Wednesday, 24 November 2010

युधिष्ठिर का कुत्ता

(यह व्यंग्य 'समकालीन अभिव्यक्ति' के 'वक्रोक्ति' स्तम्भ में प्रकाशित हुआ था। यहां इसे दो किश्तों में दिया जा रहा है।)
मैं धर्मराज युधिष्ठिर का कुत्ता बोल रहा हूँ। पूरी सृष्टि और पूरे इतिहास का वही एक्सक्ल्यूसिव कुत्ता जो उनके साथ स्वर्ग गया था। अब मैं स्वर्ग में नहीं हूँ। किसी धरती जैसे ग्रह पर मैं वापस आ गया हूँ और समझने का प्रयास कर रहा हूँ कि कहीं उसी भारतवर्ष में तो नहीं हूँ जहां से युगों पहले स्वर्ग गया था। ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि यहाँ के बारे मे यह प्रचार है कि धरती का स्वर्ग भारतवर्ष ही है, देवभूमि है।जब बिना सत्कर्म के ही मैं धरती से स्वर्ग ले जाया जा सकता हूँ तो वहां से अकारण तो मैं नर्क में फेंका नहीं जा सकता । जो भी हो ,जब मैं अपने महाभारत काल की पारिवारिक, सामाजिक और राजनैतिक परिस्थितियों का मिलान यहां की आज की परिस्थितियों से करता हूँ तो लगता है कि मैं उस देश ही नहीं अपितु उसी काल में वापस लौट आया हूँ। कभी - कभी तो भ्रम होने लगता है कि मैं धर्मराज के साथ स्वर्ग गया भी था या नहीं! कहीं गहरी नींद में सो तो नहीं रहा था ?
मैं धरती का सबसे सफल कुत्ता हूँ । ऐसा कुत्ता जिसके भाग्य से बडे- बड़े लोग ईर्ष्या रखते हैं। वैसे भी ईर्ष्या रखना बड़े लोगों का प्रमुख कार्य है। यहां तक कि धर्मराज के भाई भी मुझसे जलते हैं क्योंकि वे भी वह पद न पा सके जो मुझे मिला है। अब यह बात अलग है कि यहाँ तक पहुँचने में मुझे कितना कुत्तापना करना पड़ा , यह मैं ही जानता हूँ। इतने युगों बाद मैं जाकर समझ पाया हूँ कि स्वर्ग का सुख पाने के लिए कितना झुकना पड ता है और आत्मा को कितना मारना पडता है। मुझसे तो अच्छे वे हैं जो सशरीर आने के विषय में नहीं सोचते । दरअसल बात यह है कि स्वर्ग में आने के लिए जीव को या तो अपना शारीर त्यागना पड ता है या फिर आत्मा । मेरे बारे में आपको जानकारी है ही कि मैं कैसे आया , इसलिए आप मेरे त्याग का अंदाजा लगा सकते हैं ।
मेरे प्रसंग से आप इतना तो अवश्य जान गए होंगे कि बड़े आदमी का कुत्ता होना एक आम आदमी होने से बेहतर है । पूर्व जन्म के पुण्य और बड़े सौभाग्य से कोई आत्मा किसी रईस के कुत्ते के रूप में अवतरित होती है। जिस वैभव और सुविधा में बड़े -बड़े ज्ञानी, विद्वान और महात्मा नहीं पहुँच पाते , वहां रईस का कुत्ता पहुँच जाता है। उसे अधिकार मिल जाता है कि वह किसी पर भौंक सके किसी को भी देखकर गुर्रा सके और किसी को भी काट सके। वह ऐसा कुछ भी कर सकता है जिससे कि उसका स्वामी खुश हो जाए और स्वामी का खुश होना अपने आप में एक उपलब्धि है। व्यवस्था चाहे राजतंत्र की हो या लोकतंत्र की, सुखी वही होता है जो स्वामी को खुश कर ले।
हो सकता है कि मेरे स्वर्ग जाने की उपलब्धि से मेरी जाति वाले गौरवान्वित हों। ऐसा आजकल हो रहा है। आप कितने भी पतित और शोषित समाज से हों , आपकी पूरी बिरादरी दाने -दाने को तरस रही हो, किन्तु अपनी बिरादरी का कोई इकलौता प्राणी भी सिंहासनारूढ हो जाए तो आप स्वयं को सिंहासनारूढ समझने लग जाते हैं। आपको अपनी भुखमरी भूल जाती है। किन्तु मेरी बिरादरी में भी ऐसा ही हो, जरूरी नहीं। हम लोग तो अपना सारा जीवन अपनी बिरादरी पर भौंक कर ही निकाल देते हैं।मैं अभी भी गलियों में निकलूँ तो मेरे भाई मुझपर तुरन्त ही झपट्‌टा मारेंगे।उन्हें सामाजिक चेतना से कुछ भी लेना - देना नहीं है।
