Thursday, 28 January 2010

देवदर्शन टैक्स इन इंडिया

-हरिशंकर राढ़ी
आज की ताजा खबर यह है कि शिरडी स्थित श्री साईं भगवान के दर्शन के लिए अब शुल्क लगेगा। प्रातःकालीन आरती के लिए 500रु, मध्याह्न की आरती के लिए 300रु और सामान्य दर्शन के लिए 100रु। इसमें कुछ शर्तें भी शामिल हो सकती हैं, टर्म्स एण्ड कंडीशन्स अप्लाई वाली ट्यून! परन्तु टैक्स तो लगेगा ही लगेगा!
गत सितम्बर माह में मैं दक्षिण भारत की यात्रा पर गया था जिसका वृत्तान्त मैं ब्लॉग पर 'पोंगापंथ अपटू कन्याकुमारी' शीर्षक से लेखमाला के रूप में दे रहा हूँ। कुछ कड़ियाँ आई थीं और उस पर हर प्रकार की प्रतिक्रिया भी आई थी। इस वृत्तान्त में मंदिरों में धर्म के नाम पर हो रहे आर्थिक शोषण को सार्वजनिक दृष्टि में लाना मेरा प्रमुख उद्देश्य रहा। बहुत समर्थन मिला था मेरे विचार को। परन्तु कुछ लोगों ने इसे जायज ठहराने का भी प्रयास किया। उनका कहना था कि कुछ शुल्क निर्धारित कर देने से मंदिर के रखरखाव एवं कर्मचारियों के जीवन यापन में मदद मिलेगी और पंडों की लूट से छुटकारा भी मिलेगा। वैसे इनके इस तर्क से पूर्णतया असहमत भी नहीं हुआ जा सकता। पर, यह शुल्क कितना हो, यह भी महत्त्व पूर्ण है।
अब आज साईं बाबा के भक्तों पर गाज गिर ही गई।वैसे भी आजकल धर्म से बड़ा उद्योग शायद ही कोई हो। नाना प्रकार के बाबा जी इस कलयुग में प्रकट हो भक्तों का उद्धार कर रहे हैं और उनका जीवन सफल बना रहे हैं!ऐसी स्थिति में अगर दीनहीनों के श्रद्धास्थल साईं बाबा के संरक्षकों ने दर्शन शुल्क लगा दिया तो समयानुकूल ही है।
समस्या इस देश की मानसिकता को लेकर है। ईश्वर है कि नहीं, इस बहस का तो कोई अन्त हो ही नहीं सकता। परन्तु देश की अधिकांश जनता ईश्वर में विश्वास रखती है। सबके अपने -अपने ईश्वर हैं, अपने-अपने भगवान। जब एक सामान्य भारतीय हर ओर से थकहार जाता है तो ईश्वर के सहारे ही अपने जीवन की नैया छोड़ निराशा और आत्महत्या के भंवर से पार निकल जाता है। गलती चाहे खुद की हो, और कितनी बड़ी क्यों न हो, ईश्वर का दिया दंड समझ झेल जाता है और ईश्वर के बहाने अपनी जिन्दगी ( जो मनुष्य को जनसंख्या मानने वाले की नजर में कुछ नहीं है, बस एक आंकड़ा है और बड़े लोगों के लिए भीड़ बढ़ाने का माध्यम मात्र है) जी लेता है। कभी- कभी दो चार पैसे बच जाएं तो निकट के किसी देवालय में जाकर या कुम्भ नहाकर स्वयं को धन्य एवं ईश्वर का कृपापात्र समझ लेता है। चार धाम यात्रा या एक सुदूरवर्ती भक्त के लिए शिरडी साईंधाम की यात्रा सामान्यतः स्वप्न बनकर ही रह जाती है।अब ऐसे में साईंबाबा मंदिर प्रबन्धन ने क्या संदेश देना चाहा है, यह तो समझ के बाहर है।
मैंने सुना है कि शिरडी साईं बाबा मंदिर की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी है। वहां वैसे ही लाखों का चढ़ावा चढ़ जाता है। यात्राएं तो बहुत की मैंने किन्तु दुर्भाग्य से अभी तक शिरडी धाम के दर्शनों के लिए नहीं जा पाया। हाँ, भविष्य की योजनाओं में शामिल जरूर है यह यात्रा। अब अगर मैं शिरडीधाम की यात्रा सपरिवार करूँ और प्रातःकालीन आरती देखने की इच्छा न रुके तो मैं अपने परिवार (पति-पत्नी और दो बच्चों) के लिए पांच सौ प्रति व्यक्ति की दर से दो हजार का टिकट लूँ तब जाकर जन -जन की आस्था के केन्द्र साईं महराज की आरती देख सकूँ!
दोष केवल मंदिर व्यवस्थापकों का नहीं , पूरी व्यवस्था का है। देश में बढ़ते व्यवसायीकरण का है। कोई पर्व हो , त्योहार हो या व्रत हो, उद्योग और लालच हर जगह हावी है। पैसे के बल पर ही आदमी ‘महान‘ बन रहा है। धार्मिक ठेकेदारों को मालूम है कि तीर्थयात्रा अब पर्यटन में बदल चुकी है और अब सभी धामों में पैसे वाले ही लोग आते हैं और धर्म और श्रद्धा को पैसे से तौलते हैं । यह सब अब खूब बिकता है तो क्यों न बेचें ?क्या करें गरीबों की श्रद्धा का ?समस्या तो श्रद्धा को ही लेकर है। श्रद्धा गरीबी की समानुपाती होती है। सामान्य, हतभाग्य एवं दीन-दुर्बल की आस्था ही उसके लिए ईश्वर होती है। जितनी श्रद्धा ऐसे लोगों की साईं बाबा में है, उतनी ही साईं बाबा की ऐसे दीन हीन लोगों में थी। पर ‘उदारीकरण‘ के इस आर्थिक युग में बिकने वाली चीज क्यों न बेचें, भले ही वह भगवान या साईंबाबा क्यों न हों ?

