाड़
और उस सौन्दर्य के आगे
महसूस कर रहे हों छोटा
अपने आप को।
फिर मैं तो सामान्य सा मानव
और क्या करता
महसूस करने के सिवा ?
आखिर मुझे भी तो मानव बने रहना है
और सौन्दर्य को महसूस करना
मनुष्य के अस्तित्व के लिए
आवश्यक है ,
चाहे वह सौन्दर्य प्रकृति का हो
या किसी युवती का!
खिड़की की साइड में बैठी हुई पत्नी
बहुत सुन्दर लग रही है
आज,
और मैं सोच रहा हूँ
कि काश
ये मेरी प्रेमिका होती!
कितना साम्य होता
इस प्रकृति से
क्योंकि दोनों ही
समर्पित हैं
पूरी तरह मेरे लिए
पर मैं
उनमें न जाने क्या और खोजता हूँ
और कुछ चोरी करना चाहता हूँ
केवल अपने लिए
इस प्रकृति से !

Monday, 1 March 2010

होली के बहाने न्यू मीडिया की अपार शक्ति का बखान कर गये आलोक मेहता

“न्यू मीडिया” से बौखालाये और होलियाये आलोक मेहता ने होली के बहाने इस मीडिया की जोरदार तरीके से ऐसी की तैसी करने की कोशिश की। इसके लिये तमाम तरह के तर्क और कुर्तक गढ़े, और इस न्यू मीडिया की लानत-मलानत में कोई कोर कसर नहीं छोड़ा, जो उनके लिए स्वाभाविक था। न्यू मीडिया के खिलाफ वह पूरी तरह से कुर्ता धोती फाड़ो वाले अंदाज में थे। उनके लिए मौका भी था और दस्तुर भी। लेकिन हुड़दंगई के मूड में आने के बाद जाने या अनजाने में उन्होंने न्यू मीडिया की अपार शक्ति का भी बखान करते चले गये। और साथ में उन्हें इस बात का मलाल भी था कि न्यू मीडिया पुरातन मीडिया के मुकाबले सेंसर की परिधि से बाहर है।

उन्हीं के शब्दों में, “ब्लॉग प्रभुओं का एक शब्द, अमेरिकी, चीनी राष्ट्रपति या ब्रिटिश प्रधानमंत्री तक, नहीं कटवा सकता है...खासकर हिंदी ब्लॉग पर उनका बस ही नहीं चल सकता...” जिस स्वतंत्रता को पाने में पुरातन मीडिया को एड़ी चोटी का बल लगाना पड़ा है (और अभी भी स्वतंत्रता के क्लाइमेक्स पर नहीं पहुंच सका है), उसे तकनीकी क्रांति की बदौलत न्यू मीडिया ने सहजता से प्राप्त कर लिया है। इसे एक उदाहरण से समझना आसान होगा। अखबार “अमृत बाजार पत्रिका” का प्रकाशन क्षेत्रीय भाषा में बंगाल से होता था। सर एस्ले एडन उन दिनों बंगाल के लेफ्टिनेंट गर्वनर थे। जोड़ घटाव करके उन्होंने बाबू क्रिस्टो दास को “हिन्दू पैट्रियोटिक” का संपादक दिया, ताकि उस अखबार को वह अपने तरीके से नचा सके। उस समय “अमृत बाजार पत्रिका” के संपादक बाबू शिशिर कुमार सरकारी महकमों में जारी धांधले बाजी और नील-खेती के नकारात्मक पक्षों पर बेबाक तरीके से अपने अखबार में लिख रहे थे। उस समय आज के न्यू मीडिया की तरह प्रिंट मीडिया कई मायनों में स्वतंत्रता का भरपूर उपभोग कर रहा था। भारत में काम करने वाले अंग्रेज संपादकों और पत्रकारों की वजह से अखबारों पर हुकुमत की पकड़ थोड़ी ढीली थी। बाबू शिशिर कुमार को अपने पक्ष में मिलाने के लिए एस्ले साहब ने सम्मान के साथ उन्हें अपने पास बुलाया बोला, “मैं, आप और क्रिस्टो दास मिलकर बंगाल का शासन चलाएंगे। मेरे निर्देश में अपना अखबार चलाने के लिए किशोर दास तैयार हो गये हैं। आपको भी यही करना होगा। जो सहायता मैं हिंदू पैट्रियोट को देता हूं वह आपको भी मिलेगा। और सरकार के खिलाफ कुछ भी प्रकाशित करने से पहले उस आलेख की प्रति आपको मेरे पास भेजनी होगी। इसके बदले सरकार बहुत बड़ी संख्या में आपका अखबार खरीदेगी और सरकारी मामलात में बाबू क्रिस्टो दास की तरह मैं आपकी राय लेता रहूंगा।”

