Friday, 19 February 2010

फाल्गुन आया रे !


गोरी को बहकाने
फाल्गुन आया रे ।

रंगों के गुब्बारे
फूट रहे तन आँगन,
हाथ रचे मेंहदी के
याद आते साजन ॥

प्रेम-रस बरसाने
फाल्गुन आया रे ।

यौवन की पिचकारी
चंचल सा मन,
नयनों से रंग कलश
छलकाता तन ॥

तन-मन को भरमाने
फाल्गुन आया रे ।

[] राकेश 'सोहम'


7 comments:

  1. आ गया है. स्वागतम

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  2. गली-गली में घूम रहीं हैं, हुलियारों की टोली।
    नाच उठी चञ्चल नयनों में, रंगों की रंगोली।।

    उड़ते हैं अम्बर में गुलाल,
    नभ-धरा हो गये लाल-लाल,
    गोरी का बदरंग हाल, थिरकी है हँसी-ठिठोली।
    नाच उठी चञ्चल नयनों में, रंगों की रंगोली।।

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  3. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    इसे 20.02.10 की चिट्ठा चर्चा (सुबह ०६ बजे) में शामिल किया गया है।
    http://chitthacharcha.blogspot.com/

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  4. गोरी को बहकाने
    तन-मन को भरमाने
    फाल्गुन आया रे ।
    बहुत सामयिक रचना...आभार.

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  5. आ गया फ़ागुन, झंकार होने लगी है।

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  6. फागुनी रंगों की अद्भुद छटा बिखेरती सरस मुग्धकारी रचना....

    पढवाने के लिए बहुत बहुत आभार...

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सुस्वागतम!!