Friday, 22 January 2010

खुद को खोना ही पड़ेगा

लंबे समय से ब्लाग पर न आ पाने के लिए माफी चाहता हूं। दरअसल, हमारे चाहने भर से कुछ नहीं होता। इसके पहले जब मैंने अपनी गजल पोस्ट की थी, उस पर आपने बहुत सी उत्साहजनक टिप्पणियां देकर मुझे अच्छा लिखने को प्रेरित किया था। आज जो गजल पेश कर रहा हूं, यह किस मनोदशा में लिखी गई, यह नहीं जानता। हां, यहां निराशा हमें आशा की ओर ले जाते हुए नहीं दिखती...?-

अब तो हमको दूर तक कोई खुशी दिखती नहीं
जिंदा रहकर भी कहीं भी जिंदगी दिखती नहीं

हर किसी चेहरे पे हमको दूसरा चेहरा दिखा
एक भी चेहरे के पीछे रोशनी दिखती नहीं

जिनको आंखों का दिखा ही सच लगे, मासूम हैं
बेबसी झकझोर देती है, कभी दिखती नहीं

खुद को खोना ही पड़ेगा प्यार पाने के लिए
देखिए, मिलकर समंदर से नदी दिखती नहीं

खुद को खोना ही पड़ेगा प्यार देने के लिए
आंख ही सबकुछ दिखाती है, अजी दिखती नहीं।

खुद को खोना ही पड़ेगा

लंबे समय से ब्लाग पर न आ पाने के लिए माफी चाहता हूं। दरअसल, हमारे चाहने भर से कुछ नहीं होता। इसके पहले जब मैंने अपनी गजल पोस्ट की थी, उस पर आपने बहुत सी उत्साहजनक टिप्पणियां देकर मुझे अच्छा लिखने को प्रेरित किया था। आज जो गजल पेश कर रहा हूं, यह किस मनोदशा में लिखी गई, यह नहीं जानता। हां, यहां निराशा हमें आशा की ओर ले जाते हुए नहीं दिखती...?-

अब तो हमको दूर तक कोई खुशी दिखती नहीं
जिंदा रहकर भी कहीं भी जिंदगी दिखती नहीं

हर किसी चेहरे पे हमको दूसरा चेहरा दिखा
एक भी चेहरे के पीछे रोशनी दिखती नहीं

जिनको आंखों का दिखा ही सच लगे, मासूम हैं
बेबसी झकझोर देती है, कभी दिखती नहीं

खुद को खोना ही पड़ेगा प्यार पाने के लिए
देखिए, मिलकर समंदर से नदी दिखती नहीं

खुद को खोना ही पड़ेगा प्यार देने के लिए
आंख ही सबकुछ दिखाती है, अजी दिखती नहीं।

Wednesday, 20 January 2010

एक मगही गीत

गीतकार -पंडित युदनंदन शर्मा

सब कोई गंगा नेहा के निकल गेल,
आ तू बइठल के बइठले ह।
ढिबरी भी सितारा हो गेल,
आ ढोलकी भी नगाड़ा हो गेल,
आ तू फुटल चमरढोल के ढोले ह।