उन दिनों बाबू शिशिर कुमार की माली हालत ठीक नहीं थी। वैसे भी इस तरह के आफर पर अच्छे-अच्छे संपादकों के लार टपकने लगते, (होली टिप्पणी- पता नहीं आलोक मेहता ऐसी स्थिति में क्या करते !) लेकिन बाबू शिशिर कुमार दूसरी मिट्टी के बने हुये थे। इस शानदार आफर के लिए एस्ले साहब को धन्यवाद देते हुये उन्होंने कहा, “जनाब इस धरती पर कम से कम एक ईमानदार पत्रकार को तो रहना ही चाहिये।” एस्ले साहब पर गुस्सा का दौरा पड़ गया और फूंफकारते हुये बोले, “आपको पता है कि आप किससे बात कर रहे हो। इस सूबे का प्रमुख होने के नाते मैं किसी भी दिन आप को जेल की हवा खिला सकता हूं।”
यह कोरी भभकी नहीं थी। इसी घटना से वर्नाकूलर प्रेस एक्ट की नींव पड़ी। एस्ले साहब लार्ड लिटन से मिले और एक ही बैठक में वर्नाकूलर प्रेस एक्ट लाने की तैयारी हो गई। इसका मुख्य उद्देश्य अमृत बाजार पत्रिका के मुंह पर ताला लगाना था। (होली टिप्पणी- लगता है न्यू मीडिया को लेकर आलोक मेहता भी एस्ले साहब की मानसिकता में जी रहे हैं, वैसे फगुहाट का रंग भी हो सकता है।) लेकिन बाबू शिशिर कुमार एस्ले साहब से चार कदम आगे थे। 1878 में इस एक्ट के लागू होने के पहले ही उन्होंने अमृत बाजार पत्रिका को अंग्रेजी भाषा में तब्दील कर दिया, और लार्ड लिटन के वर्नाकूलर प्रेस एक्ट को ठेंगा दिखाते हुये निकल गये, क्योंकि अंग्रेजी अखबार इसके जद से बाहर था।
कहने का अर्थ यह है कि जिस स्वतंत्रता के लिए बाबू शिशिर कुमार को अपने अखबार की भाषा बदलनी पड़ गई उसका मजा न्यू मीडियो को ऐसे ही मिल रहा है। अमेरिकी, चीनी राष्ट्रपति या ब्रिटिश प्रधानमंत्री जब इसके सामने विवश है तो क्या यह एस्ले साहब की मानसिकता की स्वाभाविक हार नहीं है ? एस्ले साहब तो सरकारी अधिकारी थे, उनका इस तरीके से सोचना लाजिमी था, वो भी एक गुलाम देश के बारे में, लेकिन अपार स्वतंत्रता यंत्र पर होली हुड़दंगई करना एक संपादक के हाइपोक्रेसी का ही खुलासा करता है। उन्हें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का जयगान करने वाला काफिला नहीं दिखाई दे रहा है, बस चंद पोस्ट पढ़कर अपना मनमाफिक निष्कर्ष निकाल कर खुद की पीठ थपथपाने में लगे हैं। दोष उनका नहीं है तात्कालिक लाभ को दांत से पकड़ने वाले लोगों की दूरदृष्टि वैसे ही कुंद पड़ जाती है। आने वाले 20-25 सालों में जब बिजली और नेट घर-घर पहुंच जाएगा तब इस तरह के क्रिएटिव लोगों को अपने वजूद को बचाने के लिए इसी न्यू मीडिया के शरण में आना पड़ेगा।
न्यू मीडिया के प्रति विकसित होने वाली एस्लेवादी मानसिकता को यदि आप लोग रात में अगजा में नहीं डाले हैं तो सुबह उसे जरूर डाल दें। और फिर उसमें आलू पका के खाइये और होली के रंग में सराबोर हो जाइये....

न्यू मीडिया हो गई सस्ती
छा गई सब पे मस्ती
बोलो सब भोल बम बम
लिखो खूब, नाचो छम छम
भांग-धतूरा होवा ना कम
छेड़ो ना बेसुरा सरगम
जोगिरा सरररर, जोगिरा सरररर