Friday, 16 April 2010

क्यों मुस्काते हो..?


रतन
 जब मैं सदमे में जीता हूं
तब तुम क्यों मुस्काते हो?
मंजर है नहीं आज सुहाना
क्यों तुम गीत सुनाते हो?
पाया नसीबा हमने ऐसा
अक्सर तुम कहते मुझसे
मैं तो हूं पछताने वाला
अब तुम क्यों पछताते हो?
जब तक था मन साथ तुम्हारे
तुमने दूरी रखी कायम
अब हारा हूं थका हुआ हूं
तो क्यों कर तड़पाते हो?
तन खोया मन भूल चुका है
वो सपनों के घर-आंगन
रातों में ख्वाबों में क्यों तुम
आकर मुझे सताते हो?
मेरी अपनी राम कहानी
है मैं उस पर रोता हूं
अब क्या पाओगे मुझसे तुम
नाहक अश्क बहाते हो?
बुझी हुई तकदीर है मेरी
अब न नसीबा जागेगा
जान चुके हो रोज रोज क्यों
आकर शमां जलाते हो?

4 comments:

  1. बढ़िया अभिव्यक्त किया मनोभावों को........."

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  2. सुन्दर रचना. सुन्दर अभिव्यक्ति.

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  3. अब क्या पाओगे मुझसे तुम
    नाहक अश्क बहाते हो?
    बुझी हुई तकदीर है मेरी
    अब न नसीबा जागेगा
    जान चुके हो रोज रोज क्यों...
    सुन्दर रचना.

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