हाँ, हमारे और आदमियों के बीच एक समानता जरूर है। हम दोनों ही अपने अधिकार क्षेत्र में किसी की दखलन्दाजी पसन्द नहीं करते । यदि हम एक बार किसी उच्च पद पर पहुँच जाएं तो वहाँ किसी और को पहुँचने नहीं देना चाहते । मैं स्वयं किसी कुत्ते को स्वर्ग आते देखना पसन्द नहीं करूँगा । उच्च पद की तो बात छोड़िए, हमें यह भी नहीं पसन्द कि कोई हमारी गली में आए , भले ही उसकी नीयत हमारा नुकसान करने की न हो। हम यह भी नहीं पसन्द करते कि कोई हमारे शहर में आए । हमें डर है वह हमारी राजनीति और वोट बैंक पर असर डालेगा। वैसे हम प्रचारित यही करते हैं कि वह हमारी रोटी खा जाएगा। इससे हमें पूरे शहर के कुत्तों का समर्थन मिलता है और मरियल से मरियल कुत्ता भी भौंकने के लिए आगे आ जाता है। हमारे दक्षिण के कुछ भाइयों ने ऐसा काम अभी बड़े पैमाने पर किया है जब उन्होंने उत्तर के कुत्तों को भौंक - भौंककर अपने शहर से भगा दिया । ऐसा काम आदमी भी करते हैं।
अपनी जाति पर भौंकने में हमें बड़ा मजा आता है। कोई भी अपरिचित मिल जाए, हम अपने मुँह का निवाला छोड कर उस पर भौंकने निकल पडते हैं ।मुझे लगता है कि अपनी बिरादरी पर भौंकने से हमारी अच्छी छवि बनती है। हम लोग जातिवादियों की श्रेणी में नहीं आते और धर्मनिरपेक्ष होने का लाभ सहज ही प्राप्त कर लेते हैं।लडते दूसरी बिरादरी के लोग भी हैं परन्तु अकारण ही नहीं। कोई ना कोई स्वार्थ होने पर ही सींग भिड़ाते हैं। निःस्वार्थ लड़ाई तो केवल हम लोग यानी कुत्ते ही लडते हैं। यह बात अलग है कि हमारी इस अनावश्यक लड़ाई का खामियाजा हमारे हर भाई को भुगतना पडता है। लोग कहते हैं कि अगर हम एक दूसरे पर न भौंकें तो एक दिन में हम चालीस मील तक जा सकते हैं परन्तु जा पाते हैं केवल चार मील ही! बाकी का समय कभी भौंकने , कभी दुम दबाने और कभी दाँत निपोरने में चला जाता है। सच तो यह है कि अपनी गली में आए अपरिचित कुत्ते पर भौंकने से अजीब संतोष की अनुभूति होती है और आत्मविश्वास पैदा होता है।

9 comments:

  1. अपनी गली में आए अपरिचित कुत्ते पर भौंकने से अजीब संतोष की अनुभूति होती है और आत्मविश्वास पैदा होता है..
    सही है...

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  2. वाह....

    एकदम सटीक व्यंग्य....बहुत बहुत लाजवाब !!!!

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  3. yakeen maanie, krishn chander ke baad yaha aapki hi aatmakatha hai jisne mujeh aatyantik roop se prabhavit kiya hai. jajaar baar badhai. aur haan, kal hi bhairava baaba ki jayanti hai, isalie aapka panjasparsh bhi kar raha hoon. aashirvad den.

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  4. prabhooji,
    spasht karen , ashirvad kiska chaahiye, mera ya swargvasi kutte ka ?

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  5. हुज़ूर...नमस्कारम्‌!

    आज आपको खोज ही लिया मैंने! आपने तो कभी नहीं बताया कि आप ब्लॉगिंग भी करते हैं...!

    आप युधिष्ठिर के कुत्ते के बहाने अपने समय के कितने ही महत्त्वपूर्ण विषयों पर प्रहार कर गये...सारे व्यंग्य-तीर सही निशाने पर लगे हैं...भाई जी! ...सो बधाई!

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सुस्वागतम!!