झोपड़ी भी अटारी हो गेल,
कसैली भी सुपारी हो गेल।
कुर्ता भी सफारी हो गेल,
छूरी भी कटारी हो गेल,
आ तू ढकलोल के ढकलोले ह।

ढकनी भी ढकना हो गेल,
कोना भी अंगना हो गेल।
साजन भी सजना हो गेल,
विनय भी बंदना हो गेल,
आ तू बकलोल के बकलोले ह।।

Monday, 18 January 2010

महंगाई को लेकर भूतियाये लालू

आलोक नंदन
लालू यादव महंगाई को लेकर भूतियाये हुये हैं। 28 जनवरी को चक्का जाम आंदोलन का आह्वान करते फिर रहे हैं। (यदि बिहार में इसी तरह से ठंड रही तो उनका यह चक्का जाम आंदोलन वैसे ही सफल हो जाएगा)। बिहार में जहां-तहां जनसभा करके लालू यादव लोगों को ज्ञान दे रहे हैं कि जब जब कांग्रेस सत्ता में आई है, तब तब कमरतोड़ महंगाई लाई है। घुलाटीबाजी में लालू का जवाब नहीं। जब तक कांग्रेस के सहारे इनको सत्ता का स्वाद मिलता रहा तब तक कांग्रेस के खिलाफ एक भी शब्द नहीं बोले। वैस लालू यादव ने अपना पोलिटिकल कैरियर कांग्रेस के खिलाफ भाषणबाजी करके ही बनाया था। राजनीति में परिवारवाद के खिलाफ थूथन उठाकर खूब बोलते थे। सत्ता में आने के बाद इन्होंने राजनीति में जो परिवारवाद लाया, उस पर तो मोटा मोटा थीसीस तैयार किया जा सकता है।
दोबारा सत्ता में आने का सपना देखने वाले बड़बोले लालू यादव लोगों से कहते फिर रहे हैं कि वे जब सत्ता में आएंगे फूंक मारकर महंगाई को उड़ा देंगे, जैसे महंगाई कोई बैलून का गुब्बारा है। वैसे बोलने में क्या जाता है, मुंह है कुछ भी बोलते रहिये। प्रोब्लम होता है बंद से।
बंद का लफड़ा भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों ने अंग्रेजों के खिलाफ शुरु किया था। चूंकि उस समय शासक अंग्रेज थे, इसलिये बंदकारी भाई लोग खुद अपना काम बंद करते थे और दूसरों को काम बंद करने के लिए प्रेरित करते थे। अंग्रेजों का डंडा बंदकारियों पर बरसने के लिए हमेशा तैयार रहता था। स्वतंत्रता के बाद बंद का कारोबार छुटपुट तरीके से चलता रहा। जेपी के समय यह थोड़ा व्यापक रूप से सामने आया। लालू यादव जेपी के चेला थे, (बाद में भले ही जेपी से सिद्दांतों को घोरकर पी गये) अत: बंद के तौर तरीको को कुछ ज्याद ही आत्मसात कर लिया। बिहार में सत्ता में आने के बाद भी गरीब रैली और गरीब रैला कराते रहे। सरकारी तंत्र का इस्तेमाल जमकर किया। स्मरण करने योग्य है कि गरीब रैली और रैला के दौरान पूरे बिहार में स्वत ही बंद जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाती थी। राजधानी पटना का तो कबाड़ा ही निकल जाता था। अब सत्ता से बाहर धकियाये जाने के बाद एक बार फिर वह बंद- बुंद की बात कर रहे हैं।
सवाल उठता है कि क्या बिहार को बंद कर देने से महंगाई पर रोक लग जाएगी ? बंद के दौरान तमाम तरह के दुकानदारों के साथ जोर जबरदस्ती आम हो जाता है। गांधी जी का बंद स्वप्रेरित होता था। यानि की हम काम नहीं करेंगे। जबकि विगत में देख चुके हैं कि लालू यादव का रेलम रेला में खूब हुड़दंगई होता रहा है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि जनतंत्र में अपनी बात को कहने के लिए बंद एक स्वाभाविक हथियार है। जनतंत्र का मैकेनिज्म यूरोप और अमेरिका में काफी मजबूत है। अपनी बातों को कहने के लिए लोगों को बंद का सहारा नहीं लेना पड़ता है। हाथों में बैनर लेकर लोग सड़क पर उतर आते हैं, और वहां की सरकारें भी इस तरह के प्रदर्शनों को गंभीरता से लेती हैं। सामान्य जनजीवन को डिस्टर्ब नहीं किया जाता है। अचानक फूट पड़ने वाली स्वाभाविक हिंसा की बात अलग है।
