Friday, 10 September 2010

कलियां भी आने दो

रतन

कांटे हैं दामन में मेरे
कुछ कलियां भी आने दो
मुझसे ऐसी रंजिश क्यों है
रंगरलियां भी आने दो

सूखे पेड़ मुझे क्यों देते
जिनसे कोई आस नहीं
कम दो पर हरियाला पत्ता
और डलियां भी आने दो

तेरी खातिर भटका हूं मैं
अब तक संगी राहों पर
जीवन के कुछ ही पल तुम
अपनी गलियां भी आने दो

6 comments:

  1. jnaab bhut achchi prstuti. bdhaayi ho. akhtar khan akela kota rajsthan

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  2. एक एक कर कर,
    उम्मीदें टूट है जाती,
    बची हुई भी जाने दो अब,
    और सुकूँ को आने दो ..

    अच्छी प्रस्तुति ...

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  3. अच्छी प्रस्तुति। आभार।

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  4. बहुत सुन्दर, आपका अधिकार है।

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  5. वाह....बहुत ही सुन्दर भावाभिव्यक्ति...

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  6. शानदार
    अनुपम कविता !

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