Saturday, 17 April 2010

क्यों जाने दिया उसे?

रतन

1
कोलाहल का तांडव
खंडित है नीरव
भीड़ चहुंओर
भागा-भागी का दौर
सब हैं अपने काम में मगन
फुरसत नहीं किसी को
पल भर की
सुबह हुई शाम हुई
जिंदगी रोज तमाम हुई
2
जहां थी कोलाहल की आंधी
सब कुछ पड़ा है आज मंद
खामोश दरो-दीवारें
बे-आवाज जंजीरें
न घुंघरू की छम छम
न तबले की थाप
न सारंगी की सुरीली धुनें
न हारमोनियम का तान
न कोई कद्रदान
न किसी का अलाप
न रिक्शे का आना
न ठेली का जाना
न कुत्ता, न कमीना
गली है सूना-सूना
बस आती है आवाज
सायरन की अक्सर
तो होती है कानाफूसी
घर ही घर में
न आवाज बाहर को जाती किसी की
कि आई पुलिस है
मोहल्ले में अपने
3
राम-रहीम
दो दिल हैं मगर
एक जां हैं वे बचपन से
जब से वे स्कूल गए
अब हैं अधेड़ मगर
उनकी दोस्ती है पाक, जवां
आज भी, अब भी
एक-दूसरे से मिलना होता है रोज
न मिले, एक दिन
तो लगता है ऐसे
कि गोया मिले हैं नहीं हम बरस से
4
है एक दिन यह भी
कि सूनी हैं सड़कें
लगी है शहर में
पहरेदारी कफ्र्यू की
गुजरता है दिल पर
नहीं जाने क्या-क्या
कि मिलना हो कैसे हमारा-तुम्हारा
मोहल्ला है दूर
बंटा हुआ, जातियों में
राम का अपना, रहीम का अपना
दोनों के मोहल्ले वाले
एक दूसरे के दुश्मन
मारने मरने की बात
होती है अक्सर
5
एक दिन कुछ पल के लिए
शाम को मिलती है छूट
थोड़ी देर के लिए क‌र्फ्यू में
रहीम आ जाता है मौका पाकर
बचते बचाते राम से मिलने उसके घर
राम खुश हुआ
रहीम को सामने देख
गले मिल दोनों ने दिल से
किया ईश्वर का शुक्रिया
राहत की सांस ली
कि चलो हम मिले तो सही
फिर दोनों ने कोसा उनको
जिन्होंने बिगाड़ी है शहर की तस्वीर
भरे हैं जिन्होंने
लोगों के मन में नफरत के बीज
अल्लाह-ईश्वर को बांटने वाले
वे सैयाद अपने दामन को काटकर तो देखें
उनका लहू भी लाल ही है
ठीक वैसा ही, जैसा हमारा
क्या फर्क है उनमें और मुझमें?
6
यही सोचा दोनों ने अपने अपने मन में
तभी आई शोर की बारिश
खत्म हुई शांति
वजह बना एक बलवा
और फिर मच गया हल्ला
जय श्री राम, अल्ला हो अकबर
मरने की चीख
मारने की पुकार
आह, मर गया, मार डाला का शोर
इस पर नहीं था किसी का जोर
7
तभी दरवाजे पर हुई आहट
सांसें थम गई, लगा कि दम गया
राम-रहीम थे सकते में
जाने क्या होगा अब?
तभी हुई दरवाजे पर दस्तक
किसी ने हाथ से दी थपकी
बोला, दरवाजा खोलो राम भाई
क्यों? आवाज आई अंदर से
मुझे जरूरी काम है
मैं अभी किसी से नहीं मिल सकता
आप भी जाइए, बाद में आइएगा
तभी दूसरी आवाज आई
तुम हिंदू हो या मुसलमान?
राम को समझते देर न लगी
उसने रहीम को गले लगाया
पीठ पर हाथ फेरा और
ईश्वर को याद किया, कहा,
आप जैसा मुझे जानते हैं
मैं वही हूं, और कुछ न समझें
पर दरवाजा अभी नहीं खुलेगा
तीसरी आवाज आई
हम दरवाजा तोड़ दें तो?
तुम्हारे रहीम का सिर मरोड़ दें तो?
देखो, उन्होंने हमें किस तरह मारा है?
तुम उन्हें घर में छिपाए बैठे हो?
8
भगवान की कसम है, मेरे पास कोई नहीं
रहीम अपने घर में है
फिर दरवाजा खोलते क्यों नहीं?
मैं अभी ऐसा नहीं कर सकता
चलती रही बातों की झड़ी
बातचीत की हुई लंबी कड़ी
लेकिन राम ने वही किया
जो सोचा था
वह वहीं पर ठहरा रहा
वे चिल्लाकर कुछ समय बाद जाने लगे
अंदर दोनों मुस्कुराने लगे
गले मिले और खुशी के आंसू बहाने लगे