यह कितना बड़ा विरोधाभास है कि आमजनता के हित के नाम पर आम जनता को ही परेशान किया जाता है। लालू यादव की शैली अब पुरानी पड़ चुकी है, बिहार के लोगों की मानसिकता में निखार आया है। महंगाई को लेकर ‘कामन विल’ चिंतित है, लेकिन इसके लिए गैरजरूरी तरीकों को मान्यता देने के लिए तैयार नहीं है। राजधानी पटना से इतर दूर दराज के गांवों में कंपकंपी के बावजूद लालू के जनसभाओं में लोगों की भीड़ तो जुट रही हैं, लेकिन साथ ही बंद के औचित्य पर चौतरफा आलोचनात्मक तरीके से चर्चा भी हो रही है। लोगबाग लालू यादव को सुन तो रहे हैं, लेकिन इस बंद में सक्रिय भागीदारी से बचने की बात भी कर रहे हैं। बिहार की राजनीति पर नजर रखने वाले लाल बुझकड़ों का कहना है कि महंगाई को लेकर लालू यादव अपने कार्यकर्ताओं को फेरते रहने की कोशिश कर रहे हैं ताकि आगामी चुनाव उनका कदम ताल बन सके।
इस बार लालू यादव का नारा है, रोको महंगाई, बांधों दाम नहीं तो होगा चक्का जाम। अब चक्का जाम करने का अर्थ होगा सीधे-सीधे मजदूर और दैनिक रोजगार करने वाले लोगों की पेट पर लात मारना। सिर्फ पटना शहर में रिक्शेवाले और आटोवाले बहुत बड़ी तादाद में है। आटोवाले तो लोकल पटना के ही हैं, जबकि अधिकतर रिक्शेवाले दूर दराज के गांवों और कस्बों से आये हुये हैं। अब यदि चक्का जाम होता है तो इनकी दिहाड़ी निश्चित रूप से मारी जाएगी। उस दिन कमाई तो दूर इन्हें अपनी जेब से खुराकी की व्यवस्था करनी पड़ेगी। अपने घर का आंटा गिल करके उन्हें दिन पर बैठना पड़ेगा। कमोबेश पूरे बिहार के प्रत्येक जिलों और कस्बों की स्थिति यही है। इसी तरह सब्जी और खाने पीने की अन्य चीजें भी राजधानी पटना में विभिन्न वाहनों से पहुंचती हैं। बंद के दौरान राजद कार्यकर्ता कितने अनुशासित रह पाते हैं यह तो समय ही बताएगा। अब सवाल उठता है कि यह बंद किसके लिए है? इसका नकारात्मक असर सीधे आम जनता पर देखने को मिलेगा।
लालू बोल रहे हैं कि भूख से अब तक सूबे में पांच सौ लोगों ने दम तोड़ दिया है। थोड़ी देर के लिए लालू के इस आंकड़े पर यकीन करने के साथ ही उनसे यह पूछा जा सकता है कि क्या आप बंद करके इस आंकड़े में इजाफा करने की जुगत में है? इस बंद से निसंदेह लालू के कीचन पर कोई असर नहीं पड़ेगा। उनके पत्नी और बाल बच्चों को समय पर ब्रेकफास्ट, लंच और डिनर मिल जाएंगे। लेकिन पटना सहित विभिन्न जिलों में दिहाड़ी मजदूरों की स्थिति एक दिन के लिए जरूर हिल जाएगी।
इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि महंगाई एक राष्ट्रीय मुद्दा बन चुका है। इस मुद्दे पर विभिन्न राजनीतिक दलों को पूरा हक है कि वे सरकार को घेरे। लेकिन सरकार को घेरने के चक्कर में जनता की ऐसी की तैसी करने का अधिकार किसी को नहीं है। केंद्र और राज्य सरकार को जनविरोधी बताने वाले लालू यादव खुद जनविरोधी तरीके अख्तियार कर रहे हैं। बदलते समय की मांग है कि ‘राजनीति के लिए राजनीति’ की फिलासफी अब नहीं चलेगी। सही मुद्दों को उठाने का तरीका भी सही होना चाहिये। बंद की प्रवृति को नकारना ही होगा, भले ही इस बंद की भागीदारी का आकार कुछ भी क्यों न हो।













