Wednesday, 20 January 2010

एक मगही गीत

गीतकार -पंडित युदनंदन शर्मा

सब कोई गंगा नेहा के निकल गेल,
आ तू बइठल के बइठले ह।
ढिबरी भी सितारा हो गेल,
आ ढोलकी भी नगाड़ा हो गेल,
आ तू फुटल चमरढोल के ढोले ह।

झोपड़ी भी अटारी हो गेल,
कसैली भी सुपारी हो गेल।
कुर्ता भी सफारी हो गेल,
छूरी भी कटारी हो गेल,
आ तू ढकलोल के ढकलोले ह।

ढकनी भी ढकना हो गेल,
कोना भी अंगना हो गेल।
साजन भी सजना हो गेल,
विनय भी बंदना हो गेल,
आ तू बकलोल के बकलोले ह।।

4 comments:

  1. क्या बात है जी, मज़ा आ गया!
    --
    "सरस्वती माता का सबको वरदान मिले,
    वासंती फूलों-सा सबका मन आज खिले!
    खिलकर सब मुस्काएँ, सब सबके मन भाएँ!"

    --
    क्यों हम सब पूजा करते हैं, सरस्वती माता की?
    लगी झूमने खेतों में, कोहरे में भोर हुई!
    --
    संपादक : सरस पायस

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  2. झोपड़ी भी अटारी हो गेल,
    कसैली भी सुपारी हो गेल।
    कुर्ता भी सफारी हो गेल,
    छूरी भी कटारी हो गेल,
    आ तू ढकलोल के ढकलोले ह..
    vaah,mnbhavn lga yh bhee.

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  3. WAAH !!! BAHUTE BADHIYA...AANAND AA GAIL...

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  4. बहुत सुन्दर!
    ज्ञानदायिनी मातु का जो करते हैं ध्यान!
    माता उनके हृदय में भर देती हैं ज्ञान!!

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सुस्वागतम!!