Sunday, 29 August 2010

बेरुखी को छोडि़ए

रतन

प्यार है गर दिल में तो फिर
बेरुखी को छोडि़ए
आदमी हैं हम सभी इस
दुश्मनी को छोडि़ए

गैर का रोशन मकां हो
आज ऐसा काम कर
जो जला दे आशियां
उस रोशनी को छोडि़ए

हैं मुसाफिर हम सभी
कुछ पल के मिलजुल कर रहें
दर्द हो जिससे किसी को
उस खुशी को छोडि़ए

प्यार बांटो जिंदगी भर
गम को रखो दूर-दूर
फिक्र आ जाए कभी तो
जिंदगी को छोडि़ए

गुल मोहब्बत के जहां पर
खिलते हों अकसर रतन
ना खिलें गुल जो वहां तो
उस जमीं को छोडि़ए

जानते हैं हम कि दुनिया
चार दिन की है यहां
नफरतों और दहशतों की
उस लड़ी को छोडि़ए

12 comments:

  1. खुबसूरत गज़ल हर शेर बहुत खूब , मुवारक हो

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  2. हैं मुसाफिर हम सभी
    कुछ पल के मिलजुल कर रहें
    दर्द हो जिससे किसी को
    उस खुशी को छोडि़ए ।
    क्या बात है रतन जी, बहोत खूब ।

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  3. कविता तो सुंदर है ही आपकी. ब्लाग का हैडर भी ताज़गी भरा लगा :)

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  4. सही कहा भाई रतन आपने। कहीं पढा था “नफ़रत की तो गिन लेते हैं, रुपया आना पाई लोग। ढ़ाई आखर कहने वाले, मिले न हमको ढ़ाई लोग।” ऐसे में आपका यह निवेदन लोगों पर असर करे यही दुआ है,

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  5. vaah bhyi vaah bhut khub achchi baat achche alfaaz or achche andaaz ab men kya khun bhaayi mubaark ho. akhtr khan akela kota rajsthan

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  6. बहने दो, की रोकोगे तो बस होगी बेचैनी,
    एक साँस लीजिये 'मजाल', दूसरी को छोड़िए

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  7. हैं मुसाफिर हम सभी
    कुछ पल के मिलजुल कर रहें
    दर्द हो जिससे किसी को
    उस खुशी को छोडि़ए

    बहुत खूबसूरत बात कही है ..

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  8. हर शेर लाजवाब. सुंदर प्रस्तुति.

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  9. प्रभावशाली ढंग से कही गयी बहुत ही कल्याणकारी बात...
    सार्थक सन्देश दिया आपने इस सुन्दर रचना के माध्यम से.....

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