Friday, 15 January 2010

पोंगापंथ अपटु कन्याकुमारी -5

( मेरी यात्रा मदुराई तक पहंची थी, उसका वर्णन मैंने किया था। उसके बाद वास्तविक यात्रा तो नहीं रुकी किन्तु उसका वर्णन रुक गया।इस बीच में कुछ तो इधर - उधर आना जाना रहा और कुछ कम्प्यूटर महोदय का साथ न देना। पहले विण्डोज उड़ीं और फिर लम्बे समय तक इण्टरनेट नहीं चला! अब लगता है कि सब कुछ ठीक है और मैं फिर यात्रा पर निकल चुका हूँ , इस बार आपके साथ और यात्रा पूरी करने का पूरा इरादा है।)

मदुराई पहुंचे तो दोपहर के करीब बारह बज रहे थे। लगभग तीन सौ किमी की दूरी तय करने में करीब साढ़े सात घंटे लग गए जबकि ट्रेन एक्सप्रेस थी, खैर मुझे भारतीय रेल का चरित्र ठीक से मालूम है इसलिए हैरानी की कोई बात नहीं लगी। वहां पहुचे तो हम सभी थके थे , रात के जागरण का असर साफ दिख रहा था। अब हमारी प्राथमिकता थी कि कोई होटल लें और कुछ देर विश्राम करें । बाहर ऑटो वालों से बात हुई। मित्र ने कहा कि पहले चल के होटल देख आएं और फिर परिवार को ले जाएं। रात की घटना से सीख लेकर मैं उबर चुका था और अब गलती दुहराने की मूर्खता नहीं कर सकता था। अतः इस प्रस्ताव को मैंने सिरे से नकार दिया।ऑटो वाले से बात की और मीनाक्षी मंदिर के पास ही जाकर एक होटल में ठहर गए। नहा-धोकर ताजा होने के बाद ही हमारा अगला कार्यक्रम हो सकता था।मदुराई के बारे में बहुत कुछ सुन रखा था और आज यह सोचकर मैं बहुत खुश था कि भारत के एक अत्यन्त प्राचीन नगर पहुँच पाने का सौभाग्य प्राप्त हो चुका था । थोड़ी देर के आराम के बाद हम मीनाक्षी मंदिर के दर्शन के लिए चल दिए।

मदुराई भारतवर्ष के प्राचीनतम नगरों में एक है। दक्षिण भारत का यह सबसे पुराना नगर है और विशेष बात तो यह है कि अभी भी इसकी प्राचीनता बरकरार है। वैगाई नदी के किनारे बसे इस नगर की ऐतिहासिकता और सौन्दर्य अक्षुण्ण और अनुपम है। इस नगर की संस्कृति और सभ्यता सदियों पुरानी है । प्राचीन विश्व के अतिविकसित यूनान और रोम से इसके व्यापारिक संबंध थे, मेगास्थनीज भी तीसरी सदी (ई0पू0) में मदुराई की यात्रा पर आया था।मदुराई संगम काल के समय से एक स्थापित नगर है , पहले पांड्य वंश की राजधानी रहा और चोल शासकों ने दसवीं सदी में इस पर आधिपत्य स्थापित कर लिया था।मदुराई मूलतः मीनाक्षी मंदिर के कारण टेम्पल टाउन के नाम से जाना जाता है। यह शहर मंदिर के चारो ओर बसा हुआ है।मंदिर के चारो ओर आयताकार रूप में सड़के बनी हुई हैं। इन गलियों के नाम तमिल महीनों के नाम पर रखे गए हैं।मीनाक्षी मंदिरजहाँ हम रुके थे , उस होटल से मीनाक्षी मंदिर पैदल पाँच मिनट का रास्ता था। हमें यह पता चला कि मंदिर सायं पांच बजे दर्शनार्थ खुलता है। अस्तु हम यथासमय मंदिर के लिए निकल पड़े।मंदिर का गोपुरम मदुराई के किसी भी कोने से दिख जाए, इतना विशाल है। इस पर दृष्टि पड़ते ही मन मुग्ध हो गया । मंदिर में चारों दिशाओं से प्रवेश के लिए चार गोपुरम (प्रवेश द्वार) है। हम पूर्वी गोपुरम से प्रवेश कर रहे थे और यह गोपुरम सबसे शानदार है। मंदिर में प्रवेश से पूर्व सामान्य सुरक्षा जांच होती है किन्तु कोई खास प्रतिबंध मुझे नहीं दिखा। हमें मोबाइल फोन अंदर ले जाने से भी नहीं रोका गया। मंदिर की विशालता में एक बार अलग हो जाने पर यही मोबाइल काम आया।