9
कुछ पल बीता आंसुओं के सैलाब के साथ
दोनों ने न कोई बात की
न कोई सरगोशी हुई
दिल बोझिल था
पर मन में थी खुशी
कि हमने खुदा जैसा दोस्त पाया है
बिल्कुल राम जैसा
था यही गुमान मन में
इसी के साथ कुछ पल गुजरा
शाम हुई, रात की चादर बिछने लगी
रात की ठंडक शहर को लीलने लगी
10
यह हुआ अहसास रहीम को
कि इस रात की ओट में मैं
जा सकता हूं घर को
सोचता यह भी मन था
कि यदि आज राम न होता
तो क्या होता?
मैं क्या होता?
फिर उसने कह दी घर जाने की बात
राम ने कहा, कहां?
जरा सोच, यदि वे मिल गए तो?
क्या होगा तेरा?
रहीम ने चुपचाप राम की शक्ल देखी
वह सोचने लगा मन में
मेरी वजह से तू कितनी परेशानी झेलेगा?
क्यों दुख मेरे तू लेगा?
कहा राम ने, नहीं
हम यहीं रहेंगे, भूखे, रूखे, सूखे
जब तक शहर शांत नहीं हो जाता
लोग जब तक होश में नहीं आ जाते
लेकिन वहां की भी तो सोच
जहां से मैं आया हूं?
घर के लोग क्या-क्या सोचते होंगे?
मन ही मन वे क्या बुनते होंगे?
उनके मन की हालत सोच
मेरे भाई मेरे दोस्त
11
निकला रहीम बुझे मन से
राम का भी कलेजा मुंह को आया
एक को घर की चिंता थी
दूसरे को मानवीय पक्ष सता रहा था
क्या करें, क्या न करें
तभी रहीम ने रूंधे गले से
आंख में आंसू लिए
चला थके कदमों से
बुझी उम्मीदों के साथ
राम ने भी विदा किया
अश्रुधारा के साथ रहीम को
दरवाजे को धीरे से खोल
देखा बाहर चारों ओर
फिर दी रहीम को चादर
ओढ़ ले इसे
निकल पड़ा मुंह ढंक कर वो
अपने घर की ओर
12
विदा हुआ जब दोस्त दोस्त से
चैन गया और नींद गई
रात गुजारी पलकों में
डर और खौफ के साये में
दोस्त हमारा घर पहुंचा या नहीं
क्या हुआ उसका?
13
सुबह हुई, तो डर की चादर
रात की चादर के संग विदा हो गई
सुबह चमकीली थी
उजाले में अलग आभा थी
जो खुशी भी दे रही थी लेकिन डर भी
क्यों आई है आज की सुबह ऐसी सुहानी
निराली और विकराली?
तभी आया अखबार वाला
खिड़की से दिए दो रुपये और लिया अखबार
टिक कर कुर्सी पर बैठा
फिर देखा अखबार का पहला पन्ना
यह क्या? निकला मुंह से
हठात राम का मन आहत हुआ
उसकी आंख में थी एक तस्वीर
वैसी ही दाढ़ी, वैसा ही कुर्ता-पायजामा, बिखड़े बाल
उसी चादर में लिपटा रहीम
मगर एक अलग रंग भी था
इन सबके साथ उसके पूरे शरीर पर
जो हमारे जैसा ही था सूर्ख, लाल-लाल
वह आंखों की गहराई में समा गया
अंदर तक, अंतर तक
एक बार फिर बहे आंसू
फिर उसे कोसा
क्यों गया वह?
फिर खुद को कोसा
क्यों जाने दिया?
आखिर क्यों जाने दिया उसे?

6 comments:

  1. kahin chahal pehel, kahin khamoshi, kahin milan, kahin irah, kahi mohabbat kahin nafrat...waah poore sheher ka haal bayan kar diya...

    http://dilkikalam-dileep.blogspot.com/

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  2. एक बार फिर बहे आंसू
    फिर उसे कोसा
    क्यों गया वह?
    फिर खुद को कोसा
    क्यों जाने दिया?
    आखिर क्यों जाने दिया उसे?

    bahut sundar rachna
    bandhai aap ko is ke liye



    shekhar kumawat

    http://kavyawani.blogspot.com

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  3. बहुत ही मार्मिक चित्र खीचें गये हैं रचना में!

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सुस्वागतम!!