मंदिर में एक सामान्य सी लाइन दिख रही थी, कुछ खास समझ में न आने कारण हम आगे बढ़ गए, इस विचार से कि अन्दर जाकर व्यवस्था के अनुरूप हम भी दर्शनार्थ पंक्तिबद्ध हों। कुछ अपने स्तर पर करें , इससे पूर्व ही कोई मंदिर कर्मचारी ( जो हमारे रंगरूप और शारीरिक भाषा से समझ गया था कि हम उत्तर भारतीय हैं ) भागा हुआ आया और निर्देश दिया कि अगर हमें दर्शन करना है तो निकट ही बने बूथ से प्रति व्यक्ति पंद्रह रुपये की दर से टिकट लेना होगा। जहां हम खड़े थे , वहां से प्रवेश के लिए कोई मार्ग नहीं था। लाइन हमारे सामने थी, पर उसकी उत्पत्ति कहाँ से थी इसका हमें पता नहीं चल पा रहा था। भाषा की समस्या तो थी ही, तथाकथित गाइड न तो ठीक से हिन्दी बोल पा रहा था और न ढंग की अंगरेजी ! अंततः हमने टिकट ले ही लिया। अब हमें एक बैरीकेड खोलकर एक अन्य लाइन का सीधा रास्ता दे दिया गया। दर असल यह विशेष लाइन थी जो या तो पेड थी या फिर वीआइपी॰। अब तो हम क्षण भर के अंदर मीनाक्षी देवी की प्रतिमा के सामने थे।

सामान्यतः कोई भी पंद्रह रुपये की व्यवस्था पर प्रायः खुश होता। दर्शन कितनी जल्दी मिल गए! पर मेरी भी कुछ मानसिक समस्याएं हैं। पता नहीं आज तक ईश्वर के दरबार में यह वीआइपीपना मुझे रास नहीं आया। मैं सोचता ही रह गया कि इस तरह की विशेष सुविधा का लाभ हम कितनी जगहों पर लेते रहेंगे ? पैसे के बल पर और पैसे के लोभ में इस तरह का व्यापार हम कहाँ- कहाँ करते रहेंगे ? क्या ऐसा नहीं हो सकता कि जहां हम आस्था , विश्वास और श्रद्धा का भाव लेकर जाएं , वहाँ तो कम से कम अपने को एक सामान्य मनुष्य मान लें ! क्या ऐसी व्यवस्थाएं नितान्त जरूरी हैं ?क्या मंदिर प्रबन्धन एक समानता का नियम नहीं बना सकता ? क्या आर्थिक एवं सामाजिक महत्त्व का बिगुल हम यहाँ भी बजाते रहेंगे ? दर्शनोपरान्त मुझे मालूम हुआ था कि मेरे सामने जो लाइन थी वह सामान्य अर्थात निश्शुल्क लाइन थी और वह पीछे से आ रही थी। बस, जरा देर लगती है, और मैं विशेष लाइन में लगने के अपराधबोध से जल्दी मुक्त नहीं हो पाया!

Saturday, 2 January 2010

नई शाम

नव वर्ष की शाम में डूबे
कितने युवा जाम में डूबे ।

जो गुंडे हैं गरियाये,
मोटर-साइकिल की शान में डूबे ।

प्रेमियों ने तलाशे कोने,
यौवन की उड़ान में डूबे ।

ढलती शाम का दर्द ढो रहे,
प्रार्थना और अज़ान में डूबे ।

जो बहक गये क़दम उनके,
जवानी के उफ़ान में डूबे ।

पार्टी की छवि सुधारने को,
राजनीति और राम में डूबे
[] राकेश 'सोहम'